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फिर मोर्चे पर नीतीश कुमार

जद (यू) का मानना है कि कांग्रेस इंडिया गठबंधन बनाने के मामले में नीतीश के योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दे रही है

 बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 21 सितंबर को पटना में आयोजित एक कार्यक्रम में
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 21 सितंबर को पटना में आयोजित एक कार्यक्रम में
अपडेटेड 10 अक्टूबर , 2023

जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह ने 10 सितंबर को एक बार फिर 'पीएम के लिए नीतीश (कुमार)' का मुद्दा उठाया. यह एक ऐसा हौवा है जो खुद नीतीश कुमार के इनकार के बावजूद इन दिनों हर तीन महीने में सिर उठा लेता है. ट्विटर पर डाले गए एक वीडियो में ललन सिंह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा में एक सभा को संबोधित करते नजर आए. उसमें ललन सिंह ने दावा किया कि अन्य नेताओं के मुकाबले नीतीश में देश का नेतृत्व करने की बेहतर क्षमता है. उन्होंने कहा, ''आप सबों ने एक ऐसा नेता इस देश को दिया है जो पूरे देश का नेतृत्व करने के लिए खड़ा है.''

ललन सिंह ने यह बयान नालंदा के हरनौत में दिया. इसी हरनौत सीट से नीतीश पहली बार 1985 में विधायक चुने गए थे. ऐसे में हो सकता है कि ललन सिंह ने वहां लोगों को लुभाने के लिए ऐसा कहा हो. लेकिन यह बयान ऐसे वक्त में आया है जिससे पता चलता है कि जद (यू) इंडिया खेमे की भीड़ में पर्याप्त जगह बनाने की कोशिश कर रहा है. 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा से मुकाबला करने के लिए 28 पार्टियों ने एक साथ आकर इंडिया नामक राष्ट्रीय विपक्षी गठबंधन बनाया है. जद (यू) के एक वरिष्ठ नेता ने इस बयान को चतुराई भरा कदम बताया ताकि कांग्रेस को याद दिलाया जा सके कि विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व का मामला पहले से तय नहीं है.

ललन सिंह की ओर से अपनी पार्टी के नेता के लिए दावा पेश करने के दो हफ्ते बाद, इस मामले की थाह लेने की बारी बिहार विधानसभा के उपाध्यक्ष और जद (यू) के वरिष्ठ नेता महेश्वर हजारी की थी. हालांकि वे बिहार के मतदाताओं के साथ-साथ गठबंधन के घटक दलों को भी साधते नजर आए. हजारी ने केंद्रीय मंत्री के रूप में नीतीश के लंबे कार्यकाल, बिहार के सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री और उनके ''हर पद पर दोष-मुक्त (पढ़ें भ्रष्टाचार-मुक्त) रिकॉर्ड'' का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी साख को सबसे उज्ज्वल बताया. हजारी के बयान के बारे में पूछे जाने पर नीतीश ने कहा, ''ई सब हम नहीं कहते हैं, हम सबको मना करते हैं. सभी (दल) एकजुट होकर लड़ेंगे और (नेतृत्व के बारे में) फैसला बाद में लिया जाएगा.''

जद (यू) नेताओं का अपने पार्टी के नेता के लिए दावा पेश करना स्वाभाविक है, लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि इस बार बात इससे कहीं बढ़कर है. दरअसल, पार्टी नेतृत्व के एक वर्ग को लगता है कि नीतीश के परस्पर सद्भाव वाले रुख के प्रति कांग्रेस ''उदासीन'' है, इसलिए उनमें नाराजगी है. जद (यू) के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''अगस्त 2022 में एनडीए से नाता तोड़ने के के बाद नीतीश कांग्रेस-युक्त विपक्ष पर जोर देने वाले पहले शख्स थे. यही नहीं, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव अगस्त 2022 में नीतीश से मिलने पटना आए थे, लेकिन नीतीश ने गैर-कांग्रेसी विपक्षी गठबंधन के उनके विचार का समर्थन नहीं किया.'' नीतीश ने अपने रुख को मजबूती देने के लिए सितंबर 2022 में सोनिया और राहुल गांधी से मिलने दो बार दिल्ली गए थे.

जद (यू) के ये दावे पूरी तरह से खारिज नहीं किए जा सकते. अतीत में नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल का खुलकर समर्थन किया था और आम आदमी पार्टी (आप) के अरविंद केजरीवाल, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की ममता बनर्जी और समाजवादी पार्टी (सपा) के अखिलेश यादव सरीखे क्षेत्रीय कद्दावरों से भी संपर्क किया था. उन क्षेत्रीय पार्टियों की सियासी कामयाबी उनके राज्यों में कांग्रेस को हाशिये पर धकेलने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है. नीतीश ने उन नेताओं को कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने को राजी किया. आम तौर पर सहयोगी दलों में इस बात पर सहमति है कि अगर शुरुआती दौर में बिहार के मुख्यमंत्री ने अथक प्रयास नहीं किया होता, तो इंडिया गठबंधन इस तरह सफलतापूर्ण आकार नहीं ले पाता.

जद (यू) के वे नेता पूछते हैं, ''नीतीशजी ने गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनने से इनकार कर दिया था, इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं हुई जब उन्होंने इंडिया खेमे का संयोजक बनने से भी इनकार कर दिया. कर्नाटक में जीत के बाद कांग्रेस में उत्साह आ गया है, लेकिन क्या उसे उन्हें गठबंधन संयोजक बनाने का प्रस्ताव नहीं लाना चाहिए था?''

जद (यू) के कुछ वरिष्ठ नेता भी चाहते हैं कि अगर चुनाव के बाद स्थिति बनती है तो नीतीश को अपनी उम्मीदवारी को बरकरार रखना चाहिए. वहीं जद (यू) नेता कहते हैं, ''सभी दलों में उनकी स्वीकार्यता को देखते हुए, नीतीशजी छुपे रुस्तम के तौर पर उभर सकते हैं.'' हालांकि नीतीश विपक्षी गठबंधन के साथ लगातार टिके हुए हैं, लेकिन उनके कुछ हालिया फैसले दिखाते हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री ''स्वतंत्र सोच'' रखने वाले नेता की अपनी छवि को छोड़ने को तैयार नहीं हैं. उन्होंने कथित 'गोदी मीडिया' टीवी ऐंकरों पर इंडिया के बैन का विरोध करने से लेकर महिला आरक्षण विधेयक का भी समर्थन किया (जबकि गठबंधन सहयोगी राजद ने इसे दिखावटी करार दिया था).

नीतीश को इस तथ्य से बढ़त हासिल है कि उनके पास उस राज्य की कुंजी है जहां उन्होंने एनडीए गठबंधन का हिस्सा रहते हुए उसके लिए पिछले दो लोकसभा चुनावों में भारी जीत सुनिश्चित की थी. 2019 में एनडीए को 40 में से 39 सीटें हासिल हुई थीं. इस बार भाजपा के पास बिखरे हुए विपक्ष की सुविधा नहीं होगी और नीतीश तथा लालू यादव (राजद के संरक्षक) एक साथ मिलकर मजबूत विपक्ष हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 16 सितंबर के बिहार दौरे ने एक बार फिर जद (यू) प्रमुख की अहमियत को उजागर किया. ऐसा लगा कि शाह, नीतीश और लालू के वोट बैंक में दरार पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने नीतीश पर नरमी बरतते हुए उन्हें काफी हद तक बख्शा, लेकिन राजद पर उन्होंने जोरदार हमला बोला. 

भाजपा को भलीभांति मालूम है कि अगर राजद और जद (यू) के समर्पित वोट बैंक एक साथ मिलकर वोट करते हैं तो महागठबंधन एनडीए का सूपड़ा साफ कर सकता है. अतीत में भी नीतीश, लालू और कांग्रेस के इसी गठबंधन ने 2015 के विधानसभा चुनाव में भगवा गुट का सफाया कर दिया था.

शाह के भाषण में नीतीश के लिए चतुराई भरे सूक्ष्म सियासी संकेतों से इतर, भाजपा नीतीश के समर्थकों के समूह से कुशवाहा वोट को दूर करने की कोशिश भी कर रही है. इसके लिए पार्टी ने मार्च में कुशवाहा नेता सम्राट चौधरी को मार्च में पार्टी की राज्य इकाई का अध्यक्ष बनाया है और उपेंद्र कुशवाहा (राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष) को भी इसमें शामिल कर लिया है. कुशवाहा (या कोइरी) बिहार के संख्यात्मक तौर पर अहम लव-कुश समूह के 'कुश' हैं और यह समूह नीतीश का मुख्य सामाजिक समर्थन आधार रहा है. कुर्मियों यानी 'लव' के लिए नीतीश बेशक पहली पसंद हैं. विश्लेषकों का कहना है कि ''प्रधानमंत्री पद के लिए नीतीश'' का मामला दरअसल भाजपा की कोशिशों को कमजोर करने और कुशवाहा वोट को मुख्यमंत्री के साथ दृढ़तापूर्वक बरकरार रखने की कवायद हो सकती है.

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