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पूर्वांचल में कैसे लगे बेड़ा पार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साथ वाराणसी और गोरखपुर पहुंचकर पूर्वी यूपी में भाजपा के मिशन-2024 को दी गति. आम चुनाव के मद्देनजर जातिगत समीकरण साधने में जुटा भगवा खेमा.

एक तीर-कई निशाने: गोरखपुर में गीता प्रेस के शताब्दी वर्ष समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी और अन्य
एक तीर-कई निशाने: गोरखपुर में गीता प्रेस के शताब्दी वर्ष समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी और अन्य
अपडेटेड 17 जुलाई , 2023

पूर्वी उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीति के केंद्रबिंदु बने दो जिले गोरखपुर और वाराणसी में 7 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दौरा सियासत के कई समीकरण साध गया. इन दोनों जिलों को हजारों करोड़ रुपए की विकास योजनाओं की सौगात देने के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने भाजपा के सांस्कृतिक और जातिगत एजेंडे को साधने की भरसक कोशिश की. देश भर में समान नागरिक संहिता पर चल रही बहस के बीच मोदी ने गोरखपुर में गीता प्रेस के शताब्दी वर्ष समारोह में अपने संबोधन की शुरुआत भगवद्गीता के श्लोक वसुदेव सुतं देवं से की.

गीता प्रेस का विरोध कर रहे विपक्षी दलों को निशाने पर लेते हुए मोदी ने इसे एक तरह का मंदिर करार दिया. गीता प्रेस की प्रतिष्ठा सनातन धर्म के एक बड़े सांस्कृतिक केंद्र के रूप में रही है. इस संस्था के पास हिंदू धर्म से जुड़ी पुस्तकों के प्रकाशन का समृद्धशाली इतिहास है. पहले इस संस्था को गांधी शांति पुरस्कार मिलना और उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी का दौरा भाजपा के सांस्कृतिक और साथ ही साथ राजनीतिक एजेंडे को पुष्ट कर रहा था.

गोरखपुर से प्रधानमंत्री मोदी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी पहुंचे. केंद्र सरकार के नौ साल पूरे होने के मौके पर वाजिदपुर में पूर्वी यूपी की अपनी पहली जनसभा में मोदी ने अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाईं; मिर्जापुर, भदोही, जौनपुर समेत पूर्वांचल के लाभार्थियों से संवाद किया; पूर्वांचल के जनजातीय समुदाय को साधने के लिए 'जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी म्यूजियम’ का भी जिक्र किया; वाराणसी के भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ टिफिन बैठक कर मोदी ने बड़े सलीके से पूर्वांचल में आस्था और विकास पर टिकी भाजपा की सियासी पिच को भरपूर खाद-पानी दिया.

गोरखपुर के गीता प्रेस में कार्यक्रम के दौरान मोदी को केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी की मां के बीमार होने की जानकारी मिली. यह भी पता चला कि चौधरी का घर गीता प्रेस के बगल में हिंदी बाजार में है. करीब चार बजे गीता प्रेस से निकलने के बाद प्रधानमंत्री की गाड़ियों का काफिला अचानक बंधु सिंह पार्क के पास ही रुक गया. यहां से मोदी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्यपाल आनंदी बेन पटेल और दूसरे नेताओं के साथ हरबंश गली स्थित राज्यमंत्री के आवास तक करीब डेढ़ सौ मीटर पैदल ही चल पड़े. घर की चौखट पर पहुंचते ही मोदी ने पूछा, ''जूते पहन कर आना है?’’

चौधरी के मुंह से निकला 'जी’. केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री की मां और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष उज्ज्वला चौधरी से मिलते ही मोदी बोले, ''माता जी, आप मुझसे मिलने आने वाली थीं...देखिए, मैं खुद आ गया.’’ मोदी भले ही चौधरी के घर में बस 10 मिनट ठहरे हों लेकिन चुनावी साल में गोरखपुर के हिंदी बाजार की तंग गलियों में वे जातिगत समीकरण साध गए. छह बार के सांसद पंकज चौधरी की पहचान पूर्वांचल के दिग्गज कुर्मी नेता के रूप में होती है. पंकज के आवास पर मोदी के पहुंचने की तस्वीरें पूर्वांचल में कुर्मी बहुल इलाकों में रहने वाले लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट पर जमकर शेयर हो रही हैं.

प्रधानमंत्री मोदी का पंकज चौधरी के घर जाना कुर्मी मतदाताओं को साधने के साथ पूर्वांचल में 'पावर बैलेंस’ की भी रणनीति थी. सोने लाल पटेल की जयंती पर 2 जुलाई को लखनऊ में अपना दल (एस) ने एक बड़ी रैली का आयोजन किया था. इसमें पहली बार केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह शामिल हुए थे. 23 जुलाई को पटना में हुई विपक्षी दलों की बैठक के बाद लखनऊ में एनडीए के घटक दलों की जुटान करके केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग राज्यमंत्री तथा अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल ने अपना प्रभाव दिखाया था.

काशी क्षेत्र के तहत आने वाले मिर्जापुर संसदीय क्षेत्र से सांसद अनुप्रिया के साथ गोरखपुर क्षेत्र के महाराजगंज संसदीय क्षेत्र से सांसद पंकज चौधरी को तवज्जो देकर भाजपा ने पूर्वी यूपी में कुर्मी बिरादरी के बीच संतुलन भी साधने का प्रयास किया है. बिहार के मुख्यमंत्री और लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकता की धुरी बने नीतीश कुमार के पूर्वी यूपी या किसी अन्य कुर्मी बहुल सीट से चुनाव लड़ने की अटकलें हैं. इसे देखते हुए भाजपा के लिए काशी और गोरखपुर क्षेत्र के इन मतदाताओं के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी हो गया है.

पूर्वी यूपी के 21 जिलों में कुल 27 लोकसभा सीटें हैं जो भाजपा के मिशन-2024 के लिहाज से काफी अहम हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा पूर्वी यूपी की आजमगढ़, घोसी, जौनपुर, लालगंज और गाजीपुर लोकसभा सीट हार गई थी. हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद हुए उप-चुनाव में भाजपा ने आजमगढ़ संसदीय सीट पर जीत दर्ज कर पूर्वी यूपी में अपना प्रभाव बढ़ाया था.

बलरामपुर के महारानी लाल कुंवरि पीजी कालेज में राजनीति शास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर आजाद प्रताप सिंह इन समीकरणों को अपने अंदाज में पढ़ने की कोशिश करते हैं. वे बताते हैं, ''वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सभी 80 सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही भाजपा के लिए पूर्वी यूपी की हारी हुई सीटों को जीतने के साथ जीती सीटों को बचाए रखना होगा. इसी कारण भाजपा पूर्वी यूपी की जातियों में अपना जनाधार बढ़ाने की भरसक कोशिश में जुटी है.’’ इसी क्रम में भाजपा की नजर पूर्वी यूपी की राजभर जाति में जनाधार रखने वाले सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर पर जम गई है.

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सुभासपा की लड़ी गई सभी 39 सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. हालांकि उसके उम्मीदवार पूर्वांचल की कई सीटों पर मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हुए भाजपा उम्मीदवारों की हार का कारण जरूर बने थे. पिछले लोकसभा चुनाव में मछली शहर सीट पर भाजपा ने मात्र 181 वोटों से जीत हासिल की थी. इस सीट पर सुभासपा को 11,223 वोट मिले थे.

जानकारों के मुताबिक राजभर समाज का एकमुश्त वोट मिलने पर भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में पूर्वांचल की घोसी, गाजीपुर, जौनपुर, लालगंज, श्रावस्ती और आजमगढ़ सीट पर फायदा हो सकता है. सुभासपा और भाजपा के बीच संभावित गठबंधन को लेकर दोनों दलों के नेताओं के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है. बसपा सांसद अफजाल अंसारी की सदस्यता जाने के बाद खाली हुई गाजीपुर लोकसभा सीट पर संभावित उपचुनाव में भाजपा ओमप्रकाश राजभर के बेटे अरुण राजभर पर दांव लगा सकती है.

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद माफिया मुख्तार अंसारी पर सख्त रवैया अपनाकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूर्वांचल में बड़े असर वाली भूमिहार बिरादरी को साधने की कोशिश की है. पूर्वांचल के बड़े भूमिहार नेता रहे कृष्णानंद राय और उसके बाद अवधेश राय हत्याकांड में मुख्तार अंसारी को सजा दिलाकर योगी सरकार ने भूमिहार मतदाताओं को सकारात्मक संदेश दिया है. आजाद प्रताप सिंह बताते हैं, ''पूर्वांचल में गाजीपुर भूमिहारों का एक बड़ा केंद्र है. इसके साथ घोसी, मऊ और देवरिया से लेकर गोरखपुर तक भूमिहार अच्छी-खासी तादाद में मौजूद हैं.

एक अनुमान के मुताबिक यूपी में भूमिहारों की संख्या ढाई से तीन प्रतिशत ही है लेकिन प्रबल जातिगत एकता के चलते कोई भी राजनैतिक दल भूमिहारों को नजरंदाज नहीं कर सकता.’’ इसीलिए 2019 का लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद सिन्हा को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया था. भाजपा ने योगी 2.0 में नौकरशाह से नेता बने अरविंद कुमार शर्मा को बिजली और नगर विकास जैसे दो भारी-भरकम विभागों की जिम्मेदारी देते हुए कैबिनेट मंत्री बनाया गया है. गोरखपुर क्षेत्र के भूमिहारों पर पकड़ रखने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता सूर्य प्रताप शाही योगी सरकार में लगातार दूसरी बार बतौर कैबिनेट मंत्री शामिल हैं. 

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में पूर्वांचल की कई सीटें भाजपा के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं. इस साल की शुरुआत में 20 जनवरी को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने गाजीपुर में रैली कर पूर्वांचल में पार्टी के अभियान की शुरुआत की थी. 2019 के चुनाव में भाजपा गाजीपुर और इसकी बगल की घोसी लोकसभा सीट पर चुनाव हार गई थी. इसी तरह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 7 अप्रैल को कौशांबी और आजमगढ़ में रैली कर पूर्वांचल में भाजपा की जमीन मजबूत करने के अभियान की शुरुआत की थी.

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को भले ही कौशांबी (सुरक्षित) लोकसभा सीट पर जीत मिली थी लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजे बिल्कुल उलट थे. विधानसभा चुनाव में भाजपा को कौशांबी लोकसभा सीट की सभी पांच विधानसभा सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था. वहीं आजमगढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) की परंपरागत सीट है. 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव आजमगढ़ से चुनाव जीते थे.

सपा ने 2022 के विधानसभा चुनाव में भी आजमगढ़ लोकसभा की सभी पांच विधानसभा सीटें जीतकर अपनी बढ़त बनाए रखी थी. अखिलेश के इस्तीफे के बाद खाली हुई आजमगढ़ लोकसभा सीट पर हुए उप-चुनाव में भाजपा ने जीत हासिल की थी. हालांकि बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार के चलते मुस्लिम मतों में हुए बंटवारे को इस जीत का अहम कारण माना जा रहा है.

सपा के गढ़ आजमगढ़ में मिली जीत का मनोवैज्ञानिक लाभ उठाने की हर कोशिश भाजपा कर रही है. इसी के तहत पार्टी ने मार्च में आजमगढ़ के भाजपा नेता सहजानंद राय को गोरखपुर क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप दी. 2017 में यूपी में भाजपा की सरकार बनने के बाद यह पहली बार है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जिले का कोई भाजपा नेता क्षेत्रीय अध्यक्ष के पद पर नहीं है.

केंद्र में भाजपा सरकार का नौ वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के उपलक्ष्य और उसके बहाने हो रहे महाजनसंपर्क अभियान में भगवा दल पूर्वी यूपी की सभी लोकसभा सीटों के चुनावी समीकरणों पर मंथन कर रहा है. इसी मंथन से भाजपा सरकार और संगठन में कुछ बदलाव देखने को मिल सकते हैं.

''पूर्वी यूपी भाजपा के लिए हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है. अगले लोकसभा चुनाव में यूपी की सभी 80 सीटें जीतने का भाजपा का लक्ष्य पूर्वांचल में पार्टी के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा’’
आजाद प्रताप सिंह, असिसटेंट प्रोफेसर, राजनीति शास्त्र विभाग, एम.एल.के. पीजी कॉलेज, बलरामपुर

भगवा खेमे को बढ़त बरकरार रखने की चुनौती

■ वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में पूर्वी यूपी की कुल 27 सीटों में भाजपा ने 20 और इसकी सहयोगी पार्टी अपना दल (एस) ने दो सीटें जीती थीं
■ वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा के बीच गठबंधन था. पूर्वी यूपी में बसपा ने चार और सपा ने एक सीट जीती थी

■ वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पूर्वी यूपी की 135 विधानसभा सीटों में से 68 पर विजय प्राप्त की थी. भाजपा की सहयोगी पार्टी निषाद पार्टी ने छह और अपना दल (एस) ने भी छह सीटों पर विजय हासिल की थी
■ वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पूर्वी यूपी में सपा ने 44 तथा इसकी तत्कालीन सहयोगी पार्टी सुभासपा ने छह सीटों पर जीत हासिल की थी. जनसत्ता दल ने दो, कांग्रेस ने दो और बसपा ने एक सीट पर जीत हासिल की थी 

■ वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन को आजमगढ़, गाजीपुर, कौशांबी और लालगंज लोकसभा सीटों की सभी विधानसभा सीटों पर हार मिली थी
■ वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन बलिया, मऊ और बस्ती लोकसभा सीटों के तहत आने वाली विधानसभा सीटों में केवल एक-एक सीट ही जीत पाया था
■वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन ने गोरखपुर, बांसगांव, सोनभद्र, मिर्जापुर, वाराणसी, कुशीनगर और देवरिया लोकसभा सीटों की सभी विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी.

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