मोअज्जम मोहम्मद
कश्मीर में लंबे अंतराल तक सियासी गतिविधियों के बाधित रहने के बाद कुछ नए घटनाक्रम बदलती 'आबोहवा' का संकेत दे रहे हैं और इन्हें लेकर लोगों में खासी दिलचस्पी भी जगी है. 22 सितंबर को ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक को करीब चार साल बाद नजरबंदी से रिहा किया गया और बतौर इमाम श्रीनगर की जामा मस्जिद में नमाज की अगुआई की भी अनुमति मिली. उनसे पहले दो अन्य मौलवियों को जम्मू की कोट भलवाल जेल से रिहा किया गया था. सलफी उपदेशक मुश्ताक अहमद वीरी और बरेलवी मौलवी अब्दुल रशीद दाऊदी दोनों के खिलाफ सितंबर 2022 में 'युवाओं को उकसाने' के लिए सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था. दक्षिण कश्मीर में अच्छा-खासा प्रभाव रखने वाले तहरीक-ए-सौतुल औलिया के प्रमुख दाऊदी की गिरफ्तारी को अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग तक ने उनकी 'मजहबी नेतृत्व वाली भूमिका' से जुड़ा करार दिया था.
कश्मीर के प्रमुख अलगाववादी चेहरों में शुमार मीरवाइज उमर फारूक को 4 अगस्त, 2019 को हिरासत में लिया गया. यह केंद्र की तरफ से अनुच्छेद 370 को खत्म करने से एक दिन पहले की बात है. निगीन स्थित अपने घर में नजरबंदी के चार साल बाद मीरवाइज ने अगस्त में इस 'गैरकानूनी नजरबंदी' के खिलाफ सरकार को कानूनी नोटिस भेजा. उनके वकील ने जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट में एक रिट दायर की, जिसमें 14 सितंबर से चार सप्ताह के भीतर सरकार से जवाब मांगा गया. लेकिन सुनवाई से पहले ही उन्हें रिहा कर दिया गया. रही बात वीरी और दाऊदी की तो कोर्ट ने 8 सितंबर को ही उनकी हिरासत रद्द कर दी थी. हालांकि, सियासी माहौल इससे पहले ही बदल चुका था, यहां तक कि राज्य भाजपा भी उनकी रिहाई की मांग कर रही थी.
जुमे को जब 53 वर्षीय मीरवाइज जामा मस्जिद पहुंचे तो वहां मौजूद लोगों ने नारे लगाकर उनका स्वागत किया. सफेद और सुनहरे रंग का चोगा पहने मीरवाइज मस्जिद में खुत्बे से पहले रो पड़े. उन्होंने शांति और सुलह की बात करते हुए कश्मीरी पंडितों से लौटने का आह्वान किया. उन्होंने कहा, ''हमें अलगाववादी, राष्ट्र-विरोधी और शांति में बाधक कहा गया जबकि हम तो कश्मीरियों के हितों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. और उनके मसलों का उनकी शर्तों पर शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं.'' यही नहीं, उन्होंने कश्मीर के संदर्भ में यूक्रेन को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणी का इस्तेमाल करते हुए कहा, ''यह युद्ध का युग नहीं है.''
उनकी ऐसी संयमित भाषण शैली और सधे ढंग से शब्दों के इस्तेमाल को पुराने रुख में बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है. पहले मीरवाइज जैसे उदारवादी और दिवंगत सैयद अली शाह गिलानी जैसे कट्टरपंथी दोनों तरह के अलगाववादी नेता अक्सर ही अपने भाषणों में कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव का जिक्र करते थे और इसके बाद पत्थरबाजी की घटनाएं होना आम बात थी. 22 सितंबर को मीरवाइज के भाषण देकर चले जाने के बाद जामा मस्जिद के बाहर कोई उग्र विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ.
जम्मू यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर रहीं रेखा चौधरी का मानना है कि यह एक सकारात्मक संकेत है जो दिखाता है कि वे अतीत को पीछे छोड़ने को तत्पर हैं. वे कहती हैं, ''दिलचस्प बात यह है कि सियासी तौर पर उनमें दिखे बदलाव की तुलना उमर अब्दुल्ला से की जा सकती है. पिछले कुछ साल में उमर ने अपनी सियासी जमीन बनाए रखते हुए खुद को एक अनुभवी और व्यावहारिक नेता साबित किया है. मीरवाइज के भाषण में भी ऐसी ही व्यावहारिकता झलकती है. केंद्र के प्रति कोई कड़वाहट या नाराजगी नहीं, बल्कि कुछ जगह सराहना का भाव ही दिखा.''
पूर्व में मीरवाइज को केंद्र के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख रखने के लिए कट्टरपंथियों की कड़ी आलोचना सहनी पड़ी थी. अलगाववादियों के बीच एक 'उदार चेहरा' बनना कभी आसान नहीं रहा. प्रमुख उदारवादी हुर्रियत नेता अब्दुल गनी लोन को तो नई दिल्ली के साथ बातचीत का समर्थन करने की वजह से ही आतंकियों ने मार डाला. तथ्य यह भी है कि 1990 में आतंकियों के हाथों पिता मीरवाइज मौलवी फारूक की हत्या ने ही मीरवाइज को कम उम्र में सार्वजनिक जीवन में धकेला. फिर भी तमाम धमकियों से पूरी तरह बेपरवाह होकर, और कश्मीरियों को आत्मनिर्णय के अधिकार वाले रुख में कोई बदलाव किए बिना उन्होंने ऐसे समय केंद्र के साथ नजदीकी बढ़ाने का जज्बा दिखाया जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने खुद आगे आकर अलगाववादियों से बातचीत की पहल की थी. यह उनके राजनीतिक करियर में एक निर्णायक मोड़ था और नई दिल्ली में कई लोगों ने उनमें 'मुख्यधारा में आने की संभावनाएं' देखीं. चौधरी कहती हैं, ''कश्मीर में एक पॉलिटिकल एक्टर (सियासी हस्ती) के तौर पर वे अपेक्षाकृत कम विवादास्पद हैं.''
लोकसभा चुनाव अब करीब हैं, ऐसे में कई लोगों का मानना है कि भाजपा अपने फायदे के लिए मीरवाइज के नरम रुख का इस्तेमाल कर सकती है. वह इसे अपनी नीतियों को मिल रहे समर्थन के तौर पर दर्शा सकती है. जून में जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के अध्यक्ष अल्ताफ बुखारी ने नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी और उनसे आग्रह किया था कि जम्मू-कश्मीर में विश्वास बहाली के कदम उठाए जाने चाहिए. उन्होंने इन तीनों की रिहाई का सुझाव भी दिया था. भाजपा की बी-टीम करार दिए गए बुखारी ने बाद में एक अन्य उदारवादी नेता और हुर्रियत के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल गनी भट के अलावा शिया नेता आगा सैयद हसन मोसावी अल सफवी के साथ नजदीकी बढ़ाई, जिसने खासा कौतूहल जगाया. हुर्रियत के ही एक घटक इत्तिहादुल मुस्लिमीन के नेता सैयद मुजफ्फर रिजवी तो अपनी पार्टी में ही शामिल हो गए. बुखारी कहते हैं, ''हमारी पार्टी के दरवाजे उन सभी के लिए खुले हैं...जो भारतीय संविधान में विश्वास करते हैं और जिनका आतंकवाद से कोई वास्ता नहीं है.''
एक वरिष्ठ नीति विश्लेषक का मानना है कि मीरवाइज की मौजूदगी से सियासी परिदृश्य में नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी जैसी परंपरागत पार्टियों के लिए जगह घटेगी. अनुच्छेद 370 के रद्द होने के बाद बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों से उपजी शून्यता के बीच दोनों राजनैतिक दल खुद को कश्मीर की 'एकमात्र आवाज' बताते हुए मुख्यधारा और अलगाववादियों के प्रभाव वाले दोनों ही निर्वाचन क्षेत्रों में अपनी पैठ बढ़ाने में जुटे थे. लेकिन अब तस्वीर बदल जाएगी. विश्लेषक का कहना है, ''मीरवाइज की रिहाई से यह दावा भी बेमानी हो जाएगा कि जम्मू-कश्मीर में मजहबी स्वतंत्रता पर पाबंदी लगा दी गई है. वैसे, यह तो बस एक शुरुआत है, एक प्रायोगिक कदम है. भरोसा बहाल करने के लिए आगे और भी कदम उठाए जा सकते हैं.'' यह कदम इतना अप्रत्याशित था कि इसे किसी गुगली से कम नहीं माना जा सकता.
गिरफ्तारी के बाद बदलता घटनाक्रम
> 5 अगस्त, 2019 को केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को हासिल विशेष दर्जा खत्म कर दिया
> व्यापक सैन्य जमावड़े के बीच तमाम राजनेताओं, अलगाववादियों और एक्टिविस्ट सहित करीब 8,000 लोगों को हिरासत में ले लिया गया. कई लोग अब भी जेल में हैं
> पूर्व मुख्यमंत्रियों फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के अलावा शीर्ष हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारूक को नजरबंद कर दिया गया
> एनआइए ने गिलानी के अलावा मीरवाइज और कई अन्य लोगों के खिलाफ कथित आतंकी फंडिंग से जुड़े होने की जांच भी शुरू की
> 1 सितंबर, 2021 को कश्मीर के सबसे उग्र अलगाववादी नेता गिलानी का निधन
> दाऊदी और वीरी जैसे मौलवियों की रिहाई के बाद 22 सितंबर को मीरवाइज की नजरबंदी खत्म होना प्रशासन के नरम रुख का संकेत है

