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सालों तक उत्पीड़न झेलने के बाद अब संदेशखाली की महिलाओं को किससे है इंसाफ की उम्मीद?

संदेशखाली मामले के एक आरोपी हज़रा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. लेकिन भाजपा राज्य सरकार को इस बात पर लगातार घेर रही है कि इस मामले का मुख्य आरोपी शेख अब तक फरार है

संदेशखाली में महिलाओं पर अत्याचार के मामलों की वजह से राज्य सरकार कठघरे में
संदेशखाली में महिलाओं पर अत्याचार के मामलों की वजह से राज्य सरकार कठघरे में
अपडेटेड 7 मार्च , 2024

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से 75 किलोमीटर दूर और बांग्लादेश की सीमा से 15 किलोमीटर पहले एक छोटे से छायादार गांव संदेशखाली की बसावट है. जहां पहुंचने के लिए नाव का सफर मुश्किल साबित होता है. लेकिन इसी साल 8 फरवरी को मछलियों के पोखरों वाले इस गांव से उपजा गुस्सा मैंग्रोव के जंगल और सुंदरवन की नम मिट्टी पार करता हुआ देशभर में पहुंच गया.

महिलाओं के खिलाफ जघन्य और सिलसिलेवार अपराधों के आरोपों से गुस्साया यह गांव तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के टकराव की जमीन बन कर उभरा है. भाजपा की राज्य इकाई से लेकर पार्टी आलाकमान तक पूरी ताकत से टीएमसी के खिलाफ हमलावर हैं. 

यह वही संदेशखाली है, जहां की महिलाओं ने 8 फरवरी के दिन हाथ में झाड़ू, डंडे और जूते लेकर एक बड़ा प्रदर्शन किया. उनकी मांग थी कि पुलिस प्रशासन उन्हें राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के तीन नेताओं शाहजहां शेख, शिबू प्रसाद हज़रा और उत्तम सरदार के आतंक से बचाए.

जल्द ही आंदोलनकारी महिलाओं की ओर से, जिनमें से ज्यादातर अनुसूचित जनजाति की हैं, लगातार यौन बदसलूकी और उत्पीड़न के अकथनीय आतंक, जमीन पर कब्जे और पुलिस के हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के आरोपों का तांता लग गया. उन्होंने कहा कि हज़रा और सरदार ने महिलाओं का उनके घरवालों के सामने यौन उत्पीड़न किया. इन आरोपों में पीड़िता के तौर पर दर्ज एक महिला बताती हैं, "वे लोग हम लोगों को पार्टी ऑफिस में बुलाता था. हमारा भी हाथ पकड़कर खींचा था. हमारा साड़ी खोल दिया था."

महिलाओं ने कहा कि यह सब बरसों से चल रहा है और कभी किसी शिकायत की सुनवाई नहीं हुई. महिलाओं ने एक पीड़ित अध्यापक के बारे में बताते हुए हज़रा पर आरोप लगाया कि वह अध्यापक की पत्नी को अगवा करके ले गया था. पुलिस से शिकायत के बाद कोई कार्यवाही न होती देखकर उस अध्यापक ने गांव ही छोड़ दिया और आज भी लापता है. सभी महिलाओं ने एक सुर में कहा, "पुलिस ने हमारी शिकायतों को फाड़कर फेंक दिया और हमें कहा कि न्याय के लिए हम शिबू हज़रा या शाहजहां शेख से मिलें."

इन आरोपों ने सूबे की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा को सियासी खाद-पानी मुहैया कराया. भाजपा के नेताओं ने संदेशखाली की ओर कूच किया. पुलिस ने पूरे इलाके में धारा 144 लगाकर इंटरनेट बंद कर दिया. पुलिस और भाजपा नेताओं के बीच झड़प में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार घायल हुए.

दूसरी ओर सूबे के राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस पीड़ित महिलाओं से मुलाकात कर उन्हें न्याय का भरोसा दिला चुके थे. आखिरकार इस मामले पर लंबी चुप्पी के बाद ममता बनर्जी सरकार ने खानापूर्ति करने के लिए सरदार को पार्टी से निलंबित कर दिया और उसे पुलिस ने अरेस्ट कर लिया. पार्टी ने बयान दिया कि सरदार की इस मामले में संलिप्तता सामने नहीं आई है.

पश्चिम बंगाल पुलिस लगातार इन आरोपों को खारिज कर रही थी. एक तरफ पुलिस ने संदेशखाली से शिकायतें मिलने की बात तो कही, लेकिन यह भी कहा कि इन शिकायतों में कहीं भी यौन उत्पीड़न या बलात्कार की धाराओं का जिक्र नहीं है. लेकिन जब 17 फरवरी को मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान में एक पीड़िता ने कहा कि हज़रा ने उसका बलात्कार किया तो पुलिस को मुकदमा लिखना पड़ा.

उसके बाद हज़रा को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. लेकिन जिस सवाल पर भाजपा राज्य सरकार को लगातार घेर रही है वह यह है कि इस मामले का मुख्य आरोपी शेख अब तक फरार है. 5 जनवरी को ईडी की टीम जब उसके धामाखाली में स्थित निवास पर छापा मारने पहुंची थी, तो स्थानीय लोगों ने टीम पर हमला कर दिया था.

हमले में ईडी के तीन अधिकारी जख्मी हो गए थे. उसके ठीक बाद शेख अपने घर से भाग गया. उस पर टीएमसी से जुड़े नेताओं के लिए पैसों की हेराफेरी करने के आरोप भी थे. हालिया घटनाक्रम में भी शेख किसी को नहीं मिला. पुलिस सूत्रों ने कहा कि वह पास सटे बांग्लादेश भाग गया है, क्योंकि वहां पर भी उसका घर है. वहीं, पत्रकारों और स्थानीय सूत्रों ने कहा कि वह 24 परगना छोड़कर कहीं नहीं गया है.

शोक सभा कलकत्ता हाइकोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद संदेशखाली में स्थानीय महिलाओं से मिलने पहुंचे भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी

शेख के बारे में स्थानीय सूत्रों ने बताया कि वह बांग्लादेश लांघकर भारत आया था और यहां खेतों तथा ईंट भट्टों पर काम करने लगा. कुछ दिन नाव और सवारी गाड़ी चलाई. फिर साल 2004 में उसके मामा मुस्लिम शेख ने उसे माकपा (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) से जोड़ा. उसके बाद उसने स्थानीय लोगों के खेतों पर कब्जा करना शुरू किया.

वह यहां के लोगों से उनके उपजाऊ खेत लीज पर लेता, उनमें पानी भरकर मछली और झींगा पालने के लिए भेड़ी (तालाब) बना देता. जो किसान खेत देने से मना कर देता, वह उनके खेतों को खोदकर उनमें पंप से उस इलाके का खारा पानी भर देता. खेत की उपज खत्म हो जाती, और फिर किसान को हारकर उस तालाब को शेख को देना पड़ता ताकि उसमें मछली पालन का काम हो सके.

किसानों को इस एवज में पैसे का वादा किया जाता, एक दो साल तक पैसा देने के बाद शेख पैसा देना बंद कर देता. किसान अपनी जमीन सत्ता समर्थित भूमाफियाओं के हाथ खो देता. आरोप हैं कि मछली पालन और विभिन्न कामों से मिलने वाले पैसे सत्ता तक जाते थे.

साल 2010 में जब धीरे-धीरे वामपंथी राजनीति को किनारे लगाकर टीएमसी अपनी जगह बना रही थी, शेख भी इस समीकरण को समझ रहा था. उसने 2012 में पार्टी बदल ली. टीएमसी का राज आने के बाद उसका काम बदस्तूर चलता रहा. सूत्र बताते हैं कि उसे सीधे तौर पर तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव मुकुल रॉय और उत्तर 24 परगना के जिलाध्यक्ष ज्योतिप्रिय मलिक ने प्रश्रय दिया था.

शेख पर आरोपों के पीछे उसकी तेजी से बदली आर्थिक स्थिति है जिसने उसे एक समय स्थानीय मजदूर की हैसियत से उठाकर सीधा करोड़ों रुपए कमाने वाले कारोबारी में तब्दील कर दिया. उसके सभी कामों में उसकी मदद हज़रा और सरदार करते थे.

कोलकाता में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रतिम रंजन बोस बताते हैं, "शाहजहां शेख जो आज कर रहा है, उसके पहले यह काम लेफ्ट से जुड़े गुंडे और गिरोहबाज ईसा लश्कर और मजीद मास्टर करते थे. शेख इस कड़ी में बस एक और नाम भर है. अगर आप सुंदरबन के इलाके में आगे बढ़ेंगे तो आपको ऐसे कई शाहजहां शेख देखने को मिलेंगे."

बोस कहते हैं, "यह सब '90 के दशक में शुरू हुआ, जब राज्य सरकार ने झींगा पालन को बढ़ावा देना शुरू किया. यह इस इलाके के लिए वरदान की तरह था क्योंकि फैक्ट्री-ऑफिस की अनुपस्थिति वाले इलाके को झींगे में ज्यादा कमाई दिखी. यहां के खारे पानी की वजह से झींगा पालना ज्यादा आसान था. इसलिए किसान उस ओर घूमे."

"लेकिन शाहजहां शेख जैसे लोग बीच में अपना हिस्सा काटने के लिए बैठे थे. उन्होंने किसानों की जमीन पर कब्जा करना शुरू किया. इसके खिलाफ आवाज उठाने वाले किसानों को प्रताड़ित किया गया, उनके घरों की महिलाओं को प्रताड़ित किया गया. प्रताड़ना की यह कहानी बलात्कार तक गई."

वहीं, टीएमसी की विधायक और कैबिनेट मंत्री शशि पंजा कहती हैं,"जो भी इंसान ऐसी गतिविधियों में लिप्त है, उसे कोई हक नहीं है खुद को पार्टी वर्कर बताने का." वे भाजपा पर आरोप लगाती हैं कि पार्टी मामले पर पॉलिटिक्स कर रही है.

इस पर भाजपा की प्रवक्ता शतरूपा कहती हैं, "हमने बस वही कहा है, जो लोगों ने बताया. इसे राजनीति की तरह नहीं देखना चाहिए." कोलकाता हाइकोर्ट के दखल के बाद जब पूरे संदेशखाली में धारा 144 लागू करने के फैसले को खारिज किया गया तब वहां कुछ और नेता दाखिल हो सके. मामले में चौतरफा आक्रोश के बाद पीड़ितों को इंसाफ का भरोसा मिला है और दशकों से भय की परछाईं में रह रही महिलाओं में उम्मीद की किरण जगी है.

सिद्धांत मोहन

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