
पुष्यमित्र
केस-1
पिछले दो महीने से उनके सिर पर गिरफ्तारी की तलवार लटकी है. मगर वे मेडिकल लीव पर हैं और अपने घर में आराम फरमा रहे हैं. सियासी और मीडिया का बहुत दबाव बना तो उन्होंने अग्रिम जमानत की याचिका डाल दी. अब जब बिहार की निगरानी अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी है, तो सब मान रहे हैं कि उनकी गिरफ्तारी तय है. उन पर 30 करोड़ रुपए से अधिक की राशि की वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोप हैं.
आरोप हैं कि उन्होंने निविदा की शर्तों का पालन कराए बगैर मनमाने तरीके से आपूर्तिकर्ता से आंसर शीट की खरीद की. इसके अलावा, उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड की सेवा प्रदान करने वाली एजेंसी को गलत तरीके से राशि का भुगतान कर दिया. 16 नवंबर, 2021 को राज्य की विशेष निगरानी इकाई ने उनके घर गोरखपुर और बोधगया के दो ठिकानों पर छापेमारी की और लगभग एक करोड़ रुपए की नकद राशि बरामद की.
उसी रोज उनके खिलाफ एफआइआर भी दर्ज कराई गई. वे हैं: बिहार के मगध विश्वविद्यालय के कुलपति (वीसी) डॉ. राजेंद्र प्रसाद. विपक्ष ही नहीं, सत्तापक्ष के भी भारी विरोध के बावजूद राजभवन की ओर से उन्हें अपना पद छोड़ने के लिए नहीं कहा गया था. उनकी जगह पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलपति को मगध विश्वविद्यालय के कुलपति का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है.
इस मामले में विश्वविद्यालय के कुलसचिव, पुस्तकालय प्रभारी, प्रॉक्टर तथा कुलपति के पूर्व पीए को गिरफ्तार किया जा चुका है. हैरानी की बात यह है कि इस घोटाले के मुख्य आरोपी वही हैं, फिर भी उन्हें अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है. इंडिया टुडे के प्रयासों के बावजूद वीसी राजेंद्र प्रसाद इन आरोपों का जवाब देने के लिए उपलब्ध नहीं हो सके.
केस-2
कुछ-कुछ ऐसी ही कहानी ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सुरेंद्र प्रताप सिंह की है. दो माह पहले राज्य के एक अन्य कुलपति प्रो. मोहम्मद कुद्दूस ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखकर सुरेंद्र प्रताप सिंह पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया. मोहम्मद कुद्दूस को अगस्त, 2021 में मौलाना मजहरूल हक़ अरबी-फारसी विश्वविद्यालय, पटना का कुलपति बनाया गया था.

उन्हें पता चला कि उनके पहले विश्वविद्यालय के प्रभारी रहे कुलपति सुरेंद्र प्रताप सिंह ने पटना की एक सिक्योरिटी एजेंसी से 45 सुरक्षाकर्मियों का करार कर लिया है, जिसकी दर पूर्व की दर से 39 फीसद अधिक है. उन्होंने उस एजेंसी को 80 सुरक्षाकर्मियों के भुगतान करने का पत्र भी तैयार करा लिया है. जब उन्होंने इस भुगतान से मना किया तो बिहार राजभवन से उनके पास विजय सिंह और अतुल श्रीवास्तव के नाम से फोन आए और उन्हें इस भुगतान को करने का दबाव बनाया गया.
प्रभारी कुलपति सुरेंद्र प्रताप सिंह ने लखनऊ के एक प्रिंटर से 1.6 लाख आंसर शीट उपलब्ध कराने का करार भी किया था, जबकि विश्वविद्यालय को सिर्फ 40,000 आंसर शीट की जरूरत थी. उस आंसर शीट की दर भी अधिक थी. ऐसे में प्रो. कुद्दूस ने इन तमाम विवरणों के साथ 20 नवंबर, 2021 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एक पत्र लिखा है.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस आरोप को गंभीर मानते हुए यह पत्र राजभवन को भेज दिया था. मगर इन आरोपों के बावजूद सुरेंद्र प्रसाद सिंह के खिलाफ कोई जांच या कार्रवाई नहीं हुई. इसके उलट, उन्हीं दिनों राजभवन में आयोजित एक समारोह में उन्हें राज्य के 'सर्वश्रेष्ठ वीसी’ का चांसलर (कुलाधिपति) अवार्ड दिया गया.
असल में, ये दो मामले बताते हैं कि बिहार के विश्वविद्यालयों में किस हद तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है. वह भी ऊपरी स्तर पर. पिछले साल नवंबर में ही ये मामले सामने आ चुके हैं और राजभवन के साथ-साथ राज्य सरकार पर भी सवाल उठ रहे हैं. यहां तक कि राज्य के पूर्व उप-मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी ने इस मसले पर कुलपति और परोक्ष रूप से राजभवन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.
वे हाल तक सोशल मीडिया पर इस मसले पर लिखते रहे. वहीं, राज्य के शिक्षा मंत्री विजय चौधरी ने राजभवन में आयोजित चांसलर अवार्ड का बहिष्कार कर दिया. मगर ऐसा लगता है कि राजभवन इन दोनों कुलपतियों को बचाने के लिए अडिग है. हालांकि, निगरानी अदालत के फैसले के बाद मगध विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की गिरक्रतारी तो अब तय लग रही है. मगर मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति सुरेंद्र प्रताप सिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है.
मगध विश्वविद्यालय के भ्रष्टाचार के मसले पर सुशील मोदी कहते हैं, ''जिस कुलपति पर भ्रष्टाचार के इतने ऌगंभीर आरोप हों, उन्हें इतने दिनों तक बाहर रहने देना, उनकी गिरफ्तारी की कोशिश न करना ठीक बात नहीं है. खासकर तब जब इस मामले में उन्हीं के विश्वविद्यालय के कई अधिकारी गिरफ्तार किए जा चुके हैं.’’
उनका कहना है कि राजभवन और राज्य सरकार दोनों को इस मामले में तत्काल कदम उठाना चाहिए था तथा खास तौर पर राज्य सरकार को पहल करनी चाहिए थी. वे बताते हैं, ''जिस तरह से उनकी गिरफ्तारी में देरी हुई और उन्हें ऐन्टिसपेटरी बेल लेने की कोशिश करने का मौका मिल गया, उससे सही संदेश नहीं गया. भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति वाली हमारी छवि को नुक्सान पहुंचा.’’
वहीं, राजभवन ने इस मसले पर तेज कार्रवाई करने के बदले राज्य सरकार पर ही सवाल उठा दिए. राजभवन की ओर से जारी एक पत्र में 25 जनवरी, 2022 को कहा गया कि कुलाधिपति की अनुमति के बगैर निगरानी विभाग की कार्रवाई नियमों का उल्लंघन है.
सुशील मोदी का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य में उनकी पार्टी की गठबंधन सरकार है और राज्य के वर्तमान राज्यपाल फागू चौहान भी पहले उनकी ही पार्टी भाजपा से जुड़े रहे हैं. मोदी अपनी टिप्पणी में इन दोनों को कठघरे में खड़ा करते हैं. सिर्फ मोदी ही नहीं, राज्य के ज्यादातर लोग राज्य विश्वविद्यालयों में हाल के वर्षों में फैले इस भ्रष्टाचार के लिए मुख्य रूप से राजभवन को दोषी मानते हैं, मगर साथ ही वे राज्य सरकार को भी बरी नहीं करना चाहते.
बिहार लोकसेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष रामजतन ठाकुर कहते हैं, ''इस पूरे मामले में कुलपतियों का बड़ा दोष मैंने नहीं देखा. असली जिम्मेदारी राजभवन की है. वहां से कुलपति के पद पर गलत लोगों की नियुक्ति होती है. भ्रष्टाचार उजागर होने के बावजूद उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होती. उन्हें संरक्षण दिया जाता है. इतना ही नहीं, राजभवन से कुलपतियों पर भुगतान के लिए दबाव बनाया जाता है.’’
ठाकुर दो मसलों पर खास तौर पर आपत्ति करते हैं. पहला यह कि राज्य में एक कुलपति को ही दो, तीन या चार विश्वविद्यालयों के कुलपति पद का प्रभार दे दिया जाता है. मसलन, सुरेंद्र प्रताप सिंह हाल तक एकसाथ राज्य के चार विश्वविद्यालयों—मिथिला विश्वविद्यालय, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, मौलाना आज़ाद अरबी-फारसी विश्वविद्यालय और आर्यभट्ट विश्वविद्यालय—के प्रभारी थे.
आरोपों के बाद उनसे दो विश्वविद्यालयों का प्रभार जरूर वापस ले लिया गया है, मगर अभी भी वे मिथिला विश्वविद्यालय के साथ-साथ आर्यभट्ट विश्वविद्यालय के कुलपति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. ठाकुर कहते हैं, ''यह नियम विरुद्ध है. कुलपति पूर्णकालिक पद है. इसका प्रभार किसी को नहीं दिया जा सकता.’’ भागलपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. योगेंद्र भी कहते हैं, ''हर विश्वविद्यालय में प्रति कुलपति का पद होता है.
उसका काम ही है कुलपति के न होने पर उनका दायित्व संभालना. उनके न रहने पर डीन और अगर वे भी योग्य न समझे जाएं तो किसी वरिष्ठ प्रोफेसर को यह जिम्मेदारी दी जा सकती है.’’ ठाकुर कहते हैं कि संबंधित विश्वविद्यालय के लोगों को प्रभार न देकर दूसरे विश्वविद्यालय के कुलपति को प्रभारी बनाना नियमविरुद्ध भी है और भ्रष्टाचार की बड़ी वजह भी. वे सुरेंद्र प्रताप सिंह का उदाहरण देते हैं.
ठाकुर यह भी कहते हैं कि राज्य विश्वविद्यालयों की वीसी सर्च कमेटी का चेयरमैन राज्य के किसी कुलपति को बनाना भी ठीक नहीं. यह पद किसी राष्ट्रीय स्तर के शैक्षणिक संस्थान के विद्वान व्यक्ति को दिया जाना चाहिए. विडंबना कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कुलपति सुरेंद्र प्रताप सिंह ही बिहार में वीसी सर्च कमेटी के अध्यक्ष हैं.
दिलचस्प यह कि आरोपों के बाद जिस पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलपति पद का प्रभार उनसे वापस लिया गया, उसके लिए कुलपति का चयन उनकी अध्यक्षता में बनी कमेटी ने ही किया है. ठाकुर राजभवन में फैली अनियमितता को इसका जिम्मेदार ठहराते हैं.
सुरेंद्र प्रताप सिंह के सहयोगी और मिथिला विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार मुश्ताक अहमद पर भी अनियमितता के आरोप हैं. वैसे, सुरेंद्र प्रताप सिंह ने अपने ऊपर लगे आरोपों को बेबुनियाद बताया है. उन्होंने कहा, ''टेंडर प्रक्रिया के बाद की बिल को लेकर ऑर्डर, भुगतान आदि की प्रक्रिया प्रो. कुद्दूस के प्रभार ग्रहण के बाद पूरी की गई. अगर टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी थी तो कुलपति प्रो. कुद्दूस को अधिकार था कि उस टेंडर को निरस्त कर सकते थे, उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया.’’
हालांकि, राज्य के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में भ्रष्टाचार के ऐसे मामले उजागर हो रहे हैं. आंसर शीट की खरीद में अनियमितता की बात पूर्णिया, भागलपुर और छपरा के विश्वविद्यालयों में भी उठी. मुजफ्फरपुर के बिहार विश्वविद्यालय में गेस्ट टीचरों की अवैध नियुक्ति का मामला भी उजागर हुआ. विश्वविद्यालयों में भ्रष्टाचार के मसले पर लगातार मुखर सोशल एक्टिविस्ट ब्रजेश कुमार कहते हैं, ''इसका एक तय ढर्रा है.
राज्य के ज्यादातर विश्वविद्यालयों में आंसर शीट की खरीद लखनऊ के एक फर्म एक्सएलआइसीटी से की जाती है, जिस पर राज्यपाल महोदय के परिवार वालों के साथ नजदीकी होने के आरोप हैं.’’ दूसरी गड़बड़ी सिक्योरिटी गार्ड की तैनाती के नाम पर होती है. तीसरी गड़बड़ी गेस्ट टीचरों की बहाली में है. मुजफ्फरपुर के बिहार विश्वविद्यालय में तो एक ऐसा मामला सामने आया जहां एक विश्वविद्यालय कर्मी शहर के ही एल.एस. कॉलेज में अतिथि शिक्षक की नौकरी भी कर रहा था.
उसे दो जगह से भुगतान हो रहा था. ब्रजेश कहते हैं कि इसके अलावा खेलकूद और आइटी सामग्री की आपूर्ति, कॉलेजों को मान्यता और फर्जी डिग्री की खरीद-फरोख्त के नाम पर भी बड़ी गड़बड़ियां होती हैं. उनके मुताबिक, इसकी वजह यह है कि कुलपति अपने संस्थान के सर्वेसर्वा हैं और उनके पास अरबों रुपए का बजट होता है, जिसका ढंग से ऑडिट तक नहीं होता.
मगध विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार का मामला सामने आने पर राज्य सरकार के शिक्षा विभाग ने महालेखाकार से सभी विश्वविद्यालयों का ऑडिट करने का आग्रह किया. तब पता चला कि उनका ऑडिट कई वर्षों से नहीं हुआ है, जबकि कई विश्वविद्यालयों का सालाना बजट दस अरब रुपए से ज्यादा का है.
ऐसे में अगर चांसलर आंखें मूंद लें, या वहीं से संरक्षण हो तो विश्वविद्यालयों का भ्रष्टाचार के केंद्रों में बदल जाना स्वाभाविक है. इन सबका असर उसकी शैक्षणिक गतिविधियों पर पड़ता है. बिहार के विश्वविद्यालय पहले से ही सत्र में देरी और अच्छी पढ़ाई न होने के कारण बदनाम हैं. अब वे और पिछड़ रहे हैं. प्रोफेसर योगेंद्र कहते हैं, ''स्थिति यह हो गई है कि कुलपति या कोई सक्षम अधिकारी उन फाइलों में कोई दिलचस्पी नहीं लेता जिनमें पैसे का बड़ा मामला न हो.
दूसरी संचिकाएं पड़ी रहती हैं, खासकर अकादमिक काम की. मेरे विश्वविद्यालय में ही ऐसी सैकड़ों संचिकाएं पड़ी हैं.’’ इसके अलावा जब कुलपति ईमानदार नहीं होते तो निचले स्तर के कर्मचारियों को भी भ्रष्टाचार की खुली छूट मिल जाती है. पेंशन, बकाया राशि, भवन निर्माण आदि में कर्मचारी भी पैसे उगाहने में लिप्त हो जाते हैं.
हालांकि पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी नहीं मानते कि राज्य विश्वविद्यालयों में फैले भ्रष्टाचार के लिए सिर्फ राजभवन जिम्मेदार है. वे कहते हैं, ''इस अपराध से राज्य सरकार को किसी सूरत में बरी नहीं किया जा सकता. जो मामले उजागर हुए हैं, उससे जाहिर है कि असली वजह कुलपतियों का गलत चयन है.
उनके चयन के लिए बनी कमेटी के तीन सदस्यों में एक राज्य सरकार का प्रतिनिधि होता है और चांसलर उसकी नियुक्ति नियमानुसार बिहार के सीएम से प्रभावी संपर्क के बाद करते हैं. जाहिर है कि सब कुछ मुख्यमंत्री की सहमति से होता है, फिर वे कैसे इस अपराध से बरी हैं. अगर उनकी सहमति नहीं है, तो फिर उन्होंने विरोध क्यों नहीं किया.’’
वे यह भी कहते हैं, ''मगध विश्वविद्यालय के कुलपति की गिरफ्तारी में जितना वक्त लगा, वह भी यह जाहिर करता है कि राज्य सरकार ने इस मसले में ढीला रवैया अपनाया. वरना क्या निगरानी टीम गोरखपुर में उनके घर जाकर उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकती थी. अगर विश्वविद्यालयों के खर्चे का नियमित ऑडिट नहीं हो रहा है, तो यह किसकी गलती है, इसलिए राज्य सरकार को इस मसले से बरी नहीं किया जा सकता.’’
राजभवन के खिलाफ लगे आरोपों को लेकर इंडिया टुडे ने 16 जनवरी, 2022 को एक विस्तृत मेल राजभवन सचिवालय में भेजा. मगर इस खबर को लिखे जाने तक उसका कोई जवाब नहीं आया. 25 जनवरी को गवर्नर के प्रिंसिपल सेक्रेटरी को फोन करने पर उनके दफ्तर से बताया गया कि कोरोना की वजह से अभी आधे-आधे लोग ही दफ्तर आ रहे हैं, इसलिए जवाब देने में देरी हो रही है.
यह भी कहा गया कि विश्वविद्यालयों के भ्रष्टाचार के मसले पर कार्रवाई की जा रही है. उधर, वीसी राजेंद्र प्रसाद सिंह के बारे में विशेष निगरानी इकाई के एक अधिकारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि उनकी गिरफ्तारी की कोशिश चल रही है.
मिथिला विश्वविद्यालय के वीसी सुरेंद्र प्रताप सिंह और रजिस्ट्रार मुश्ताक अहमद को बर्खास्त करने की मांग करते हुए दरभंगा में छात्रों ने रेल रोको अभियान तक चलाया है. लेकिन उन पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. जाहिर है, ऊपरी स्तर तक जड़ जमाए बैठे इस भ्रष्टाचार पर लगाम लगती नहीं नजर आ रही.
आमने-सामने
सरकार और राजभवन
बिहार राजभवन ने राज्य विश्वविद्यालयों में निगरानी विभाग के सीधे हस्तक्षेप को नियमों का उल्लंघन बताया है. 25 जनवरी, 2022 को राज्यपाल के प्रधान सचिव रॉबर्ट एल चोंगथू ने बिहार सरकार के मुख्य सचिव को इससे संबंधित एक पत्र लिखा. इस पत्र में उन्होंने लिखा है कि बिहार के विश्वविद्यालयों में राज्य की विशेष निगरानी इकाई की ओर से सीधे जांच की जा रही है, जो न सिर्फ नियम-विरुद्ध है, बल्कि यह कुलाधिपति (जो राज्यपाल होते हैं) के अधिकारों में हस्तक्षेप भी है. उनकी अनुमति के बगैर जांच नहीं की जा सकती. इसे तत्काल रोका जाए. यह भी कहा गया कि इससे राज्य के विश्वविद्यालयों में भय का माहौल बन रहा है.
ऐसे होता है भ्रष्टाचार
आंसर शीट की खरीद: भ्रष्टाचार के ज्यादातर मामले इसी से जुड़े हैं. ज्यादातर विश्वविद्यालय लखनऊ की एक फर्म से आंसर शीट की खरीद करते हैं. वह फर्म अलग-अलग विश्वविद्यालयों को अलग-अलग दर पर आंसर शीट मुहैया कराती है. पेमेंट नहीं होने पर राजभवन से दबाव बनाया जाता है. महंगी ओएमआर शीट की खरीद का चलन बढ़ा है
सिक्योरिटी गार्ड की तैनाती: इसकी एजेंसी भी अमूमन तय है, जो अधिक दर पर सिक्योरिटी गार्ड मुहैया कराती हैं. भले सेवा कम गार्ड की मिले, भुगतान अधिक गार्ड का करने के लिए दबाव बनाया जाता है
गेस्ट शिक्षकों की नियुक्ति: बिहार विश्वविद्यालय और मिथिला विश्वविद्यालय में ऐसे मामले सामने आए. अपात्र लोगों को बहाल किया जाता है. एक व्यक्ति को दो जगह से भुगतान का मामला भी
कॉलेजों को मान्यता: विश्वविद्यालयों के पास कॉलेजों को मान्यता देने का अधिकार है. इसमें पैसों का बड़ा लेन-देन होता है. पूर्वी चंपारण के ढाका में ऐसा ही एक मामला सामने आया जिसमें मिडल स्कूल में बीएड कॉलेज संचालित हो रहा था
फर्जी सर्टिफिकेट का घोटाला: दूसरे राज्यों में बिहार के विश्वविद्यालयों की फर्जी डिग्रियां काफी पकड़ी जाती हैं. आरोप है कि इसमें विश्वविद्यालय के कर्मी भी शामिल होते हैं
अन्य खरीद: लाइब्रेरी और खेल की सामग्री की खरीद में भी खूब अनियमितता होती है

