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दो जजों के बीच जंग का अखाड़ा बना कलकत्ता हाई कोर्ट

जस्टिस गंगोपाध्याय ने जस्टिस सेन पर एक दल के लिए काम करने और जस्टिस सिन्हा को धमकी देने का आरोप लगाया

कलकत्ता हाई कोर्ट
कलकत्ता हाई कोर्ट
अपडेटेड 15 फ़रवरी , 2024

कलकत्ता हाइकोर्ट में हाल में ऐसी न्यायिक उथलपुथल मची कि सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष जजों को आगे आकर कमोबेश व्यवस्था बहाल करनी पड़ी. झगड़ा तब शुरू हुआ जब न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय ने आरोप लगाया कि उनके बंधु जज न्यायमूर्ति सौमेन सेन की 'किसी राजनैतिक दल' के साथ साठगांठ है.

न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय की एकल पीठ ने 24 जनवरी को पश्चिम बंगाल के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए आरक्षित श्रेणी के प्रमाणपत्र जारी करने और उनके इस्तेमाल में अनियमितताओं की सीबीआई जांच का आदेश दिया था. एक दिन बाद राज्य सरकार ने मौखिक अपील के जरिए कलकत्ता हाइकोर्ट की न्यायमूर्तिद्वय सेन और उदय कुमार की खंडपीठ का दरवाजा खटखटाया और न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय के आदेश पर अंतरिम स्थगन हासिल कर लिया.

प्रवेश घोटाले में सीबीआई की तरफ से दर्ज एफआईआर को खंडपीठ की ओर से रद्द कर दिए जाने से खीजे न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने उसी दिन जवाबी आदेश पारित करते हुए निर्देश दिया कि "सीबीआई इस मामले में जांच तुरंत शुरू करेगी." इसी लिखित आदेश में उन्होंने न्यायमूर्ति सेन के खिलाफ आरोप लगाए. 

न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय के आदेश के मुताबिक, एक और जज न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा ने (उन्हें) कुछ दिन पहले बताया कि न्यायमूर्ति सौमेन सेन ने (क्रिसमस की) छुट्टी से पहले आखिरी दिन उन्हें (अपने) चैंबर में बुलाया और तीन निर्देश दिए. पहला, अभिषेक बनर्जी—टीएमसी सांसद और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे का राजनैतिक भविष्य है, उन्हें परेशान नहीं किया जाना चाहिए.

उन्होंने यह भी बताया कि "न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा की अदालत में लाइव स्ट्रीमिंग बंद कर दी जाएगी" और आखिर में यह कि न्यायमूर्ति सिन्हा जिन दो याचिकाओं की सुनवाई कर रही हैं और जो अभिषेक नाम से जुड़ी हैं, उन्हें 'खारिज करना है.' न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने लिखा कि यह कथित बातचीत पहले उन्हें न्यायमूर्ति सिन्हा ने और बाद में हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस ने बताई, जिन्होंने भारत के प्रधान न्यायाधीश को इसकी जानकारी दे दी.

इतना ही नहीं, जज ने अपने आदेश में लिखा कि न्यायमूर्ति सेन दो साल से ज्यादा वक्त से 'तबादला आदेश के तहत' हैं और "यहां सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की उस सिफारिश (तारीख 16 सितंबर, 2021) की अवहेलना करने वाले जज के तौर पर काम कर रहे हैं." जिसमें कहा गया था कि उन्हें "इस अदालत से ओडिशा हाइकोर्ट भेज दिया जाए." उन्होंने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के आदेश की कथित अनदेखी करने के बावजूद न्यायमूर्ति सेन का बचाव करने वाले लोगों की पहचान पर सवाल उठाया. 

न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय के गंभीर आरोप के सार्वजनिक होने पर सुप्रीम कोर्ट ने 26 जनवरी को मामले का स्वत: संज्ञान लिया. उसकी सुनवाई के लिए सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुआई में पांच जजों की पीठ का गठन किया गया, जिसमें न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, बी.आर. गवई, सूर्यकांत और अनिरुद्ध बोस भी थे. पीठ ने 27 जनवरी को विशेष बैठक में सुनवाई की.

याचिकाकर्ता सीबीआई, जिसकी याचिका पर सीबीआई जांच का आदेश दिया गया था, और पश्चिम बंगाल की सरकार—जिसकी याचिका पर खंडपीठ ने इस पर रोक लगा दी थी—को नोटिस जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाइकोर्ट की एकल पीठ और खंडपीठ के समक्ष आगे किसी भी कार्यवाही पर रोक लगा दी और गंगोपाध्याय के अंतिम भड़काऊ आदेश पर अंतरिम रोक का आदेश दे दिया.

उस आदेश में न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने न्यायमूर्तिद्वय सेन और कुमार की खंडपीठ की तरफ से पारित आदेश की वैधता पर भी सवाल उठाए और कहा, "इस मामले में तत्काल जरूरत की कोई रिकॉर्डिग नहीं मिली." उन्होंने यह भी कहा कि जब उनके आदेश पर रोक लगाई गई, "अदालत के सामने न तो कोई अपील का मेमो और न ही कोई विवादित आदेश था...मुझे ऐसा कोई नियम नहीं बताया गया कि विवादित आदेश के बिना और अपील के मेमोरैंडम के बिना इस हाइकोर्ट में उस पर अपील को वरीयता दी जा सकती है और आदेश पारित किया जा सकता है."

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह मुद्दा अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उठाया, जिन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का पहले का एक आदेश मेमो या विवादित आदेश (वह आदेश जिसे चुनौती दी गई है) की प्रति के बिना और केवल मौखिक अपील पर किसी उच्चतर न्यायालय को अंतरिम आदेश पारित करने से रोकता है. 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह मामला हाइकोर्ट से शीर्ष अदालत में स्थानांतरित कर दिया. उसने सभी ऊपर उल्लिखित पक्षों को अगले तीन हफ्तों में अपनी याचिकाएं दायर करने को कहा. मामला 19 फरवरी के लिए सूचीबद्ध किया गया है.

न्यायमूर्ति सेन ने 30 जनवरी को मामले पर प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, "अब बस, बहुत हुआ...इस अदालत का अपमान किया गया है...न्यायमूर्ति का काम आदेश पारित करना है. मेरे पास कहने को कुछ नहीं है. उन्होंने (न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने) मेरे ऊपर टिप्पणी की, पर मेरे मन में उनके प्रति सम्मान है."

सुप्रीम कोर्ट न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय को भी पहले फटकार लगा चुका है. सुप्रीम कोर्ट की तरफ से अभिषेक से जुड़ा एक मामला उनके रोस्टर से हटाने का आदेश पारित किए जाने के बाद 28 अप्रैल, 2023 को गंगोपाध्याय ने आदेश पारित करके सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी को सीजेआई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की पीठ को दिखाए गए दस्तावेज उन्हें भेजने का निर्देश दिया था. सीजेआई ने इस धृष्टता का संज्ञान लेते हुए न्यायमूर्तिद्वय ए.एस. बोपन्ना और हिमा कोहली की पीठ गठित की, जिसने न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय के आदेश को 'उचित नहीं' और 'न्यायिक अनुशासन' के खिलाफ ठहराते हुए उस पर हमेशा के लिए रोक लगा दी.

टीएमसी ने न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय के आरोपों से इनकार किया. पार्टी के राज्य महासचिव कुणाल घोष ने कहा, "अब वे जज नहीं रहे और न्यायमूर्ति सिन्हा के वकील के तौर पर काम कर रहे हैं. साथी जज के बारे में उन्होंने जो कहा, वह बेशर्म सियासी भाषण जैसा था." तो भाजपा ने टीएमसी पर निशाना साधा. बंगाल भाजपा के मुख्य प्रवक्ता समिक भट्टाचार्य ने कहा, "हाइकोर्ट में जो अराजकता और अनुशासनहीनता दिख रही है, वह टीएमसी की तरफ से जजों और उनके परिवारों को तंग किए जाने का नतीजा है." इस हो-हल्ले में असल मुद्दा कहीं गुम हो गया है. 

- अर्कमय दत्ता मजूमदार

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