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सुलझता नहीं भूमि विवाद का मकड़जाल

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दरबार में हर पांचवीं शिकायत जमीन से जुड़े विवादों की होती है, इसके बावजूद ये विवाद सुलझते नहीं दिखते

भागलपुर जिले में महादलित परिवार की ये महिलाएं पट्टे मिलने के दस साल बाद भी अपनी जमीन पर कब्जे के इंतजार में हैं (फोटो: पुष्यमित्र)
भागलपुर जिले में महादलित परिवार की ये महिलाएं पट्टे मिलने के दस साल बाद भी अपनी जमीन पर कब्जे के इंतजार में हैं (फोटो: पुष्यमित्र)
अपडेटेड 7 अगस्त , 2023

जुलाई की 3 तारीख. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जनता दरबार चल रहा है. एक के बाद एक फरियादी आ रहे हैं. कटिहार से आए विजय कुमार ने अपनी मुश्किल साझा करते हुए बताया, ''अपनी जमीन में मकान का एक्सटेंशन करना चाह रहा हूं, लेकिन पड़ोसी रोक रहे हैं.’’ बेगुसराय के सरफराज अंसारी बताते हैं, ''दबंगों ने मेरी जमीन पर कब्जा कर लिया है और अब मुझे परेशान कर रहे हैं...’’ मधेपुरा के एक युवक सुमन का कहना था, ''मेरी जमीन को दलालों ने बेचकर उस पर मकान बनवा लिया, शिकायत की मगर निराकरण नहीं हुआ...’’  बांका के फरियादी राजीव ने बताया, ''जमीन पर दबंगों का कब्जा है, थाने में शिकायत दर्ज नहीं हो रही...’’ 

ये उन शिकायतों की बानगी है जो नीतीश कुमार के जनता दरबार में पहुंची थीं. उस रोज ऐसी 80 से अधिक शिकायतें पहुंचीं. जमीन विवाद से संबंधित इन शिकायतों की संख्या इतनी अधिक थी कि खुद नीतीश कुमार परेशान हो गए. उनके मुंह से निकल गया, ''काफी केस आ रहा है भाई.’’  ये विवाद भी मुख्य तौर पर पांच तरह के हैं—जमीन पर अवैध कब्जा, बंटवारे को लेकर विवाद, खरीद-फरोख्त में धोखा, भूमि अधिग्रहण से संबंधित विवाद और सीमांकन विवाद जिसके कारण पड़ोसी मकान बनाने से रोकते हैं. 

बिहार सीएम के जनता दरबार में हमेशा से जमीन विवाद के मामले बहुतायत में आते रहे हैं. जनता दरबार का दूसरा चरण जुलाई, 2021 से शुरू हुआ है. तब से ऑनलाइन शिकायतें भी ली जा रही हैं. इनसे जुड़े आंकड़े बताते हैं कि जुलाई, 2023 के आखिर तक कुल 67,958 शिकायतें आईं, इनमें से 14,521 शिकायतें राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग से संबंधित हैं. हालांकि जमीन विवाद से जुड़ी शिकायतें निबंधन विभाग और गृह विभाग से भी जुड़ी होती हैं. इसके बावजूद अगर राजस्व एवं भूमि सुधार की शिकायतों को ही गिना जाए तो यह साफ है कि जनता दरबार में हर पांचवीं शिकायत जमीन विवाद से संबंधित होती है. 

इन आंकड़ों से जाहिर है कि भूमि-विवाद बिहार में कितनी बड़ी समस्या का रूप ले चुका है. खुद मुख्यमंत्री कई दफा कह चुके हैं कि राज्य में 60 फीसद से अधिक आपराधिक मामलों की वजह भूमि विवाद होते हैं. इन भूमि विवादों के समाधान के लिए राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने कई योजनाएं भी लागू की हैं. मगर इन योजनाओं का असर जमीन पर नहीं दिखता. लिहाजा समस्या जस की तस है.

अगर जनता दरबार की शिकायतों का ही विभाग समाधान निकालता तो शायद स्थिति कुछ हद तक बेहतर हो जाती. मगर बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के पास ये आंकड़े भी नहीं हैं कि अब तक जो 14,521 शिकायतें मुख्यमंत्री के सामने आईं, उनमें से कितनों का समाधान हुआ और कितनी शिकायतों का निबटारा बाकी है. विभाग के सचिव जय सिंह कहते हैं, ''ये मामले जिला प्रशासन देखता है इसलिए हमें यह जानकारी नहीं है कि इनमें से कितनी शिकायतों का समाधान हुआ है, कितनी अभी बची हैं.’’ यह पूछे जाने पर कि क्या विभाग ने कभी इन मामलों को एक साथ रखने कोशिश नहीं की, उन्होंने ना में सिर हिला दिया.

बिहार में भूमि विवाद से जुड़े ज्यादातर मामले किसी दबंग व्यक्ति या भू-माफिया के किसी की जमीन पर कब्जा कर लेने से संबंधित होते हैं. इसके समाधान के लिए बिहार सरकार ने सितंबर, 2014 से ऑपरेशन भूमि दखल दिहानी शुरू किया था. आंकड़ों के हिसाब से तो ऐसा लगता है कि यह अभियान सफल है. विभाग के सचिव जय सिंह बताते हैं, ''बिहार में कुल 1,39,116 लोगों ने अपनी जमीन पर कब्जा होने की शिकायत की थी. इनमें से अब तक 1,08,634 लोगों को इस अभियान के तहत कब्जा दिलाया जा चुका है. सिर्फ  20,482 लोगों को ही अब कब्जा दिलाना है. इनमें से भी ज्यादातर ऐसे मामले हैं, जो अदालत में हैं. नहीं तो यह काम भी हो जाता.’’ हालांकि विभाग के दावे से इतर धरातल पर इसका असर नजर नहीं आता. 

बिहार में ऑपरेशन भूमि दखल दिहानी के असर को देखने जब हम भागलपुर के नाथनगर ब्लॉक के तूतबागान पहुंचे तो महादलित परिवारों की दर्जनों महिलाओं ने हमें घेर लिया. सभी महिलाओं के हाथ में एक लेमिनेटेड कागज था, जो उन्हें 2011-12 में मिले जमीन के पट्टे की रसीदें थीं. 

इस जगह महादलितों में भी सबसे हाशिये पर मानी जाने वाली डोम जाति के 70-75 परिवार सड़क किनारे छोटी-छोटी झोपड़ियां बनाकर रहते हैं. ऐसी ही एक झोपड़ी में 60 साल की चीना देवी मिलीं. छह गुणा आठ फुट की झोपड़ी में उनके परिवार के छह सदस्य और उनकी तीन बकरियां रहती हैं. इसी छोटी-सी झोपड़ी में उनका खाना भी बनता है और पूरे घर का सामान भी अटा है. चीना देवी के पास भी वही सरकारी कागज है, जिसके मुताबिक यहां से दसेक किमी दूर दोगच्छी गांव में उन्हें पांच डेसिमल जमीन मिली है. मगर 12 साल बीत जाने के बाद भी यह सरकारी कागज उनके लिए उस जमीन की शक्ल नहीं ले पाया, जहां वे अपनी छोटी-सी झोपड़ी खड़ी कर सकें. सरकारी भाषा में वे भूमिहीन नहीं हैं, मगर हकीकत में बेघरबार ही हैं. 

इस मोहल्ले के 42 परिवारों को यह कागज मिला है मगर सबकी हालत एक जैसी है. चीना देवी बताती हैं, ''यह कागज मिला तो हम बहुत खुश हुए. मगर जब जमीन लेने गए तो पता चला कि वहां किसी और का कब्जा है. फिर हम सीओ (अंचल अधिकारी), बीडीओ (प्रखंड विकास अधिकारी) के दफ्तरों का चक्कर लगाने लगे. आंदोलन करने लगे कि हमें जो जमीन मिली है, उसका कब्जा भी मिले. 10-11 साल की मेहनत के बाद पिछले साल सरकार ने हमें उस जमीन पर कब्जा दिलाया.’’ इन सभी परिवारों ने वहां अपनी-अपनी झोपड़ी खड़ी कर ली थी, लेकिन वह इतनी मजबूत नहीं थी कि बारिश की मार झेल पाए. बीते साल मॉनसून की शुरुआत में जब झोपड़ियां रहने लायक नहीं रहीं तो ये परिवार वापस अपनी पुरानी जगह पर लौट आए. चीना देवी बताती हैं, ''छठ के बाद जब हम लोग फिर से वहां गए तो हमारी झोपड़ी उजाड़ दी गई थी. वहां किसी और का कब्जा था.’’ इसी मोहल्ले की मुन्नी देवी बताती हैं कि ये महिलाएं इसके बाद फिर सीओ ऑफिस गईं लेकिन उनसे कह दिया गया कि वह जमीन उनकी नहीं है. 

खगड़िया जिले के बलकुंडा की कहानी भी तूतबागान की इन महिलाओं से मिलती-जुलती है. नाथनगर से लगभग 100 किमी दूर धमहरा घाट के पास बलकुंडा नाम का यह गांव है. यहां के 412 परिवार ऐसे ही सरकारी कागज हाथ में लेकर पिछले 12 साल से अपनी जमीन पर काबिज होने का इंतजार कर रहे हैं. 1995 में कोसी-बागमती की धारा में उनके गांव का एक टोला नदी में समा गया था. तब से ये सभी परिवार बेघर हैं और रेलवे की जमीन पर झुग्गी बनाकर रहते हैं. 

इस बस्ती के एक बुजुर्ग शिवनंदन सिंह बिंद ने खगड़िया से लेकर पटना तक हर जगह अपनी बस्ती के लोगों के लिए गुहार लगाई तो सरकार ने इन्हें बसने के लिए बलकुंडा गांव की 20 एकड़ जमीन खरीदी. वे बताते हैं, ''18 अप्रैल, 2011 को हर परिवार को पांच-पांच डेसिमल जमीन का कागज दिया गया. हम बड़े खुश थे क्योंकि यह जमीन काफी ऊंचाई पर थी. यहां घरों के डूबने का कोई खतरा नहीं था. फिर जमीन का नक्शा तैयार हुआ और 9 जुलाई, 2013 को हम सभी लोगों को वहां बसाने ले जाया गया. मगर हम जैसे ही पहुंचे, उस जमीन को जोतने वाले परिवारों की औरतें जमीन पर लेट गईं. उन्होंने अमीनों को जमीन नहीं नापने दी. हमें वहां बसाने के लिए पहुंचे पुलिस दस्ते में एक भी महिला पुलिस नहीं थी. लिहाजा हम लोग लाचार होकर लौट गए.’’

शिवनंदन सिंह दावा करते हैं कि उस वक्त डीसीएलआर (डिप्टी कलेक्टर लैंड रिफॉर्म) ने कहा था कि जिला प्रशासन इस बार महिला पुलिसकर्मियों के साथ बलकुंडा गांव जाएगा और लोगों को उनकी जमीन का कब्जा दिलाएगा. लेकिन वह बात तभी आई-गई हो गई और आज तक ये परिवार रेलवे की जमीन पर बनी अवैध झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं.   

नाथनगर और बलकुंडा, दोनों जगहों की यह कहानी इस बात का जीता- जागता उदाहरण है कि बिहार सरकार का भू-राजस्व विभाग कैसे काम करता है. भूमिहीनों को बसने के लिए जमीन का पट्टा देने की सच्चाई क्या है और जमीन मालिकों को उनकी ही जमीन पर कब्जा दिलाने के लिए लंबे अरसे से चल रहे विभाग के भूमि दखल दिहानी अभियान की हकीकत क्या है. अगर सरकार खुद बांटे गए पट्टों पर लोगों को कब्जा नहीं दिला पा रही तो दूसरे विवादों में वह कितनी सक्षम होगी, यह सहज ही समझा जा सकता है.

हालांकि राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के अधिकारियों का कहना है कि विभाग इन विवादों को कम करने के लिए कई तरह की योजनाएं चला रहा है. बिहार में पारिवारिक बंटवारे का म्यूटेशन सिर्फ  50 रुपए देकर कराया जा सकता है. जमीन के छोटे-मोटे झगड़ों के निपटारे का अधिकार हर जिले में डीसीएलआर को दिया गया है, इन्हें 90 दिनों के अंदर फैसला सुनाना है. जमीन के सारे नक्शे ऑनलाइन किए जा रहे हैं. दाखिल-खारिज, लगान और जमीन संबंधी सारे मामलों के आवेदन ऑनलाइन किए जा सकते हैं. जमीन के नक्शों की होम डिलिवरी भी सुनिश्चित की गई है.

बिहार में भूमि विवाद के निबटारे के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण पहल की जा रही है, वह है लैंड सर्वे. आजादी के बाद बिहार में दूसरी बार और कुल मिलाकर तीसरी बार भूमि सर्वेक्षण का काम हो रहा है. पहला सर्वेक्षण ब्रिटिश राज में 1890 में शुरू हुआ था. उसके बाद 1956 में दूसरा सर्वे हुआ. इस तीसरे लैंड सर्वे की अधिसूचना 2012 में जारी हुई और इसका काम 2020 में शुरू हुआ. इस अभियान के तहत राज्य के 40 हजार गांवों का नक्शा तैयार होना है, मगर अभी तक सिर्फ 511 गांवों के खतियान का अंतिम प्रकाशन हो पाया है. प्रशिक्षित अमीनों की कमी के कारण इस काम में दिक्कत हो रही है. हालांकि सचिव जय सिंह कहते हैं, ''हम बहुत जल्द 10 हजार अमीनों की बहाली करने जा रहे हैं. पहले चरण में 4,900 गांवों में लैंड सर्वे होना है, जिसे हम जल्द से जल्द पूरा कर लेंगे. इस सर्वे की सबसे बड़ी खासियत डायनेमिक नक्शे को तैयार करना है. अभी हमारा सारा काम 45 साल पुराने नक्शे से चलता है. एक दफा जब डायनेमिक नक्शा तैयार हो जाएगा तो हर म्यूटेशन के बाद नक्शा अपडेट हो जाएगा. इससे विवाद में खुद-ब-खुद काफी कमी आ जाएगी.’’ 
मगर लैंड सर्वे की जो रफ्तार है, उसे देखते हुए यह कहना मुश्किल लगता है कि आखिर यह कब पूरा होगा और बिहार को कब भूमि विवादों से थोड़ी राहत मिलेगी. 

राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग, डीसीएलआर की कोर्ट, पुलिस, थाना और अदालतें भले ही भूमि विवाद के समाधान में कारगर न हो रही हों, मगर बिहार की ग्राम कचहरी इन विवादों को निबटाने में सफल मानी जा रही है. अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और सिग्मा फाउंडेशन की ओर से कराए गए अध्ययन से जाहिर हुआ है कि राज्य की ग्राम कचहरियों ने पिछले पांच वर्षों में 97.5 फीसद सिविल मामलों को सुलझाया है, इनमें ज्यादातर मामले भूमि विवाद के हैं. इसकी रिपोर्ट सितंबर, 2022 में जारी हुई थी. राज्य के अलग-अलग जिलों की 15 ग्राम कचहरियों का इस दौरान अध्ययन किया गया. 2016 से 2021 के बीच इन कचहरियों में 590 मामले दर्ज हुए थे, इनमें 575 का निबटारा हो गया. इनमें 85.6 फीसद मामलों का निपटारा आपसी सहमति से किया गया, सिर्फ 11.9 फीसद मामलों में मुकदमा चलाना पड़ा. इस लिहाज से सरकार भूमि विवाद के मामलों के समाधान के लिए ग्राम कचहरियों पर भी भरोसा कर सकती है.

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