भाजपा की परिवर्तन यात्रा 20 सितंबर की सुबह पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के निर्वाचन क्षेत्र झालरापाटन में पहुंची. उतराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, पूर्व शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी सहित पार्टी के कई पदाधिकारी उस यात्रा में मौजूद थे. लेकिन वसुंधरा राजे पूरे जिले में इस यात्रा में शामिल नहीं हुईं. 19 सितंबर को परिवर्तन संकल्प यात्रा बारां जिले से झालावाड़ जिले में प्रविष्ट हुई तब भी राजे साथ नहीं थीं.
बांसवाड़ा संभाग के बेणेश्वर धाम से 3 सितंबर को शुरू हुई भाजपा की दूसरी परिवर्तन संकल्प यात्रा का समापन 21 सितंबर को कोटा के नयापुरा में हुआ. यात्रा के समापन में असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा सहित कई पदाधिकारी पहुंचे, लेकिन राजे और उनके सांसद पुत्र दुष्यंत सिंह वहां भी मौजूद नहीं थे.
असल में, राजस्थान में भाजपा की चार अलग-अलग जगहों से रवाना हुई चार परिर्वतन यात्राओं की शुरुआत के अवसर पर राजे मंच पर नजर आई थीं, लेकिन उसके बाद उन्होंने इन यात्राओं से दूरी बना ली. सवाई माधोपुर में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, डूंगरपुर के बेणेश्वर धाम से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, जैसलमेर के रामदेवरा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और हनुमानगढ़ के गोगामेड़ी में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के साथ राजे मंच पर मौजूद थीं.
उसके बाद इन यात्राओं की कमान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सी.पी. जोशी (मेवाड़, वागड़ और हाड़ौती), केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत (मारवाड़ और थार), विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ (जयपुर, भरतपुर) और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तथा विधानसभा में उपनेता सतीश पूनियां (बीकानेर संभाग) और कुछ अन्य नेता संभालते नजर आए.
परिवर्तन संकल्प यात्रा और भाजपा के स्थानीय कार्यक्रमों में राजे की यह दूरी सियासी हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है. परिवर्तन संकल्प यात्रा में उनके साथ नहीं रहने के कई कारण माने जा रहे हैं. एक तो कार्यक्रम तैयार करने से पहले उनसे चर्चा नहीं की गई, और दूसरे उन्हें पसंद के रूट का जिम्मा नहीं मिला. बताया जा रहा है कि राजे 2 सितंबर को बेणेश्वर धाम से शुरू हुई यात्रा की कमान चाहती थीं क्योंकि इस यात्रा में उनका निर्वाचन क्षेत्र झालावाड़ भी शामिल था. लेकिन पार्टी उन्हें सवाई माधोपुर से शुरू हुई यात्रा का जिम्मा देना चाहती थी.
वागड़, मेवाड़ और हाड़ौती की यात्रा की जिम्मेदारी जब उनकी जगह भाजपा प्रदेश अध्यक्ष जोशी को सौंप दी गई तो राजे ने उस यात्रा के एक दिन पहले देव दर्शन यात्रा निकालकर शक्ति प्रदर्शन किया. 1 सितंबर को राजे ने राजसमंद जिले के चारभुजा मंदिर, नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर और बांसवाड़ा के त्रिपुर सुंदरी मंदिर में अपनी देवदर्शन यात्रा निकाली. तीनों जगहों पर राजे समर्थकों की भीड़ उमड़ी.
राजे की नाराजगी का एक कारण विधानसभा चुनाव में उन्हें अब तक कोई जिम्मेदारी नहीं दिए जाने को भी माना जा रहा है. सियासी जानकारों का कहना है कि सूबे की दो बार मुख्यमंत्री रह चुकीं राजे को चुनाव में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिलना यह संकेत है कि इस बार पार्टी उनके चेहरे पर चुनाव नहीं लड़ेगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 25 सितंबर को जयपुर के निकट दादिया में हुई रैली में इसकी बानगी नजर आई.
मोदी ने इस रैली में साफ संकेत दिए कि इस बार भाजपा किसी के भी चेहरे पर चुनाव नहीं लड़ेगी. मोदी ने दो-टूक कहा, ''राजस्थान अग्रणी राज्यों में तब आएगा जब यहां भी कमल का फूल खिलेगा. हमारी पहचान व शान केवल और केवल कमल का फूल है.'' प्रधानमंत्री का यह संदेश उन अटकलों पर विराम लगा देता है जो अब तक राजस्थान में किसी नेता को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाए जाने को लेकर लगाई जा रही थी. इतना ही नहीं, मोदी के भाषण से पहले जोशी, गजेंद्र सिंह शेखावत, किरोड़ी लाल मीणा, राजेंद्र राठौड़, अर्जुन राम मेघवाल, सतीश पूनियां जैसे कई नेताओं को भाषण के लिए बुलाया गया, लेकिन राजे को मौका नहीं दिया गया. मोदी की रैली में मंच संचालन का काम भी राजे की विरोधी सांसद दीया कुमारी को सौंपा गया.
इससे पहले 30 जून को उदयपुर में हुई गृह मंत्री शाह की रैली में भी मंच संचालन कर रहे राजेंद्र राठौड़ ने राजे को दरकिनार करते हुए शाह का नाम भाषण के लिए पुकार लिया था. राठौड़ की भूल को भांपकर शाह ने इशारों से उन्हें राजे को भाषण के लिए बुलाने के लिए कहा. इसके बाद राजे को भाषण का मौका दिया गया. उस वक्त राठौड़ को लेकर राजे के तल्ख तेवर साफ नजर आए थे. सियासी विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार मिलाप चंद डंडिया कहते हैं, ''वसुंधरा राजे हमेशा नंबर वन बनकर रहना चाहती हैं, उन्हें नंबर दो पर रहना कतई पसंद नहीं. राजे को नेतृत्व चाहिए, फॉलोअर बनना उनकी फितरत नहीं.''
राजस्थान में आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी के चेहरे को लेकर केंद्रीय नेतृत्व जो भी फैसला ले, लेकिन राजे अपनी ताकत दिखाने का कोई भी मौका गंवाना नहीं चाहतीं. मोदी के जयपुर आने से दो दिन पहले 23 सितंबर को राजे ने अपने सरकारी निवास पर शक्ति वंदन और रक्षा सूत्र नाम से एक कार्यक्रम आयोजित किया. उसमें प्रदेशभर से महिलाओं की इतनी भीड़ उमड़ी कि उनके बंगले पर पैर रखने की भी जगह नहीं बची. महिलाओं को संबोधित करते हुए राजे ने साफ कहा, ''आप सब महिलाओं की अटूट शक्ति की वजह से राजस्थान से कहीं नहीं जाऊंगी. आपके साथ रहूंगी और आपकी ही सेवा करूंगी. आपकी आवाज उठाने में कोई कमी नहीं रखूंगी.''
सियासी रणनीतिकार इसे राजे की केंद्रीय नेतृत्व को चुनौती के तौर पर देख रहे हैं. राजे के इस बयान को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद सियासी गलियारों में उन्हें दिल्ली भेजे जाने की चर्चा चल रही थी.
राजस्थान की सियासत में अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि भाजपा हाइकमान का राजे को लेकर क्या रुख रहेगा. क्या उन्हें विधानसभा चुनाव में कोई अहम जिम्मेदारी मिलेगी या फिर दो बार की मुख्यमंत्री को एकदम किनारे कर दिया जाएगा?
वसुंधरा राजे की नाराजगी के पांच बड़े कारण
राजे समर्थकों की पार्टी में नो एंट्री: राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में करीब 100-150 छोटे-बड़े नेताओं की एंट्री हो चुकी है. इनमें भाजपा छोड़कर जाने वाले या भाजपा से निकाले गए और कांग्रेस से आने वाले कई बड़े नेता शामिल हैं, लेकिन राजे समर्थक माने जाने वाले नेताओं की अभी तक पार्टी में वापसी नहीं हुई है. भरतपुर के पूर्व विधायक विजय बंसल, अलवर से पूर्व मंत्री रोहिताश्व कुमार, अजमेर के भंवर सिंह पलाड़ा जैसे नेताओं को अब तक पार्टी में शामिल नहीं किया जाना संकेत है कि संगठन में राजे के विरोधी किस कदर हावी हैं.
कैलाश मेघवाल पर कार्रवाई: जनसंघ की स्थापना से लेकर अब तक पार्टी के प्रदेश और देश स्तर पर बड़ा चेहरा माने जाने वाले पूर्व विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल को निलंबित करने में संगठन ने जितनी जल्दबाजी दिखाई, वह राजे को पसंद नहीं आई. अर्जुन राम मेघवाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वाले कैलाश मेघवाल राजस्थान के बड़े दलित नेता रहे हैं और उन्हें इस तरह पार्टी से निकाला जाना राजे के लिए बड़ा झटका है. छह बार विधायक रह चुकीं सूर्यकांता व्यास को लेकर पार्टी नेताओं ने जिस तरह से बयानबाजी की है वह भी राजे को रास नहीं आ रही.
चुनाव कमेटियों में राजे को जगह नहीं: भाजपा ने विधानसभा चुनाव के लिए जो कमेटियां बनाई हैं, उनमें राजे और उनके समर्थकों को जगह नहीं मिली है. चुनाव प्रबंधन कमेटी की कमान राज्यसभा के पूर्व सांसद नारायण पंचारिया और संकल्प पत्र समिति की कमान राजे के धुर विरोधी केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को सौंपी गई है.
जोशी प्रदेशाध्यक्ष, राठौड़ नेता प्रतिपक्ष: माना जा रहा कि राजस्थान में भाजपा की कमान राजे के विरोधी खेमे वाले सी.पी. जोशी को दिए जाने और राजेंद्र राठौड़ को नेता प्रतिपक्ष जैसी अहम जिम्मेदारी दिए जाने से पहले राजे की राय नहीं ली गई. इसके बाद उनके विरोधी अर्जुन मेघवाल को केंद्र में कानून मंत्री का स्वतंत्र प्रभार देकर पार्टी ने दलित वोट बैंक और बीकानेर संभाग में नया क्षत्रप खड़ा करने की कोशिश की.
चार परिवर्तन यात्राओं का आगाज: पिछले 20 साल में राजस्थान में अधिकतर बड़ी यात्राएं राजे के नेतृत्व में निकली हैं. इस बार प्रदेश में चार अलग-अलग जगहों से चार यात्राएं निकालना और उनकी जिम्मेदारी अलग-अलग नेताओं को दिया जाना राजे को रास नहीं आ रहा. 2003, 2013 और 2018 में परिवर्तन यात्राओं की कमान राजे के पास थी, पर इस बार उनके विरोधी नेताओं को यात्राओं की जिम्मेदारी दे दी गई.

