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अब काशी-मथुरा की बारी!

ज्ञानवापी परिसर-शृंगार गौरी मंदिर विवाद में कोर्ट कमिशनर की सर्वे कार्यवाही को जारी रखने का आदेश सुनाया. यह पहला मौका है जब ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़े विवादों के परिप्रेक्ष्य में सबूत जुटाने का काम शुरू होगा.

विवाद की जड़ :  काशी विश्वनाथ धाम का गेट नंबर 4. यहां से प्रवेश करने पर भीतर ज्ञानवापी परिसर की पश्चिमी दीवार पर शृंगार गौरी की आकृति अंकित है.
विवाद की जड़ : काशी विश्वनाथ धाम का गेट नंबर 4. यहां से प्रवेश करने पर भीतर ज्ञानवापी परिसर की पश्चिमी दीवार पर शृंगार गौरी की आकृति अंकित है.
अपडेटेड 16 मई , 2022

उत्तर प्रदेश का राजनैतिक तापमान 12 मई को अचानक बढ़ गया जब हाइकोर्ट ने मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद से जुड़े प्रकरणों का चार महीने के भीतर निबटारा करने का आदेश दिया. हालांकि यूपी की राजनैतिक पार्टियों ने इस विवाद से खुद को सीधे तौर पर अलग रखा है लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी से जुड़े नेता समय-समय पर 'अब मथुरा की बारी’का नारा लगाकर हिंदुत्व के एजेंडे का तड़का लगाने की कोशिश कर रहे थे.

मथुरा मसले पर हाइकोर्ट का फैसला आने के दो घंटे बाद वाराणसी में जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर के भीतर लाल रंग की इमारत में सरगर्मियां बढ़ गईं. यहां पहले तल पर सिविल जज (सीनियर डिविजन) की अदालत ने ज्ञानवापी परिसर-शृंगार गौरी मंदिर विवाद में कोर्ट कमिशनर की सर्वे कार्यवाही को जारी रखने का आदेश सुनाया. यह पहला मौका है जब ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़े विवादों के परिप्रेक्ष्य में सबूत जुटाने का काम शुरू होगा

वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम के गेट संख्या चार के सामने फूल-माला की दुकान लगाने वाले अतुल केसरवानी को इन दिनों काम-धंधे की चिंता सता रही है. अतुल उस वक्त काफी दहशत में आ गए थे जब 6 मई को काशी विश्वनाथ धाम को जाने वाले रास्ते पर पुलिस, पीएसी और सीआरपीएफ के जवानों को पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया गया था.

दुकानें बंद करा दी गई थीं. दोपहर तीन बजे के करीब जैसे ही कोर्ट के आदेश पर कोर्ट कमिशनर ने सर्वे की कार्यवाही शुरू की, बाहर सड़क पर जमा सैकड़ों लोग पक्ष और विपक्ष में नारेबाजी करने लगे. अगले दिन 7 मई को दोबारा सर्वे की कार्यवाही शुरू होने पर ऐसा ही माहौल रहा. अतुल बताते हैं, ''पूरे चार घंटे तक आसपास के इलाके में दहशत का महौल बना रहा. दिसंबर में काशी विश्वनाथ धाम की शुरुआत होने के बाद यहां श्रद्धालुओं की संख्या में काफी इजाफा हुआ है. दो साल कोरोना के चलते व्यवसाय काफी मंदा रहा.

अब जब सब कुछ पटरी पर आ रहा है तब ज्ञानवापी परिसर से जुड़े विवाद के चलते तनाव की स्थि‍ति है. किसी अनहोनी की आशंका के चलते श्रद्धालुओं की संख्या में भी 6 मई से कमी आई, जिसका असर काम-धंधे पर पड़ा है.’’वाराणसी में मैदागिन से गोदौलिया जाने वाली सड़क पर मौजूद हजारों व्यवसायी इन दिनों अतुल जैसी ही आशंका की वजह से अपने धंधे को लेकर चिंतित हैं. 

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के नए स्वरूप काशी विश्वनाथ धाम के गेट संख्या 4 से प्रवेश कर परिसर में सीधे करीब बीस कदम चलने पर बाईं ओर बैरिकेडिंग से घिरी हुई ज्ञानवापी परिसर की पश्चिमी दीवार पड़ती है. बैरिकेडिंग से एक पत्थर का चबूतरानुमा आकार बाहर निकला हुआ है. इसी के निचले हिस्से पर शृंगार गौरी की आकृति उभरी हुई है जिसे लाल रंग से पोत दिया गया है.

इसी शृंगार गौरी की पूजा को लेकर विवाद कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है. इसकी शुरुआत करीब ढाई दशक पहले हुई थी जब वाराणसी के सूरजकुंड निवासी और विश्व हिंदू परिषद के पूर्व महानगर उपाध्यक्ष सोहनलाल आर्य ने 1995 में वाराणसी जिला न्यायालय में याचिका दायर कर शृंगार गौरी के दर्शन-पूजन और सर्वे की मांग की थी. 18 मई, 1995 को अदालत ने सर्वे के लिए कोर्ट कमिशनर नियुक्त किया.

दोनों पक्षों में तनाव के चलते कोर्ट कमिशनर ने कमिशन की कार्यवाही खारिज कर दी. हाइकोर्ट ने भी जिला न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी. सोहनलाल आर्य काशी विश्वनाथ मंदिर और इसके बगल मे मौजूद ज्ञानवापी मंदिर की पुरानी तस्वीरें दिखाते हुए बताते हैं, ''शृंगार गौरी के विग्रह ज्ञानवापी मस्जिद की पश्चिमी दीवार पर स्पष्ट हैं जबकि मंदिर से जुड़े अवशेष परिसर के भीतर मौजूद हैं.’’ 

सोहनलाल की पहल पर ही पांच महिलाओं, दिल्ली की रहने वाली राखी सिंह और वाराणसी की लक्ष्मीदेवी, मंजू व्यास, सीता साहू और रेखा पाठक ने संयुक्त रूप से 18 अगस्त, 2021 को वाराणसी के सिविल जज (सीनियर डिविजन) रवि कुमार दिवाकर की अदालत में याचिका दायर कर श्री काशी विश्वनाथ धाम-ज्ञानवापी परिसर स्थित शृंगार गौरी और अन्य विग्रहों की 1991 से पूर्व की स्थिति की तरह नियमित दर्शन-पूजन की मांग की.

सुनवाई के क्रम में अदालत ने मौके की स्थिति जानने के लिए 8 अप्रैल को अजय कुमार मिश्र को कोर्ट कमिशनर नियुक्त कर कमिशन की कार्यवाही का आदेश दिया. कोर्ट कमिशनर ने 19 अप्रैल को सर्वे करने की तिथि से अदालत को अवगत कराया. इसके एक दिन पहले 18 अप्रैल को प्रशासन ने शासकीय अधिवक्ता के जरिए कोर्ट में आपत्ति दाखि‍ल कर वीडियोग्राफी व फाटोग्राफी पर रोक लगाने की मांग की.

उधर, ज्ञानवापी परिसर की देखरेख करने वाली संस्था अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने भी 19 अप्रैल को हाइकोर्ट में याचिका दाखिल कर कोर्ट कमिशनर की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की. हाइकोर्ट ने याचिका खारिज कर निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा. अगले दिन 20 अप्रैल को सिविल जज (सीनियर डिविजन) की कोर्ट ने सुनवाई पूरी की और 26 अप्रैल को ईद के बाद कमिशन की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया. इसके तहत कोर्ट कमिशनर अजय कुमार मिश्र ने 6 मई से सर्वे शुरू करने की तारीख तय की. 

मिश्र ने जैसे ही 6 मई से कमिशन की कार्यवाही शुरू की तो विवाद बढ़ गया. विश्वनाथ धाम के गेट नंबर 4 के बाहर मौजूद दोनों पक्षों के लोगों ने धार्मिक नारे लगाने शुरू कर दिए और कुछ देर के लिए तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी. इस दौरान मौके पर मौजूद दोनों पक्षों के प्रबुद्ध लोगों ने बीचबचाव कर लोगों को अलग किया. कोर्ट कमिशनर मिश्र के साथ दोनों पक्षों के कुल 28 लोग दोपहर तीन बजे परिसर के भीतर पहुंचे और शाम सात बजे बाहर निकले.

कोर्ट कमिशनर की कार्यवाही पर मस्जिद कमेटी ने सवाल खड़े कर दिए. कमेटी के एडवोकेट अभय नाथ यादव बताते हैं, ''कोर्ट कमिशनर ज्ञानवापी परिसर की दीवारों को उंगली से कुरेद रहे थे जबकि कोर्ट की ओर से किसी भी चीज को कुरेदने या खोदने का आदेश नहीं है.’’ मस्जिद कमेटी से जुड़े लोगों ने सर्वे टीम को परिसर में बैरिकेडिंग से आगे मस्जि‍द में नहीं जाने दिया.

कोर्ट कमिशनर की कार्यवाही से असंतुष्ट मस्जि‍द कमेटी ने इन्हें बदलने की अर्जी सिविल जज (सीनियर डिविजन) रवि कुमार दिवाकर की अदालत में दाखिल की. 12 मई को कोर्ट ने अपने निर्णय में एडवोकेट कमिशनर अजय कुमार मिश्र को हटाने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने विशाल कुमार सिंह को भी कोर्ट कमिशनर नियुक्त किया है. कोर्ट ने आदेश में कहा कि पूरे ज्ञानवापी मस्जि‍द परिसर का सर्वे कराया जाएगा, जिसमें तहखाना भी शामिल है.

इस दौरान वीडियोग्राफी भी कराई जाएगी. कोर्ट ने 17 मई के पहले ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे पूरा करने को भी कहा है. उसने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि वह सर्वे की कार्यवाही को पूरा कराए और जो लोग इसमें व्यवधान डाल रहे हैं उन पर कार्रवाई की जाए. यह पहला मौका है जब ज्ञानवापी मस्जि‍द से जुड़े विवादों के परिप्रेक्ष्य में सबूत जुटाने का काम शुरू होगा. साक्ष्यों की कसौटी पर यह सर्वे मील का पत्थर साबित हो सकता है.

अयोध्या में साकेत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य वी.एन. अरोड़ा बताते हैं, ''ऐसी ही शुरुआत अयोध्या रामजन्मभूमि मामले में भी हुई थी जब फैजाबाद के सिविल जज ने 1 अप्रैल, 1950 को विवादित नक्शा तैयार करने के लिए कोर्ट कमिशनर नियुक्त किया था. राम जन्मभूमि विवाद से जुड़े मुकदमे में हाइकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कोर्ट कमिशनर की रिपोर्ट की चर्चा हुई. यही रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हिस्सा है.’’

ज्ञानवापी परिसर में शृंगार गौरी मंदिर के नियमित दर्शन की मांग करने पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं. ज्ञानवापी परिसर पश्चिमी हिस्से में मौजूद शृंगार गौरी के साथ नंदी, गणेश, गौरीशंकर, तारकेश्वर महादेव, हनुमान जी के मंदिर में पुजारी का जिम्मा वाराणसी का व्यास परिवार संभालता है. इसी परिवार के जितेंद्र नाथ व्यास बताते हैं, ''शृंगार गौरी का दर्शन तो रोज होता है लेकिन उनकी पूजा साल में एक बार वासंतिक चैत नवरात्रि की चतुर्थी को ही की जाती है.

हमेशा से यही परंपरा चली हा रही है. शृंगार गौरी का नियमित पूजन नहीं होता है.’’ 1991 में जब अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर पहुंच रहा था उसी समय वाराणसी में भी काशी विश्वनाथ और ज्ञानवापी मस्जि‍द से जुड़ा विवाद कोर्ट में पहुंच गया था. 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद वाराणसी में ज्ञानवापी परिसर की सुरक्षा कड़ी कर दी गई. पूरे परिसर को बैरिकेडिंग से घेर दिया गया.

विश्वनाथ मंदिर के पास कालिका मंदिर के महंत सुरेंद्र तिवारी बताते हैं, ''1996 में हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के त्योहार एक ही दिन पड़ गए. सुरक्षा की दृष्टि से शृंगार गौरी की तरफ जाने वाले रास्ते को बंद कर दिया गया. इस बाद यह हमेशा के लिए बंद हो गया.’’ काशी विश्वनाथ धाम के बनने के बाद गेट नंबर 4 से गेट नंबर 5 के बीच ज्ञानवापी परिसर के पश्चिमी हिस्से में एक बड़ा रास्ता बन गया, जिससे शृंगार गौरी का दर्शन श्रद्धालुओं के लिए सुलभ हो गया है.

व्यास परिवार के वकील इंदु प्रकाश श्रीवास्तव बताते हैं, ''शृंगार गौरी के श्रद्धालु नियमित दर्शन कर रहे हैं. परंपरा के अनुसार यहां वर्ष में एक बार पूजा भी हो रही है. शृंगार गौरी मंदिर में रोज पूजा होना चाहिए कि नहीं इस पर मंदिर के पुजारी का जिम्मा संभालने वाले व्यास परिवार का पक्ष किसी ने नहीं लिया है. ऐसे में यह मामला कहीं से प्रायोजित लगता है.’’ इस मामले का सियासी कनेक्शन पहले से रहा है.

शृंगार गौरी के नियमित दर्शन पूजन की अनुमति को लेकर विश्व हिंदू परिषद, शिवसेना समेत कई हिंदूवादी संगठन ''शृंगार गौरी मुन्न्ति आंदोलन’’ चला रहे हैं. बीते कुछ वर्षों में शिवसैनिक सावन के महीने में शृंगार गौरी की पूजा करने जाते और पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर चौक थाने ले जाती और फिर वहां से वे रिहा कर दिए जाते. 

उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम-1991 के उपयोग को लेकर भी अलग-अलग दावे हो रहे हैं. तीन दशक पहले देश भर में धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद बढ़ने पर तत्कालीन नरसिंह राव ने 11 जुलाई, 1991 को उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम या प्लेसेज आफ वरशि‍प ऐक्ट लागू किया. इसके मुताबिक, 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्थिति में और जिस समुदाय का था, भविष्य में उसी का रहेगा.

उस वक्त अयोध्या में राम जन्मभूमि प्रकरण हाइकोर्ट में लंबित था, इसलिए उसे इस कानून के दायरे से अलग रखा गया. इंतजामिया कमेटी के वकील अभय नाथ यादव कहते हैं, ''मस्जिद में नमाज पढ़ी जा रही है, ऐक्ट के अनुसार वहां नमाज पढ़ी जाती रहेगी. नीचे तहखाने में कोई पूजा नहीं हो रही थी तो वह नहीं होनी चाहिए. शृंगार गौरी की पूजा साल में एक बार होती थी तो वैसे ही होती रहेगी. ’’

शृंगार गौरी मामले के पैरोकार सोहनलाल आर्य कहते हैं, ''1947 के बाद भी शृंगार गौरी मंदिर में नियमित पूजा हो रही थी. इसी की अब मांग की जा रही है. पूजा न होने देना प्लेसेज ऑफ वरशिप ऐक्ट का उल्लंघन है.’’ सोहनलाल के मुताबिक, सर्वे किसी मंदिर या मस्जिद का नहीं किया जा रहा बल्कि 124 फुट लंबे और 124 फुट चौड़े प्लॉट का सर्वे करने का आदेश कोर्ट ने दिया है.

हिंदू पक्ष के वकील हरिशंकर जैन कहते हैं, ''इस मामले में कानून आड़े नहीं आएगा, क्योंकि अगर इमारत की प्रकृति मंदिर की साबित होती है तो वह मंदिर ही मानी जाएगी. यह साबित किए बगैर कि यह संपत्ति वक्फ की थी, मस्जिद नहीं हो सकती और मंदिर की संपत्ति वक्फ संप‌‌‌त्ति नहीं हो सकती है.’’ 

इस विवाद के बीच श्री काशी विश्वनाथ के नव्य, दिव्य और भव्य धाम के लोकार्पण के बाद यहां श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. लोकार्पण से पहले सामान्य दिनों में जहां श्रद्धालुओं की संख्या रोज 10 से 12 हजार रहती थी, वह बढ़कर अब 35 से 45 हजार पहुंच गई है. ज्ञानवापी परिसर-शृंगार गौरी विवाद के तूल पकड़ने पर यह तेजी कुछ सुस्त पड़ सकती है.

नव वर्ष के पहले दिन साढ़े पांच लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचे जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है.

बढ़ते श्रद्धालुओं से पिछले अप्रैल माह में काशी विश्वनाथ धाम को रिकार्ड 5.45 करोड़ रुपए का का दान चढ़ावे को मिला साथ ही परिसर के बाहर बाजार ने भी तेजी पकड़ी.

 

साल में एक बार पूजा

ज्ञानवापी मस्जिद में नमाज पढ़ी जा रही है वरशि‍प ऐक्ट के अनुसार वहां नमाज पढ़ी जाती रहेगी. नीचे तहखाने में कोई पूजा नहीं हो रही थी तो वह नहीं होनी चाहिए. शृंगार गौरी की पूजा साल में एक बार होती थी तो वैसे ही होती रहेगी. इसमें कोई विवाद भी नहीं है’’

अभय नाथ यादव 
एडवोकेट, अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी

 

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