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सड़कों पर क्यों बुझ रहे घर के दीये

त्रासदी बन चुके सड़क हादसों में आए दिन सैकड़ों दिन लोगों की जान जा रही है, इसके लिए ड्राइवर, सड़कों की बनावट से लेकर सिस्टम तक सभी थोड़े-थोड़े जिम्मेदार

आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे पर ट्रक-कंटेनर की भीषण भिड़ंत के बाद क्षतिग्रस्त कंटेनर
आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे पर ट्रक-कंटेनर की भीषण भिड़ंत के बाद क्षतिग्रस्त कंटेनर
अपडेटेड 4 जुलाई , 2022

राजस्थान के जयपुर में सीतापुर इंडस्ट्रियल एरिया में मोटर पार्ट्स का व्यापार करने वाले अखिलेश मिश्र 18 जून की शाम अपनी टाटा सफारी गाड़ी से पूरे परिवार के साथ उन्नाव स्थित पैतृक गांव को चले. तीन दिन बाद 22 जून को अखिलेश के सबसे छोटे भाई विकास की शादी थी. कार में पूरा परिवार शादी के उल्लास में डूबा गाता-बजाता चला जा रहा था. 19 जून की सुबह चार बजे जब आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे के अंतिम छोर की दूरी महज 25 किलोमीटर रह गई थी, उसी वक्त लखनऊ से आगरा की ओर जा रहे स्कूटी लदे कंटेनर के चालक को झपकी आई और कंटेनर एक्सप्रेसवे का डिवाइडर तोड़कर सड़क के दूसरी साइड पहुंच गया. अचानक सामने आए कंटेनर की अखि‍लेश की एसयूवी से सीधी टक्कर हो गई. इससे कार के परखच्चे उड़ गए. कार में बैठे अखिलेश, उनकी पत्नी, बेटी और भतीजी की मौके पर ही मौत हो गई. इस हादसे ने शादी की खुशियों को मातम में बदल दिया.

यह केवल एक परिवार का हाल नहीं, दो दिन बाद 21 जून को हुए हादसे ने पांच परिवारों को कभी न भूलने वाला जख्म दे दिया. इस जख्म की वजह हाइवे पर चलने वालों की नादानी थी जिन्होंने कुछ समय बचाने के लिए अपनी कार को 'रांग साइड' मोड़ दिया था. उत्तराखंड के नैनीताल में रहने वाले इब्राहिम अपने चार दोस्तों के साथ स्विफ्ट कार से हरदोई की बिलग्राम दरगाह में जियारत के लिए जा रहे थे. नैनीताल-लखनऊ हाइवे पर 21 जून की सुबह इज्जतनगर के लालपुर चौराहे के पास एक परिचित के ढाबे पर जाने के लिए इब्राहिम ने कार को 'रांग साइड' ले लिया. दूसरी ओर काफी तेजी से आ रहे ट्रक से कार की सीधी टक्कर हो गई. भीषण दुर्घटना ने कार में बैठे सभी लोगों की जान ले ली.

यह महज दो हादसों की जानकारी भर नहीं है बल्कि कभी अपनी गलती और कभी दूसरे की गलती से होने वाली दुर्घटनाएं सड़क सुरक्षा के दावों को खुली चुनौती दे रही हैं. सड़क पर चलने वालों की लापरवाही की वजह से ही प्रदेश में हर साल 38 हजार सड़क हादसे हो रहे हैं जिनमें औसतन 58 से अधि‍क लोग रोज जान से हाथ धो रहे हैं. केंद्रीय सड़क यातायात और हाइवे मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट 'रोड एक्सिडेंट इन इंडिया 2020' के मुताबिक, नेशनल हाइवे पर होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के मामले में यूपी भले ही तीसरे नंबर पर है लेकिन इन हादसों में होने वाली मौतों के मामले पर प्रदेश का स्थान पहले नंबर पर आता है.

वर्ष 2010 में ऐसे ही एक सड़क हादसे में लखनऊ के संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के जनसंपर्क विभाग में कार्यरत रहे आशुतोष सोती ने अपने बेटे शुभम को खो दिया था. उसके बाद से आशुतोष ने 'शुभम सोती फाउंडेशन' नाम से संस्था बनाई और लोगों को सड़क दुर्घटनाओं से बचाने और जागरूक करने का अभियान शुरू किया. सोती बताते हैं, ''सड़कों के निर्माण में खराब रोड इंजीनियरिंग और बड़े पैमाने पर यातायात नियमों का उल्लंघन प्रदेश में बढ़ते सड़क हादसों और उनमें होने वाली मौतों की वजह है.'' यातायात विभाग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, सूबे में होने वाली दुर्घटनाओं में 71 फीसद हादसों की वजह चालक की लापरवाही है. इनमें से सबसे अधिक 37 प्रतिशत दुर्घटनाएं ओवरस्पीड से होती हैं. बाकी 29 फीसद के लिए रोड इंजीनियरिंग से लेकर वाहन की फिटनेस और अन्य अव्यवस्थाएं हैं. हालात यह है‍ कि सरकार ने बड़े जिलों, हाइवे और एक्सप्रेसवे पर इंटीग्रेटेड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लगा रखा है. यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों का बड़े पैमाने पर ऑनलाइन चालान भी हो रहा है, इसके बावजूद हादसों में उल्लेखनीय कमी नहीं आ पा रही.

हर साल सड़क सुरक्षा के नाम पर चलने वाला सरकारी जागरूकता कार्यक्रम असर क्यों नहीं दिखा पा रहा है? इसकी वजह लखनऊ के क्वींस कॉलेज के पूर्व प्राचार्य आर.पी. मिश्र बताते हैं,  ''यातायात माह में स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम महज खानापूर्ति है. सड़क सुरक्षा और सुरक्षि‍त यातायात को कोर्स का हिस्सा बनाना चाहिए. पहले स्कूल-कॉलेजों को इस बात की जांच करनी चाहिए कि उनके यहां पढ़ने आने वाला छात्र बगैर ड्राइविंग लाइसेंस के वाहन लेकर तो नहीं आ रहा है. अभिभावक भी अपने बच्चों को कम उम्र में वाहन चलाने को दे रहे हैं जो कई बार ओवरस्पीड के कारण हादसों की वजह बन रहे हैं.'' यूपी में सड़क हादसों में सबसे ज्यादा युवाओं की मौत हो रही है. सेवानिवृत्त सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी चंद्रेश श्रीवास्तव बताते हैं, ''ड्राइविंग लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया में मूलभूत सुधार की गुंजाइश है. परिवहन विभाग ड्राइविंग ट्रैक पर गाड़ी चलवाकर लाइसेंस बनवाने से पहले चालक की दक्षता आंकता है लेकिन चालक हाइवे और एक्सप्रेसवे पर वाहन चलाने में कितना दक्ष है, इसकी पड़ताल नहीं होती. यही वजह है कि हाइवे पर वाहनों से दुर्घटनाएं ज्यादा हो रही हैं.''

लर्निंग ड्राइविंग लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया हाइटेक होने के बावजूद दलालों के चंगुल से नहीं निकल पाई है. घर बैठे लर्निंग ड्राइविंग परीक्षा देने की सुविधा शुरू होने के साथ संभागीय परिवहन अधिकारी (आरटीओ) दफ्तर में टेस्ट बंद हो गए हैं. पहले आरटीओ दफ्तर आकर टेस्ट देने वाले आवेदकों में कम से कम एक-तिहाई फेल हो जाते थे लेकिन अब यह आंकड़ा महज पांच से छह प्रतिशत ही बैठ रहा है. चंद्रेश श्रीवास्तव बताते हैं, ''लर्निंग लाइसेंस बनवाने के लिए आवेदक भले ही घर पर कंप्यूटर या लैपटॉप के सामने टेस्ट देने बैठा हो लेकिन टेस्ट दलाल ही देते हैं. कैफे में बैठे दलाल रिमोट ऐप से कंप्यूटर का एक्सेस लेकर आवेदक की जगह ऑनलाइन टेस्ट देते हैं.

सारथी ऐप या परिवहन विभाग के आइटी सेल को इस बात की जानकारी ही नहीं हो पाती है कि सिस्टम को रिमोट ऐप्लिकेशन पर लिया गया है.'' सुविधा शुरू होने के बाद 15 जून तक कानपुर जिले में 3,379 लोगों ने लर्निंग ड्राइविंग लाइसेंस बनाने के लिए ऑनलाइन टेस्ट दिया. इसमें 3,133 (93%) पास हुए और केवल 246 (7%) ही फेल हुए. कानपुर के एआरटीओ प्रशासन सुधीर कुमार कहते हैं, ''लोग एक आइपी एड्रेस से ज्यादा आवेदन न कर सकें और रिमोट ऐप्लिकेशन के जरिए दलाल आवेदक के कंप्यूटर का एक्सेस न ले सकें, इसके लिए योजना तैयार करने की खातिर मुख्यालय को अवगत कराया गया है.''

ड्राइविंग ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की गड़बड़ियां भी सुरक्षित यातायात में रोड़ा हैं. 2018 में सरकार ने प्रदेश के सभी मंडलीय मुख्यालयों में ड्राइविंग ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट बनाने की घोषणा की थी. अलीगढ़ जिले के आइटीआइ परिसर में पांच करोड़ दो लाख रुपए की लागत से मंडलीय ड्राइविंग ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट बनकर तैयार हो गया. मार्च के अंतिम हफ्ते में हैंडओवर से पहले जब परिवहन विभाग की टीम निरीक्षण करने गई तो उसे कई खामियां मिलीं. ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक में न तो सेंसर लगाए गए थे और न ही ब्रिक्स लगी थीं. ट्रैक की चौड़ाई भी मानक से अधिक थी. ऐसे में इस ट्रैक पर कोई भी नौसिखुआ आसानी से पास हो सकता था. अब ड्राइविंग ट्रैक को सुधारा जा रहा है. 

सड़क दुर्घटनाओं के लिहाज से संवेदनशील इलाकों पर प्रभावी निरोधात्मक उपाय न होने से भी हादसों पर रोक नहीं लग पा रही. लोक निर्माण विभाग ने पूरे प्रदेश में अपनी सड़कों पर 495 ब्लैक स्पॉट चिन्हित किए हैं. इनमें से अधि‍कांश ऐसे जंक्शन पॉइंट हैं जहां कोई ग्रामीण मार्ग किसी स्टेट हाइवे या प्रमुख जिला मार्ग में आकर मिलता है. काफी ब्लैक स्पॉट ऐसे भी हैं जो संकरी पुलिया के कारण हादसे का सबब बनते हैं. सीतापुर में नैपालापुर नेशनल हाइवे को जोड़ने वाले बिजवार पुल की पहचान ऐसे ही एक ब्लैक स्पॉट के रूप में है. पिछले दो महीने के दौरान इस पुल पर हादसे में तीन लोगों की जान जा चुकी है. 6 जून को खैराबाद निवासी सौरभ मिश्र बिजवार पुल की बाउंड्रीवॉल से टकराकर नीचे गिर गए जिससे उनकी मौत हो गई. खैराबाद निवासी पुनीत सिंह बताते हैं, ''ब्लैक स्पॉट होने के बावजूद बिजवार पुल पर न तो कहीं कोई गति नियंत्रक लगा है और न ही कहीं खतरा दर्शाने वाला संकेतक.

इसी वजह से हादसे नहीं रुक रहे.'' लोक निर्माण विभाग के एक अधिकारी बताते हैं, ''ब्लैक स्पॉट पर अल्पकालीन उपाय के तौर पर रंबल स्ट्रिप या स्पीड ब्रेकर और साइन बोर्ड की व्यवस्था की जा रही है. स्थाई हल के लिए भी योजना पर काम हो रहा है.'' दीर्घकालीन उपाय के तहत यह देखा जा रहा है कि सड़क की डिजाइन में किस तरह सुधार करके ब्लैक स्पॉट खत्म किए जा सकते हैं. इसमें सड़कों के घुमाव पर गति को नियंत्रित करना और संकरी पुलियों को चौड़ा करना शामिल हैं. हादसों में जनहानि रोकने के लिए हाइवे के किनारे ट्रॉमा सेंटर बनाने की योजना भी फलीभूत नहीं हो पाई है. मैनपुरी जिले के बेवर क्षेत्र में जीटी रोड पर 2.94 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले ट्रॉमा सेंटर का भवन अभी तक आकार नहीं ले पाया है. 14 अगस्त, 2016 को इस ट्रॉमा सेंटर का निर्माण शुरू हुआ था जिसे 13 अगस्त, 2017 तक पूरा किया जाना था लेकिन जमीन के विवाद के चलते इसका निर्माण कार्य लटक गया है.

सड़क हादसों में होने वाली मौतों को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 2014 में गुड सेमेरिटन यानी नेक इनसान योजना शुरू की थी. योजना के अंतर्गत तय हुआ कि ऐसा व्यक्ति जो सड़क पर तड़पते व्यक्ति‍ को अस्पताल में पहुंचाकर भर्ती कराएगा, उसे 'गुड सेमेरिटन' यानी नेक इनसान के तौर पर पुरस्कृत किया जाएगा. पुरस्कार के तौर पर व्यक्ति को पांच हजार रुपए मिलेंगे. आलम यह है कि प्रदेश के 75 जिलों में से 60 से अधिक में पिछले दो वर्षों के दौरान एक भी नेक इनसान की पहचान नहीं हो पाई है. सड़क पर लावारिस लोगों की मदद करने वाली समाजसेवी सुमन एस. रावत बताती हैं, ''परिहवन, स्वास्थ्य और प्रशासन के अधिकारियों की एक कमेटी गुड सेमेरिटन योजना की निगरानी करती है लेकिन तीनों विभागों में परस्पर सामंजस्य न होने से न तो इसके प्रचार-प्रसार पर ध्यान दिया गया है और न ही नेक इनसान की ही पहचान की जा सकी है.''

यातायात व्यवस्था को मजबूत करने और सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर 19 मई से 15 जून तक प्रदेश भर में विशेष अभियान चलाया गया. इस दौरान प्रदेश भर में 1431 अवैध ऑटो, टैक्सी और बस स्टैंड, 3,433 अवैध पार्किग स्थल हटाए गए. अवैध ट्रांसपोर्ट से जुड़े 34 माफियाओं को चिन्हित करते हुए 17 के खि‍लाफ एफआइआर दर्ज कराई गई. ओवर स्पीड वाले 18,119 दो पहिया और 31,062 चार पहिया वाहनों का चालान किया गया. हालांकि प्रदेश में 27 दिन चला यह अभि‍यान सड़क दुर्घटनाओं को रोकने और यातायात नियमों के अनुशासन को दीर्घकालिक ढंग से लागू करा पाने में कितना सफल हुआ, इसकी पुष्टि होना अभी बाकी है.

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