पुष्यमित्र
बिहार के सबसे छोटे जिलों में से एक शेखपुरा में मेहुस नाम का गांव है. यहां पिछले महीने शिव मंदिर के सार्वजनिक तालाब की खुदाई चल रही थी. यह खुदाई पूरी हो जाती तो उस गांव के पास 20 एकड़ का अपना तालाब होता. मगर 11 मई, 2023 को यहां से तीन दुर्लभ मूर्तियां निकलीं. एक सूर्य की और दो विष्णु की. गांव में हर्ष छा गया और खुदाई छोड़कर लोग मंदिर निर्माण में जुट गए.
यहां 3 जून तक मंदिर की नींव डाली जा चुकी थी और ईंटों की जुड़ाई चालू थी. तालाब से सटे पुराने शिव मंदिर के बरामदे में तीनों दुर्लभ मूर्तियां रखी हुई थीं. उन्हें वस्त्र पहना दिए गए थे और कुछ महिलाएं सिंदूर, जल और फूलों से उनकी पूजा-अर्चना कर रही थीं. काले पत्थर की ये तीनों प्रतिमाएं 9वीं-10वीं शताब्दी की पालकालीन दुर्लभ मूर्तियां बताई जा रही हैं. इन्हें दिखाते हुए इसी गांव के मनोज कुमार कहते हैं, ''बताइए, कितने सम्मान से हम लोग इन मूर्तियों को रख रहे हैं.
इनके लिए मंदिर भी बनवा रहे हैं. मगर पुरातत्व विभाग वालों ने मीडिया में बयान दे दिया कि मूर्तियां गांव में असुरक्षित हैं, इन्हें संग्रहालय में रखा जाना चाहिए.’’ उनकी नाराजगी पड़ोसी जिले लखीसराय के संग्रहालय अध्यक्ष शिव कुमार मिश्र को लेकर थी. वे कुछ दिन पहले इन मूर्तियों की नाप-जोख करके गए थे और शेखपुरा जिला प्रशासन से इन मूर्तियों को संग्रहालय में रखवाने की अपील की थी. शेखपुरा के एसपी इन मूर्तियों को लेने भी आए थे, मगर गांव के लोगों ने एकजुट होकर उन्हें मूर्तियां ले जाने से रोक दिया. गांव वालों ने भरोसा दिलाया कि इन मूर्तियों को सुरक्षित रखा जाएगा.
मगर इस भरोसे की पोल इस मंदिर से ढाई किमी दूर नोहरी तालाब की तरफ जाते ही खुल जाती है. धूल भरी कच्ची सड़क से गुजरते हुए जब वहां पहुंचते हैं तो ईंट की पतली सी दीवार और टिन की छत वाला एक छोटा सा मकान तालाब के किनारे नजर आता है. उस असुरक्षित टिन शेड में तीन दर्जन से अधिक दुर्लभ मूर्तियां जैसे-तैसे रखी हुई हैं. उस मकान की छत से टिन का एक टुकड़ा भी उड़ गया है.
धूप और बारिश बेरोक-टोक इस कमरे में आ सकती हैं. ये मूर्तियां तीन साल पहले नोहरी तालाब से इसी तरह निकली थीं. तब भी गांव वालों ने प्रशासन को मूर्तियों को ले जाने से रोक दिया था. इन मूर्तियों के लिए मंदिर बनाने की योजना बनी, लेकिन कुछ समय बाद उसका काम ठप हो गया और उसे बनवाने में अब किसी की दिलचस्पी नहीं दिखती.
डेढ़ दर्जन गांवों की एक ही कहानी
पुराने मगध के गया, नालंदा, नवादा, शेखपुरा और लखीसराय जिलों में डेढ़ दर्जन के करीब ऐसे गांव हैं, जहां पिछले कुछ दशक में इतनी मूर्तियां निकली हैं कि इन गांवों का अपना संग्रहालय बन सकता है. इनमें से एक दर्जन से अधिक ऐसी मूर्तियां हैं, जो किसी भी संग्रहालय के लिए शान की बात हो सकती थी. मगर ग्रामीणों की जिद के कारण ये मूर्तियां या तो पूजा-पाठ के लिए इस्तेमाल हो रही हैं, या फिर असुरक्षित पड़ी हैं.
ऐसा ही एक गांव नालंदा जिले में चंडी मऊ है. यहां के चंडी स्थान में खुले परिसर में डेढ़ दर्जन से अधिक प्रतिमाएं रखी मिलती हैं. इनमें एक सात फुट की बुद्ध की प्रतिमा है, जो मौसम की मार झेलते हुए इतनी सपाट हो गई है कि इसे पहचान पाना मुश्किल है. इस मंदिर के एक भवन में रैकों पर पांच दर्जन से अधिक प्रतिमाएं रखी हुई हैं.
इन प्रतिमाओं को लेकर 1999 में एक संस्था बुद्धोलॉजी सोसाइटी ऑफ इंडिया ने ग्रामीणों के सहयोग से एक संग्रहालय शुरू किया था. मगर यह संग्रहालय ज्यादा दिन तक नहीं चल सका. इसी गांव के रामानुज सिंह बताते हैं, ''इसका एक फायदा जरूर हुआ कि इस गांव में कहीं भी प्रतिमा मिलती है तो लोग इसी परिसर में आकर रख जाते हैं. कोई अपने घर नहीं ले जाता.’’
शेखपुरा जिले के गवय गांव में इसी मई महीने में ही खेत में गणेश की एक खंडित प्रतिमा जुताई के दौरान निकली. गांव वालों ने उसे खेत की मुंडेर से टिकाकर रख दिया और पूजा-अर्चना शुरू कर दी. नवादा जिले के अपसढ़ गांव में तो लोग ऐसी दुर्लभ मूर्तियां मिलने पर उसे अपने घरों में छिपाकर रख रहे हैं. एक ग्रामीण ने अपने घर में ताखे पर रखी कई दुर्लभ मूर्तियां दिखाईं. इसी तरह नालंदा जिले के तेतरहवां गांव में एक गढ़ से अक्सर मूर्तियां निकलती हैं. एक ग्रामीण मंतोष कुमार बताते हैं, ''लोग इन मूर्तियों को अपने घर में छुपा देते हैं या तस्करों को बेच देते हैं.’’
तस्करों के निशाने पर मूर्तियां
नालंदा जिले के चंडी मऊ गांव में मूर्तियों की चोरी होती रहती है. शक्ति कुमार सिंह हमें एक पीपल पेड़ के नीचे ले जाते हैं जहां सूर्य की एक बड़ी प्रतिमा और कुछ छोटी-छोटी प्रतिमाएं रखी हैं. वे बताते हैं, ''पहले यहां सूर्य की एक इससे भी बड़ी प्रतिमा थी, साथ में वराह की भी प्रतिमा थी. सात-आठ साल पहले ये गायब हो गईं.’’ जाहिर है कि गांव के बाहर पीपल के नीचे अगर कोई प्रतिमा रखी हो तो चोरों का काम आसान हो जाता है.
मूर्तियों की चोरी रोकने के लिए नवादा जिले के अपसढ़ गांव में तो लोगों ने बाकायदा विरासत संरक्षण समिति का गठन कर लिया है. मगर यह समिति भी मूर्तियों की चोरी रोक नहीं पा रही. समिति के अध्यक्ष युगल किशोर कहते हैं, ''2009 के बाद से अब तक छह मूर्तियां चोरी हो चुकी है. इनमें सबसे दुर्लभ दुर्गा की मूर्ति थी, जो 2012 में खेत से निकली थी. 2015 में उसे किसी ने चुरा लिया.’’
दिलचस्प बात यह है कि ये ऐसी चोरियां हैं, जिनकी रिपोर्ट पुलिस में भी दर्ज नहीं हुई है. इन चोरियों का पता तब चलता है जब तस्कर मूर्तियों के साथ पुलिस के हत्थे चढ़ जाते हैं. गया में 26 फरवरी, 2022 को मस्तपुरा के भुइयां टोली के एक तस्कर के घर से पुलिस ने दस प्राचीन मूर्तियां बरामद कीं. 31 मई, 2023 को ये मूर्तियां गया की अदालत में पेश हुईं और दखल के बाद संग्रहालय में रखी गईं.
मगध के इस पूरे इलाके में (शेखपुरा को छोड़) लगभग हर जिले में एक सरकारी संग्रहालय है. इन सभी संग्रहालयों का प्रभार एक ही व्यक्ति शिव कुमार मिश्र के पास है. इसके अलावा उनके पास मुंगेर, भागलपुर, जमुई और सहरसा जिले के संग्रहालयों का भी प्रभार है. मिश्र बताते हैं, ''मैं अक्सर इन गांवों में जाता हूं और मूर्तियों की नाप-जोख और पहचान करके रख लेता हूं. ऐसा इसलिए करता हूं कि भले ही मूर्तियां संग्रहालयों तक न पहुंचें, मगर इनकी सूचना तो हमारे पास रहे.’’
असुरक्षित मंदिरों में तड़पती प्रतिमाएं
इन प्राचीन मूर्तियों को लेकर इस इलाके में हाल के वर्षों में कई मंदिर और धाम विकसित हुए हैं. इनमें लखीसराय का अशोक धाम, नालंदा के घोसरहवां में आशा पुरी मंदिर, देवी मंदिर, चंडी मऊ में चंडी मंदिर, गवय गांव में भगवती मंदिर, सामस में विष्णु धाम प्रमुख हैं. इस इलाके में छोटे-छोटे मंदिर भी खूब बने हैं.
मंदिरों में श्रद्धालु इन मूर्तियों पर सिंदूर, रोली, जल, फूल और तेल व घी भी चढ़ाते हैं. पुरातत्व जानकार मानते हैं कि ये सभी चीजें मूर्तियों के लिए नुक्सानदेह हैं. कई जगह तो मूर्तियों की आंखें फोड़कर उसमें सोना, चांदी, कौड़ी या शीशा भी लगाया जाता है.
गवय गांव में भगवती मंदिर के पुजारी राकेश पांडेय कहते हैं, ''पुरातत्व वालों ने हमें बताया था कि इन मूर्तियों को तेल नहीं लगाइएगा, पानी से नहीं धोइएगा. मगर क्या हम उनकी बातें मान लें? हम हिंदू हैं, रोज स्नान करके पूजा करते हैं. क्या हम अपने भगवान को ऐसे ही छोड़ दें?’’ उन्होंने अपने मंदिर की 11 फुट ऊंची विष्णु प्रतिमा के ऊपर जगह-जगह पीले रंग से बिंदियां लगाई हैं और श्री लिख दिया है.
इसी गांव में एक अन्य मूर्ति का तो यह हाल है कि जलार्पण की वजह से छह फुट की पूरी मूर्ति घिसकर समतल हो गई है. अब पहचानना मुश्किल है कि यह मूर्ति किस देवी या देवता की है. चंडी मऊ गांव में भी बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा का यही हाल है.
मूर्तियां मंदिरों में रहें या संग्रहालयों में, इसको लेकर लोगों में अलग-अलग राय है. पटना के महावीर मंदिर न्यास के सचिव किशोर कुणाल कहते हैं, ''देव प्रतिमाओं की असली जगह तो मंदिरों में ही है. संग्रहालयों में तो इनकी पूजा हो नहीं सकती.’’ शेखपुरा के सामस गांव में विष्णु धाम बनवाने के पीछे किशोर कुणाल की बड़ी भूमिका रही है. वहां विष्णु की सात फुट ऊंची मूर्ति 1992 में तालाब से निकली थी. उन्हें लगा कि यह मूर्ति तिरुपति के बालाजी की मूर्ति जैसी है. अब वहां मंदिर का निर्माण जारी है और वहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी पहुंचने लगे हैं.
इसी तरह प्राचीन मूर्तियों की मदद से लखीसराय में अशोक धाम के नाम से एक बड़ा तीर्थस्थल विकसित हो गया है. यहां लगा शिवलिंग 1977 में कुछ चरवाहों को मिला था. इसके अलावा 2003-04 में इस मंदिर परिसर में खुदाई के दौरान दर्जनों प्राचीन मूर्तियां मिलीं. इनमें से 40 मूर्तियां ठीक हालत में हैं, बाकी खंडित. मंदिर प्रबंधन ने निजी संग्रहालय बनाकर इन्हें संभालकर रखा है. वे इसे सरकार को देने के लिए भी तैयार हैं. मगर सरकार की तरफ से इन्हें लेने के लिए पहल नहीं हो रही.
धाम और तीर्थस्थल बनाने का ट्रेंड भी लोगों को मूर्तियों को अपने गांव में रखने के लिए प्रेरित करता है. गवय गांव के लोग इस बात से खासे नाराज दिखते हैं कि सामस में सात फुट की विष्णु प्रतिमा की वजह से धाम बन गया, जबकि उनके गांव में 11 फुट ऊंची विष्णु प्रतिमा प्रचार-प्रसार के अभाव में उपेक्षित है. मेहुस में प्रतिमाओं को रोकने और आनन-फानन में मंदिर बनवाने के पीछे भी यही भावना दिखती है. तीर्थ या धाम बनने पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है.
शिव कुमार कहते हैं, ''हमारे सामने तो देवघर के प्रसिद्ध वैद्यनाथ मंदिर का प्रत्यक्ष उदाहरण है. वहां लगातार जल चढ़ाए जाने से शिवलिंग घिसकर खराब हो गया. फिर नया शिवलिंग लगाना पड़ा. बिहार के भागलपुर में बूढानाथ, सहरसा में मत्स्य धाम, चैनपुर में नीलकंठेश्वर महादेव, मधुबनी में उगना महादेव आदि सभी शिवलिंगों में दरार आ गई है.’’
पुरातत्व मामलों के जानकार और के.पी. जायसवाल संस्थान के पूर्व अध्यक्ष सी.पी. सिन्हा कहते हैं, ''हैरत की बात है कि पटना में बिहार म्यूजियम जैसा अत्याधुनिक संग्रहालय बनता है और वे अपने यहां मूर्तियां पटना म्यूजियम से लेते हैं. अगर वे गांवों में बिखरी इन अनमोल मूर्तियों को बटोर भर लें तो उनका संग्रहालय संपन्न हो जाए. सरकार और प्रशासन को इस मामले में सक्रिय होने की जरूरत है.’’
हालांकि बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग की सचिव बंदना प्रेयसी इस बात से इनकार करती हैं कि इस मामले में सरकार की तरफ से कोई ढिलाई हो रही है. वे कहती हैं, ''हमें जहां सूचना मिलती है, हम तत्काल जिला प्रशासन की मदद से ऐसी मूर्तियों को उठवा कर संग्रहालय में रखवा लेते हैं. हालांकि जिस मूर्ति की पूजा शुरू हो जाती है, उन्हें हटाना मुश्किल हो जाता है.’’
खेतों और खुले में रखी मूर्तियों के बारे में विभाग के अतिरिक्त सचिव और निदेशक, संग्रहालय दीपक आनंद कहते हैं, ''हमें अभी यह जानकारी आपसे मिली है. हम तत्काल इस दिशा में कदम उठाने की तैयारी कर रहे हैं.’’
जब तक इस दिशा में कुछ ठोस पहल नहीं होती, इतिहास पर भारी आस्था और कुछ हद तक लापरवाही, इन दोनों के लिए नुक्सान का सबब बनती रहेगी.

