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खास रपटः खतरे में बिहार की सांस्कृतिक धरोहर

पटना संग्रहालय के महापंडित राहुल सांकृत्यायन कक्ष के क्षतिग्रस्त होने से हजारों दुर्लभ व अनमोल तिब्बती पांडुलिपियों की सुरक्षा पर उठे सवाल. अन्य संग्रहालय और पुरातत्व साइट्स झेल रहीं बदहाली.

आलमारियों में कैद धरोहर
आलमारियों में कैद धरोहर
अपडेटेड 18 फ़रवरी , 2022

पुष्यमित्र

तिब्बत में 16 मई (1933) को एक अनमोल चीज हाथ लगी. यह ताड़पत्र की एक पुस्तक थी. पास के एक लामा ने यह पुस्तक इस संदेश के साथ मेरे पास भेजी थी कि इस पुस्तक में क्या है बस इतना बता दें. फिर ये पुस्तक अपने पास रख लें क्योंकि हम तो (यह भाषा) पढ़ना जानते नहीं. मैंने कुटिल अक्षरों (देवनागरी से ठीक पहले 7वीं से 10वीं के बीच पूरे भारत में यही लिपि प्रचलित थी) को देखते ही समझ लिया कि ये 10वीं-11वीं सदी से इधर की पुस्तक नहीं हो सकती.

नाम व्रजडाकतंत्र देखने से ख्याल आया कि ये तो कांग्यूर में अनुवादित है. और अनुवाद भी 11वीं सदी के मध्य में वैशाली के कायस्थ पंडित गंगाधर ने उस शलु मठ के एक बौद्ध भिक्षु की मदद से किया था जहां के लामा ने ये पुस्तक अब मेरे पास भेजी है...हमने याक के चमड़े के बड़े-बड़े थैलों में इन किताबों/चित्रपटों को रखकर उन्हें अच्छी तरह बांधा और गदहों पर लाद कर फ-रो-जोड् के लिए रवाना कर दिया.’’

यायावर और दार्शनिक महापंडित राहुल सांकृत्यायन के (तिब्बत में सवा साल में) लिखे ये शब्द बताते हैं कि तिब्बत से ये दुर्लभ पांडुलिपियां जुटाने में उन्हें कितनी मशक्कतों का सामना करना पड़ा था. सांकृत्यायन ने 1929 से 1938 तक चार बार तिब्बत की यात्रा की. इन यात्राओं के दौरान वे तिब्बती लिपि में लिखीं हजारों पांडुलिपियां और ताड़पत्र ग्रंथ अपने साथ 22 गदहे-खच्चरों पर लादकर पटना लाए.

महापंडित राहुल तिब्बत यात्रा के दौरान वहां मौजूद संस्कृत ग्रंथों के 'फिल्म निगेटिव’, 'ग्लास निगेटिव’ के साथ ही बौद्ध मठों में ताड़पत्र पर लिखीं पांडुलिपियों की तस्वीर भी खींचकर लाए थे. ये उन पुस्तकों की तिब्बती पांडुलिपियां हैं, जो तिब्बती भिक्षु और धर्म का प्रचार करने भारतीय विद्वान नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय से अनुवाद करके तिब्बत ले गए थे. इन पांडुलिपियों को 'जादूघर’ के नाम से पुकारे जाने वाले पटना संग्रहालय के एक कोने में बने 'राहुल कक्ष’ में संरक्षित कर रखा गया है. और करीब नौ दशक से ये पांडुलिपियां पटना संग्रहालय की अनमोल धरोहर हैं. 

लेकिन अब यह धरोहर खतरे में है. इस साल जनवरी के आखिरी दिन इस कमरे की छत का पलस्तर टूटकर गिरने लगा. उसके कुछ हिस्से उस आलमारी पर भी गिरे जिसमें ये पांडुलिपियां संरक्षित हैं. मगर इस घटना के 12 दिन बाद जब इस संवाददाता ने यह सवाल बिहार सरकार के संग्रहालयों के निदेशक दीपक आनंद से पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्हें इस घटना की सूचना तक नहीं है. जाहिर है, उस रोज तक उस भवन की मरम्मत भी शुरू नहीं हो पाई थी. छत का उखड़ा हुआ पलस्तर वैसा का वैसा ही नजर आ रहा था. 

यह बात सच है कि छत का पलस्तर गिरने से इन पांडुलिपियों को खास नुक्सान नहीं हुआ. मगर सबसे दुखद बात यह है कि भारत आने के 84 साल बाद भी ये पांडुलिपियां संरक्षित होकर एक कमरे में बंद पड़ी हैं. इनका अनुवाद और प्रकाशन नहीं हो पाया है. इन 10 हजार पांडुलिपियों में से अब तक बमुश्किल 20-25 ग्रंथों का ही प्रकाशन हुआ है और अधिकतम 50 ग्रंथों का अनुवाद हो पाया है.

इतिहास और धरोहरों से संबंधित शोध के लिए मशहूर संस्थान केपी जायसवाल इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक डॉ. चितरंजन प्रसाद सिन्हा कहते हैं-एक तरह से 10 हजार दुर्लभ ग्रंथ उस छोटे से कमरे में कैद हैं. इनके ज्ञान की रोशनी बाहर नहीं आ पाई है. और किसी को इसकी फिक्र नहीं है.

यह पूरी घटना इस बात को उजागर करने के लिए काफी है कि इस अत्यंत दुर्लभ ज्ञान धरोहर को संभालने और इस ज्ञान को फिर से दुनिया तक पहुंचाने में बिहार या केंद्र सरकार की कितनी दिलचस्पी है. यह मामला सिर्फ इन दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण का ही नहीं है.

इस भवन से कुछ ही दूरी पर अनुग्रह नारायण सिन्हा इंस्टीट्यूट परिसर में गांधी शिविर नामक वह ऐतिहासिक भवन है, जहां आजादी के ठीक पहले महात्मा गांधी कुल 67 दिन ठहरे, वहां का हाल तो इससे भी बुरा है. उस भवन के दीवारों पर काई लग गई है, दरवाजा टूटा हुआ है. उस भवन की जिम्मेदारी लेने के लिए कोई तैयार नहीं है. न एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट और न ही बिहार का कला संस्कृति विभाग. 

सभी 26 संग्रहालय खस्ताहाल

बिहार की ऐतिहासिक विरासतों की संपन्नता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य में केंद्र सरकार और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा संरक्षित नालंदा, राजगीर, बोधगया, विक्रमशिला आदि साइटों के अलावा 54 ऐसी साइट्स हैं, जिनका संरक्षण राज्य सरकार करती है.

राज्य सरकार अलग-अलग जिलों में 26 संग्रहालयों का प्रबंधन करती है, इसके अलावा छह अन्य संग्रहालयों को ग्रांट देती है. यहां बुद्धकालीन मूर्तियों की भरमार है जो हाल तक मनरेगा के तहत होने वाली खुदाई में बाहर आती रही हैं. मगर इन विरासतों की देखरेख की व्यवस्था इतनी लचर है कि सोचकर हैरत होती है. 

राज्य सरकार के इन 26 संग्रहालयों के प्रबंधन का जिम्मा सिर्फ चार संग्रहालयाध्यक्षों के पास है. इनमें से एक-एक संग्रहालयाध्यक्ष के पास पांच से आठ संग्रहालयों तक का जिम्मा है. इन सभी संग्रहालयों में एक भी पूर्णकालिक दीर्घा सहायक या तकनीकी सहायक तक नहीं है. इनके सभी पद खाली हैं, कहीं-कहीं संविदा कर्मियों को रखकर काम चलाया जा रहा है.

दूर-दराज के ज्यादातर संग्रहालयों का चार्ज चतुर्थ श्रेणी के कर्मियों के जिम्मे है. वही इन्हें खोलते और बंद करते हैं. हालांकि विभाग इस बात को स्वीकार नहीं करता मगर इनमें से कई संग्रहालय समय-समय पर कर्मियों के अभाव में बंद रह जाते हैं. 

ऐसा ही एक संग्रहालय है सहरसा जिले का कारू खिरहर म्यूजियम. वर्ष 2004 में इस संग्रहालय का उद्घाटन हुआ था. अगले साल ही वहां से कुछ बेशकीमती मूर्तियां चोरी हो गईं. उसके बाद इस संग्रहालय पर ताला लग गया. संग्रहालय अगले दस साल तक बंद रहा. फिर वहां 2015 में एक कर्मचारी की पोस्टिंग हुई और उसका ताला खुलने लगा.

मगर 2019 में उस कर्मी के रिटायर होने पर फिर से इस संग्रहालय पर ताला लटक गया. 2020 में जब उसी जिले के नेता आलोक रंजन कला एवं संस्कृति मंत्री बने तो 2021 में फिर से संग्रहालय को खोला गया है. इसी तरह सूरज नारायण सिंह और ब्रज बिहारी प्रसाद स्मृति संग्रहालय पर हमेशा ताला लगे रहने की खबरें आती हैं. 

लगभग यही हाल राज्य के आर्कियोलॉजिकल साइट्स का है. पूर्वी चंपारण के लौरिया स्थित अशोक स्तंभ के चारों तरफ हर साल बाढ़ का पानी जमा हो जाता है. वैशाली जो बौद्ध और जैनकालीन विरासतों के लिए मशहूर है, वहां के पुरावशेषों का भी यही हाल है. वहां से खुदाई में मिले बुद्ध के अस्थि अवशेष सुरक्षा के लिहाज से 1972 से राजधानी के पटना संग्रहालय में रखे हुए हैं.

2010 में पटना हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था कि एक साल के अंदर वैशाली में एक संग्रहालय और बुद्धिस्ट सेंटर की स्थापना की जाए और बुद्ध की अस्थियां वहीं रखी जाएं. मगर 12 साल बीतने जा रहे हैं, अभी तक वैशाली में संग्रहालय और बुद्धिस्ट सेंटर का निर्माण पूरा नहीं हो पाया है.

पिछले दिनों इस संवेदनहीनता की तब अति हो गई जब एक फ्लाइओवर के निर्माण के लिए बिहार सरकार दुर्लभ पांडुलिपियों के लिए विख्यात ऐतिहासिक खुदाबख्श लाइब्रेरी के कर्जन रीडिंग रूम को तोड़ने के लिए तैयार हो गई. मगर बाद में जब इसका राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध हुआ तो सरकार ने उस फैसले से अपने कदम वापस खींचे.

इतिहास की प्रोफेसर रह चुकीं और हिंदी-मैथिली की लेखिका उषाकिरण खान कहती हैं, ''काश हम इन विरासतों को सहेज पाते तो इस गरीब राज्य बिहार को पर्यटन से ही काफी धन हासिल हो जाता.’’ मगर लगता है, सरकार ने इस दिशा में अभी गंभीरता से सोचना शुरू नहीं किया है.

क्या है इन तिब्बती ग्रंथों में
राहुल तो फक्कड़ थे. तिब्बत से दुर्लभ ग्रंथ लाने के लिए प्रसिद्ध इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल ने उन्हें आर्थिक मदद दी थी. जायसवाल बिहार रिसर्च सोसाइटी के प्रभारी थे. राहुल ने इन दुर्लभ ग्रंथों को उन्हीं के पास रख छोड़ा था. राहुल तिब्बत से किन खोए हुए अनमोल ग्रंथों को भारत लाए, इसे पहली बार जायसवाल ने ही दुनिया को बताया.

मॉर्डन रिव्यू (1937) में छपे एक लेख में जायसवाल ने बताया कि राहुल पहली बार तिब्बत गए तो और वहां से तिब्बती पुस्तकें, पेटिंग व अन्य साहित्य सामग्री 22 खच्चरों पर लाद कर पटना लाए. उन्होंने 16,000 दुर्लभ श्लोकों की तस्वीरें उतारीं. इतना काफी नहीं था तो उन्होंने 40,000 श्लोकों की नकल उतार ली क्योंकि वे किताबें वे भारत नहीं ला सकते थे. उन्हें तिब्बत में ईसा पूर्व शताब्दी का संस्कृत में लिखा 'विनय पाठ’ मिला.

इसके लेखक मातृचेता थे जो कनिष्क के समकालीन थे. इन्हें भ्रमवश अश्वघोष के नाम से भी जाना जाता था. प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने लिखा है कि मातृचेता के पदों का पाठ नालंदा विश्वविद्यालय में प्रति दिन किया जाता था. राहुल को तिब्बत में नागार्जुन की विग्रह व्यावर्तिनी के 450 श्लोक मिले. आसंग और वसुबंधु चौथी सदी के बौद्ध विद्वान थे.

इनके प्रामाणिक ग्रंथों के श्लोक मिले जो भारत में नहीं थे. राहुल 5वीं सदी के भाव्य, छठी सदी के बौद्ध दार्शनिक धर्मकीर्ति, 10वीं सदी के ज्ञानश्री, जीतारि की दुर्लभ रचनाएं भारत लाए थे. राहुल तिब्बत से ''बड़ा रहस्य’’ और ''तर्क रहस्य’’ नाम की 10वीं सदी की रचनाएं भी लाए जिनके लेखक अज्ञात हैं.  

राहुल द्वारा लाई गई पांडुलिपियों को हम चार हिस्सों में बांटते हैं. पटना संग्रहालय स्थित राहुल कक्ष के प्रभारी शोध सहायक शिवकुमार मिश्र कहते हैं पहला कांग्यूर ग्रंथ है, जो बुद्ध के मूल वचनों की पुस्तक है. दूसरा तांग्यूर है, जिसमें इन वचनों पर उस वक्त के भारतीय विद्वानों की टिप्पणियां और भाष्य हैं. इनकी संख्या 3,500 है. तीसरे नीमा ग्रंथ हैं, जो बुद्ध के उपदेशों पर तिब्बती विद्वानों की टिप्पणियां हैं.

इनकी संख्या 2,466 है. शेष मिश्रित ग्रंथ हैं, जिनमें बौद्ध भिक्षुओं के यात्रा वृत्तांत और उनकी जीवनियां इत्यादि हैं. बताते हैं कि इस पंचवर्षीय योजना में 5,000 हजार ग्रंथों के अनुवाद का लक्ष्य रखा गया था. मगर आधी अवधि बीत जाने पर भी बमुश्किल 40-50 ग्रंथों का ही अनुवाद हुआ है. एक महान खोजकर्ता के परिश्रम का यह सिला! आखिर क्यों?

वैष्णव संन्यासी से बौद्ध बने थे राहुल
हिन्दी को खड़ी बोली का नाम देने वाले बहुभाषाविद् और खोजी दार्शनिक राहुल सांकृत्यायन आजमगढ़ जिले के कनैला गांव में ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे. उनका मूल नाम केदारनाथ पांडेय था. 16 साल की उम्र में संस्कृत पढ़ने बनारस आए और 20 साल की उम्र में वैष्णव धर्म अपनाकर संन्यासी हो गए.

छपरा के एक संपन्न मठ की महंती ठुकराकर संस्कृत शिक्षक बने और फिर श्रीलंका चले गए. तिब्बत की पहली यात्रा (1929) से लौट कर उन्होंने घोषणा की कि ईश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं है. फिर श्रीलंका में 'त्रिपिटक’ का अध्ययन करके उन्होंने 1930 में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया. देशभक्ति और दर्शन उनके खून में था.

बौद्ध धर्म के प्रकांड विद्वान होने के नाते उन्हें 'त्रिपिटकचार्य’ की उपाधि मिली, जबकि बनारस ने उन्हें 'महापंडित’ की पदवी से नवाजा. अपने जीवन में अंतिम वर्षों में वे मसूरी में रहने लगे. फिर वे दार्जिलिंग में जाकर बस गए जहां 1963 में उनका देहांत हुआ.

—पुष्यमित्र

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