जुलाई के आखिरी हफ्ते में गुजरात के कच्छ जिले से दिल दहला देने वाली एक घटना सामने आई. घटना, जिसमें पांच बच्चों ने अपनी जान गंवा दी, नखत्राणा तालुका स्थित लुदबई गांव में हुई. गांव के सरपंच जब्बार जाट का यह बयान कि बच्चों की मौत कुपोषण की वजह से हुई, स्थिति की गंभीरता बताती है. हालांकि, जिला विकास अधिकारी शैलेश प्रजापति ने केवल दो मौतों के लिए कुपोषण को जिम्मेदार बताया है.
साथ ही, तीन हफ्ते पहले जारी हुई नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआइ) रिपोर्ट के इस पहलू को भी उजागर किया कि गुजरात में हर 100 में से 38 बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. यह 2021 के बाद रिपोर्ट का दूसरा संस्करण है, और इस व्यापक सूचकांक में तीन महत्वपूर्ण आयामों—स्वास्थ्य और पोषण, शिक्षा और जीवन स्तर—के आधार पर राज्यों और जिलों में गरीबी की गंभीरता का आकलन किया गया है.
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़ों पर आधारित इस सूचकांक के मुताबिक, गुजरात अपनी गरीबी की दर 2015-16 के 18.47 फीसद के मुकाबले 2019-21 में मामूली सुधार के साथ 11.66 फीसद पर लाने में सफल रहा है. वहीं, कुपोषण के मामले में गुजरात का प्रदर्शन 41.37 फीसद की तुलना में थोड़ा सुधरकर 38.09 फीसद हो गया है. हालांकि, समान जीडीपी वाले राज्यों और बच्चों की पोषण संबंधी जरूरतें पूरी किए जाने के प्रयासों की तुलना करें तो यह सुधार कम ही लगते हैं.
गुजरात को एक लंबे अरसे से उसकी शानदार प्रति व्यक्ति आय (पीसीआइ) के लिए सराहा जाता रहा है, जो लगातार राष्ट्रीय औसत से अधिक बनी हुई है. 2021-22 के अनुमान के मुताबिक, राष्ट्रीय औसत 1.72 लाख रुपए के मुकाबले राज्य की प्रति व्यक्ति आय 2.5 लाख रुपए है. 2012 में जब भाजपा ने गुजरात को 'विकास के एक मॉडल' के तौर पर प्रचारित करना शुरू किया, तो विश्लेषकों ने इसकी वास्तविक तस्वीर को गहराई से खंगालना शुरू किया, जिसके बाद ही बच्चों में पोषण का स्तर कम होना और शिशु और मातृ मृत्यु दर की चिंताजनक स्थिति के बारे में पता चला. और इसके बाद राज्य प्रशासन ने स्कूली बच्चों में कुपोषण के कारण होने वाली बौनेपन की समस्या से निबटने के उद्देश्य से कई कार्यक्रम शुरू किए. कुपोषण की रोकथाम, निगरानी और इसके खात्मे के लक्ष्य के साथ की गई तमाम पहल की समीक्षा दर्शाती है कि राज्य में योजनाओं की कोई कमी नहीं है—कम से कम कागजों पर तो कतई नहीं. फिर भी, एनएफएचएस डेटा एक भयावह तस्वीर सामने लाता है—राज्य में एनीमिया पीड़ित 6 से 9 वर्ष आयु के बच्चों का आंकड़ा 2015-16 में 62.6 फीसद से बढ़कर 2019-21 में 79.7 फीसद हो गया है. यह पोषण वहन करने में असमर्थता और इसकी अहमियत को लेकर जागरूकता के अभाव, दोनों का नतीजा है.
हालांकि, एमपीआइ रिपोर्ट के खुलासों पर सरकारी अधिकारियों का नजरिया अलग-अलग है. स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि गरीबी और कुपोषण दोनों अलग चीजें हैं. उन्होंने तर्क दिया, ''लोगों का रुझान प्रसंस्कृत डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की ओर अधिक हो गया है, जिनमें कैलोरी तो अधिक होती है लेकिन पोषण तत्वों का अभाव होता है. यह एक तरह से महामारी है.'' वहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी, जिन्हें पूर्व में गुजरात के आइसीडीएस (एकीकृत बाल विकास सेवाओं) के स्वतंत्र ऑडिट का जिम्मा सौंपा गया था, इससे असहमति जताते हुए पूछते हैं, ''हमारे यहां क्या अमीर बच्चों के कुपोषण का इलाज चल रहा है?'' वे सवाल उठाते हैं, ''क्या आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता नियमित तौर पर गर्भवती मांओं की जांच करने पहुंचती हैं? क्या उनकी तरफ से परिवारों को पोषण संबंधी जानकारी मुहैया कराई जाती है? क्या वे ऐसा करने के लिए प्रशिक्षित हैं?''
शोध बताता है कि पोषण को लेकर लोगों में जागरूकता के अभाव के लिए काफी हद तक शिक्षा प्रणाली जिम्मेदार है. आइसीडीएस के तहत पूरक खाद्य कार्यक्रमों में पर्याप्त सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी है, और उनका प्रबंधन भी ठीक नहीं है. इसका सबसे ज्यादा जोखिम लड़कियों और महिलाओं के लिए होता है. ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियां अक्सर स्कूल छोड़ने पर बाध्य होती हैं, बाल विवाह जारी रहते हैं, और कम उम्र में मां बनने वाली महिलाएं अपने पोषण की समझ नहीं रखती हैं.
एक चौंकाने वाला आंकड़ा यह भी है कि गुजरात में 50 फीसद बच्चों को जन्म के बाद पहले घंटे में स्तनपान नहीं कराया जाता है. यह गंभीर तस्वीर एनएफएचएस 2015-16 के आंकड़ों पर आधारित है, जो दर्शाता है कि 20 से 24 वर्ष की आयु की 24.9 फीसद महिलाओं की शादी 18 वर्ष यानी कानूनी उम्र तक पहुंचने से पहले हो गई थी. गुजरात में एनीमिया से पीड़ित गर्भवती महिलाओं का अनुपात 2015-16 में 51.3 फीसद की तुलना में 2019-21 में 62.6 फीसद हो गया.
महिला एवं बाल विकास विभाग और अन्य विभागों की तरफ से चलाई जाने वाली तमाम योजनाओं के बीच राज्य सरकार अपना ध्यान एक व्यापक सामाजिक जागरूकता अभियान पर केंद्रित कर रही है. मई में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ऋषिकेश पटेल ने घोषणा की थी, ''हम मारु गाम, कुपोषण मुक्त गाम (मेरा गांव, कुपोषण मुक्त गांव) नामक एक ग्राम स्तरीय अभियान शुरू करने जा रहे हैं.'' स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने इस पर अपनी रणनीति की रूपरेखा बताई, ''हम उचित पोषण पर जोर देने के लिए ग्राम प्रधानों, स्वयं सहायता समूहों, स्कूल शिक्षकों और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के प्रभावशाली लोगों के साथ मिलकर काम करेंगे. एक सुव्यवस्थित संचार योजना तैयार की जा रही है.''
बहरहाल, इस पूरे अभियान की सफलता विभिन्न क्षेत्रों में वास्तविक समस्याओं को पहचान करने और अलग-अलग मामले में अलग-अलग तरह की जरूरतों को समझकर उनका समाधान निकालने में निहित है. इसके लिए धैर्य के साथ वैज्ञानिक पहलू पर भी ध्यान देने की जरूरत है.

