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खास रपटः गरीब अपात्र, कोठी वाले पात्र

राजस्थान में हजारों आदिवासियों को लैंडलाइन फोन और पक्के घर वाला बता कर उनके आवेदन निरस्त कर दिए गए जबकि रसूखदार लखपतियों के नाम आ गए पात्रता सूची में

अनीता 19 वर्ष, शीना 16 वर्ष उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील का तारावट गांव
उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील के तारावट गांव की अनीता और शीना (फोटो : पुरुषोत्तम दिवाकर)
अपडेटेड 20 मार्च , 2024

राजस्थान के उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील के तारावट गांव में गरीब आदिवासी केशा डांगी का परिवार एक तिरपाल के नीचे रहता है. तिरपाल की ही दीवारें और तिरपाल की ही छत है. ओढ़ने-बिछाने के बिस्तर-बिछौने तीन बक्सों के ऊपर खुले रखे हैं, जिन पर मिट्टी की मोटी परत जमी हुई है. तिरपाल के नीचे एक बैलगाड़ी खड़ी है जिस पर आटा, दाल, नमक, मिर्च जैसे खाने-पीने के सामान और बर्तन रखे हैं. प्रधानमंत्री आवास योजना की आवास प्लस आइडी क्रमांक 13175513 पर केशा का नाम था लेकिन उनके पास पहले से पक्का मकान बताकर उन्हें आवास की पात्रता से बेदखल कर दिया गया. पिछले 20 साल से केशा पक्के मकान के लिए आवेदन कर रहे हैं लेकिन उनका यह सपना अब अधूरा है. केशा की पत्नी चंदरीबाई पक्के मकान की आस लिए इस दुनिया से चली गई. केशा के तिरपाल वाले घर में बेटी अनीता और शीना खाना बनाने की तैयारी में जुटी हैं. अनिता मायूसी से कहती हैं, ''हमारा पक्का मकान तो गांव की सियासत खा गई.'' 

इसी तारावट गांव के अंबालाल का नाम भी प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभार्थी के रूप में अंकित है. गांव में उनकी नीले रंग की आलीशान कोठी है. कोठी के पीछे बड़े से खेत में ट्रैक्टर चल रहा है. उनके घर में फ्रिज, कूलर सहित जरूरत का हर सामान मौजूद हैं. बावजूद इसके आवास स्वीकृत सूची में क्रमांक 206 और आवास प्लस आइडी संख्या149054706 पर अंबालाल का नाम दर्ज है.

 
आदिवासी बने अपात्र
आदिवासी बने अपात्र

ये कहानियां बता रही हैं कि कैसे राजस्थान में प्रधानमंत्री आवास योजना मजाक बन गई है. यह अपवाद भर नहीं हैं. उदयपुर जिले की भींडर तहसील की फुसरिया पंचायत के डामराखेड़ा फलां गांव की गरीब विधवा शांति बाई अपने दो बच्चों के साथ फूस की छत वाले कच्चे घर में रहती हैं. शांति के पति पप्पूलाल मीणा की डेढ़ साल पहले मौत हो गई. शांति बाई ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर के लिए आवेदन किया था, लेकिन सर्वे में उनके पास लैंडलाइन फोन बताकर उन्हें अपात्र घोषित कर दिया गया. अनपढ़ शांति को जब यह बताया गया तो कई दिन तक वे यह नहीं समझ पाईं कि आखिर लैंडलाइन फोन होता क्या है? शांति कहती हैं, ''मैं कदी इस्यो फोन देख्यो ई नी'' (मैंने कभी ऐसा फोन देखा ही नहीं).

राजस्थान में शांति बाई और केशा जैसे हजारों लोग हैं जिन्हें ऐसे ही मनमाने कारण बताकर प्रधानमंत्री आवास योजना से वंचित कर दिया गया. इंडिया टुडे टीम ने राजस्थान के तीन आदिवासी जिलों उदयपुर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा के विभिन्न गांवों की हकीकत जानने कोशिश की. प्रधानमंत्री आवास योजना में तारावाट गांव के एक दो नहीं, बल्कि 70 परिवारों को पक्का मकान बताकर 'अपात्र' घोषित कर दिया गया. इनमें से 42 लोगों के पास पक्का मकान तो दूर फूस के कच्चे जर्जर घर हैं. इसी तरह भींडर तहसील के भोपाखेड़ा गांव में अपात्र किए गए 158 परिवारों में से 70 के पास लैंडलाइन फोन बताए गए हैं, जबकि भोपाखेड़ा में 60 परिवार तो ऐसे हैं जिनके पास लैंडलाइन फोन तो दूर मोबाइल फोन तक नहीं हैं. पूरे भोपाखेड़ा गांव के एक भी घर में लैंडलाइन फोन नहीं है. यहां जिन 60 परिवारों के पक्के घर बताए गए हैं उनमें से 15 परिवार तो ऐसे हैं जो तिरपाल या टूटे-फूटे छप्पर के नीचे रहते हैं.

राजस्थान सरकार की प्रधानमंत्री आवास योजना मार्ग दर्शिका पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और (तत्कालीन) उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट की शानदार तस्वीर छपी है. 2020 के शुरू में छपी इस मार्ग दर्शिका में दर्ज नियम व शर्तों के तहत उन्हीं लोगों को पक्के मकान के लिए पात्र माना जाता है जिनके पास पहले से पक्का घर, दोपहिया, तिपहिया, चौपहिया वाहन, मछली नाव, लैंडलाइन फोन और फ्रिज जैसी सुविधाएं न हों. घर पाने की पात्रता के लिए योजना के इसी तरह के कुल 14 मापदंडों पर खरा उतरना जरूरी है. उसके बाद पात्र परिवारों को पहली किस्त 50 हजार रुपए उनके बैंक खातों में ऑनलाइन डाली जाती है. फिर अगले आठ माह में चार किस्तों के रूप में 1.20 लाख रुपए का भुगतान होगा.

 
आदिवासी बने अपात्र
आदिवासी बने अपात्र

इस योजना के तहत वर्ष 2022 के अंत तक हर व्यक्ति को पक्का मकान दिए जाने का वादा है. राजस्थान में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कुल पंजीकृत परिवारों की संख्या 15 लाख 90 हजार 551 है जिनमें 2 लाख 6 हजार 509 परिवारों को अपात्र करार दिया गया है. सबसे ज्यादा अपात्र आदिवासी जिलों में हैं. डूंगरपुर, उदयपुर, बांसवाड़ा, सिरोही, बारां जिलों में 62 हजार 717 परिवारों के आवेदन निरस्त हुए हैं. पूरे राजस्थान में 24 हजार 214 परिवारों को लैंडलाइन फोन और 13 हजार 658 परिवारों को पक्का घर बताकर प्रधानमंत्री आवास योजना से महरूम कर दिया गया है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि ऑनलाइन डेटा एंट्री में धांधली की वजह से बहुत सारे पात्र परिवारों को पक्का घर नहीं मिल पाया. 

दरअसल, प्रधानमंत्री आवास योजना के तीसरे चरण में वर्ष 2018-19 में ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया शुरू हुई. आवास के लिए आवेदन करने वालों की लोकेशन की जियो टैगिंग की गई. इसके बाद ग्राम पंचायतों के सचिवों और ग्राम पंचायत सहायकों ने जियो टैगिंग का सर्वे किया. असल गड़बड़ इसी वजह से हुई. सूत्र बताते हैं कि जियो टैगिंग में आठ मीटर तक का दायरा होता है. अगर इस दायरे में कोई पक्का मकान नजर आ जाता है तो वह आवेदन अपने आप निरस्त हो जाता है. कई जगह नेटवर्क नहीं होने या अन्य खामियों के चलते भी जियो टैगिंग में लोकेशन की वास्तविक स्थिति पता नहीं चल पाई. तारावट ग्राम पंचायत के सरपंच भैरूलाल गुर्जर का कहना है, ''हमने एक भी परिवार के पक्के घर का आवेदन निरस्त नहीं किया है. यह सब आगे से निरस्त हुए हैं. रही सर्वे की बात तो ये सर्वे मेरे कार्यकाल से पहले हुआ था.'' 

ग्राम सचिवों और सहायकों की ओर से तैयार की गई रिपोर्ट पंचायत समिति के विकास अधिकारी को भेजी गई और वहां से जिला परिषदों के माध्यम से उन्हें ग्रामीण विकास विभाग को भेज दिया गया. वहां उसे आवास प्लस ऐप पर अपलोड कर दिया गया. वर्ष 2020-21 में आवास प्लस ऐप के जरिए प्राप्त आवेदनों की केंद्रीय ग्रामीण विकास विभाग की ओर से अलग से जांच की गई.

शुरुआत में राजस्थान में इस योजना के तहत 23 लाख परिवारों को पक्के मकान के लिए पात्र माना गया. केंद्र सरकार के सर्वे के बाद पात्र परिवारों की संख्या 15 लाख 90 हजार हो गई तथा बाद में 2 लाख 6 हजार परिवारों को फिर से बाहर कर दिया गया. राजस्थान के ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री रमेश मीणा ने बताया, ''केंद्र सरकार की ओर से हटाए गए 2 लाख 6 हजार परिवारों का हमने फिर से सर्वे करवाया है, जिसमें 1 लाख 55 हजार परिवार पात्र पाए गए हैं.'' इस संबंध में राजस्थान के पंचायती राज मंत्री रमेश मीणा ने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गिरिराज सिंह से भी मुलाकात की है.

उधर, उदयपुर जिले के वल्लभनगर क्षेत्र से पूर्व विधायक रणधीर सिंह भींडर ने इसके लिए राजस्थान सरकार को दोषी बताया है. भींडर कहते हैं कि स्मार्टफोन के जमाने में लैंडलाइन फोन और पक्के घर जैसे कारण बताकर आवास निरस्त करना गरीब आदिवासियों के साथ क्रूर मजाक है. भींडर ने राज्य सरकार से मांग की है कि वह अपने खर्च पर गलती से अपात्र घोषित किए गए परिवारों के लिए पक्के आवास बनवाए. भींडर ने चेताया है कि अगर सरकार ने इन परिवारों को पक्के मकान नहीं दिए तो वे इन आदिवासियों के साथ विधानसभा के बाहर धरना देंगे.
 
अमीरों को मिले आवास

यह तस्वीर का एक पहलू है. दूसरा पहलू और भी हैरत में डालने वाला है. प्रधानमंत्री आवास योजना में कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें आलीशान पक्के घर और 40-50 बीघा जमीन वाले लोगों को पात्र मानकर पक्के घर के लिए पैसा जारी कर दिया गया.

उदयपुर जिले के तारावट गांव के नाथूलाल के पास गांव के बीचोबीच करीब 10 हजार वर्ग फुट में बना पक्का मकान और दुकान है. चौपहिया वाहन, खेत और पक्का मकान होने के बाद भी उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना में पक्के मकान के लिए पात्र मान लिया गया. आवास प्लस आइडी पर नाथूलाल का नाम क्रमांक नंबर 147355985 पर अंकित है. इसी तरह भींडर तहसील के खड़ोदा गांव के गोदा पुत्र वगता मेघवाल और तुलसा पुस्करना के दो मंजिला मकान और 30-40 बीघा खेत होने के बाद भी उनके लिए आवास स्वीकृत हो गए.

आवास प्लस आइडी में गोदा का नाम सातवें नंबर और आरजे 26005/2/3249 क्रमांक पर है. उन्हें पात्र मानकर पहली किस्त जारी कर दी गई. तारावट गांव के सरपंच भैरूलाल गुर्जर का कहना है कि उनकी भावी किस्त रोक दी जाएगी. ''जिन लोगों को पक्के मकान होने के बावजूद मकान मिले हैं उनको हम प्रधानमंत्री आवास योजना की किस्त जारी नहीं होने देंगे.'' पात्रता सूची से अमीरों के नाम हटाने की मिसालें पहले से हैं. उदयपुर जिले की गोगुंदा तहसील के देवड़ों का गुढ़ा में छह व्यवसायियों के नाम इस सूची में शामिल हो गए थे, जिन्हें बाद में हटा दिया गया.
 
बनी नहीं छत, पैसा हजम

इंडिया टुडे की पड़ताल में प्रधानमंत्री आवास योजना में स्वीकृत किए गए सैंकड़ों ऐसे आवास नजर आए, जो पूरा पैसा खर्च होने के बाद भी बिना छत के हैं. डूंगरपुर जिले की देवड़ा ग्राम पंचायत के होली का लेमड़ा और हिराता गांव में इन योजनाओं के तहत बनाए गए 100 से ज्यादा घरों पर छत नहीं है. यहां महज 500 मीटर के घेरे में 20 से ज्यादा ऐसे मकान नजर आते हैं जिनमें सिर्फ चारों दीवारें बनी हैं. होली का लेमड़ा गांव के बंशीलाल, जयंतीलाल, कचरा, शंकरलाल, कृष्णलाल, शिवलाल, सुखदेव और धूलेश्वर के मकान कई साल से बिना छत के हैं. कचरा, शिवलाल और सुखदेव के मकान मुख्यमंत्री बीपीएल आवास योजना और बंशीलाल, जयंती, शंकरलाल, कृष्णलाल और धूलेश्वर के मकान स्वीकृत हुए थे. शंकरलाल कहते हैं कि ''मकान के लिए जो पैसा मिला था, उसमें सिर्फ चार दीवारें ही खड़ी हो पाई हैं.'' 

पाड़ला हांडलिया गांव के कचरा खराड़ी की पत्नी रंबा का नाम 2018-19 की प्रधानमंत्री आवास योजना में शामिल हुआ. उनके पक्के मकान और शौचालय बनाने के लिए 1.48 लाख रुपए स्वीकृत हुए. चारों दीवारें ही बनी थीं कि रंबा की बीमारी से मौत हो गई. रंबा की मौत के बाद बाकी पैसा रोक लिए गए. ऐसे में न मकान की पक्की छत बनी और न शौचालय. शौचालय और पक्की छत क्यों नहीं बनवाई? कचरा कहते हैं, ''पत्नी की मौत के बाद एक रुपया भी नहीं मिला तो शौचालय कहां से बनवाता?''

ग्रामीण विकास विभाग के आंकड़े बताते हैं कि सूबे में 1 लाख 23 हजार 906 घर ऐसे हैं जिनका काम डेढ़-दो साल बाद भी पूरा नहीं हो सका. 39 हजार घर ऐसे हैं जो पहली किस्त मिलने के 18 माह बाद भी अधूरे हैं. 1 लाख 5 हजार घर पहली किस्त जारी होने के नौ माह बाद भी पूरे नहीं बन पाए तो 71 हजार घर पहली किस्त जारी होने के 12 माह बाद भी अपूर्ण हैं.

ऐसा नहीं है कि राजस्थान सरकार को इन गड़बड़ियों के बारे में नहीं पता. ग्रामीण विकास विभाग के सचिव के. पाठक ने स्वीकार किया कि सर्वे की गड़बड़ियों की वजह से बहुत सारे लोगों के आवेदन निरस्त हो गए. राज्य सरकार ने इस बारे में केंद्र सरकार को पत्र भेजा है. वे बताते हैं कि कुछ आवेदन सिस्टम की वजह से अस्वीकृत हो गए और कुछ डेटा एंट्री के वक्त गलत जानकारी भरने के कारण निरस्त हुए हैं. पाठक ने जिला कलेक्टरों को केंद्र सरकार की ओर से अपात्र घोषित किए गए परिवारों का पुन:परीक्षण करने के निर्देश दिए हैं.

उन्होंने परीक्षण के दौरान पात्र पाए जाने वाले परिवारों के नामों का ग्राम सभाओं के माध्यम से अनुमोदन कराने और इसे ऐप पर दर्ज करने के लिए कहा है. पाठक से जब कोठी वालों को आवास आवंटित किए जाने के बारे में पूछा गया तो वे चौंके नहीं. उन्होंने कहा कि जिन लोगों के पक्के मकान होते हुए भी नए आवास स्वीकृत हुए हैं और आवास के लिए जिन्हें किस्तें जारी हुई हैं, उनसे जुर्माने समेत पूरी राशि वापस वसूली जाएगी तथा इसके लिए दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. लेकिन बेघर गरीबों का अपना पक्का घर कब होगा? ये यक्ष प्रश्न है.

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