मथुरा में यमुना नदी पर बने गोकुल बैराज से बलदेव गांव की ओर जाने वाली सड़क पर तीन किलोमीटर चलने पर बाईं ओर मौजूद रसखान समाधि स्थल पर्यटकों के लिए एक नया केंद्र बनकर उभरा है. भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में डूबे रसखान ने 16वीं शताब्दी में ब्रज भाषा में कवित्त, सवैये और दोहों की रचना कर समकालीन कवियों में महत्वपूर्ण स्थान बनाया था.
रसखान के देहांत के बाद उनके पार्थिव शरीर को महावन गांव में समाधिष्ट कर दिया गया, जिसे आज रसखान समाधि स्थल के रूप में जाना जाता है. ब्रज की संस्कृति पर गैर सरकारी संस्था 'ब्रज संस्कृति शोध संस्थान’ की तरफ से निकलने वाली किताबों के संपादक गोपाल शरण शर्मा पिछले कई वर्षों से जानकारियां जुटाने के लिए रसखान के समाधि स्थल आ रहे हैं.
अपने मोबाइल पर सितंबर, 2019 की फोटो दिखाते हुए शर्मा बताते हैं, ''रसखान समाधि स्थल के पत्थर टूट चुके थे. पूरे परिसर में झाड़ियां और छत पर पीपल उग आए थे. सांप और कीड़े-मकोड़ों की वजह से इस परिसर के करीब से गुजरने में भी डर लगता था.’’ करीब 12 एकड़ में फैले इस परिसर से सटी दो एकड़ जगह पर एक और समाधि ताजबीवी की थी जो खंडहर हो चुकी थी.
ताजबीवी ने श्रीकृष्ण के माधुर्य से ओतप्रोत काव्य रचनाएं लिखीं और मुगल शासनकाल के दौरान अपने हिंदुआनी बनने और कलमा-कुरान छोड़ने की घोषणा की थी. वर्ष 2020 में ब्रज तीर्थ क्षेत्र विकास परिषद के प्रयास से रसखान और ताजबीवी के समाधिस्थल को एकीकृत परिसर के तौर पर संवारने का प्रयास शुरू हुआ जो अब पूरा हो चुका है.
पूरे 14 एकड़ के इस परिसर के प्राकृतिक लैंडस्केप को घास एवं पौधों से आच्छादित किया गया है. पर्यटकों को रसखान एवं ताजबीवी के जीवन पर आधारित चित्र वीथिकाओं से परिचित कराने के लिए 500 दर्शकों की क्षमता वाले एक ओपन एम्फीथिएटर और 50 दर्शकों की क्षमता वाले एक इंटरप्रिटेशन सेंटर ने इस स्थान को संपूर्ण पर्यटक स्थल की पहचान दिलाई है.
रसखान और ताजबीवी समाधि उपवन के नए नाम से पहचाने जाने वाला गोकुल का यह स्थल अब ब्रज की विलुप्त होती सांझी कला के उत्थान का गवाह बना है. इस कला में कलाकार शाम के वक्त में फूलों से जमीन व पानी की सतह पर, रंगों से पानी के नीचे व सतह पर, गोबर से श्रीकृष्ण की विभिन्न कलाओं का चित्रण करते थे. सांझी कला का यह प्रदर्शन पितृपक्ष के दौरान ही किया जाता था.
समय बीतने के साथ यह कला लुप्त हो गई थी. सांझी कला चर्चा में तब आई जब मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तोक्यो में क्वाड सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन को मथुरा के ठकुरानी घाट थीम पर आधारित एक सांझी 'पैनल’ भेंट किया था. सांझी कला से दूसरे कलाकारों का परिचय कराने के लिए पहली बार ब्रज तीर्थ विकास परिषद ने रसखान और ताजबीवी समाधि उपवन में सांझी महोत्सव का आयोजन किया.
मथुरा की स्थानीय जी.एल.ए. यूनिवर्सिटी के सहयोग से पितृपक्ष के दौरान 18 से 25 सितंबर के दौरान कलाकारों ने स्कूलों के छात्रों के सामने न केवल सांझी कला का प्रदर्शन किया बल्कि उसकी बारीकियां भी सिखाईं. शाम होते ही रसखान और ताजबीवी समाधि उपवन परिसर में रंगबिरंगी फसाड लाइटों की छटा देखते ही बनती है. यूपी के धार्मिक तीर्थ स्थलों में मथुरा संभवत: पहला स्थान है जहां बड़े पैमाने पर प्रमुख मंदिरों को फसाड लाइटों से सजाया गया है. शाम होते ही यहां का कुसुम सरोवर, श्रीकृष्ण जन्मभूमि, बरसाना, नंदगांव के मंदिर रंगबिरंगी फसाड लाइटों से रोशन हो जाते हैं.
वर्ष 2017 के मार्च में यूपी का मुख्यमंत्री बनने के दो महीने के भीतर ही योगी आदित्यनाथ ने कैबिनेट से प्रस्ताव पारित कराकर मथुरा-वृंदावन नगर निगम का गठन कर दिया था. साथ ही अपने करीबी आइएएस अफसर और तत्कालीन प्रमुख सचिव पर्यटन (वर्तमान में सलाहकार, मुख्यमंत्री) अवनीश अवस्थी को मथुरा-वृंदावन के समग्र विकास की योजना बनाने का निर्देश भी दिया था. अवस्थी के प्रस्ताव के आधार पर अगस्त, 2017 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद का गठन हुआ.
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा में फैकलटी ऑफ मैनेजमेंट के डीन और डिपार्टमेंट ऑफ ट्रैवल ऐंड टूरिस्ट मैनेजमेंट के विभागाध्यक्ष डॉ. लवकुश मिश्र कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद देश में इकलौता मॉडल है जहां एक जिले के विकास के लिए बनी किसी संस्था के प्रशासनिक अध्यक्ष मुख्यमंत्री स्वयं हैं जबकि मुख्यमंत्री तो स्वयं पूरे प्रदेश के प्रशासनिक प्रमुख हैं. इससे मथुरा-वृंदावन के विकास के प्रति मुख्यमंत्री योगी की प्रतिबद्धता जाहिर होती है.’’ परिषद का उपाध्यक्ष 1977 बैच के आइपीएस अफसर शैलजाकांत मिश्र को बनाया गया.
मिश्र 1988 में दो साल मथुरा के पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात रहे थे. वे 2012 में पुलिस महानिदेशक (डीजी) सिविल डिफेंस के पद से रिटायर हुए. सेवानिवृत्ति के बाद मिश्र जबलपुर में रह रहे थे. परिषद में आठ विभागों के प्रमुख सचिवों को बतौर सदस्य शामिल किया गया. ब्रज तीर्थ विकास परिषद के सीईओ के पद पर मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की तैनाती की गई.
इससे विकास प्राधिकरण ही तीर्थ विकास परिषद के कार्यों की कार्यदायी संस्था बन गई. परिषद का काम 84 कोसी परिक्रमा के मार्ग की सीमा के भीतर आने वाले 362 किमी क्षेत्र, जिनमें मथुरा के अलावा कुछ भाग राजस्थान और हरियाणा का भी शामिल है, के लिए विकास की योजना बनाना और उसकी निगरानी कर समय से पूरा कराना है.
मथुरा में तीर्थ स्थलों के विकास में जुटी ब्रज तीर्थ विकास परिषद के सामने गोवर्धन पर्वत एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा था. गोवर्धन पर्वत पूरा सूख गया था. इसके नष्ट होने का खतरा मंडरा रहा था. परिषद के उपाध्यक्ष शैलजाकांत मिश्र के सामने उसे हरा-भरा करने की बड़ी चुनौती थी. वन विभाग के अधिकारियों के साथ गोवर्धन पर्वत का परीक्षण करने के दौरान मिश्र ने पाया कि पहाड़ पर पानी नहीं रुकता था.
पहाड़ पर जानवर, आदमी चढ़कर उसके पेड़-पैधों को नष्ट कर रहे थे. पहाड़ पर कंटीली झाड़ियां भी थीं जिन्हें हटाने के लिए कर्मचारियों को जूते पहनकर पहाड़ पर चढ़ने का विरोध स्थानीय लोग कर रहे थे. इससे निबटने के लिए पहाड़ के भीतर जाने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए कपड़े के जूते तैयार किए गए.
21 किलोमीटर की परिधि में फैले गोवर्धन पर्वत में 8 करोड़ रुपए की लागत से 14 किलोमीटर लंबी चारदीवारी बनाई गई. पानी रोकने के लिए दो फुट की उंचाई तक ईंट की दीवार बनाई गई और इसके ऊपर लोहे की ग्रिल लगाई गई. बारिश का पानी रुकने लगा और जानवरों के पर्वत के भीतर प्रवेश रुकते ही दो साल के भीतर गोवर्धन पर्वत पर हरियाली आने लगी. इस तरह गोवर्धन पर्वत का संरक्षण किया गया.
पिछले पांच वर्षों में विकास परिषद ने 100 से ज्यादा विकास प्रस्ताव मुख्यमंत्री के सामने पेश किए लेकिन इनमें एक भी प्रस्ताव को वापस नहीं किया गया है. इस दौरान मथुरा-वृंदावन में 400 करोड़ रुपए की परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं. लवकुश मिश्र बताते हैं, ''मुख्यमंत्री की अध्यक्षता और सभी प्रमुख विभागों के प्रमुख सचिवों के बतौर सदस्य परिषद में शामिल होने का फायदा यह हुआ कि प्रस्ताव से जुड़ी फाइलों के एक विभाग से दूसरे विभाग घूमने में लगने वाला समय बचा.
मुख्यमंत्री की प्राथमिकता समझकर अफसरों ने फौरन अपनी स्वीकृतियां दीं.’’ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं मथुरा-वृंदावन आकर न केवल नई योजनाओं की नींव डाली बल्कि पूरी होने वाली योजनाओं की शुरुआत भी की. पिछले पांच वर्षों के दौरान योगी 26 बार वृंदावन आ चुके हैं.
मथुरा-वृंदावन के विकास के लिए मुख्यमंत्री योगी की गंभीरता इसी बात से जाहिर होती है कि उन्होंने 24 जून को दिल्ली में एक साथ सड़क परिवहन मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री नितिन गडकरी, केंद्रीय रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव, केंद्रीय मंत्री पत्तन जहाजरानी एवं जलमार्ग सर्बानंद सोनोवाल, केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जी. किशन रेड्डी और केंद्रीय सड़क परिवहन राज्यमंत्री वी.के. सिंह के साथ एक साथ बैठक की. इस बैठक में 84 कोसी परिक्रमा मार्ग को ठीक करने के लिए 9,000 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट को नितिन गडकरी ने स्वीकृति दी.
15,000 करोड़ रुपए से आउटर रिंग रोड, मथुरा-वृंदावन के बीच खराब पड़े 12 किलोमीटर के रेलवे ट्रैक को ठीक कर इस पर ट्रेन चलाने के लिए 400 करोड़ रुपए और वृंदावन से 24 किलोमीटर के जलपरिवहन के प्रोजेक्ट को स्वीकृति मिली. यह पहली बार था जब मुख्यमंत्री योगी के निवेदन पर पांच केंद्रीय मंत्रियों ने एक साथ बैठक कर करीब 30 हजार करोड़ रुपए की योजनाओं को स्वीकृति दी हो.
मथुरा-वृंदावन को पर्यटन के मानचित्र पर चमकाने के प्रयासों ने भी गति पकड़ी है. सामान्य परिस्थितियों में करीब 80 लाख लोग हर साल ताज महल देखने जाते हैं. मथुरा-वृंदावन में एक साल में आने वाले पर्यटकों की संक्चया पौने तीन करोड़ के आसपास है. ब्रज तीर्थ विकास परिषद के सर्वे के मुताबिक, गुरु पूर्णिमा के आसपास पांच दिन में औसतन एक करोड़ लोग मथुरा में गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं.
मथुरा में टूरिस्ट गाइड का काम करने वाले ब्रज किशोर शर्मा बताते हैं, ''मथुरा आने वाले पर्यटकों का एक बड़ा तबका आर्थिक रूप से बहुत मजबूत नहीं है. रात में ठहरने का अच्छा इंतजाम नहीं होने से संपन्न पर्यटक यहां रुकते नहीं.’’ मथुरा विधानसभा सीट से भाजपा विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री श्रीकांत शर्मा 'मेरो ब्रज’ नाम से सफाई अभियान चला रहे हैं. शर्मा बताते हैं, ''टूरिस्टों को आकर्षित करने के लिए मथुरा-वृंदावन के तीर्थ स्थलों को रेलवे और बस स्टेशन से बेहतर कनेक्टिविटी दी गई है.
जेवर में बनने वाला अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट मथुरा से महज 45 किलोमीटर दूर है. इसके शुरू होने से भी मथुरा-वृंदावन में पर्यटन एक नई ऊंचाइयां छुएगा.’’ पर्यटकों को रात में मथुरा-वृंदावन में रोकने के लिए तीर्थ विकास परिषद ने ब्रज की संस्कृति का विकास करने के साथ तीर्थ स्थलों को फसाड लाइट से सजाने और साउंड एवं लाइट शो का आयोजन भी शुरू किया है.
कई चुनौतियां भी हैं. करीब पांच हजार मंदिरों वाला वृंदावन यू आकार में यमुना नदी से घिरा हुआ है. इसके तीन तरफ यमुना नदी है और चौथी तरफ मथुरा है. ऐसे में वृंदावन का जमीनी विस्तार काफी मुश्किल है. यमुना के किनारे बांके बिहारी का दर्शन करने के लिए पूरे वृंदावन से गुजरना पड़ता है. ऐसे में ट्रैफिक जाम एक गंभीर समस्या का रूप ले चुका है. यमुना नदी के दूसरी तरफ एक पुल बनाकर वहां से सीधे बांके बिहारी मंदिर आने की सुविधा के साथ यमुना में जलपरिवहन के शुरू होने से ट्रैफिक जाम की समस्या से निजात मिलने की आस लगाई जा रही है.
आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय की अरबन मास ट्रांजिट कंपनी (यूएनटीसी) ने वृंदावन में ट्रैफिक सुधार की योजना बनाने का काम शुरू कर दिया है. यह छह महीने में अपनी रिपोर्ट तीर्थ विकास परिषद को देगी. इसी के हिसाब से परिषद अपने नए प्रोजेक्ट को आकार देगा. इसके अलावा यूपी सरकार काशी विश्वनाथ की तर्ज पर वृंदावन में बांके बिहारी कॉरिडोर बनाने की संभावनाएं तलाश रही है.
तेजी से कट रहे जंगलों के कारण मथुरा-वृंदावन में बंदरों की समस्या काफी अधिक है. तीर्थ विकास परिषद बंदरों को वापस उनका प्राकृतिक वास देने की दिशा में काम कर रही है. मथुरा में यमुना के किनारे 350 एकड़ जमीन में फैले सौभरिवन को एशिया का सबसे बड़ा सिटी फॉरेस्ट बनाने की दिशा में काम चल रहा है. यहां पर 76 हजार पेड़ लगाए जा चुके हैं.
राजस्थान की सीमा पर बसे मथुरा की करीब एक-तिहाई आबादी जाट है तो ब्रज क्षेत्र में बसे यादव समाज का यह एक प्रमुख तीर्थ स्थल भी है. मथुरा-वृंदावन में तीर्थ स्थलों का विकास करके मुख्यमंत्री योगी सांस्कृतिक एजेंडे को धार देने की कोशिश कर रहे हैं. यूपी के पश्चिमी और ब्रज क्षेत्र में विपक्षी दलों के जाट-यादव गठजोड़ को योगी का सांस्कृतिक एजेंडा कितना निष्प्रभावी कर पाता है, इसी पर 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन भी निर्भर करेगा.

