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अपने आप से जूझते युवा

भारतीय युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य की दिक्कतें अब आम समस्या है. इस मामले में खुद ही मोर्चा संभालते हुए युवा न केवल अपनी और दूसरों की मदद कर रहे हैं बल्कि गलत सोच को बदलने की जंग भी लड़ रहे हैं

उदासी की छाया : अधिक जागरुकता के बावजूद भारतीय युवा मानसिक स्वास्थ्य की तकलीफों से जूझ रहे हैं
उदासी की छाया : अधिक जागरुकता के बावजूद भारतीय युवा मानसिक स्वास्थ्य की तकलीफों से जूझ रहे हैं
अपडेटेड 25 अप्रैल , 2023

सोनाली आचार्जी

इक्कीस साल की ऋचा सिंह हमेशा से ही एक ऐसी इंसान रही हैं जिन पर उनके दोस्त आंख मूंदकर भरोसा कर सकते हैं. किशोरावस्था में होने वाली भावनात्मक उलझनें हों या फिर भविष्य को लेकर कोई चिंता, अथवा परिवार के आपसी झगड़े, ऋचा के दोस्तों को किसी भी बात पर उनके साथ खुलकर चर्चा करने में कभी कोई हिचक नहीं रही. ऋचा भी ध्यान से उनकी बातें सुनतीं हैं. ऐसे में, 2009 में जब उनकी एक दोस्त ने खुदकुशी करने जैसा कदम उठाना तय किया तो वे बुरी तरह हिल गईं. कॉलेज प्लेसमेंट के दौरान महीनों तक नौकरी नहीं मिलने से उनकी दोस्त तनाव में आ गई थी लेकिन चुपचाप सब बर्दाश्त करती रही.

ऋचा के साथ किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि चीजें इस कदर बिगड़ जाएंगी. इस घटना ने ऋचा को एक बेहद महत्वपूर्ण सबक दिया—अगर लोगों को कोई ऐसा न मिले जो उन्हें समझता हो तो कुछ कहने-सुनने के बजाये फंदे पर झूल जाना उन्हें शायद कहीं ज्यादा बेहतर लगेगा. शायद यही वह शून्यता है जिसने भारत के युवाओं को यह मोर्चा खुद संभालने के लिए प्रेरित किया. अपनी दोस्त की मौत के पांच साल बाद ऋचा ने अपने दोस्त पुनीत मनुजा—जिन्होंने खुद भी भावनात्मक स्तर पर आधुनिक जीवन का खामियाजा भुगता है—के साथ मिलकर एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म योरदोस्त शुरू किया. यह प्लेटफॉर्म खासकर युवाओं को मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों से जोड़ता है और उन्हें सहयोग देता है.

इस दल में युवावस्था के तनाव से वाकिफ और इससे जूझने और दूसरों की मदद करने वाले युवक-युवतियां हैं. भारत ऐसा देश है जहां मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मसलों का उपहास उड़ाया जाता है या ऐसे लोगों के बारे में कोई धारणा बना ली जाती है. यूनिसेफ और गैलप की तरफ से 21 देशों के 20,000 बच्चों पर किए गए एक अध्ययन 'द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन' 2021 से पता चलता है कि 15 से 24 वर्ष आयु वर्ग में हर सात में से एक भारतीय खुद को उदास पाता है या उसकी कुछ करने में बहुत दिलचस्पी नहीं होती है, यह वैश्विक औसत पांच में से एक के मुकाबले थोड़ा कम है. हालांकि ज्यादा फिक्र की बात यह है कि इनमें से बहुत कम-भारत में सिर्फ 40 प्रतिशत यह महसूस करते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य की दिक्कतें झेल रहे लोगों को सहायता मिलनी चाहिए जबकि विदेशों में ऐसा महसूस करने वाले 83 फीसद थे. ऐसे ही निराशाजनक निष्कर्ष लांसेट साइकिएट्री की 2021 में हुई स्टडी में सामने आए. भारत न केवल आत्महत्याओं के आंकड़े के मामले में दुनिया में सबसे आगे है बल्कि यहां 15-39 वर्ष आयु वर्ग में आत्महत्या मौत का प्रमुख कारण है.

योरदोस्त का दावा है कि वह अब तक 8,000 से ज्यादा लोगों की जान बचा चुका है. इसके अलावा, 2019 में शुरू चरित जग्गी का 'वी द यंग' भी है. यह एक ऐसा मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता मंच है, जिसमें यूजर्स दूसरों से अपने अनुभव साझा कर सकते हैं. 29 वर्षीय जग्गी कहते हैं, ''देश की जनसांख्यिकी में हमारी (युवाओं की) भागीदारी सबसे ज्यादा है लेकिन हमारी समस्याओं को समाज में अनसुना कर दिया जाता है या इन पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है...आज, युवा कहीं अधिक जागरूक हैं और (पिछली पीढ़ी की तुलना में) खुलकर बातचीत करने के लिए तैयार हैं लेकिन मुश्किल यह है कि बात करें तो किससे. गलत धारणा और झिझक उनकी बाधा  बनी हुई है.'' हमारी पहल इसी से जुड़ी हुई है. 

युवाओं की असल दिक्कत क्या है
एक समय था जब स्किट्जोफ्रेनिया या बाइपोलर डिसऑर्डर जैसी चरम स्थितियों में ही डॉक्टर या मनोचिकित्सक की मदद लेने की जरूरत पड़ती थी. लेकिन समय के साथ मानसिक रोगों का दायरा एकदम बदल गया है.

भारत अभी एक बेहद अहम मोड़ पर खड़ा है, दुनिया में सबसे अधिक युवा आबादी यहीं है—दुनिया का हर पांचवां युवा भारत में रहता है. 2020 तक, एक भारतीय की औसत आयु 29 वर्ष थी, जो चीन में 37 वर्ष और जापान में 48 वर्ष के औसत से बहुत कम थी. लेकिन यह युवा आबादी उन परिस्थितियों से काफी अलग हालात में पल-बढ़ रही है जिनमें भारत में पारंपरिक मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली विकसित हुई है. बेंगलूरू निवासी क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट पुरोत्री मजूमदार कहती हैं, ''मानसिक स्वास्थ्य अपने आप में कोई नई बात नहीं है. लेकिन दो चीजें बदली हैं—एक तो लोग अब अधिक व्यक्तिवादी और अकेले हो गए हैं और आसपास के माहौल को लेकर इस बात का भी काफी दबाव रहता है कि कैसे दिखना है, क्या खाना है, कहां काम करना है.'' उन्होंने तो अपने मरीजों को ऐसी मामूली बातों का तनाव झेलते देखा है कि उनके पास मनचाही नौकरी पाने का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं है. और ऐसी स्थितियों में ही अकेलेपन या आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचने जैसी समस्याएं उभरती हैं. पीढ़ियों से सामान्य मानी जाती रही ऐसी बातों को वाजिब मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा माना जाना चाहिए.

बहरहाल, असल स्थिति इससे काफी अलग है. एंग्जाइटी की समस्या पर अपने स्कूल में काउंसिलिंग लेने वाली दिल्ली की 16 वर्षीया रीता ठक्कर (बदला नाम) कहती हैं, ''अगर मैं या मेरे भाई-बहन ये कहें कि हम मानसिक रूप से अस्वस्थ महसूस कर रहे हैं तो उनकी (माता-पिता) प्रतिक्रिया नाराजगी भरी ही होगी...वे मस्तिष्क और उसकी चुनौतियों को नहीं समझते. मैं छोटे-मोटे कामों को भी टालती रहती थी क्योंकि मुझे एक अजीब-सी बेचैनी होती थी. मेरे माता-पिता को लगता था कि मैं आलसी हूं और उन्हेंने इसे मेरी टाल-मटोल की आदत माना लेकिन यह नहीं सोचा कि यह मानसिक स्वास्थ्य की समस्या हो सकती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि वह तो 'पागल लोगों' से जुड़ी होती है.''

आधुनिक परिवार का ढांचा बदल चुका है. दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स हॉस्पिटल में मानसिक स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख और कई स्कूल प्रबंधन समितियों के सदस्य डॉ. समीर मल्होत्रा कहते हैं, ''पहले, हम एक अलग तरह का सामुदायिक जीवन जीते थे और सार्थक रिश्तों में घुल-मिलकर रहते थे—इनमें आप कभी अकेले नहीं पड़ते थे क्योंकि घर में कोई न कोई आपका मार्गदर्शन करने वाला होता था. तमाम शारीरिक गतिविधियां भी होती थीं जो युवा ऊर्जा को कुछ रचनात्मकता प्रदान करती थीं. जीवनशैली में किसी तरह की बाधा डालने के लिए कोई सोशल मीडिया नहीं था, इसलिए कोई भी छोटी-मोटी भावनात्मक चुनौतियों से बहुत जल्द उबर जाता था.

अब, युवा उनमें फंसे रह जाते हैं.'' वे बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में उनके अस्पताल ने युवाओं के बीच मनो-भावनात्मक समस्याएं बढ़ती देखी हैं, साथ ही उन पर काबू पाने की क्षमता घटी है. हर चीज के त्वरित समाधान की चाहत, ऑनलाइन जीवन के सतहीपन को समझने में असमर्थता, जरा-जरा सी बात पर गुस्से से बेकाबू होना, करियर और पढ़ाई की बेचैनी, मादक द्रव्यों का इस्तेमाल, और अपने अस्तित्व का संकट—जिसमें किशोरों को यह तक लगता है कि सब कुछ हो गया है, अब जीने का कोई मतलब नहीं रह गया है—आदि ऐसी समस्याएं हैं जो स्पष्ट तौर पर नजर आई हैं. वे कहते हैं, ''आज युवाओं ने खुद से इतनी उम्मीदें पाल रखी हैं कि पूरा न होने से वे हताश और असहिष्णु हो रहे हैं.''

युवा भी इस बीमारी को एक कलंक मानने से पूरी तरह अछूते नहीं हैं. 2015 में अभिनेत्री दीपिका पादुकोण द्वारा मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए शुरू किए गए फाउंडेशन लिव लव लाफ ने 2021 में देश के नौ शहरों में 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग के 3,497 लोगों पर एक अध्ययन किया. 'हाउ इंडिया पर्सीव्स मेंटल हेल्थ' यानी मानसिक स्वास्थ्य पर भारतीयों की सोच-समझ को दर्शाने वाले इस अध्ययन से पता चला कि 2018 के बाद उन लोगों की संख्या काफी बढ़ी है, जिनका मानना है कि मानसिक बीमारियों से जूझने वाले लोग भी अंतत: अपने करियर और व्यक्तिगत जीवन में उत्कृष्ट मुकाम हासिल कर सकते हैं (2018 में 32 फीसद की तुलना में 2021 में यह आंकड़ा 65 फीसद रहा). वहीं कम से कम 28 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा कि वे मानसिक बीमारी वाले व्यक्ति से या तो दोस्ती नहीं करेंगे या फिर उनके साथ बातचीत सीमित ही रखेंगे और दूसरों को भी उनसे दूरी बनाए रखने को कहेंगे.

यहां तक कि अगर कोई व्यक्ति अंतत: इस तरह की राय या दकियानूसी सोच के खिलाफ खड़े होने का फैसला करता है और मदद की अपेक्षा करता है, तो राह में बाधाएं आना लाजिमी ही है: या तो इसे लेकर जागरूकता बहुत कम है या फिर मदद पाना काफी खर्चीला है. 2019 में यूथ फॉर मेंटल हेल्थ (वाईएमएच) की स्थापना करने वाले 30 वर्षीय हितेश सांवल ने 19 वर्ष की उम्र में खुद भी एंग्जाइटी और डिप्रेशन की समस्या का सामना किया था. सांवल कहते हैं, ''मैं शिक्षित और संपन्न पृष्ठभूमि से आता हूं. फिर भी मुझे मानसिक स्वास्थ्य के बारे में तब तक ज्यादा जानकारी नहीं थी, जब तक कि मैंने खुद समस्याओं का अनुभव नहीं किया.'' अब तक वाईएमएच ने युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने को लेकर 30 से अधिक अभियान चलाए हैं. वाईएमएच वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ के वैश्विक अभियानों का एक आधिकारिक भागीदार भी है, जिसने 1992 में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की स्थापना की थी. सांवल कहते हैं, ''आज, वाईएमएच के पास मानसिक स्वास्थ्य पर 100 से अधिक कैंपस में वॉलंटियर्स की मौजूदगी है, जो छात्रों का सबसे बड़ा नेटवर्क है. इसका उद्देश्य युवाओं को स्वतंत्र रूप से खुद को अभिव्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करना और दकियानूसी सोच मिटाना है.''

दूसरी तरफ, अधिकांश लोगों के लिए मदद पाना सुलभ नहीं होता. इमोशंस मैटर फाउंडेशन की स्थापना करने वाली 33 वर्षीया जूही शर्मा को इसका अंदाजा तब हुआ जब उन्होंने समाज के कुछ सबसे वंचित तबकों के साथ काम किया जिसमें शहरी झुग्गी बस्तियों के बच्चों से लेकर वेश्यालयों या आश्रय गृहों में पले-बढ़े बच्चे तक शामिल थे. औसतन, एक चिकित्सक या मनोचिकित्सक के साथ निजी अस्पतालों में एक घंटे के सेशन पर 1,000 रुपए से 5,000 रुपए तक खर्च आता है. लोगों की मदद के लिए भारत में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 जैसे कानून हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इलाज उपलब्ध होना किसी चुनौती से कम नहीं है. संस्थानों में काउंसलर रखना इलाज को सस्ता और सुलभ बनाने का कारगर तरीका है. लेकिन जब तक मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सोच को नहीं बदला जाता, तब तक सही मायने में बदलाव शुरू नहीं हो सकता. और इसमें साझा अनुभव ही बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.

#1 वजह है आत्महत्या, भारत में 15-39 वर्ष आयु समूह के लोगों की मौत की. यह जानकारी लांसेट साइकिएट्री की 2021 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दी गई

41%  भारत के उत्तरदाता मानते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य की दिक्कतों से जूझ रहे लोगों को मदद मिलनी चाहिए. जबकि पूरी दुनिया में ऐसा मानने वाले 83 प्रतिशत हैं-यह जानकारी यूनिसेफ की रिपोर्ट में सामने आई

अभियान में जुटे युवा

योरदोस्त.कॉम 
ऑनलाइन परामर्श और भावनात्मक स्वास्थ्य की कोचिंग देती है www.yourdost.com

लोनपैक 
मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर सीधे बातचीत से सहायता की जाती है www.lonepack.org

इट्स ओके टु टाक 
एक सुरक्षित डिजिटल स्पेस जहां पर आप अपने अनुभव अन्य लोगों से साझा कर सकते हैं www.wetheyoung.in

वी द यंग 
युवाओं के लिए बना प्लेटफॉर्म जहां वे मानसिक सेहत की कहानियां बता सकते हैं www.wetheyoung.in

सोल अप 
एक जैसे लोगों का नेटवर्क है जिनके साथ वे भावनात्मक चुनौतियों को साझा कर सकते हैं  www.soulup.in

इमोशंस मैटर 
दिल्ली का एक एनजीओ जो मानसिक सेहत पर जागरूकता फैलाने के साथ वंचितों की मदद करता है

यूथ फॉर मेंटल हेल्थ 
विभिन्न अभियानों और पहलों के जरिये मानसिक स्वास्थ्य चेतना फैलाता है www.youthformentalhealth.org

माइंडपीयर्स
एक ऐप जो तकनीक की मदद से लोगों की मानसिक क्षमताएं और कमजोरियां नापता है www.mindpeers.co

इवॉल्व 
एक मेंटल हेल्थ ऐप जो यूजर को व्यक्तिगत और साक्ष्य आधारित परामर्श देता है  www.evolveinc.co

बिकॉजयू 
एक मेंटल हेल्थ कक्वयुनिटी जो आत्मखोज के लिए सामूहिक कार्यक्रम और वर्कशॉप चलाती है www.becauseyou.in

माइंड क्लान 
भारत भर के चिकित्सकों, सहायता समूहों और हेल्पलाइन की खास तौर पर तैयार सूची उपलब्ध कराता है www.themindclan.com

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