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एक आदमी की जिद, कैसे बिहार की खस्ताहाल शिक्षा व्यवस्था को बदल रही है

एक अधिकारी के प्रयास से राज्य के स्कूल समय पर खुलने लगे हैं और शिक्षकों-विद्यार्थियों की हाजिरी बढ़ने से वे फिर गुलजार हो गए हैं. यह अफसर आखिर किस तरह शिक्षकों को उनका कर्तव्य याद दिलाकर खस्ताहाल शिक्षा व्ययवस्था को फिर से दुरुस्त करने पर आमादा है

बढ़ गई उपस्थिति लगातार प्रयास का असर सोहसराय के उच्च विद्यालय में दिख रहा है. सुबह की प्रार्थना में शिक्षक और छात्राएं
बढ़ गई उपस्थिति लगातार प्रयास का असर सोहसराय के उच्च विद्यालय में दिख रहा है. सुबह की प्रार्थना में शिक्षक और छात्राएं
अपडेटेड 19 सितंबर , 2023

"संभव है, आप वहां जा नहीं सकते... खासकर इस बरसात के मौसम में..." वहां जाने से पहले प्लस टू विद्यालय, अलौली के शिक्षक ने यही कहा था. उनके साथियों ने बताया था कि वे इसी इलाके के रहने वाले हैं और यहां के भूगोल से परिचित हैं. ''इस बरसात के मौसम में आपको दो-दो नदियां पार करनी पड़ेंगी और आठ से दस किमी पैदल चलना पड़ेगा. हम आपको रोकेंगे नहीं, मगर जान लीजिये रास्ता कैसा है.’’

उनकी बात गलत नहीं थी, यह कोसी नदी की पहली धारा पार करते हुए ही समझ आ गया. नाव पर सवार एक बुजुर्ग ने तंज कसते हुए जब कहा, ''एंह जुत्ता-मोजा पहनकर जाएंगे. खोलिए जुत्ता और हाथ में लीजिए. ई दियर का इलाका है. यहां साहिबी नहीं चलेगी.’’ नाव घाट से दस मीटर पहले ही रुक गई. पानी में उतरना पड़ा. फिर एक से डेढ़ किमी खेत वाले रास्ते में कीचड़ के बीच खुद को फिसलन से बचाते हुए चलना पड़ा.

खेत और बहियार के बीच से गुजरते हुए रास्ता भटक जाने का डर था. मगर जब दो घंटे चली इस यात्रा के बाद खगड़िया जिले के प्राथमिक विद्यालय, सुखासन पहुंचे तो वहां स्कूल खुला था. दो शिक्षक भी मौजूद थे. बारिश के मौसम के बीच कई बच्चे पढ़ भी रहे थे और रसोइया इनके लिए मिड-डे मील पका रही थी.यह वही स्कूल था, जिसमें पिछले दिनों हुए निरीक्षण के वक्त न कोई छात्र मिला था, न शिक्षक.

शिक्षा विभाग के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी को एक ग्रामीण युवक आनंद पासवान ने बताया कि यहां की एक शिक्षिका आशा कुमारी ने उसे छह हजार रुपए के मानदेय पर रखा है, ताकि उसके बदले वह बच्चों को पढ़ाया करे. इस शिकायत पर 25 जुलाई, 2023 को इस स्कूल के चारों शिक्षकों से उनके छह माह के वेतन के बराबर राशि वसूलने का आदेश जारी हुआ. 

बिहार के इस दुर्गम इलाके में छह माह से अधिक समय से बंद पड़े इस स्कूल को फिर से चालू कराना लगभग असंभव था. और यह असंभव काम संभव हुआ, बिहार सरकार के शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव के.के. पाठक की जिद की वजह से. वे पिछले लगभग दो महीने से बिहार की शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाने में जुटे हैं.

इस अभियान के तहत इस साल 1 जुलाई से राज्य के सरकारी स्कूलों का लगातार नियमित निरीक्षण हो रहा है. अनियमितता पाए जाने पर शिक्षकों के वेतन को रोका जा रहा है, वेतन की वसूली की जा रही है. शिक्षा विभाग के प्रखंड और जिला स्तर के अधिकारियों पर छात्रों की उपस्थिति सुनिश्चित करने का दबाव बनाया जा रहा है. स्कूल के टाइम में कोचिंग और प्राइवेट ट्यूशन बंद रखने का दबाव है और स्कूलों की व्यवस्था को सुधारने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है. 

सीएम चाहते हैं बदले स्कूलों का माहौल

अब तक बिहार की सरकारी स्कूलों की व्यवस्था को सुधारना असंभव माना जाता रहा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल की यही सबसे बड़ी विफलता मानी जाती है. 2022 की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) के मुताबिक, बिहार के सरकारी स्कूलों में छात्रों और शिक्षकों की उपस्थिति चिंताजनक (क्रमश: 60 और 80 फीसद से कम) बताई गई थी. पढ़ाई की गुणवत्ता पर भी सवाल उठे थे.

इसकी एक बड़ी वजह बिहार में 2006 में शुरू हुई शिक्षा मित्र योजना को माना जाता है. 2012 तक इस योजना के जरिए सरकारी स्कूलों में सिर्फ डिग्री देखकर नियोजित शिक्षक रखे जाते रहे. इस काम का जिम्मा पंचायतों पर था और जानकारों का कहना है कि बड़ी संख्या में अयोग्य शिक्षक आ गए. फंड की कमी से जूझ रही बिहार की शिक्षा व्यवस्था एक तरह से इन्हीं शिक्षकों के भरोसे हो गई.

ऐसा माना जाता है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने सेवा काल के इस कलंक को धोना चाहते हैं, और इसके लिए उन्होंने इस मिशन इंपॉसिबल की जिम्मेदारी सख्ती से काम कराने के लिए चर्चित अफसर के.के. पाठक को दी है. इस साल स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में भी उन्होंने कहा, ''स्कूलों में शैक्षणिक माहौल बनाने के लिए लगातार काम हो रहे हैं. आधारभूत संरचना को भी बेहतर बनाया जा रहा है. जो शिक्षक अच्छा काम करेंगे, उन्हें बेहतर अवसर मिलेगा.’’

बदलते स्कूलों की कहानियां

इस बदलाव का प्रतिनिधि उदाहरण है, मुख्यमंत्री के ही गृह जिले नालंदा का नालंदा कॉलेजिएट स्कूल, जो जिला मुख्यालय बिहारशरीफ में स्थित है. 1861 में खुले इस स्कूल की कभी काफी प्रतिष्ठा हुआ करती थी. मगर पिछले कुछ वर्षों में इस स्कूल की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई. खुद नालंदा के जिला शिक्षा अधिकारी केशव प्रसाद भी यह स्वीकार करते हैं कि जून महीने तक इस स्कूल की ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में बमुश्किल 10-15 छात्र ही आते थे. 17 अगस्त, 2023 को इन दोनों कक्षाओं में न सिर्फ 114 छात्र उपस्थित मिले, बल्कि इनमें से कई छात्र जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान प्रयोगशाला में प्रयोग भी कर रहे थे और पुस्तकालय के कमरे में भी छात्र नजर आ रहे थे.

स्कूल के प्रधानाचार्य सुनील कुमार ने बताया, ''यह असंभव काम दो वजहों से संभव हुआ. हमने सभी अभिभावकों को फोन पर चेताया कि अगर उनके बच्चों की साल भर में उपस्थिति 75 फीसद से कम रही तो उन्हें परीक्षा नहीं देने दिया जाएगा.’’

ऐसी चेतावनियों का असर दिख रहा है. बिहारशरीफ के ही एस.एस. कन्या उच्च विद्यालय में तो छात्राओं की उपस्थिति इतनी अधिक हो गई है कि उन्हें बरामदे मंय बिठाकर कक्षाएं लेनी पड़ रही हैं. इसी तरह अरवल के कन्या उच्च विद्यालय में छात्राओं की बढ़ती संख्या की वजह से हॉस्टल के कमरे में कक्षाएं आयोजित कराई जा रही हैं. 4 अगस्त, 2023 को जब पाठक वहां औचक निरीक्षण के लिए पहुंचे तो उन्हें कक्षाओं में खड़ी होकर पढ़ाई करती लड़कियां दिखीं. फिर उन्होंने आनन-फानन में हॉस्टल में कक्षाएं आयोजित कराने का निर्देश दिया.

सफलता की यह कहानी धरातल पर भी नजर आती है. इसे देखने के लिए इंडिया टुडे ने पिछले दिनों अरवल, नालंदा, खगड़िया, बेगूसराय, वैशाली आदि जिलों के डेढ़ दर्जन से अधिक स्कूलों की यात्रा की. 

ऐसे चला अभियान

बिहार जैसे बड़े राज्य के सरकारी स्कूलों की व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करना एक बड़ा काम था. 10 जून, 2023 को पाठक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव बनाए गए तो स्कूलों में गर्मियों की छुट्टी चल रही थी. उन्होंने 1 जुलाई से राज्य के सरकारी स्कूलों के नियमित निरीक्षण का अभियान शुरू किया. पहले दिन 4,681 सरकारी स्कूलों का निरीक्षण हुआ और उस दिन गैरहाजिर मिले 588 शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई की गई. धीरे-धीरे जांच का दायरा बढ़ता चला गया और 24 अगस्त को एक साथ राज्य के 36,300 सरकारी स्कूलों का औचक निरीक्षण किया गया.

इस जांच का सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि दूर-दराज के स्कूलों में भी शिक्षक अब समय से उपस्थित होने लगे हैं और विद्यालय की पूरी अवधि तक उपस्थित रहते हैं. इस बीच शिक्षा विभाग एक ऐसा ऐप (ई-शिक्षा कोष) तैयार करा चुका है जिसमें विद्यालय में पहुंचकर ही शिक्षक हाजिर लगा पाएंगे. शिक्षा विभाग ने स्कूलों के साथ-साथ प्रखंड शिक्षा अधिकारी के जिम्मे यह काम डाल दिया है कि वे छात्रों की 75 फीसद उपस्थिति सुनिश्चित करें. अन्यथा उनके वेतन में कटौती होगी. 

बिहार के सरकारी स्कूलों में गैरहाजिर छात्रों की संख्या खूब रहती है. मिड-डे मील, साइकिल, पोशाक और दूसरी सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए कई अभिभावक अपने बच्चों का नाम यहां लिखा देते हैं और पढ़ाई के लिए उन्हें प्राइवेट स्कूल और कोचिंग संस्थानों में भेजते हैं. अरवल के एक सरकारी स्कूल उत्क्रमित मध्य विद्यालय, रसीदपुर के प्रभारी प्रधानाध्यापक अभय लाल ने बताया कि उनके स्कूल से ऐसे 60 से अधिक बच्चों का नाम हाल के दिनों में काट दिया गया.

पाठक जांच के लिए शुक्रवार का दिन चुन रहे हैं, जो सचिवालय के काम-काज का आखिरी दिन होता है. वे अब तक सारण, अरवल, समस्तीपुर, वैशाली, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मधुबनी आदि जिलों के कई स्कूलों की जांच कर चुके हैं.

हाजिरी बढ़ी तो समस्याएं दिखने लगीं

स्कूलों में कहीं पंखा काम नहीं कर रहा तो कहीं बल्ब खराब है. शौचालय की सफाई के लिए किसी स्कूल के पास स्टाफ नहीं है. अब छात्रों को बिठाने के लिए कमरे कम पड़ रहे हैं. इन तमाम समस्याओं की चुनौतियां भी विभाग के सामने हैं. मगर पाठक इनका समाधान भी अपने तरीके से कर रहे हैं.

राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में कुल 1,400 करोड़ रुपए की राशि डंप पड़ी है. उन्होंने तत्काल आदेश जारी कराया कि पांच लाख रुपए तक का काम प्राचार्य बिना अनुमोदन के अपने स्तर से करा सकते हैं. इससे अधिक के काम के लिए विद्यालय प्रबंध समिति से अनुमोदन लें. अगर समिति 15 दिनों में अनुमोदन नहीं देती तो डीईओ से अनुमोदन लेकर काम करा सकते हैं.

अरवल के कन्या उच्च विद्यालय में जांच के लिए पहुंचे पाठक से लड़कियों ने शिकायत कर दी कि उनके स्कूल में कंप्यूटर तो पड़े हैं, मगर कंप्यूटर की पढ़ाई नहीं होती. फिर पता चला कि 2011-12 में राज्य के सभी सरकारी स्कूलों के लिए कंप्यूटरों की खरीद हुई थी. उनमें से ज्यादातर बिना इस्तेमाल के खराब हो गए. पाठक ने इस शिकायत को संज्ञान में लिया और बिहार शिक्षा परियोजना राज्य के दस हजार सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर की कक्षाएं चलाने की तैयारी में जुट गया है. सभी माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों को दस-दस कंप्यूटर दिए जा रहे हैं. 

26 अगस्त को पाठक ने सभी जिलाधिकारियों को एक पत्र लिखा है कि जिन स्कूलों में बरामदे में कक्षाएं हो रही हैं, वहां मॉडुलर भवन तैयार कर कक्षाएं शुरू की जाएं. जहां शिक्षकों की कमी है, वहां आउटसोर्सिंग के जरिए अस्थायी शिक्षक बहाल किए जाएं. स्कूलों की साफ-सफाई का जिम्मा वेंडरों को दिया जाए.

पाठक को राज्य शैक्षणिक अनुसंधान प्रशिक्षण परिषद के पटना स्थित कार्यालय में उम्मीद के मुताबिक काम नजर नहीं आया तो उन्होंने 75 अधिकारियों और कर्मियों का वेतन बंद करा दिया. इसके बाद वहां के निदेशक ने भरोसा दिलाया कि परिषद में हर हफ्ते 15 हजार शिक्षकों का प्रशिक्षण होगा. उन्होंने राज्य के सभी चार लाख शिक्षकों को दिसंबर, 2023 तक प्रशिक्षित करने का लक्ष्य परिषद को दिया है.

कोचिंग-ट्यूशन पर लगाम

शिक्षा विभाग की ओर से आदेश जारी हुआ है कि स्कूल के टाइम में सुबह नौ बजे से शाम चार बजे के बीच राज्य में कोई कोचिंग या ट्यूशन सेंटर संचालित नहीं होगा. किसी सेंटर में सरकारी या निजी विद्यालयों के शिक्षक नहीं पढ़ाएंगे. यह अभियान 1 अगस्त से शुरू हुआ है. जिला शिक्षा अधिकारी को 31 अगस्त तक हर हाल में इस आदेश को लागू कराने का जिम्मा दिया गया है.

कमियां और शिकायतें

स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के इस अभियान को लेकर कई शिकायतें भी हैं. शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर खुद इस अभियान के पक्ष में नहीं हैं, मगर चूंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पाठक को खुली छूट दे रखी है, तो वे भी कुछ कर नहीं पा रहे. (देखें: 'मंत्री से भिड़ गए अफसर’, इंडिया टुडे, 26 जुलाई, 2023) इस अभियान को लेकर शिक्षकों के संगठन में भी नाराजगी है. टीईटी-एसटीईटी उत्तीर्ण नियोजित शिक्षक संघ के प्रदेश प्रवक्ता अश्विनी पांडेय कहते हैं, ''अगर राज्य की शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाना है तो शिक्षकों से भी बात करनी चाहिए. अधिकारी उनकी समस्याओं को सुनें, उन्हें समय पर वेतन मिले.’’ 

पाठक के बाद क्या?

स्कूली शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए अभियान की सबसे बड़ी खामी यह बताई जा रही है कि यह व्यक्ति केंद्रित है. राजकीयकृत मध्य विद्यालय बीहट के प्रधानाचार्य रंजन, जो शिक्षा के क्षेत्र में अपने प्रयोग के लिए जाने जाते हैं, कहते हैं, ''बिहार के सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी दिक्कत है कि यहां अब तक स्कूल संचालन नियमावली नहीं बनी है.’’ उनकी सलाह है कि विभाग को स्कूल के प्राचार्यों को पूरी शक्ति देनी चाहिए और बदले में उसे स्कूल में शिक्षकों, छात्रों की उपस्थिति, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पूरी व्यवस्था के लिए जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए.

लेकिन शिक्षा विभाग का तर्क है, ''शैक्षणिक संस्थानों के संचालन के लिए उचित एवं सशक्त नियमावली पहले से ही है.’’ (देखें बातचीत: असामान्य समस्या का असामन्य समाधान) 

बहरहाल, सरकार ने पाठक के नेतृत्व में शिक्षा व्यवस्था सुधारने की ठान ली है. शिक्षकों और छात्रों को उनका कर्तव्य याद दिलाया जा रहा है. नतीजतन, समय पर खुल रहे स्कूलों में उनकी हाजिरी बढ़ गई है. उम्मीद है, यह अनुशासन धीरे-धीरे मानक बन जाएगा.

बातचीत:

शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव के.के. पाठक अमूमन मीडिया से बातचीत नहीं करते. इंडिया टुडे ने कई दफ उनसे बातचीत की कोशिश की मगर वे राजी नहीं हुए. हालांकि उनसे बातचीत के लिए मेल पर भेजे गए सवालों के सटीक और स्पष्ट जवाब दिए. 

पिछली 1 जुलाई से बिहार में स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए लगातार अभियान चल रहा है. डेढ़ महीने बाद इस अभियान को लेकर आप कितने संतुष्ट हैं?  
समय पर स्कूल शुरू हों और सभी शिक्षक-शिक्षिकाएं तथा छात्र उपस्थित रहें, यह कोई अभियान नहीं है. हां, कुछ लोग अपना कर्तव्य भूल गए हैं, तो उन्हें इसकी याद दिला देनी है. विभाग इतना भर कर रहा है और इसके सकारात्मक परिणाम भी दिखाई दे रहे हैं. 
 
यह तो दिखता है कि स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति बढ़ी है और छात्रों की उपस्थिति में भी सुधार हुआ है, मगर गुणात्मक शिक्षा अभी भी स्कूलों के लिए सपना है. इसके लिए क्या योजनाएं हैं?  
शिक्षा बिना गुणवत्ता के हो ही नहीं सकती. जब निर्धारित प्रकियाओं के साथ शैक्षणिक संस्थाएं काम करेंगी तो शिक्षा का प्रभावकारी रूप सामने आएगा, जिससे लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है. विभाग के लिए शिक्षा के सिर्फ दो रूप हैं- प्रभावकारी शिक्षा तथा प्रभावहीन शिक्षा. प्रभावकारी शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए सघन कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. 

शिक्षा विभाग के जिला स्तरीय अधिकारी कहते हैं कि पिछले डेढ़ महीने से मिशन मोड में काम चल रहा है, हफ्ते में छह दिन और कई बार सात दिन, 12 घंटे से अधिक की ड्यूटी हो रही है. यह मिशन कब तक चलेगा. विभाग नॉर्मल मोड में कब आएगा?  
असामान्य समस्या के लिए असामान्य समाधन की आवश्यकता होती है. 

ऐसा कहा जाता है कि बिहार में स्कूलों के परिचालन के लिए कोई नियमावली नहीं है. ज्यादातर काम अधिकारियों की चिट्ठी से चलते हैं. प्राचार्यों के हाथ में कोई पावर नहीं है. ऐसा क्यों है?  
यह कहा जाना कि स्कूलों के परिचालन के लिए नियमावली नहीं है, उचित नहीं है. उस नियमावली को प्रभावी बनाने के लिए अधिकारिक स्तर से पत्र भेजे जाते हैं.  प्राचार्यों को विद्यालय संचालन एवं गुणवत्तापूर्ण पठन-पाठन के लिए सभी तरह के अधिकार दिए गए हैं. 

क्या यह सुधार तभी तक है, जब तक के.के. पाठक हैं? आपके बाद भी यह सुधार जारी रहे, उसके लिए आप क्या करने वाले हैं?  
शैक्षणिक संस्थानों के संचालन के लिए उचित एवं सशक्त नियमावली पहले से ही है. नियमावलियों का उचित ढंग से पालन किया जाना सभी उच्चाधिकारियों के लिए आवश्यक एवं अनिवार्य है. 

शिक्षकों के बीच यह चर्चा है कि आप कभी भी सभी सरकारी शिक्षकों और शिक्षा विभाग के कर्मियों, अधिकारियों के लिए उनके बच्चों की पढ़ाई सरकारी स्कूलों में कराना अनिवार्य कर सकते हैं. इसमें कितनी सच्चाई है?  

ऐसी कोई बात नहीं है. 

कहा जाता है कि बिहार में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता कोचिंग संस्थानों पर ही निर्भर हो गई है. ऐसे में अगर कोचिंग संस्थान बंद हो गए तो रही-सही गुणवत्ता भी चली जाएगी.

कोचिंग संस्थान अपनी समय-सारिणी को स्कूली समय के बाद रखें, ऐसा आदेश दिया गया है. बिहार के विद्यालयों के बच्चे बिहार और बिहार के बाहर उच्चस्तरीय संस्थानों में नामांकन लेने के लिए सक्षम होते हैं.

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