
राज्य बिजली बोर्ड का 49 वर्षीय पूर्व कर्मचारी. सरकारी कॉलेज से रिटायर अंग्रेजी का लेक्चरर. हाइस्कूल का 70 वर्षीय पूर्व अरबी शिक्षक. इस्लामी अध्ययन में डॉक्टरेट 36 वर्षीय शख्स. एक मशहूर दर्जी. अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के इन पांच लोगों में पहली नजर में मुश्किल से ही कोई साझा बात दिखाई देगी.
मगर जो धागा इन्हें एक सूत्र में पिरोता है, वह यह है कि ये कट्टरपंथी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआइ) के सदस्य थे, जिसे केंद्र सरकार ने बुधवार, 28 सितंबर को एक अधिसूचना जारी करके संवैधानिक सत्ता के प्रति बहुत कम सम्मान के साथ हिंसक और चरमपंथी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप में ''गैरकानूनी’’ घोषित कर दिया.
इसकी गतिविधियों पर पांच साल की पाबंदी की घोषणा के कुछ घंटे बाद फ्रंट ने ऐलान किया कि वह खुद को भंग कर रहा है. इसके केरल के जनरल सेक्रेटरी ए. अब्दुल सत्तार ने एक बयान में कहा, ''हमारे महान देश के कानून का पालन करने वाले नागरिक होने के नाते, संगठन गृह मंत्रालय का फैसला स्वीकार करता है... पीएफआइ के सभी सदस्यों से गतिविधियां बंद करने का निवेदन किया जाता है.’’
यह बयान जारी करने के कुछ देर बाद सत्तार को गिरफ्तार कर लिया गया. वे और ऊपर बताए गए पांचों लोग पीएफआइ के करीब 400 कार्यकर्ताओं में हैं जिन्हें देश भर से राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और कई राज्यों के राज्य पुलिस बलों के हफ्ते भर चले संयुक्त अभियान में गिरफ्तार किया गया है.
पीएफआइ का दावा है कि उसका संगठन 'देश में हाशिए के तबकों को ताकतवर बनाने के लिए नव-सामाजिक आंदोलन है’, पर सरकारी एजेंसियों का आरोप है कि वे पाकिस्तान सहित विदेशी ताकतों से प्राप्त धन से इस्लामी आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले एक गुप्त नेटवर्क के केंद्र में हैं.

एनआइए के एक अफसर का दावा है, ''सामाजिक कार्य का मुखौटा पहनकर पीएफआइ की कई शाखाएं नौजवानों, छात्रों, महिलाओं और कामकाजी तबके तक फैल गईं, पर अंतिम लक्ष्य उन्हें भावी आतंकी गतिविधियों के लिए अपने सिद्धांतों की शिक्षा देकर राजी और तैयार करना था. जब सरकार बाहरी आतंकी संगठनों के खिलाफ मजबूत हो रही है, यह भारत पर भीतर से हमला करने की साजिश थी.’’
केंद्र सरकार की अधिसूचना यही बात दोटूक कहती है. गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून (यूएपीए), 1967 की धारा 3 की उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए केंद्र सरकार ने पीएफआइ और उससे संबद्ध आठ शाखाओं को 'गैर-कानूनी संगठन’ घोषित कर दिया.
प्रभावी तौर पर यह प्रतिबंधित संगठन बन गया है—भारत में 42 ऐसे संगठनों की सूची है जिसमें अंतिम दो 2019 में इसमें दाखिल हुए. पीएफआइ का ज्यादातर शीर्ष नेतृत्व—चेयरमैन ओ.एम.ए. अब्दुल सलाम, वाइस-चेयरमैन ई.एम. अब्दुल रहमान, जनरल सेक्रेटरी अनीस अहमद, वैचारिक प्रवक्ता पी. कोया और कई राज्य इकाइयों के प्रमुख—अब हिरासत में हैं और आतंक के लिए धन मुहैया करने, हथियारों का प्रशिक्षण देने के शिविर लगाने और अलग-अलग धार्मिक समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने सरीखे यूएपीए के तहत आने वाले अपराधों के आरोपों का सामना कर रहे हैं.
सरकार का मकसद जाहिरा तौर पर पीएफआइ के समूचे नेटवर्क को जड़ से उखाड़ फेंकना है. यही वजह है कि आठ संबद्ध संगठनों पर भी पाबंदी लगाई गई है. ये हैं—रिहैब इंडिया फाउंडेशन, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (छात्र शाखा), ऑल इंडिया इमाम्स काउंसिल, नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशंस, नेशनल वूमेंस फ्रंट, जूनियर फ्रंट, एम्पॉवर इंडिया फाउंडेशन और रिहैब फाउंडेशन, केरल.
केंद्र सरकार की सूचना में कहा गया है कि इन शाखाओं का पीएफआइ के साथ 'हब ऐंड स्पोक’ या 'धुरी और तीली’ का रिश्ता था, जिसमें पीएफआइ धुरी का काम करता था और अपने संबद्ध संगठनों की जनसाधारण तक पहुंचने और धन जुटाने की क्षमता का इस्तेमाल गैर-कानूनी गतिविधियों की अपनी क्षमता को मजबूत बनाने के लिए करता था. अधिसूचना कहती है कि ये मोर्चे 'जड़ों और टहनियों के रूप में काम करते हैं जिनके जरिए पीएफआइ को पोषित और मजबूत किया जाता है.’
हालांकि ये कथित सहयोगी संगठन ऐसे दावों का खंडन करते हैं. मसलन, गिरफ्तार पीएफआइ नेता कोया, रहमान तथा दिल्ली इकाई के अध्यक्ष परवेज अहमद एम्पावर इंडिया फाउंडेशन के ट्रस्टी हैं. उसके सीईओ मोहम्मद शफीक एन. का कहना है कि यह थिंक टैंक संगठन से जुड़ा नहीं है. शफीक ने इंडिया टुडे से कहा, ''हमारे कुछ सदस्य पीएफआइ से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उससे एम्पावर इंडिया का कोई संबंध है.’’
इस्लामवादी संगठन?
पाबंदी अचानक नहीं लगाई गई. झारखंड में यह कथित ''राष्ट्र विरोधी गतिविधियों और आइएसआइएस सरीखे आंतकी संगठनों के साथ जुड़ाव’’ के कारण पहले से ही प्रतिबंधित संगठन है. एनआइए ने 2017 में ही पीएफआइ पर पाबंदी लगाने के सुझाव के साथ केंद्रीय गृह मंत्रालय को रिपोर्ट सौंपी थी. कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और गुजरात सरीखे राज्यों ने भी यही सिफारिश की थी.
पीएफआइ ने वही किया जो उसने पहले भी कई मौकों पर किया था. उसने कहा कि वह राष्ट्र विरोधी या हिंसक गतिविधियों में कभी शामिल नहीं रहा. उसने एनआइए और ईडी के आरोपों को ''सनसनी फैलाने की बेबुनियाद कोशिश’’ करार दिया और आरोप लगाया कि इन छापों का मकसद ''आतंक का माहौल पैदा करना’’ था.
मगर इस अखिल भारतीय कार्रवाई—जिसे ऑपरेशन ऑक्टोपस का कूटनाम दिया गया—पर पीएफआइ के काडर की प्रतिक्रिया से अहिंसा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता की झलक नहीं मिली. पीएफआइ के गढ़ केरल में आनन-फानन की गई हड़ताल के दौरान कई जिलों में हिंसक घटनाएं हुईं—बसों पर हमले किए गए, सड़कें रोक दी गईं और भाजपा-आरएसएस के नेताओं के घरों पर पेट्रोल बम फेंके गए. पड़ोसी राज्य तमिलनाडु के भी 17 जिलों में पीएफआइ के सदस्यों ने कथित तौर पर हिंसा भड़काई.

इन विरोध प्रदर्शनों से केरल में संगठन की राजनैतिक ताकत का खुलासा हुआ, जहां 3.34 करोड़ की कुल आबादी में 26.1 फीसद मुसलमान हैं. सेवानिवृत्त आइपीएस अफसर और पूर्व सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (इंटेलिजेंस विंग) के.एम. एंटनी कहते हैं, ''उन्होंने पुलिस की चेतावनियों और हाइकोर्ट के निर्देशों की परवाह न करके 10 घंटों के भीतर हड़ताल को अंजाम दिया. केवल भाजपा और सीपीआइ (एम) ही केरल में ऐसी आनन-फानन हड़ताल का इंतजाम कर सकती हैं. इससे पता चलता है कि केरल में पीएफआइ का जबरदस्त आधार है.’’
दरअसल, संकट की स्थितियों का जवाब हिंसक प्रतिक्रियाओं से देकर ही पीएफआइ ने ''इस्लामवादी चरमपंथी धड़ा’’ होने की कुख्याति हासिल की है. कथित सांप्रदायिक हिंसा को उकसावों, नफरतजदा अभियानों, जबरन धर्मांतरणों, युवाओं के अचानक गायब होने और अफगानिस्तान तथा सीरिया जाकर इस्लामिक स्टेट से जुड़ने और जैसे-को-तैसा की तर्ज पर केरल में भाजपा/आरएसएस और सीपीआइ (एम) के नेताओं की हत्याओं की घटनाओं से जुड़े होने को लेकर यह काफी लंबे वक्त से सरकारी एजेंसियों की जांच-पड़ताल के दायरे में रहा है.
एनआइए का यह भी दावा है कि संगठन के पास देसी बम और आइईडी बनाने का प्रशिक्षण देने वाले दस्ते, खुफिया शाखा और हिंसा के अभियान चलाने के लिए कार्रवाई दस्ते भी थे. यह धार्मिक कक्षाओं और मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग के केंद्र भी चलाता है. इस जुलाई में तेलंगाना पुलिस ने हैदराबाद के निजामाबाद से 52 वर्षीय कराटे शिक्षक को गिरफ्तार किया, जो कथित तौर पर मुस्लिम युवाओं को समाज विरोधी गतिविधियां भड़काने का प्रशिक्षण दे रहा था. यह जांच भी अब एनआइए ने अपने हाथ में ले ली है.
हिंसा का जायका
पीएफआइ की हिंसक गतिविधियां पहले-पहल 2010 में सामने आईं जब इसके कुछ सदस्यों ने थोडुपुझा के न्यूमैन कॉलेज में मलयाली प्रोफेसर टी.जे. जोसफ की हथेली काटकर इसलिए अलग कर दी क्योंकि उन्होंने अपने बनाए एक आंतरिक प्रश्नपत्र में कथित तौर पर पैगंबर मोहम्मद का अपमान किया था. 2015 में केरल की एक अदालत ने पीएफआइ के 13 कार्यकर्ताओं को इस अपराध में दोषी पाया.
दो साल बाद केरल हाइकोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में राज्य सरकार ने दावा किया कि पीएफआइ के सदस्य हत्या के 27, हत्या की कोशिश के 86 और सांप्रदायिक अशांति पैदा करने के 125 से ज्यादा मामलों में शामिल थे. एनआइए की तरफ से साझा किया गया डेटा कहता है कि उसने पीएफआइ के 46 लोगों को सजा दिलवाई और 335 के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए. संगठन पर 2019-20 में देश भर में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोधी प्रदर्शनों और 2020-21 में किसान आंदोलन को संसाधन और भौतिक सहायता मुहैया करने का आरोप लगाया गया है. 2020 में उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुए दंगों में इसकी कथित भूमिका भी जांच के दायरे में है.
2021 में यह असम में उस वक्त खबरों में आया जब अतिक्रमण हटाने के अभियान के दौरान दारांग जिले में हिंसा के पीछे इसका हाथ होने का संदेह था. हाल में असम पुलिस ने पीएफआइ और बांग्लादेश के इस्लामी आंतकी धड़े अनसारुल्लाह बांग्ला टीम (एबीटी) के बीच रिश्ते होने का दावा किया.
एक और 'वैश्विक कड़ी’ मार्च 2020 में अफगानिस्तान में काबुल के एक गुरुद्वारे पर बम हमला था, जिसमें 25 लोग मारे गए थे—बम हमलावरों में एक कथित तौर पर केरल से पीएफआइ का सदस्य था. केंद्र सरकार की अधिसूचना में यह भी दावा किया गया है कि पीएफआइ के जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी) और इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक और सीरिया (आइएसआइएस) के साथ संबंध हैं.
संगठन इसी साल हिजाब पर विवाद के दौरान भी सुर्खियों में आया. कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकारी संस्थाओं में हिजाब पर पाबंदी के खिलाफ छात्र उससे प्रभावित थे. जून में उदयपुर में दर्जी कन्हैया लाल (जिसने पैगंबर के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाली भाजपा नेता नूपुर शर्मा का समर्थन किया था) की हत्या की जांच में एनआइए ने दावा किया कि आरोपियों के संबंध पीएफआइ से थे.

दो महीने बाद पटना के फुलवारी शरीफ इलाके से पीएफआइ के तीन कथित सदस्य गिरफ्तार किए गए और बिहार पुलिस ने दावा किया कि उनके पास से आठ पन्नों का एक दस्तावेज मिला है जिसमें ''2047 तक भारत में इस्लाम का शासन स्थापित करने’’ की योजना पेश की गई है. इस मामले की जांच भी एनआइए कर रही है.
पीएफआइ ने जांच एजेंसियों और आलोचकों के आरोपों से इनकार किया है. यह संगठन सदस्यों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखता, इसलिए हिंसा के दोषी पाए गए लोगों का इससे रिश्ता साबित करना मुश्किल रहा है. समाजशास्त्री भी इसे अभी आतंकी संगठन घोषित करने से हिचकिचा रहे हैं.
विकासशील समाज अध्ययन केंद्र (सीएसडीएस) में एसोसिएट प्रोफेसर हिलाल अहमद कहते हैं, ''यह सच है कि पीएफआइ बेहद कट्टरपंथी देशज संगठन था. हालांकि लामबंदी का उसका तरीका आतंकी संगठनों से बहुत अलग था.’’ राजस्थान मुस्लिम फोरम सरीखे संगठनों ने भी गिरफ्तारियों और प्रतिबंध को राजनीति से प्रेरित बताया है.
पीएफआइ की जड़ें
सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम 1860 के 21 के तहत दिल्ली में पंजीकृत, पीएफआइ की जड़ें 1994 में केरल में स्थापित एक संगठन, नेशनल डेवेलपमेंट फ्रंट (एनडीएफ) में मिल सकती हैं. एनडीएफ ने थोड़ी लोकप्रियता हासिल की लेकिन यह जल्द ही कई सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में शामिल हो गया.
इनमें मई 2002 में कोझीकोड के मराड बीच इलाके में जवाबी हमला शामिल हैं जिसमें आठ हिंदू मारे गए थे. इसके बाद से पुलिस की लगातार निगरानी और जांच में रहे एनडीएफ का पड़ोसी राज्यों के दो अन्य मुस्लिम संगठनों—कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी और तमिलनाडु मनीथा नीथी पासराय में विलय हो गया और इस तरह 16 फरवरी, 2007 को पीएफआइ की नींव पड़ी.
जांच एजेंसियों का आरोप है कि वैचारिक रूप से पीएफआइ के सदस्य मुस्लिम ब्रदरहुड (एमबी) से जुड़े हैं, जो एक अंतरराष्ट्रीय सुन्नी इस्लामी संगठन है जिसने 1928 में मिस्र में जड़ें जमा लीं थीं. मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी, जो एमबी से संबद्ध थे, को 2015 में मौत की सजा के खिलाफ पीएफआइ के कार्यकर्ताओं ने नई दिल्ली में मिस्र के दूतावास के बाहर विरोध प्रदर्शन किया. ब्रदरहुड का उद्देश्य शरिया कानून द्वारा शासित इस्लामी राज्य की स्थापना करना था और इसका एक नारा चर्चित रहा है:
'इस्लाम समाधान है.’ विभाजन से पहले, इसे भारतीय मुसलमानों द्वारा एक सामाजिक-धार्मिक संगठन के रूप में देखा जाता था और एमबी के उद्देश्यों से प्रभावित होकर, जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक अबुल आला मौदूदी ने इस विचार को भारतीय उपमहाद्वीप में लोकप्रिय बनाया. आजादी के बाद, मौदूदी पाकिस्तान चले गए और जमात-ए-इस्लामी हिंद ने भारत के संविधान और उदार नजरिए को अपनाया. लेकिन अप्रैल 1977 में अलीगढ़ में गठित युवा विंग, स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) कट्टरपंथी हो गया.
सिमी का मिशन पश्चिमी भौतिकवादी प्रभाव से ''भारत को मुक्त’’ करना और मुस्लिम समाज को इस्लामी कानून के अनुसार जीवन जीने के लिए तैयार करना था. इसके कुछ बार-बार दोहराए गए उद्देश्यों में 'खिलाफत’ की बहाली, 'उम्मा’ (मुस्लिम भाईचारे) पर जोर, और इस्लाम की सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए जेहाद की आवश्यकता जैसे अपने कुछ लक्ष्यों को सिमी बार-बार दोहराता था.
जमात ने स्टूडेंट इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन (एसआइओ) बनाकर सिमी से दूरी बना ली थी. इस बीच, देश में कई आतंकी घटनाओं में इसकी कथित संलिप्तता के कारण, 2001 में 9/11 के हमलों के तुरंत बाद सिमी पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. 2007 में पीएफआइ के गठन को जांच एजेंसियों ने नए नाम से शुरू सिमी के अधिक परिष्कृत संस्करण के रूप में देखा क्योंकि सलाम, रहमान, कोया और पीएफआइ के राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य अबूबकर, सहित इसके कई शीर्ष नेता 1980 के दशक की शुरुआत में सिमी के पदाधिकारी थे.
कोया ने एक साक्षात्कार में इसे खारिज किया था, ''सिमी का कहना था कि इस्लाम भारत की समस्याओं का समाधान है, लेकिन हम मानते हैं कि भारत कई धर्मों के साथ विविधतापूर्ण देश है. हमने सिमी के विचारों का समर्थन नहीं किया.’’
संगठन की ताकत
जमीन पर, पीएफआइ ने अपने उद्देश्यों को भारतीय संविधान की सीमाओं के भीतर सीमित कर दिया है, यहां तक कि विशेष रूप से गैर-इस्लामी कहे जाने शब्दों जैसे योग, आयुर्वेद, और हिंदी और संस्कृत के नारों को अपने भाषणों में शामिल किया है. जांच एजेंसियों का कहना है कि पीएफआइ का उद्देश्य एक मुखर मुस्लिम संगठन स्थापित करना था, जो 2047 तक भारत में संख्याबल और लोकतांत्रिक शक्ति, दोनों रूपों से शक्तिशाली हो जाएगा. एजेंसियों का आरोप है कि संगठन चुपचाप देश भर के कई शहरों और ग्रामीण इलाकों में हमले में सक्षम प्रशिक्षित दस्ते तैयार करके जमीनी ताकत बढ़ा रहा था. संगठन के तेजी से विस्तार ने भारत के आंतरिक सुरक्षा संस्थानों को बहुत ज्यादा चिंतित कर दिया था.
लगभग 4,00,000 सदस्य होने का दावा करने वाले पीएफआइ के 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कार्यालय थे. इसके संविधान में इसके मुस्लिम संगठन होने का उल्लेख नहीं था, हालांकि अन्य संप्रदायों के बहुत कम लोग इसके सदस्य थे. इसके नेतृत्व में पारंपरिक मौलवियों, विश्वविद्यालय के शिक्षित पेशेवरों और प्रतिबद्ध सामान्य कार्यकर्ताओं का मिश्रण था. पश्चिम बंगाल इकाई का 36 वर्षीय प्रमुख मीनारुल शेख के पास इस्लामिक स्टडीज में डॉक्टरेट की डिग्री है, जबकि यूपी इकाई का नेतृत्व लखनऊ का एक दर्जी वसीम अहमद करता था.
एक दक्षिणी घटना
पहले केरल के कोझीकोड में इसका मुख्यालय था लेकिन अब इसने अपना प्रधान कार्यालय नई दिल्ली में स्थानांतरित कर दिया था, जो एक अखिल भारतीय संगठन बनने की उसकी इच्छा को दर्शाता है. वह काम अधूरा रह गया. दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जेक्टिव स्टडीज के महासचिव प्रो. जेड.एम. खान कहते हैं, ''पीएफआइ की दक्षिण भारत के कुछ राज्यों से आगे कोई खास मौजूदगी नहीं थी.
उत्तर में इस संगठन को कोई जानता नहीं था.’’ सीएसडीएस के अहमद इससे सहमत हैं. उनका कहना है कि पीएफआइ दक्षिण भारत का ही संगठन बना रहा है क्योंकि उत्तर भारत में किसी विशेष पहचान पर आधारित संगठन-निर्माण की संस्कृति नहीं है. खाड़ी देशों से आने वाला पैसा वहां नहीं पहुंचता था.
2009 में पीएफआइ के अंदर से सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआइ) नाम का राजनैतिक संगठन विकसित हुआ, जिसका उद्देश्य मुसलमानों, दलितों और हाशिए के अन्य समुदायों के मुद्दों को उठाना था. पार्टी ही पीएफआइ से जुड़ा एकमात्र संगठन है जिस पर अभी तक प्रतिबंध नहीं लगाया गया है. इसमें गैर-मुस्लिम समुदायों के सदस्य हैं और केरल और कर्नाटक में स्थानीय निकाय चुनावों में क्रमश: 125 और 225 सीटें जीतकर इसने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है. अब इसका पश्चिम बंगाल, बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, पुदुच्चेरी और आंध्र प्रदेश में स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व है.
2013 से एसडीपीआइ कर्नाटक में विधानसभा और संसद के चुनावों में भी उम्मीदवार उतार रही है. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह पार्टी दक्षिण कन्नड़ सीट से लगभग तीन प्रतिशत वोट हासिल करने में सफल रही. यह सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील सीट है. एसडीपीआइ अब खुद को पीएफआइ से अलग करने की कोशिश कर रही है. पार्टी उपाध्यक्ष बी.एम. कांबले कहते हैं, ''एसडीपीआइ और पीएफआइ के बीच कोई संबंध नहीं है.’’ यह दीगर बात है कि एसडीपीआइ के सदस्य पीएफआइ नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में तमिलनाडु और कर्नाटक में सड़कों पर उतरे थे.
हालांकि इसे प्रतिबंधित नहीं किया गया है लेकिन 22 और 27 सितंबर को जांच एजेंसियों और पुलिस बलों की कार्रवाई के दो दौर में एसडीपीआइ के कई सदस्यों को गिरफ्तार किया गया है. जांच एजेंसियां पीएफआइ द्वारा जुटाए जा रहे पैसे को लेकर चिंतित हो गई थीं.
पीएफआइ ने दावा किया था कि वह सदस्यता अभियान और शुभचिंतकों से चंदा लेकर फंड जुटाता है. सभी सदस्यों से अपेक्षा की जाती थी कि वे अपने मासिक वेतन का कम से कम एक प्रतिशत संगठन को या कम से कम 10 रुपए प्रति माह का योगदान दें. इसमें अगर वास्तव में 4,00,000 सदस्य हैं, तो इसे अपने आप में हर महीने कम से कम 40 लाख रुपए की आमद होगी.
संगठन अपनी वित्तीय ताकत के प्रदर्शन से कभी नहीं कतराया है. इसने 2019 में कोर्ट में एक मुकदमे की पैरवी के लिए शीर्ष वकील कपिल सिब्बल को 77 लाख रुपए का भुगतान किया था. ईडी और आयकर विभाग पैसा जुटाने की इसकी गतिविधियों की भी जांच कर रहे हैं.
आयकर विभाग ने पीएफआइ और रिहैब इंडिया फाउंडेशन (आरआइएफ) का पंजीकरण रद्द कर दिया है. संगठन पर प्रतिबंध लगाने वाली अधिसूचना में कहा गया है, ''पीएफआइ की ओर से उसके कई बैंक खातों में जमा के स्रोत खाताधारकों की आर्थिक हैसियत से मेल नहीं खाते थे और पीएफआइ की गतिविधियां उसके घोषित उद्देश्यों के अनुरूप नहीं थीं.’’
पैसा कहां से आता था
गृह मंत्रालय के एक डोसियर में कहा गया है कि पीएफआइ ने आरआइएफ, इंडियन सोशल फोरम और इंडियन फ्रेटरनिटी फोरम जैसे अपने प्रमुख संगठनों के माध्यम से पश्चिम एशियाई देशों से धन एकत्र किया. मुस्लिम रिलीफ नेटवर्क (एमआरएन) एक अन्य संस्था है जिसके माध्यम से धन जुटाया गया.
यह केरल का एक गैर-सरकारी संगठन है जिसे पीएफआइ ने खड़ा किया है. एमआरएन के कथित तौर पर जेद्दा स्थित वल्र्ड असेंबली ऑफ मुस्लिम यूथ (डब्ल्यूएएमवाइ) से संबंध हैं, जो कट्टरपंथी इस्लामी संगठन है और अतीत में अल कायदा से जुड़ा रहा है. अब इन फंडों का क्या होगा और इसे कहां डायवर्ट किया जाएगा, यह अधिकारियों के लिए बड़ी चिंता का विषय हो सकता है.
पीएफआइ का धन उगाहना 2020 में फिर से ईडी के निशाने पर आया जब उसके कुछ कथित सदस्यों को यूपी पुलिस ने मथुरा में गिरफ्तार किया, जब वे 19 वर्षीय दलित लड़की के सामूहिक बलात्कार और मौत के बाद हाथरस जा रहे थे. यूपी पुलिस ने उन पर ''सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने’’ के प्रयास का आरोप लगाया और मामले के आधार पर ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग जांच शुरू की. फरवरी 2021 में पीएफआइ और कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया के पांच सदस्यों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई. एजेंसी का दावा है कि सीएए विरोधी प्रदर्शनों, दिल्ली दंगों और हाथरस विरोध प्रदर्शनों के लिए 1.36 करोड़ रुपए एकत्र किए गए थे.
ईडी का यह भी आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में पीएफआइ खातों में 100 करोड़ रुपए से अधिक जमा किए गए हैं. पिछले साल दिसंबर में एजेंसी ने दस्तावेजों के साथ बताया कि रियल्टी फर्म मुन्नार विला विस्टा प्राइवेट लिमिटेड सहित केरल में विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से पीएफआइ मनी लॉन्ड्रिंग गतिविधियों में शामिल है. एजेंसी ने आरोप लगाया, ''अबू धाबी में एक बार और रेस्तरां सहित पीएफआइ नेताओं द्वारा विदेशी संपत्तियों का अधिग्रहण भी जांच के दायरे में है.’’
पीएफआइ के महासचिव अनीस अहमद ने इन दावों को खारिज किया है. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ''पहले दावा किया कि हमारे खातों में 200 करोड़ रुपए हैं. फिर यह घटकर 120 करोड़ रुपए रह गया... अब उन्हें 12 साल में केवल 60 करोड़ रुपए ही मिले हैं.’’
राजनैतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पीएफआइ ने भारत में मुस्लिम राजनीति के एक नए ब्रांड का प्रतिनिधित्व किया, जो अधिक सशक्तीकरण पर जोर देता है और समुदाय की सामाजिक-आर्थिक शिकायतों को दूर करता है. चरमपंथी हिंदू धर्म के उदय के साथ, मुसलमानों ने इस एहसास के साथ सामाजिक और राजनैतिक रूप से हाशिए पर महसूस किया कि उनका मौजूदा नेतृत्व उनमें सुरक्षा की भावना प्रदान करने में विफल रहा है. पीएफआइ ने चतुराई से खुद को समुदाय के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया.
दरअसल, पीएफआइ आरएसएस और विहिप जैसे दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी संगठनों के ढर्रे पर चला था. अहमद कहते हैं, ''यह विहिप और बजरंग दल जैसे कट्टरपंथी दबाव समूहों के नए मॉडल में से एक था जो पिछले 30-40 वर्षों में उभरा है. ये समूह एक वर्ग की भावनाओं को भड़काकर अपने लिए समर्थन हासिल करने के प्रयास करते हैं.
वे खुद को ऐसे हितधारकों के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो समुदाय की भलाई के लिए लड़ रहा है.’’ हथियारों के प्रशिक्षण के आरोपों पर जबाव देते हुए पीएफआइ के नेता अक्सर इशारा करते हैं कि आरएसएस और बजरंग दल जैसे हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों के खिलाफ भी इस तरह के आरोप लगे हैं, लेकिन इन संगठनों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती है.
मुस्लिम राजनीति में बुनियादी बदलाव
जर्मन विद्वान एरंड्ट अमेरिच का कहना है कि पीएफआइ के उद्भव ने भारत में मुस्लिम राजनीति में 'एक मौलिक बदलाव’ का संकेत दिया जो पहचान-आधारित और अंतर्मुखी न रहकर, राजनैतिक शिक्षा तथा कानूनी सक्रियता के माध्यम से अल्पसंख्यक सशक्तीकरण पर केंद्रित समावेशी बहस में शामिल होती है.
भारत में मुस्लिम संगठनों की राजनैतिक शिक्षा और कानूनी व्यावहारिकता: मुस्लिम अल्पसंख्यक राजनीति की बदलती प्रकृति का एक अध्ययन शार्षक से उनका शोध पत्र बताता है कि कानूनी शिक्षा के माध्यम से मुसलमानों को सशक्त बनाना और उन्हें अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करने का एजेंडा, पीएफआइ की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण था.
कानूनी सशक्तीकरण पर इस जोर ने मुसलमानों के बीच असुरक्षा को कम किया और 'हिंदू राष्ट्रवादी समूहों द्वारा नियमित रूप से डराने-धमकाने, पुलिस उत्पीड़न के दौर में उनका विश्वास बढ़ाया.’ भारत के जेल आंकड़ों के अनुसार, 2021 में भारतीय जेलों में बंद सभी बंदियों में से 30 प्रतिशत से अधिक मुसलमान थे, जो देश की जनसंख्या में उनकी सिर्फ 14.2 प्रतिशत हिस्सेदारी के अनुपात में बहुत अधिक है.
हालांकि संगठन भंग है पर यह प्रतिबंध के खिलाफ कानूनी लड़ाई का विकल्प चुन सकता है और इसकी छात्र शाखा ने ऐसे इरादे जताए भी हैं. लेकिन लोगों की निगाहों में बैकफुट पर है. विवाह-पूर्व संबंधों जैसे कई मुद्दों पर दकियानूसी रुख के कारण संगठन आलोचना का सामना कर रहा था, अब इसके सभी फ्रंटों पर लगा प्रतिबंध इसे अपंग कर देगा.
ऑल इंडिया मुस्लिम जमात, मुस्लिम स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया, ऑल इंडिया तंजीम उलमा-ए-इस्लाम, कुल हिंद मरकजी इमाम काउंसिल, ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज जैसे कई मुस्लिम संगठनों के नेताओं ने कहा है कि पीएफआइ की गतिविधियां मुसलमानों के हित में नहीं हैं और वे प्रतिबंध का स्वागत करते हैं. संगठन का फोकस अपने नेताओं को जमानत पर बाहर निकालने पर होगा. भविष्य में नई पहचान के साथ नए अवतार में, आगे बढ़ना भी बड़ा मुश्किल काम होगा.
—साथ जीमॉन जैकब, प्रशांत श्रीवास्तव, रोमिता दत्ता, राहुल नरोन्हा और अमरनाथ के. मेनन

