
दो टीमें आमने-सामने खड़ी हैं—एक आक्रमण करने को और दूसरी उस आक्रमण को नाकाम करने को. मैदान के चारों तरफ लगे लाउडस्पीकर पर चल रही कमेंटरी दर्शकों के उत्साह को नई ऊंचाई पर पहुंचा देती है. जैसे ही एक खिलाड़ी ने मैदान के बीचो-बीच खींची गई रेखा पार की, दर्शकों ने अपनी टीम का बुलंद आवाज में उत्साहवर्धन किया है. एक खिलाड़ी बिना सांस रोके 'कबड्डी-कबड्डी’ कहती, लाइन के दूसरी ओर खड़ीं अपनी चार विरोधियों को मात देने लपकी है.
दूसरी टीम भी चौकन्नी है. उसके हर हमले को नाकाम करती हुई, दबोचने का दांव लगा रही है. अंत में, चारों में से एक ने लपककर उसे कमर से कसकर पकड़ लिया है. दूसरी ने उसके पैरों को जकड़ लिया है. टीम की शेष दो खिलाड़ियों ने उसके बच निकलने का रास्ता घेर रखा है.
आखिरकार उसका दम खत्म हुआ और इसके साथ ही वह मुकाबला. लाल, नीली, हरी और अन्य रंगीन सूती साड़ियां पहने दोनों टीमों की सदस्य मुस्कराते और हंसते हुए, एक-दूसरे को बधाई दे रही हैं. दर्शकों के बीच खड़े होकर अपनी माताओं का हौसला बढ़ा रहे बच्चे भागकर टर्फ पर आ गए हैं और अपनी मां के गले लग गए.
छत्तीसगढ़ में ओलंपिक चल रहा है. वीडियो गेम और स्मार्टफोन के बच्चों के दिमाग पर कब्जा कर लेने से पहले कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा, सांखली, पिट्ठू, कंचे, लंगड़ी दौड़ और भंवरा (लट्टू नचाना) जैसे खेल ही भारतीय परंपरा का अटूट हिस्सा हुआ करते थे. 6 अक्तूबर को शुरू हुए अपनी तरह के ऐसे पहले और असाधारण खेल उत्सव, जिसे छत्तीसगढ़िया ओलंपिक कहा जा रहा है, में ये सारे खेल ही मुख्य आकर्षण हैं.
युवा हो या वृद्ध, पुरुष हो या महिला, ग्रामीण हो या शहरों में रहने वाला, सभी छत्तीसगढ़ियों को इस आयोजन में शामिल होने का मौका दिया गया है. इस देसी ओलंपिक में 14 खेलों को स्थान दिया गया है जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त लंबी कूद, ऊंची कूद और 100 मीटर की दौड़ भी शामिल है.
राज्य की राजधानी रायपुर के बलबीर सिंह जुनेजा इनडोर स्टेडियम में कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा, ''यह पहल हमारे पारंपरिक खेलों को प्रोत्साहित करेगी, जिन्हें हमें लुप्त नहीं होने देना चाहिए.’’ उन्होंने कहा कि इससे सिर्फ लोगों का मनोरंजन ही नहीं होगा बल्कि यह कार्यक्रम प्रतिभागियों को फिट रहने के लिए भी प्रोत्साहित करेगा.

लोगों तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए सिनेमाघरों में भी छत्तीसगढ़ी बोली में जिंगल बजाने के साथ ही साथ, बड़े पैमाने पर विज्ञापन दिए गए हैं. यहां तक कि मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) के ट्विटर अकाउंट से हाल ही में बलौदा बाजार जिले के एक गांव में भंवरा कार्यक्रम में भाग लेने वाली एक 75 वर्षीया महिला का वीडियो पोस्ट किया, जिसमें उनके कौशल और उत्साह की प्रशंसा की गई.
बड़ी योजना
बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के खेल सहित स्थानीय परंपराओं और संस्कृति को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के ये कदम, जाहिर तौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रवादी और पुनरुत्थानवादी एजेंडे को हड़पने का राजनैतिक मास्टरस्ट्रोक जैसे हैं. खेल मंत्री उमेश पटेल का दावा है, ''छत्तीसगढ़ की एक समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा है, जिसे अतीत में पनपने नहीं दिया गया था.
सीएम छत्तीसगढ़ी भोजन, भाषा और स्थानीय ज्ञान के साथ-साथ कृषि और अन्य व्यवसायों में छत्तीसगढ़ के विशेष हुनर को लोकप्रिय बनाने के प्रयास कर रहे हैं. छत्तीसगढ़िया ओलंपिक भी इसी दिशा में एक कदम है.’’ कुछ महीने पहले, राज्य का एक पारंपरिक व्यंजन कृषि उत्सव में छाया रहा जिसे गर्मी से संबंधित बीमारियों के लिए रामबाण के रूप में पेश किया गया था. राजनैतिक पर्यवेक्षकों को लगता है कि 'छत्तीसगढ़ी पहचान’ को मजबूती से बढ़ावा देना, सरकार के पक्ष में जनता का समर्थन बढ़ा सकता है.
हालांकि, खेल गांवों और कस्बों दोनों में खेले जा रहे हैं, लेकिन मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों पर ध्यान केंद्रित किया गया है. बघेल सरकार ने अपने लगभग चार साल के कार्यकाल में शुरू की गई अधिकांश अन्य योजनाओं में भी ग्रामीण क्षेत्रों को ही फोकस में रखा है.
कृषि ऋण माफी, एमएसपी से अधिक कीमत पर धान की खरीद, ग्रामीण भूमिहीन मजदूरों के लिए रेवड़ियां और बहुप्रचारित 'गोबर अर्थव्यवस्था’, जिसमें सरकार खाद तैयार करने के लिए मवेशी मालिकों से गोबर खरीदती रही है—ये सभी योजनाएं ग्रामीण आबादी को ध्यान में रखकर बनाई और चलाई गई हैं. चूंकि राज्य की तीन-चौथाई से अधिक आबादी गांवों में रहती है, इसलिए यह स्वाभाविक है. राज्य में जनजातीय समुदायों की आबादी 30 प्रतिशत है, जो पूर्वोत्तर को छोड़कर भारत के दूसरे किसी भी राज्य से अधिक है.
कांग्रेस अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही है. ऐसे में तीन महीने तक चलने वाले इस खेल आयोजन ने उसे अपने दूसरे और तीसरे स्तर के नेताओं को सक्रिय करने का मौका दिया है, जो अक्सर राज्य इकाई द्वारा नजरअंदाज किए जाने की शिकायत करते हैं. ओलंपिक छह स्तरों पर आयोजित किया जा रहा है.
राज्य सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायत और शहरी इलाकों में वार्ड स्तर तक पर राजीव युवा मितान (युवा मित्र) क्लब बनाए हैं और उन्हें धन भी दिया है. गांवों में ऐसे 11,664 क्लब और कस्बों तथा शहरों में 1,605 क्लब हैं, जिनमें से प्रत्येक में मनोनीत सदस्य हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि इन क्लबों से जुड़े 'युवा, मिलनसार’ कांग्रेस कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर खेलों का आयोजन कर रहे हैं.
कांग्रेस भी उम्मीद कर रही है कि चाहे वह युवा हों, महिलाएं हों या फिर बच्चे हों जो भविष्य के मतदाता होंगे, ये खेल उन्हें मतदाताओं के सभी वर्गों तक पहुंचने में मददगार होंगे. 18 वर्ष से कम, 18-40 वर्ष तथा 40 वर्ष और उससे ऊपर—इन तीन आयु वर्गों में सभी खेल पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए हैं.
राज्य के खेल विभाग के अनुसार, छत्तीसगढ़िया ओलंपिक के दूसरे चरण (शहरी क्षेत्रों में जोनल और ग्रामीण में क्लस्टर) में विभिन्न श्रेणियों और खेलों में लगभग 32 लाख लोग शामिल होंगे. यानी तीन करोड़ की अनुमानित आबादी वाले राज्य की 10 प्रतिशत से अधिक जनता की इन खेलों में भागीदारी होने वाली है. तीन स्तरों से गुजरने के बाद, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के विजेताओं का एक दूसरे से जिला स्तर पर सामना होगा. इसके बाद संभागीय खेल होंगे और फिर 28 दिसंबर, 2022 से 6 जनवरी, 2023 तक राज्य के फाइनल मुकाबले होंगे.
क्या मकसद बस खेल है?
जहां राज्य सरकार लोगों की भागीदारी को लेकर लंबे-चौड़े दावे कर रही है, विपक्षी भाजपा ने इस आयोजन को ''समय और संसाधनों की बर्बादी’’ करार दिया है. कबड्डी मैचों के दौरान दो प्रतिभागियों—रायगढ़ जिले के एक 32 वर्षीय व्यक्ति और कोंडागांव की 28 वर्षीया महिला की आकस्मिक मौत ने विपक्ष को सरकार को घेरने के लिए और अधिक मजबूत वजहें दे दी हैं. दोनों मृतकों के परिवारों को चार-चार लाख रुपए का मुआवजा दिया गया है, लेकिन भाजपा ने बेहतर मुआवजे की मांग की है.
रायपुर से लोकसभा सदस्य सुनील सोनी पूछते हैं, ''मैं पारंपरिक खेलों के खिलाफ नहीं हूं लेकिन जब पूरा देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त खेलों में भाग लेने और जीतने के लिए एथलीटों को तैयार करने की कोशिश कर रहा है, तो छत्तीसगढ़ सरकार अपने खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने के बजाए पीछे ले जाने की कोशिश क्यों कर रही है?’’ भाजपा नेता राजीव युवा मितान क्लबों की जवाबदेही पर भी सवाल उठाते हैं. वे पूछते हैं, ''क्या वे सरकारी निकाय हैं? उन्हें सरकारी फंड कैसे दिया जा रहा है? उनका हिसाब कैसे होगा?’’
राज्य सरकार ने 2022-23 के अपने बजट में इन क्लबों की स्थापना के लिए 75 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं, जिसका उद्देश्य युवा नेताओं को उभारना है. प्रत्येक क्लब सालाना 1 लाख रुपए पाने का पात्र है, और ओलंपिक के दौरान आकस्मिक खर्च के लिए उन्हें पहले ही 25,000 रुपए दिए जा चुके हैं.
कुल मिलाकर खेल विभाग की तरफ से क्लबों की संख्या के आधार पर प्रति जिले के लिए 5 से 15 लाख रुपए और संभागीय स्तर पर 20 लाख रुपए के खर्च का अनुमान है. राज्य-स्तरीय आयोजन में 5 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है, और तीन महीने के आयोजन पर कुल खर्च 10 करोड़ रुपए से ऊपर जाएगा.
खिलाड़ियों का कोई पैसा खर्च होने की उम्मीद नहीं है. सरकार का दावा है कि उनका सारा खर्च वहन किया जाएगा. हालांकि, पुरस्कार राशि बहुत मामूली है. उदाहरण के लिए, टीम स्पर्धाओं में राज्य चैंपियन को सिर्फ 10,000 रुपए मिलेंगे, जबकि व्यक्तिगत स्पर्धा के विजेताओं को महज 1,000 रुपए मिलेंगे.
सवाल यह भी है कि खेल के लिहाज से छत्तीसगढ़, देश में कहां खड़ा है? हाल ही में संपन्न हुए 36वें राष्ट्रीय खेलों में पदकों की संख्या के हिसाब से देखें तो यह बहुत अधिक नहीं है. इसके एथलीटों ने सिर्फ दो स्वर्ण, पांच रजत और छह कांस्य पदक जीते और छत्तीसगढ़ देश के कुल 37 राज्यों में से 22 वें स्थान पर रहा.
इस बीच, सरकार ने पारंपरिक भारतीय जिम्नास्टिक के पोषण के लिए नारायणपुर जिले में मल्लखंभ अकादमी स्थापित करने के लिए चालू वित्त वर्ष में 2.83 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं.
राज्य में पारंपरिक खेलों और आधुनिक खेलों में ख्याति के लिए चल रही रस्साकशी के बीच, यह देखना होगा कि कौन किसको पछाड़कर अग्रणी रहेगा. या, फिर सभी प्रयास राजनैतिक बढ़त हासिल करने की एक होड़ भर बनकर रह जाएंगे?

