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भाजपा को दक्षिण में लगा धक्का

तमिलनाडु में भाजपा अपने तेवरों के बावजूद अन्नाद्रमुक पर निर्भर है. इसी वजह से रिश्ते टूटने पर उसने बयानों के मामले में संयम बरता

अलग होने के बाद अन्नाद्रमुक के महासचिव एडाप्पडी के. पलानीस्वामी 26 सितंबर को चेन्नै में पार्टी नेताओं के साथ
अलग होने के बाद अन्नाद्रमुक के महासचिव एडाप्पडी के. पलानीस्वामी 26 सितंबर को चेन्नै में पार्टी नेताओं के साथ
अपडेटेड 10 अक्टूबर , 2023

लंबे वक्त के साझेदारों को बाहर निकलते देखना भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए अब नई बात नहीं रह गई है. 2019 में अविभाजित शिवसेना और 2020 में शिरोमणि अकाली दल के साथ रिश्तों का अंत कटुता भरे तलाक में हुआ था. 25 सितंबर को ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कलगम (अन्नाद्रमुक) का इस फेहरिस्त में जुड़ना भी पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं था.

भाजपा और दक्षिण में उसके राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सबसे असरदार साझेदार के बीच रिश्ते तभी से बिगड़ने लगे थे जब जुलाई 2021 में के. अन्नामलाई ने भगवा पार्टी की तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष की कमान संभाली थी. 2011 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी और 2019 में इस्तीफा देकर राजनीति में आए 39 वर्षीय तेज-तर्रार अन्नामलाई जुबानी आतिशबाजी का कोई मौका नहीं छोड़ते.

उनका यह रवैया उस पार्टी को रास आया जिसे बरसों से अन्नाद्रमुक के साथ रिश्तों में दोयम दर्जे की भूमिका निभानी पड़ रही थी. लिहाजा अब कुछ ज्यादा ही सुधार होता देख उसे कोई हर्ज दिखाई नहीं दिया—भले ही इसका मतलब पुराने दोस्त को नाराज करना क्यों न हो. अन्नामलाई मानते हैं कि अगर भाजपा तमिलनाडु में द्रविड़ पार्टियों—सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कलगम (द्रमुक) और उसकी प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक—का 50 साल का शिकंजा तोड़कर अपनी बढ़त पर लगी रोक को चकनाचूर करना चाहती है तो उसे राज्य में अकेले अपने दम पर खड़ा होना होगा. जून में पूर्व मुख्यमंत्री और अन्नाद्रमुक की करिश्माई नेता दिवंगत जे. जयललिता के खिलाफ उनकी टिप्पणियों ने रिश्तों में और कड़वाहट घोल दी, जो उनकी तरफ से अन्नाद्रमुक की लगातार आलोचना से पहले ही कमजोर पड़ गए थे.

उससे पहले 2016 में जब जयललिता के निधन से राज्य की राजनीति में खालीपन आया और अन्नाद्रमुक के मौजूदा प्रमुख एडाप्पडी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) और उनसे पहले मुख्यमंत्री रहे ओ. पनीरसेलवम (ओपीएस) के बीच वर्चस्व की खुली लड़ाई छिड़ गई, तो इस फूट का फायदा उठाने के लिए भाजपा आगे आ गई. केंद्र की सत्ता पर काबिज होने से मिली ताकत की बदौलत उसने पहले मध्यस्थ की और फिर चुपचाप दबंग की भूमिका अदा की. फिर तो यह होना ही था कि अपने विस्तार के मंसूबों के प्रयास में वह ज्यादा से ज्यादा मुखर होती गई.

तमिलनाडु भाजपा के प्रमुख के. अन्नामलाई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में

भाजपा के युवा क्षत्रप के बेलगाम बयानों से अन्नाद्रमुक चिढ़ तो गई ही थी, उसे यह आशंका भी थी कि भगवा पार्टी को शायद उसकी कीमत पर फायदा मिल रहा है. उसने हाल के महीनों में कई बार अन्नामलाई पर गठबंधन धर्म के नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया. उसके सब्र का बांध 11 सितंबर को तब टूट गया जब अन्नामलाई ने आरोप लगाया कि द्रविड़ राजनीति के महामना और पूर्व मुख्यमंत्री अन्नादुरई—वही श्रद्धेय 'अन्ना' जिन्हें पार्टी के नाम में भी जगह दी गई है—ने 1956 में मदुरै के एक आयोजन में हिंदू धर्म का अपमान किया था. इससे पहले जब उन्होंने जयललिता के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए (जिनसे फिर वे पीछे हट गए), तो अन्नाद्रमुक ने एक प्रस्ताव पारित करके उन्हें ''राजनैतिक रूप से अनुभवहीन और अपरिपक्व'' करार दिया था. 20 अगस्त को मदुरै में अपनी स्वर्ण जयंती बैठक में पार्टी ने फैसला किया कि अन्नामलाई की चुभती बातों को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

करीब एक महीने बाद 18 सितंबर को अन्नाद्रमुक के संगठन सचिव डी. जयकुमार ने भाजपा के साथ सशर्त ''रिश्ते तोड़ने'' का ऐलान किया, जो अन्नामलाई को हटाने का अल्टीमेटम था. निर्णायक टूट दिल्ली में पार्टी के प्रतिनिधिमंडल की भाजपा के नेताओं के साथ बैठक के बाद हुई, जिसमें यह साफ हो गया कि अन्नामलाई की पीठ पर नेतृत्व का हाथ है. अन्नाद्रमुक के डिप्टी जनरल सेक्रेटरी के.पी. मुनुसामी तस्दीक करते हैं, ''गठबंधन को खत्म करने का फैसला भाजपा के राज्य नेतृत्व के मानहानि करने वाले बयानों की वजह से किया गया.''

राजनैतिक टिप्पणीकार एन. सत्य मूर्ति कहते हैं, ''अन्नामलाई से पहले भी यह होने का इंतजार ही कर रहा था. 2019 के लोकसभा और 2021 के विधानसभा चुनावों में उलटफेरों के बाद अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ताओं को यकीन हो गया कि भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति और कथित अल्पसंख्यक विरोधी रुख को बर्दाश्त करते रहना महंगा पड़ेगा. अन्नामलाई ने इतना किया कि उस प्रक्रिया को तेज कर दिया या अन्नाद्रमुक को वह बहाना दे दिया जिसकी उसे जरूरत थी.''

ज्यादातर विशेषज्ञों को लगता है कि खराब हो चुके रिश्तों से बाहर निकलकर अन्नाद्रमुक ने राहत की सांस ली है. उसे अल्पसंख्यकों के वोट वापस मिलने की आस है जो उसने 2019 और 2022 में गंवा दिए थे. इससे वह नैरेटिव भी टूट गया जिसे भाजपा बड़ी मेहनत से गढ़ रही है कि तमिलनाडु में मुकाबला भाजपा बनाम द्रमुक है. अन्नाद्रमुक के एक हिस्से को सचमुच पार्टी के तीसरे पायदान पर धकेल दिए जाने का डर सताने लगा था. टूट के बगैर यह वाकई होता या नहीं, यह अब काल्पनिक सवाल है.

हकीकत यह है कि तमिलनाडु में भाजपा ज्यादातर स्थानीय अभिभावकों पर निर्भर छोटी खिलाड़ी है. यहां तक कि तब भी 2019 में उसने लोकसभा की पांच सीटों पर चुनाव लड़ा और पांचों हार गई और 2021 में मिली 20 विधानसभा सीटों में से महज चार जीत पाई थी. अन्नाद्रमुक के प्रवक्ता कोवई सत्यन कहते हैं, ''जितनी जरूरत हमें भाजपा की है, उससे कहीं ज्यादा जरूरत उसे हमारी है.'' ईपीएस जानते हैं कि कुछेक सीटें जीतने की भाजपा की उम्मीदें मोटे तौर पर अन्नाद्रमुक के साथ उसके गठबंधन पर टिकी थीं. इसलिए अब रिश्ते तोड़कर वे पक्का कर रहे हैं कि फिर सुलह होने की घड़ी में भाजपा 2019 में उसे दी गई पांच सीटों से ज्यादा के लिए मोलभाव करने की स्थिति में न रहे. भाजपा को भी इस जमीनी हकीकत का एहसास है, इसलिए अन्नाद्रमुक के ऐलान पर उसने सतर्क प्रतिक्रिया की और गठबंधन टूटने का स्वागत कर रहे राज्य के नेताओं से अपने बयान वापस लेने को कहा.

फिलहाल, 2024 के लोकसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने को लेकर अन्नाद्रमुक उत्साह से लबालब है. पार्टी नेताओं का कहना है कि राज्य में एनडीए और साथ ही द्रमुक के खिलाफ प्रबल सत्ता-विरोधी मूड है. उनकी प्रेरणा का स्रोत 2014 है जब पार्टी ने लोकसभा का चुनाव अकेले लड़ा था और तमिलनाडु की 39 में से 37 सीटें जीती थीं. हालांकि जयललिता सरीखी करिश्माई सुप्रीमो की गैरमौजूदगी में उस कामयाबी को दोहराना उसके लिए जबरदस्त चुनौती होगी.

कुछ लोगों को लगता है कि भाजपा देसिया मुकपोक्कु द्रविड़ कलगम (डीएमडीके), इंधिया जननायक काची और जॉन पांडियन की अगुआई वाली तमिड़गा मुनेत्र कलगम के अलावा ओपीएस और टी.टी.वी. दिनाकरण की अगुआई वाले अन्नाद्रमुक के ईपीएस विरोधी धड़ों को रिझा सकती है. मूर्ति कहते हैं, ''अब उसके पास तीसरे मोर्चे की अगुआई का विकल्प है और तिकोने मुकाबले में दक्षिणी जिलों में वह दो-एक पारंपरिक सीटें जीत भी सकती है, जबकि सीधे मुकाबलों में उसके हारने की संभावना ही ज्यादा होती.''

अगले कुछ महीनों में पार्टी के राष्ट्रीय आलाकमान को तय करना होगा कि वह एआइएडीएमके के साथ मतभेदों को सुलझाए या अन्नामलाई पर अपना दांव लगाए, जो दावा कर रहे हैं कि पार्टी तमिनाडु में इतनी मजबूत है कि 25 लोकसभा सीटें जीत सकती है.

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