scorecardresearch

खास रपटः तमिल सभ्यता की खोज

तमिराबरानी नदी घाटी में हाल की पुरातात्विक खोजों से इस अंचल में यही कोई ईसा पूर्व 1200 के आसपास एक जटिल सभ्यता के उत्थान का पता चलता है

धरोहर की तलाश शिवगलै में उत्खनन वाली खाइयों का ऊपर से लिया गया चित्र; (नीचे) शिवगलै में जस का तस रखा मिला अस्थि कलश
धरोहर की तलाश शिवगलै में उत्खनन वाली खाइयों का ऊपर से लिया गया चित्र; (नीचे) शिवगलै में जस का तस रखा मिला अस्थि कलश
अपडेटेड 8 अक्टूबर , 2021

तमिलनाडु के पुरातत्व आयुक्त रामलिंगम शिवानंतम 27 अगस्त को मायामी (अमेरिका) स्थित बीटा एनैलिटिक टेस्टिंग लैबोरेटरी से आई रिपोर्ट को देखकर हक्के-बक्के रह गए. लैबोरेटरी ने थूडुकुड्डी जिले के शिवगलै से खुदाई में मिले एक अस्थि कलश के अवयवों की रेडियोकार्बन डेटिंग की थी और यह रिपोर्ट उसी के बारे में थी. रिपोर्ट इस नतीजे पर पहुंची कि कलश के अवयव, जिनमें चावल और मिट्टी भी थे, ईसा पूर्व 1155 के थे, यानी उस समय तमिलनाडु में एक कृषि सभ्यता फूल-फल रही थी. यह दिलचस्प खबर देखते ही देखते पूरे महकमे में फैल गई. शिवानंतम ने रिपोर्ट तमिलनाडु के पुरातत्व सलाहकार प्रोफेसर के. राजन के साथ साझा की, जिन्होंने इसे राज्य के पुरातत्व मंत्री तंगम तेन्नारासु तक बढ़ा दिया और उन्होंने फिर इस बारे में मुख्यमंत्री एम.के. स्तालिन को सूचित किया.

स्तालिन ने 9 सितंबर को जब तक राज्य विधानसभा में इसका खुलासा नहीं किया तब तक रिपोर्ट को राज ही रखा गया. उन्होंने कहा, ''निष्कर्षों से यह बात साबित हुई है कि पोरुनै (आज की तमिराबरानी) नदी घाटी सभ्यता 3,200 साल पुरानी थी. वैज्ञानिक तरीके से यह स्थापित करना सरकार का काम है कि भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास तमिल भूभाग से शुरू होना चाहिए.'' इस खोज और राज्य में कई स्थलों पर हुई खोजों से उस इतिहास पर रोशनी पड़ रही है जो उत्तर पश्चिम के ज्यादा जाने-माने सिंधु घाटी सभ्यता के स्थलों की छाया में ढक गए हैं (देखें: धरोहर वाली जगहें और निकल रहे आंखें खोलने वाले निष्कर्ष).

तमिल सभ्यता की खोज
तमिल सभ्यता की खोज

पुरातात्विक खोजों की पहचान या उनके सही समय का पता लगाना अक्सर मुश्किल काम होता है. अलबत्ता कुछ खोज इतिहास की हमारी समझ को आमूलचूल बदल देती हैं. शिवगलै से मिला कलश इनमें से एक है. यह हाल की दूसरी खुदाइयों में शिवगंगलै जिले के कीलाड़ी से मिली प्राचीन कलाकृतियों से 600 साल ज्यादा पुरानी है. इसी तरह कीलाड़ी, आदिचनल्लूर, शिवगलै, कोरकै, कोडुमनाल, मयिलादुंपरै और गंगैकोंडाचोलपुरम सहित दूसरे कई स्थलों पर खुदाई से भारतीय प्रायद्वीप में एक स्थापित सभ्यता, उसके नगरों और खेती-किसानी के आविर्भाव की अनुमानित तारीख कहीं ज्यादा पहले की साबित होती रही है. आदिचनल्लूर ईसा पूर्व 950 का है और पोरुनै के मुहाने पर प्राचीन बंदरगाह कोरकै ईसा पूर्व 785 का है. ताजातरीन खोज के बाद पुरातत्वविद् और इतिहासकार अब मानते हैं कि करीब 3,000 साल पहले पोरुनै के आसपास एक उन्नत सभ्यता फली-फूली थी, जिसमें आदिचनल्लूर और शिवगलै इनसानी बस्तियां थीं और कोरकै एक महत्वपूर्ण बंदरगाह हुआ करता था.

शिवगलै के अस्थि कलश के काल निर्धारण से पता चलता है कि इस क्षेत्र में ईसा पूर्व 12वीं सदी में चावल की खेती होती थी. दूसरी प्राचीन कलाकृतियों से यह भी संकेत मिलता है कि उस समय यहां लोहे का काम उन्नत ढंग से किया जाता था. साथ ही रांगे, कांसे और सोने की वस्तुओं का मिलना और उस समय के अत्यधिक विकसित रीति-रिवाज उस सभ्यता के उन्नत स्तर की गवाही देते हैं.

राजन कहते हैं, ''अनुष्ठान, श्मशान का आकार और श्मशान की चीजों की बड़ी तादाद—जिनमें पोरुनै नदी घाटी से मिली मिट्टी की कृतियां, लोहे और सोने की चीजें और दूसरी कलाकृतियां भी हैं—बताती है कि उस वक्त खास किस्म के शिल्पी थे, जो व्यवस्था में बंधे समाज में रहते थे. भित्ति चित्रों की निशानियां और दमिली (जिसे तमिल-ब्राह्मी या ब्राह्मी लिपि के भिन्न रूप तमिलि के रूप में भी जाना जाता है) लिपि में उत्कीर्ण मिट्टी के टूटे बर्तन लिखने की प्रणाली की मौजूदगी का भी संकेत देते हैं.''

धरोहर वाली जगहें और निकल रहे आंखें खोलने वाले निष्कर्ष
धरोहर वाली जगहें और निकल रहे आंखें खोलने वाले निष्कर्ष

स्थापित सभ्यता

नए तथ्यों के उद्घाटन के बारे में बताते हुए राजन कहते हैं कि पोरुनै नदी के नजदीक माइक्रोलिथिक औजारों (पत्थर से बने छोटे औजारों) की खोज बताती है कि कई हजार साल पहले यहां इनसान आबाद थे. पोरुनै नदी के किनारे लौह युग के कई स्थलों की खोज से कृषि आधारित परिपक्व सभ्यता के होने का पता चलता है. पहले मिली प्राचीन कलाकृतियां इस सभ्यता के विकास के स्तर की गवाही देती हैं. इनमें लंबी दूरी के समुद्री व्यापार, मिट्टी के बर्तन बनाने, खनन और धातुओं की ढलाई की विशिष्ट तकनीकों के इस्तेमाल, अनूठी और विस्तृत अंत्येष्टि व्यवस्थाओं और सबसे ज्यादा उत्कीर्ण मिट्टी के बर्तनों के प्रमाण शामिल हैं.

तेन्नारासु कहते हैं, ''आदिचनल्लूर में मिली प्राचीन कलाकृतियों से साबित होता है कि जो लोग यहां रहते थे, वे लौह अयस्क, पिटवां लोहे, ढलवां लोहे और कच्चे लोहे सहित हर प्रकार के लोहे के काम में माहिर थे और यह भी संभव है कि उन्होंने समुद्र में जाने वाली नावें बना ली हों.'' 2014 से कीलाड़ी में हुई खुदाई से तमिलनाडु के प्राचीन अतीत के एक अध्याय का खुलासा हुआ, जिसने इस लोक मान्यता को झुठला दिया कि इस इलाके में नदी तट पर बसी कोई सञ्जयता नहीं थी और ब्राह्मी लिपि पूरी तरह मौर्यों से निकली थी. प्रमाणों से सिद्ध हुआ है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी जितने पहले वैगई नदी के किनारों पर एक साक्षर समुदाय फला-फूला.

पोरुनै नदी सभ्यता की गूंज दो सहस्राब्दी पुराने संगम युग के साहित्य में भी सुनाई देती है, जो पहली और दूसरी ईस्वी सदी में लिखा गया. तमिल अध्येता और जर्नी ऑफ अ सिविलाइजेशन: इंडस टू वैगई के लेखक आर. बालकृष्णन बताते हैं, ''संगम साहित्य में कोरकै का बंदरगाह के तौर पर 11 जगहों का जिक्र है.'' दूसरा उदाहरण उन नामों का है जो संगम युग के साहित्य में भी मिलते हैं और प्राचीन कलाकृतियों पर भी उत्कीर्ण हैं. बालकृष्णन कहते हैं, ''शिवगलै में तमिलि में 'अतन' नाम से उत्कीर्ण मिट्टी के बर्तन का टुकड़ा मिला है. यही नाम कीलाड़ी में भी मिट्टी के बर्तनों पर तमिलि में उत्कीर्ण मिला है.'' प्राचीन कलाकृतियों और अभिलेखों की खोज से तमिल संस्कृति की पुरातनता का भौतिक प्रमाण मिलता है, जो पहले केवल संगम साहित्य से स्थापित था.

राज्य के पुरातत्व विभाग का लक्ष्य आगे पोरुनै नदी घाटी सभ्यता का विशद अध्ययन करना है. यह एक बहुआयामी काम होगा, जिसमें नदी के बहने की दशा-दिशा, समुद्र तल में उतार-चढ़ाव, मॉनसून के पैटर्न, मिट्टी की उर्वरता, औद्योगिक गतिविधि और प्राचीन स्थलों के भीतर और उनके बीच क्षेत्रीय सांस्कृतिक संबंधों का विश्लेषण किया जाएगा. इस सभ्यता के पैमाने और स्वरूप की थाह लेने के लिए इसमें मोतियों के लिए गोताखोरी, सिंचाई प्रौद्योगिकी और कांस्य तथा लोहे के काम की क्षमताओं सरीखे प्रौद्योगिकीय नवाचारों का अध्ययन भी होगा. शिवानंतम कहते हैं, ''खुदाइयों का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में सबसे शुरुआती बस्तियों का पता लगाना है, ताकि लौह युग और आरंभिक ऐतिहासिक संस्कृति और उसके पारगमन की संभावनाओं को समझा और तमिल-ब्राह्मी लिपि के विकासक्रम का अध्ययन किया जा सके.''

सिंधु घाटी से रिश्ता

ये पुरातात्विक खोजें इस बात पर जोर देती हैं कि भारत के प्राचीन अतीत के बखान में बड़े सुधार की जरूरत है. कुछ इतिहासकार सिंधु घाटी सभ्यता के भौतिक प्रमाणों और दक्षिण भारत के पुरातात्विक स्थलों से खोजे गए भौतिक प्रमाणों में समानता देखते हैं. वे कहते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता और दक्षिण भारत तथा श्रीलंका की सभ्यताओं के बीच भाषाई संबंध रहा हो सकता है. भौतिक प्रमाणों में समानता की बात करें, तो इनमें नारी की एक छोटी-सी मूर्ति (जिसे मां देवी की मूर्ति माना गया है) भी है, जो सिंधु घाटी सभ्यता स्थल से मिली एक अन्य मूर्ति से आश्चर्यजनक ढंग से मिलती-जुलती है. उस समय इस्तेमाल की जाने वाली तांबे की मिश्रधातुओं में भी समानताएं हैं.

2004-05 में आदिचनल्लूर स्थल की खुदाई की अगुआई करने वाले टी. सत्यमूर्ति इसे दक्षिण भारतीय संस्कृति का नाभिकेंद्र स्थल कहते हैं. इसके वे कई कारक बताते हैं, जैसे इसका नदी किनारे होना, खनन और धातु ढलाई की अत्यंत विकसित तकनीकें, चिकनी चूरा (शुद्ध) मिट्टी का इस्तेमाल और मिट्टी के छोटे-छोटे बर्तनों पर विकसित सजावट. अहम खोजों में कुम्हारों की गोल भत्तियां, प्रार्थनाघर, सोने के आभूषण, कांसे के बर्तन और लोहे की वस्तुएं तथा हथियार हैं.

राजन कहते हैं, ''पुरातात्विक स्थलों को उनकी ज्यादा बड़ी पृष्ठभूमि में देखने और आंकने की जरूरत है. हमें पुरातात्विक क्षेत्र से निकली हर प्राचीन कलाकृति का अध्ययन करके उसका सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य स्थापित करना होता है. मसलन, मेट्टूर के नजदीक तेलुंगानूर और मंगाडू स्थल लोहे के काम का सबसे शुरुआती समय ईसा पूर्व 1800 बताते हैं. कीलाड़ी दमिलि (तमिल-ब्राह्मी) का सबसे शुरुआती समय ईसा पूर्व छठी शताब्दी बताता है.

यह भारत में ब्राह्मी से उत्कीर्ण मिट्टी के बर्तनों का अब तक उपलब्ध सबसे पुराना समय है. पूरे देश में हमने प्राकृत-ब्राह्मी से उत्कीर्ण 100 से भी कम मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े देखे, जबकि तमिलनाडु में और खासकर कोडुमनाल में तमिल-ब्राह्मी से उत्कीर्ण 1,000 से ज्यादा मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े मिले हैं.'' विशाल ईंट के ढांचों के अवशेष स्थल के शहरी स्वरूप की तरफ इशारा करते हैं, जिनसे कपड़ा उद्योग, तमिल-ब्राह्मी से उत्कीर्ण मिट्टी के बर्तनों, उत्तर भारत के औसत मूल्य वाले रत्नों, मानकीकृत बांट और हाथी दांत के पासों सरीखी विलासिता की चीजों के होने का पता चलता है.

देखना होगा नई रोशनी में

पुरातत्वविदों और इतिहासकारों का कहना है कि प्राचीन भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया का अध्ययन केवल गंगा के मैदानों की सभ्यता पर ध्यान केंद्रित करके नहीं किया जा सकता. कीलाड़ी और शिवकलै की खोजों में दमिलि लिपि की पुरातनता के सबूत मिलने के साथ तकरीबन उसी वक्त तमिलनाडु में शहरी ढांचों के प्रमाण बढ़ते जा रहे हैं. हड़प्पा काल के भारत के बाद का कालक्रम तय करने की पद्धति पर इसके असर पड़ेंगे ही.

हड़प्पा सभ्यता के स्थान का दक्षिण की तरफ खिसकना पुरातात्विक तौर पर साबित सचाई है. लोथल, धौलावीरा और देसलपुर सरीखे स्थल इसके गवाह हैं. हड़प्पा और हड़प्पा के बाद की सबसे धुर दक्षिणी सीमा 1960 के दशक के बाद से अभी तक महाराष्ट्र के दाइमाबाद में ठहरी है. हो सकता है पुरातात्विक इच्छा न होने की वजह से ऐसा हो. बालकृष्णन सवाल करते हैं, ''वर्ना इस उदासीनता की क्या वजह है कि एलेग्जेंडर रिया (ब्रिटिश पुरातत्वविद् जिन्होंने 1800 के दशक के आखिरी सालों और 1900 के शुरुआती सालों में दक्षिण भारत में काम किया था) के 100 साल बाद भी आदिचनल्लूर का अध्ययन नहीं किया गया. यह इस तथ्य के बावजूद कि इसके अहम सुराग 1904 जितना पहले मौजूद थे.''

मगर कुछ लोग ताजातरीन खोजों की व्याख्याओं में एहतियात बरत रहे हैं. कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में साउथ एशियन आर्कियोलॉजी के एमेरिटस प्रोफेसर दिलीप के. चक्रवर्ती कहते हैं, ''दक्षिण में मिले शुरुआती मिट्टी के बर्तनों पर चित्रों की ढेरों निशानियां मिली हैं. एक मान्यता हालांकि यह है कि कुछ मामलों में ये सिंधु लिपि से मेल खाते हैं, लेकिन इस मान्यता की गहरी छानबीन नहीं हुई और यह बहुत कमजोर नींव पर टिकी है.'' वे यह भी कहते हैं, ''यह संभव है कि कीलाड़ी कुछ हद तक संगम काल का निरूपण करता हो. मुझे निजी तौर पर लगता है कि संगम साहित्य से 500 ईस्वी के आसपास की जीवनस्थिति की झलक मिलती है.''

तमिलनाडु की पुरातात्विक खुदाई की आगे की कोशिशों के पहले चरण में केरल के अब पत्तनम के रूप में जाने वाले प्राचीन मुसिरि बंदरगाह का अध्ययन किया जाएगा. इसी तरह के अध्ययन आंध्र प्रदेश के वेंगी, कर्नाटक के तलैकाडु और ओडिशा के पलूर में भी किए जाएंगे, जहां तमिल-ब्राह्मी अभिलेख मिले हैं. इनमें अंतरराष्ट्रीय स्थल भी हैं. तमिल लिपि वाले मिट्टी के बर्तन मिस्र और ओमान में भी पाए गए हैं. मिस्र के कसीर-अल-कदीमी और पर्निका एनेक्के में और ओमान के खोर रोरी में अध्ययन किए जाएंगे, ताकि इन स्थलों के साथ व्यापार के प्राचीन तमिल संबंध स्थापित किए जा सकें. इस काम में इन देशों के पुरातत्वविदों को साथ लिया जाएगा. इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया और वियतनाम सरीखे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भी अध्ययन किए जाएंगे.

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पुरातत्व विज्ञान के प्रोफेसर रवींद्र एन. सिंह कहते हैं, ''हाल की खुदाइयों से उन सालों के दौरान सांस्कृतिक कायापलट की अच्छी तस्वीर उभरकर आती है. इनसे पता चलता है कि भारत दूसरी सहस्राब्दी ईस्वी से पहले सांस्कृतिक तौर पर अच्छी तरह जुड़ा था.'' मगर आरंभिक ऐतिहासिक काल से पहले इस क्षेत्र में संस्कृति के विकास के बारे में बहुत कम समझा गया है. इस लिहाज से कीलाड़ी अनुसंधान में निर्णायक मोड़ था. तमिल विश्वविद्यालय तंजावुर में समुद्री इतिहास और समुद्री पुरातत्व शास्त्र विभाग के प्रमुख डॉ. डी. सेल्वाकुमार कहते हैं, ''तमिलनाडु और केरल, कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश में नवपाषाण संबंध और लौह युग की शुरुआती आबादियों के अनुसंधान की जरूरत है ताकि हमारी समझ बेहतर हो सके.''

राजन और भी आगे देखते हैं. वे कहते हैं कि तमिलनाडु और दूसरे दक्षिणी राज्यों में मिल रहे नए प्रमाणों के आधार पर भारत के इतिहास को ही नए सिरे से लिखने की जरूरत है.

Advertisement
Advertisement