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खास रपटः गोबर का कारोबार

छत्तीसगढ़ की गोबर खरीद योजना से हजारों गौ पालकों की अंटी में आई ज्यादा आमदनी, सामाजिक फायदों का वादा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उछाल अलग से.

अपडेटेड 27 दिसंबर , 2021

गौकल्याण के नाम पर राजनैतिक होड़ में पार्टियां अपनी हुकूमत वाले राज्यों में विभिन्न नीतियां और कार्यक्रम लेकर आईं. लेकिन कांग्रेस की हुकूमत वाला छत्तीसगढ़ एक कदम आगे निकल गया. पिछले साल जुलाई में उसने एक ऐसी योजना लॉन्च की जिससे उसके गौपालक गोबर से पैसा कमा सकें.

गोधन न्याय योजना के पीछे इरादा यह था कि गौ पालकों से गोबर खरीदकर उनकी आमदनी बढ़ाई जाए. अब भूपेश बघेल सरकार इसे राज्य में रासायनिक खाद की कमी को देखते हुए वर्मीकम्पोस्ट या केंचुआ खाद बनाने की योजना बता रही है. गोबर से बनाई जाने वाली चीजों में विविधता लाकर पेंट, फिनाइल और गौ काष्ठ (उपले या कंडे, दाह संस्कार में भी काम आते हैं) सरीखी चीजें बनाने की योजनाएं भी चल रही हैं.

गोधन न्याय योजना के पीछे राज्य सरकार की नरवा-गरुवा-घुरवा-बाड़ी परियोजना की प्रेरणा है. इसका मकसद ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना है. गोधन योजना के तहत होने वाले कामों का केंद्र गौठान (गौशालाएं) हैं. बघेल सरकार का मनसूबा कुल 10,569 गौठान—मोटे तौर पर राज्य की हर पंचायत में एक गौठान—बनाने का है. 30 नवंबर तक 7,777 गौठान बन चुके थे.

खास रपटः गोबर का कारोबार
खास रपटः गोबर का कारोबार

योजना ऐसे काम करती है 
सरकार गौठान को गांवों की संपत्ति की तरह देखती है. भला क्यों नहीं, आखिर ये समुदाय की जमीन पर बनाए गए हैं और तरह-तरह की आर्थिक गतिविधियों को सहारा दे सकते हैं. गोधन न्याय योजना के प्रबंध निदेशक एस. भारतीदासन कहते हैं, ‘‘गांव की कुछ जमीनों पर स्थानीय रसूखदारों ने अतिक्रमण कर लिए थे. गौठानों के लिए जमीनों की पहचान करते वक्त इनमें से कई जमीनें मुक्त करवाकर हासिल की गईं.’’

छत्तीसगढ़ में करीब 9,50,000 गौ पालक हैं. गोधन योजना के तहत पंजीकृत 2,73,966 गौ पालकों में से 1,92,144 सरकार को दो रुपए किलो की तय दर से गोबर बेच चुके हैं. गौठानों से गोबर इकट्ठा करने और उससे केंचुआ खाद बनाने का काम महिलाओं के स्व-सहायता समूह (एसएचजी) करते हैं.

खाद बनाने में 45-60 दिन लगते हैं. एक किलो गोबर से करीब 400 ग्राम खाद बनती है. इसे नर्सरियों में इस्तेमाल के लिए 10 रुपए किलो के हिसाब से सरकारी महकमों को बेचा जाता है. सबसे बड़ा हिस्सा किसानों को मिलता है. मसलन, पिछले खरीफ सीजन में 2.7 लाख क्विंटल खाद प्राथमिक कृषि साख समितियों (पीएसी) के जरिए किसानों को बेची गई. 

खास रपटः गोबर का कारोबार
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इस बिक्री से कमाए हर 10 रुपए में से 3 रुपए 70 पैसे अपने कामों के संचालन के लिए स्व-सहायता समूहों को मिलते हैं. 50 पैसे पीएसी को जाते हैं. जुलाई 2020 से राज्य सरकार ने 114 करोड़ रुपए में 57 लाख क्विंटल गोबर खरीदा. इससे बनाई गई 9.3 लाख क्विंटल केंचुआ खाद में से 6.7 लाख क्विंटल (करीब 73 फीसद) खाद बेची गई.

यह तकरीबन पूरी की पूरी सरकारी विभागों और किसानों से मिलकर बने एकाधिकार वाले बाजार को बेची गई. भारतीदासन कहते हैं, ''अब हमारा इरादा केंचुआ खाद को खुले बाजार में बेचना है. इसके लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (मंशा पत्र) आमंत्रित किए गए हैं. खुले बाजार में कम्पोस्ट की कीमत 15 रुपए से 64 रुपए किलो तक है, इसलिए हमारी कीमत काफी प्रतिस्पर्धी होगी.’’

गौठानों को राज्य सरकार वित्तीय सहायता देती है. हरेक गौठान को ट्यूबवेल और उन्हें चलाने के लिए सोलर पैनल सरीखे बुनियादी ढांचे के लिए 12 लाख रुपए देना तय किया गया है. वर्मीपोस्ट टैंक और पशु-सुरक्षा खंदक (पशुओं को बाउंड्री वॉल खड़ी किए बगैर रखने के लिए) सरीखी दूसरी जरूरतों के लिए मनरेगा से पैसा दिया जाता है.

राज्य सरकार के सूत्रों का कहना है कि 7,777 गौठान स्थापित करने पर करीब 233 करोड़ रुपए (प्रति गौठान 3 लाख रुपए) खर्च किए गए. हरेक गौठान को कामकाजी खर्चों के लिए 10,000 रुपए महीना मिलता है. इसमें से ज्यादातर चारे की ढुलाई चुकाने में जाता है. (देखें: रायपुर मॉडल)

अफसरों का कहना है कि उत्पादों में विविधता लाकर गौठान आज नहीं तो कल आत्मनिर्भर हो ही जाएंगी. मुख्यमंत्री बघेल के कृषि सलाहकार प्रदीप शर्मा कहते हैं, ''केंचुआ खाद गोबर से बनने वाली महज एक चीज है. गौठान गांवों की बेहतरीन प्रथाओं के मॉडल हैं. हम उन्हें अंतत: ग्रामीण उद्योग के केंद्रों की तरह विकसित करना चाहते हैं.’’ शर्मा दावा करते हैं कि 7,777 में से 2,029 गौठान आत्मनिर्भर हो चुके हैं.

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उत्पादों में विविधता लाने की योजना के तहत सरकार ने गोबर से पेंट बनाने के लिए जयपुर की कुमारप्पा नेशनल हैंडमेड पेपर इंस्टीट्यूट से हाथ मिलाया है. ईंट और दिये भी बनाए जाने वाले हैं. गौठानों की गतिविधियों का दायरा बढ़ाकर उसमें सब्जियां उगाने और मछली तथा मुर्गीपालन भी शामिल किया जा रहा है.

पशु प्रजनन विकास कार्यक्रम के तहत गौठान की गायों में गिर और सहिवाल नस्लों के साथ कृत्रिम गर्भाधान करवाया जाता है. दुर्ग के प्रजनन कार्यक्रम के प्रभारी पशु चिकित्सक डॉ. सी.पी. मिश्र कहते हैं, ''जब स्वदेशी गायों का गिर की स्वदेशी नस्ल के साथ गर्भाधान कराया जाता है, तो बाद की हरेक पीढ़ी (की गाय) दोगुना दूध देती है.’’

इसे गांवों की खुशहाली से जोड़ने के अलावा कांग्रेस सरकार ने गायों के कल्याण का अपना संदेश भी इसमें एहतियात से पिरोया है. गोधन योजना लॉन्च करते वक्त बघेल ने छत्तीसगढ़ राज्य गौसेवा आयोग बनाने का ऐलान किया. इसकी कमान दो बार कांग्रेस के विधायक रह चुके और व्यापक जनसमर्थन रखने वाले महंत रामसुंदर दास के हाथ में है.

वे कहते हैं, ''भूपेश बघेल सच्चे गौसेवक हैं. गौवंश को ऐसा सहारा छत्तीसगढ़ में पहले कभी नहीं मिला.’’ वे हाल में दुर्ग जिले के मतवारी गांव की गौठान गए. वहां उन्होंने लोगों से गौठान को सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बनाने की अपील की. उन्होंने कहा, ''अपने जन्मदिन और वर्षगांठ यहां मनाएं. चारा जलाएं नहीं, उसे गायों के लिए दान कर दें.’’ गौठानों के अपने दौरे वे प्रार्थना और वैदिक भजनों से शुरू करते हैं और 'गौ माता की जय’ के नारे से खत्म करते हैं.

आमदनी में बढ़ोतरी
सरकार को उम्मीद है कि गोबर की खरीद से अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और अनुसूचित जातियों (एससी) को रुपए-पैसे का फायदा होगा. ज्यादातर गौ पालक इन्हीं समुदायों के हैं. करीब 48 फीसद लाभार्थी ओबीसी, 41 फीसद एसटी और 8 फीसद एससी हैं. इनमें 45 फीसद औरतें हैं. योजना ने कुल 88,000 भूमिहीन ग्रामीणों को गुजर-बसर का सहारा दिया है.

आर्थिक फायदे अलबत्ता एक समान नहीं हैं. इनमें किशन यादव सरीखी सफलता की कहानियां भी हैं. यादव मतवारी की गौठान में काम कर रहे ग्वाले हैं. वे कहते हैं, ''मैं और मेरा भाई रोज 200 किलो गोबर इकट्ठा करके गौठान को बेचते हैं. पिछले एक साल में हमने करीब 30,000 रुपए कमाए.’’ दूसरे गांव वाले इतने खुशकिस्मत नहीं रहे. मतवारी में गोबर खरीदने के काम में लगे 12 सदस्यीय अर्पण स्व-सहायता समूह की सेक्रेटरी सरोज साहू कहती हैं, ''गोबर बड़ी तादाद में तब तक इकट्ठा नहीं किया जा सकता जब तक गायें गौठान सरीखी एक जगह पर बंधी न हों.’’

साहू किसान परिवार की हैं. खबरें आईं कि सरकारी एजेंसियों से रासायनिक खाद खरीदने गए किसानों को केंचुआ खाद का 30 किलो का बोरा खरीदने के लिए 'मजबूर’ किया गया. वे कहती हैं, ''रासायनिक खाद की जगह केंचुआ खाद खरीदने के लिए कहने से हम नाराज थे. मगर कम्पोस्ट खुले बाजार में बिकने लगेगी तो कम ही लोग इसकी कोई शिकायत करेंगे.’’

बघेल को लगता है कि केंचुआ खाद ही आगे का रास्ता है. वे कहते हैं, ''देश भर में रासायनिक खाद की कमी ने किसानों को आत्महत्या तक के लिए मजबूर किया है. केंचुआ खाद से खाद की कमी दूर हो सकती है, साथ ही मिट्टी की सेहत भी बेहतर होगी.’’ मुख्यमंत्री महीने में दो बार गोधन योजना की निगरानी करते हैं.

कृषि मंत्री रवींद्र चौबे कहते हैं कि इस पहल पर अच्छी प्रतिक्रिया मिली है. वे दावा करते हैं, ''चार संसदीय टीमों के अलावा राजस्थान और झारखंड के अफसर देखने आए. यहां तक कि केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री मनसुख मांडविया ने भी हमारे मॉडल की तारीफ की.’’

अफसरों का कहना है कि गोधन न्याय योजना से खेतों पर धावा बोलने वाले आवारा मवेशियों की परेशानी से भी छुटकारा पाने में मदद मिल रही है. 2015 की पशुगणना के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में 1.32 करोड़ मवेशी थे, जिनमें से 3,80,000 आवारा थे. अफसरों का दावा है कि डेढ़ साल पहले गोधन योजना लॉन्च होने के बाद सड़कों पर आवारा मवेशी करीब 20 फीसद कम हुए हैं. अलबत्ता ऐसा कोई डेटा नहीं है जिससे वाहन दुर्घटनाओं में भी कमी आने का पता चलता हो.

विपक्ष प्रभावित नहीं
भाजपा छत्तीसगढ़ की गोधन योजना को महज झांसा करार देकर खारिज कर देती है. पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं, ''रायपुर से बाहर निकलें तो आपको सड़कों पर यहां-वहां पसरी गायें दिख जाएंगी. सरकार को गोबर बेचने वालों को समय पर पैसा ही नहीं मिला. सरकार मीडिया को चुनकर इक्के-दुक्के मॉडल गौठान दिखा रही है.’’

भाजपा के छत्तीसगढ़ के आरटीआइ (सूचना का अधिकार) प्रकोष्ठ ने सितंबर में अर्जी दाखिल करके रायपुर में गोधन योजना के लाभार्थियों का ब्योरा मांगा. रायपुर नगर निगम ने जो नाम बताए, उनमें जाहिरा तौर पर लाखों रुपए का सैकड़ों क्विंटल गोबर बेचने वाले कुछ लोग भी थे. भाजपा आरटीआइ प्रकोष्ठ के मुखिया विजय शंकर मिश्र घोटाले का आरोप लगाते हुए कहते हैं, ''रायपुर के 10 जोन में डेयरी पशु पालने की इजाजत नहीं है.

हमने बड़े लाभार्थियों की औचक जांच की. आरटीआइ के जरिए दिए गए पतों पर उनमें से कई मिले ही नहीं. जब पशु रखने की ही इजाजत नहीं है, तो यह गोबर आ कहां से रहा है?’’ वे यह भी कहते हैं, ''गायों से दूध तो कम या ज्यादा अलग-अलग निकल सकता है, पर शायद गोबर नहीं. साल भर गोबर की बिक्री एक जैसा क्यों नहीं है?’’

इंडिया टुडे ने गौ पालक सुरजीत सिंह से संपर्क किया. आरटीआइ के जवाब के मुताबिक, सुरजीत ने करीब 3,540 क्विंटल गोबर बेचा और उनके खाते में 7,07,380 रुपए जमा हुए. उन्होंने कहा कि वे 200 गायों की डेयरी के मालिक और गोधन योजना के तहत पंजीकृत हैं, मगर यह योजना ''फ्लॉप’’ थी. सुरजीत ने कहा, ''सरकार ने शुरुआत में मुझसे गोबर खरीदा, पर बाद में पाबंदियां लगाने लगी. 1 अप्रैल के बाद मैं गोबर नहीं बेच पाया—उन्होंने खरीदने से इनकार कर दिया.’’

लगता है, गोबर रायपुर में 'हथियार’ भी है. भाजपा के आरटीआइ प्रकोष्ठ के सदस्य जयराम दुबे के ऊपर 16 नवंबर को रायपुर में गोबर फेंका गया. दुबे ने ही आरटीआइ की वह अर्जी दाखिल की थी. उन्होंने इस हमले के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है.

कम ही लेवाल
बघेल रासायनिक खाद की जगह जैविक या केंचुआ खाद अपनाने पर जोर देकर अच्छा ही कर रहे हैं. मगर इसका अर्थशास्त्र शायद ज्यादातर किसानों के लिए कारगर न हो. रायपुर के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने रासायनिक खाद की जगह प्रति एकड़ 6-8 क्विंटल जैविक खाद डालने की सिफारिश की है.

इसकी लागत प्रति एकड़ करीब 8,000 रुपए पड़ेगी. ढुलाई और मजदूरी अलग. रासायनिक खाद डालकर किसान प्रति एकड़ 1,500 रुपए में अपनी फसलों को उतनी ही नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश दे सकता है. यह सही है कि कम्पोस्ट मिट्टी में ज्यादा वक्त टिकती है, पर इसकी लागत इतनी ज्यादा है कि किसान खाद बदलने को भला क्यों प्रेरित महसूस करे. 

गोबर का काफी वजन होता है. लिहाजा ढुलाई की लागत भी काफी होती है. इसीलिए दो रुपए किलो गोबर बेचना शायद कइयों के लिए फायदेमंद न हो. फिलहाल 19 फीसद विक्रेता सांस्थानिक डेयरी मालिक हैं. बाकी अलग-अलग लोग हैं. साफ है कि कुछ इने-गिने लोगों ने ही गोबर की बिक्री से ढेरों धन कमाया है. यही नहीं, बड़े पैमाने पर चीजें बनाने और उन्हें खुले बाजार में बेचने के लिए स्व-सहायता समूहों को मदद और सहारे की जरूरत है. गोबर भले प्रकृति की देन हो पर जरूर नहीं कि छत्तीसगढ़ को कुदरत ने उद्यमिता भी दी हो. 

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