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ईडी की गिरफ्तारी में जेल जाने से ऊंचा हुआ है हेमंत सोरेन का राजनीतिक कद?

भाजपा ने वक्त रहते इसे भांपा है. यही वजह है कि विधानसभा में विश्वास मत के दौरान भाजपा या उसके सहयोगी दलों के किसी भी नेता ने सीधे सोरेन को निशाने पर लेने की बजाए कांग्रेस पर निशाना साधा

क्या हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद आदिवासियों में उनके प्रति सहानुभूति उपजी है?
क्या हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद आदिवासियों में उनके प्रति सहानुभूति उपजी है?
अपडेटेड 4 मार्च , 2024

झारखंड की पहचान अस्थिर सरकारों वाले राज्य के रूप में रही है. यह छवि बीते नौ साल में थोड़ी धुंधली पड़ रही थी, लेकिन वक्त ने फिर करवट ली. अपने कार्यकाल के पांचवें साल में प्रवेश कर चुके हेमंत सोरेन को इस्तीफा देना पड़ा. बीती 31 जनवरी की रात उन्हें ईडी ने राजभवन के अंदर गिरफ्तार कर लिया.

गिरफ्तारी के बाद जिस भाव-भंगिमा के साथ वे ईडी की गाड़ी में फ्रंट सीट पर बैठे और समर्थकों, मीडियाकर्मियों को थम्स अप किया, उससे उन्होंने मजबूत सियासी संदेश देने की कोशिश की. थोड़ी देर बाद थोड़े मायूस, थोड़े मजबूत चेहरे के साथ उनकी पत्नी कल्पना मुर्मू सोरेन भी उनसे मिलने गईं.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह दृश्य झारखंड सहित देशभर की आदिवासी राजनीति और आदिवासियों पर अपना प्रभाव छोड़ने जा रहा है? क्या इस गिरफ्तारी ने सोरेन का सियासी कद ऊंचा कर दिया है?

रांची के दीपाटोली कैंट स्थित एक पान वाले मनोज कुमार (बदला हुआ नाम) खुद को कट्टर भाजपा समर्थक बताते हैं लेकिन वे भी कहते हैं, "भाजपा वाला सब हद कर दिया. इतना नहीं करना चाहिए था. ये गलत हुआ है. आजकल किस पार्टी में भ्रष्ट आदमी नहीं है जी?"

झारखंड की राजनीति को पिछले 20 साल से कवर कर रहे पत्रकार सुरेंद्र सोरेन कहते हैं, "हेमंत सोरेन अब तक बतौर राजनेता शिबू सोरेन के बेटे ही थे. लेकिन गिरफ्तारी ने उन्हें देश के स्तर पर बतौर मजबूत आदिवासी नेता स्थापित कर दिया है. या यूं कह लें कि राजनीति में उनका पुनर्जन्म हुआ है."

सोरेन की गिरफ्तारी और फिर चार दिन बाद फ्लोर टेस्ट के दौरान दिए उनके भाषण की चर्चा झारखंड के बाहर भी, खासकर आदिवासी क्षेत्रों में खूब हो रही है. छत्तीसगढ़ के आदिवासी नेता अरविंद नेताम कहते हैं, "एक आदिवासी या हेमंत की छवि को समझने के लिए आपको विधानसभा में दिए भाषण के मात्र दो बिंदुओं को समझना होगा."

हेमंत ने कहा कि "मैं आंसू नहीं बहाऊंगा, वक्त आने पर इनको जवाब दूंगा." दूसरा, "हम जंगल से बाहर आ गए तो इनके कपड़े मैले होने लगे." इन दो बातों में देशभर के आदिवासियों के नेचर और मौजूदा दर्द को साफ देखा जा सकता है. "आदिवासी जो झेलता है, दिलेरी के साथ फेस करता है."

इस बात की पुष्टि रांची के वरिष्ठ पत्रकार नीरज सिन्हा भी करते हैं. वे कहते हैं कि इस भाषण के बाद सोरेन ने अपना दायरा झारखंड से बाहर भी बढ़ा लिया है. वैसे, लोकसभा चुनाव या उसके बाद इसका कितना असर होगा, यह अभी देखना बाकी है.

भारत आदिवासी पार्टी के कांतिलाल रोत राजस्थान के उभरते आदिवासी नेता हैं. नेताम की बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं, "हम पूरे देश के आदिवासियों की तरफ से हेमंत सोरेन को धन्यवाद देना चाहते हैं कि एक आदिवासी नेता ने हार नहीं मानी, संघर्ष किया और सरकार को गिरने नहीं दिया."

उनका कहना है कि आदिवासियों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए बहुत समय बाद आदिवासियों के बीच एक बड़ा नेता मिला है. वहीं त्रिपुरा के आदिवासी नेता और टिपरा मोथा प्रमुख प्रद्योत माणिक्य अलग राय रखते हैं. उनका मानना है कि "हेमंत के पिता शिबू सोरेन रियल ट्राइबल लीडर थे. हेमंत को अगर बड़ा बनना है तो यह अब उन्हें चुनाव में अपने प्रदर्शन से बताना होगा. यह आदिवासी और गैर-आदिवासी के बीच की लड़ाई नहीं है."

आदिवासी मुद्दों पर बारीक नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्याम सुंदर ने हाल में झारखंड के विभिन्न इलाकों का दौरा किया. वे कहते हैं, "केवल ईडी प्रकरण से हेमंत के कद के ग्राफ को नहीं मापा जाना चाहिए. वे तो सरकार में आते ही इसकी तैयारी में लग गए थे. चाहे वह सरना धर्म कोड पास करने की बात हो, 1932 स्थानीय नीति का मुद्दा हो या फिर भाषा आंदोलन हो. हां, झुकने की बजाए गिरफ्तारी देकर उन्होंने इस ग्राफ को तेजी से ऊंचा कर दिया है."

इधर, आम आदिवासियों के बीच यह भावना भी प्रबल है कि सोरेन को बाहरी-बिहारी लोगों ने फंसा दिया है. खुद सोरेन भी फ्लोर टेस्ट के दौरान यह कहते सुने गए, "मैं एक आदिवासी वर्ग से आता हूं. नियम, कायदे-कानून की जानकारी का थोड़ा अभाव रहता है. बौद्धिक क्षमता हमारे विपक्ष के बराबर नहीं है."

लेकिन गिरफ्तारी से पहले बीते चार साल में अपने विरोधियों को हर कदम पर मात देते आए सोरेन की इस स्वीकारोक्ति को इतनी आसानी से मान लेना चाहिए? वह भी तब, जब अपनी सरकार बचाने के लिए कांग्रेस के तीन विधायकों को गिरफ्तार कराना, विधायकों को रायपुर शिफ्ट करना, सरना धर्म कोड पास कर गेंद केंद्र के पाले में डालना, ट्राइबल एडवाइजरी कमेटी को राजभवन से बाहर निकाल सीएम के क्षेत्राधिकार में ले आना, दिल्ली स्थित आवास पर ईडी के पहुंचने से पहले वहां से निकल जाना, जैसी सियासी चालबाजियां वे लगातार चलते रहे हों.

आरोप-प्रत्यारोप, पूछताछ और गिरफ्तारी की इस कड़ी में सोरेन के अलावा बाकी सभी गैर-आदिवासी हैं. इसमें उनके प्रेस सलाहकार अभिषेक श्रीवास्तव, उनके विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्र, करीबी दोस्त विनोद सिंह, अमित अग्रवाल, सत्ता के बेहद करीबी पावर ब्रोकर प्रेम प्रकाश जैसे नाम शामिल हैं. सोरेन एक संथाल आदिवासी हैं. ऐसे में सवाल तो बनता है कि उनके सही या गलत काम, जो कि अभी साबित होने हैं, में कोई अन्य आदिवासी व्यक्ति या समुदाय, मसलन, मुंडा जनजाति के लोग क्यों नहीं शामिल हैं?

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी इस मुद्दे पर कहते हैं, "आदिवासी कभी लूटता नहीं, चोरी नहीं करता है. ऐसे में हेमंत सोरेन का ये पैसों का कारोबार कौन करता? इसलिए उन्होंने अपने आसपास ऐसे लोगों को जगह दी, जो इसमें माहिर हैं. जो पैसे कमा कर भी लाता रहा और उसको इन्वेस्ट भी करता रहा."

"जहां तक बात हेमंत सोरेन का कद ऊंचा होने की है, तो वह केवल उनके समर्थकों की नजर में है. राज्यभर के आदिवासियों में नहीं. बीते एक हफ्ते में मैंने बड़ी संख्या में आदिवासी लोगों को भाजपा जॉइन कराया है. कुछ जाति-वर्ग के लोग भाजपा के खिलाफ हैं, वे हेमंत के सपोर्ट में हैं, बाकी कोई नहीं."

ओडिशा के मयूरभंज से दो बार भाजपा के सांसद रह चुके सालखन मुर्मू फिलहाल पार्टी छोड़ आदिवासी सेंगेल अभियान चला रहे हैं. इसके तहत वे धर्म कोड सहित अन्य मुद्दों पर लगातार आंदोलन कर रहे हैं.

वे कहते हैं, "आदिवासी जनमानस बाई नेचर करप्शन या गलत काम में कम लिप्त रहता है. लेकिन जो आदिवासी पॉलिटिक्स में आ जाते हैं, बाकी लोगों की बीमारियों का असर उन पर भी पड़ता है. यहां पर मामला अलग है. सोरेन खानदान के सभी लोग इसमें संलिप्त रहे हैं. उनके इर्द-गिर्द के अधिकतर लोग जेल में हैं. ये कुछ तो इंडिकेशन देता है न."

सहानुभूति काल कब तक

लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव सिर पर हैं. जब पीएम मोदी राम मंदिर के रथ पर सवार होकर झारखंड के चुनावी दौरों पर पहुंचेंगे और कहेंगे कि हम भ्रष्टाचारियों को छोड़ते नहीं, तब क्या सोरेन के प्रति बनी सहानुभूति बरकरार रह पाएगी?

क्या जेएमएम इस 'सहानुभूति काल' को विधानसभा चुनाव होने तक जनता, खासकर आदिवासी वोटरों के बीच, जो कि कुल 28 रिजर्व सीट पर किसी को बनाने-बिगाड़ने की क्षमता रखते हों, बनाए रख पाएगी? ईडी की जांच में जब खुलासे होंगे, जो सोरेन की प्रतिष्ठा, सियासी फायदे के अनुकूल नहीं होंगे, तब इस सहानुभूति की उम्र क्या तेजी से घट जाएगी?

यह बात काबिले-गौर इसलिए भी है कि देश की दूसरी जातियां ऐसे आरोपों के बावजूद अपने नेता के साथ खड़ी रहती हैं. लालू प्रसाद यादव इसकी सबसे मजबूत मिसाल हैं. लेकिन आदिवासी भ्रष्टाचार के आरोप को बर्दाश्त नहीं करते. शायद यही वजह है कि शिबू सोरेन सीएम रहते विधानसभा उप-चुनाव हार गए थे. अपने गढ़ संथाल से लोकसभा के चुनाव हार गए. हालांकि तब के राजनैतिक हालात अलग थे.

माणिक्य फिर कहते हैं, "अगर पब्लिक यह मानती है कि हेमंत ने उनके लिए काम किया है, तो उन्हें वोट करेगी. चाहे हवा किसी भी ओर हो, अगर पब्लिक नहीं मानेगी तो सत्ता में रहते हुए भी सहानुभूति काम नहीं करेगी."

वहीं, नेताम कहते हैं, "जब तक अंतिम फैसला नहीं आ जाता, यह बरकरार रहने वाली है." श्याम सुंदर इसमें एक अहम बात जोड़ते हैं, "संथाल ही नहीं, मुंडा आदिवासी भी मानने लगे हैं कि आदिवासी होने की वजह से उनको टारगेट किया गया है. हेमंत पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, यह बात आदिवासी जानते हैं, पर उलिहातू जो कि बिरसा मुंडा का गांव है, वहां एक आदिवासी ने साफ कहा कि अगर वे भाजपा से हाथ मिला लेंगे तो आरोप खत्म हो जाएंगे."

लड़ाई परसेप्शन बनाने-बिगाड़ने की है. सोरेन फिलहाल इसमें आगे नजर आ रहे हैं और सहानुभूति अभी उनके साथ है. भाजपा ने वक्त रहते इसे भांपा है.

यही वजह है कि विधानसभा में विश्वास मत के दौरान भाजपा या उसके सहयोगी दलों के किसी भी नेता ने सीधे सोरेन को निशाने पर लेने की बजाए कांग्रेस पर निशाना साधा.

वे जेएमएम को बार-बार याद दिलाते रहे कि शिबू सोरेन को कांग्रेस ने ही गिरफ्तार करवाया था. क्या इसे यह माना जाए कि हेमंत सोरेन को मिल रही सहानुभूति की लहर में शिबू सोरेन के रास्ते भाजपा घुसने की कोशिश कर रही है?

आनंद दत्त

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