
पिछले साल 25 मार्च को जब भारत में दुनिया के सबसे कठोर लॉकडाउन में से एक लगाया गया, कारोबार पर इसका असर इतना जबरदस्त था कि 40 वर्षों में पहली बार अर्थव्यवस्था मंदी में चली गई. अब जब देश कोविड-19 की दूसरी लहर से जूझ रहा है और सक्रिय मामले हर दिन तेजी से बढ़ रहे हैं (31 मार्च को 5,52,566), आशंका बढ़ गई है कि अर्थव्यवस्था में बीते छह महीनों में हुई बहाली भी नेस्तनाबूद न हो जाए.
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के गवर्नर शक्तिकांत दास ने 25 मार्च को भरोसा जताया कि कोविड की दूसरी लहर आर्थिक बहाली में रुकावट नहीं डालेगी और अर्थव्यवस्था केंद्रीय बैंक के 2021-22 के पूर्वानुमान के मुताबिक 11 फीसद की रफ्तार से बढ़ती रहेगी. मगर उद्योगों से जुड़े विशेषज्ञों को लगता है कि कोविड की इस लहर की तीव्रता अर्थव्यवस्था की सामर्थ्य का इम्तिहान लेगी और यह सामर्थ्य इससे तय होगी कि भारत अपनी आबादी और अहम कार्यबल के सबसे बड़े हिस्से यानी 20-60 आयु समूह के लोगों को कितनी तेजी से टीके लगा पाता है.
अभी तक कहीं लॉकडाउन का ऐलान नहीं हुआ है और केंद्र ने यह तय करने की जिम्मेदारी राज्यों पर छोड़ दी है कि पाबंदियां किस हद तक लगाई जाएं. पंजाब, महाराष्ट्र और गुजरात कोविड के प्रकोप के अपने बदतरीन दौर से गुजर रहे हैं. भारत के जीडीपी में महाराष्ट्र और गुजरात का मिलाकर 22 फीसद योगदान है. दोनों राज्यों में बढ़ते मामलों और ज्यादा पाबंदियों की आशंका ने न केवल कारोबार बल्कि व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर दिया है.
कई राज्यों ने होली के दिन इकट्ठा होने पर पाबंदियों का ऐलान किया. उद्धव ठाकरे की सरकार ने पूरे महाराष्ट्र में 28 मार्च से रात का कक्रर्यू लगा दिया. होटलों, मॉल और रेस्तरां सहित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को शाम 7 बजे अपने को बंद करना पड़ रहा है. इन पाबंदियों की मार पहले ही जर्जर फूड और रेस्तरां कारोबार पर पड़ेगी और संगठित खुदरा कारोबार पर भी, जो मंदी के कई महीनों बाद लोगों के आने में बढ़ोतरी बता रहा था. अगर कोविड के मामले बढ़ते हैं तो महाराष्ट्र को आखिरकार फिर लॉकडाउन लगाना पड़ सकता है.

धीमी बहाली
देशव्यापी लॉकडाउन ने ज्यादातर क्षेत्रों के कारोबार को भारी नुक्सान पहुंचाया. कृषि को उतना नुक्सान नहीं हुआ क्योंकि इसका ज्यादा कामकाज ग्रामीण क्षेत्रों में है, पर मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र को लॉकडाउन में कामकाज जारी रखने की छूट के बावजूद भारी मार सहनी पड़ी. फैक्ट्रियों में काम करने वाले हजारों प्रवासी मजदूर अपने गांव-घरों के लिए निकल गए, जिसका असर उत्पादन पर पड़ा, सप्लाइ चेन अवरुद्ध हो गई और सड़कों पर ट्रकों की लंबी कतारें लग गईं.
सप्लाइ चेन की दिक्कतों, मांग में कमी और खुदरा दुकानों के बंद होने से उद्योग और खासकर ऑटोमोबाइल तथा इससे जुड़े क्षेत्र लडख़ड़ा गए. ऑटोमोटिव इंडस्ट्री के इतिहास में पहली बार अप्रैल 2020 ऐसा महीना था जब वाहनों की बिक्री शून्य रही. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने अगस्त 2020 में कहा कि लॉकडाउन की कीमत 1.9 करोड़ वैतनिक नौकरियों से चुकानी पड़ी है, नौकरियां देने वाले एक और बड़े क्षेत्र अनौपचारिक सेक्टर को लगे झटके की बात ही क्या कहें. अर्थव्यवस्था नकारात्मक वृद्धि में धंस गई. 2020-21 की पहली तिमाही में जीडीपी 23.9 फीसद संकुचित हुआ.
जून 2020 से छिटपुट आर्थिक गतिविधियां फिर शुरू हुईं जिससे बाद के महीनों में मैन्युफैक्चरिंग में सुधार आया, लेकिन सेवा क्षेत्र की जद्दोजहद जारी रही. गतिविधियों में इस उछाल की झलक दूसरी तिमाही की वृद्धि में दिखाई दी जब अर्थव्यवस्था बहाली के साथ बढ़कर -7.5 फीसद पर आ गई. इस बहाली की अगुआई मैन्युफैक्चरिंग ने की, जिसमें पिछली तिमाही के 38 फीसद के मुकाबले संकुचन 2.1 फीसद था. जैसा कि कई विशेषज्ञों ने अनुमान बताया था, तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था में और सुधार आया और इसने 0.5 फीसद की वृद्धि हासिल की.
दूसरी लहर के लिए तैयारी
फिलहाल इस बात का अंदाज लगाना जल्दबाजी होगी कि कोविड की दूसरी लहर अर्थव्यवस्था पर कितना असर डालेगी. मगर कारोबार पिछले तजुर्बे से सबक लेकर इसके संभावित असर से खुद को सुरक्षित रखने के उपाय कर रहे हैं. भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी के चेयरमैन आर.सी. भार्गव कहते हैं, ''कोविड की दूसरी लहर ने अब तक तो हम पर असर नहीं डाला है.
मगर हम अपने स्टाफ, वितरकों और वेंडरों पर बार-बार जोर डाल रहे हैं कि कोविड के नियम-कायदों का कड़ाई से पालन करें.’’ कार्यस्थल पर सुरक्षित दूरी रखना हो या दुकानों/दफ्तरों को सैनिटाइज करना या सारे समय मास्क पहनना, कारोबार सुरक्षा नियमों के कठोर पालन पर जोर दे रहे हैं.
जहां तक सप्लाइ चेन की बात है, उद्योग महामारी के पहले कुछ महीनों के अनुभव से बेहतर समृद्ध हैं. कंपनियां वैकल्पिक विक्रेताओं की पहचान कर रही हैं. लागत पर नियंत्रण रखने की कोशिश भी है, चाहे वह कच्चे माल की खरीद हो, सप्लाइ चेन की साज-संभाल या रोजमर्रा का कामकाज हो. भार्गव कहते हैं, ‘‘हम अपने विक्रेताओं पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं और वे महामारी में हुए अपने अनुभव से जानते हैं कि उनके और हमारे लिए क्या अच्छा है.’’
दवाई, किराने का सामान, फल और सब्जियों सरीखी अनिवार्य चीजों की आपूर्ति में लगे लोगों को छोड़कर पूरा खुदरा क्षेत्र लॉकडाउन से तहस-नहस हो गया था. फर्म अब मौजूदा संकट के लिए तैयारी कर रही हैं. संगठित खुदरा क्षेत्र की शीर्ष संस्था रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सीईओ कुमार राजागोपालन कहते हैं, ‘‘हमें चीजों के फिर गड़बड़ होने का अंदेशा है. हमने अपने कारोबार को चलाते रहने के लिए वैकल्पिक योजनाएं बनाई हैं. हम पूरी तरह तैयार हैं.’’
बीते पूरे साल प्रतिकूल हालात से गुजरते हुए इस क्षेत्र ने खुद को बचाए रखने की अपनी क्षमता को निखारा है. राजागोपालन कहते हैं, ‘‘ज्यादातर खुदरा कारोबारी अब कहीं ज्यादा पारंगत हैं कि लागत में कहां और कैसे कटौती करनी है, स्टॉक को लेकर कैसे नए सिरे से मोलभाव करना है और कैसे बिल्कुल समय पर स्टॉक के मौजूद रहने का इंतजाम करना है.’’
रिटेल फर्म नजदीक आ रहे संकट से पार पाने के लिए ऑनलाइन कारोबारी रणनीति भी विकसित कर रही हैं. अनौपचारिक क्षेत्र ऑर्डर लेने और सीधे घरों पर सामान पहुंचाने के लिए व्हाट्सऐप सरीखे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने लगा है. संचार के ऐसे साधन लॉकडाउन की स्थिति में कारोबार को चलाते रहने में बेहद मददगार होंगे.
एक अहम चुनौती राज्यों की तरफ से लाए जा रहे विभिन्न किस्म के अलग-अलग नियमों के साथ तालमेल बैठाना है. इन नियम-कायदों में से कुछ तो अजीबोगरीब हैं. राजागोपालन बताते हैं, ‘‘पंजाब में मॉल के भीतर एक वक्त 100 से ज्यादा लोगों को आने की इजाजत नहीं है जबकि सिनेमा हॉल में 200 लोग बिठाए जा सकते हैं.
विडंबना कि कई जगह सिनेमा हॉल मॉल के भीतर हैं.’’ वे यह भी कहते हैं कि उद्योग ऐसी मुश्किलों के बीच काम करना तेजी से सीख रहा है, ‘‘उद्योग ने एक चुस्त-फुर्तीला बिजनेस मॉडल विकसित कर लिया है और खुद को दुबला-पतला बना रहे हैं.’’ वे किराए कम करवाने के खातिर मकान मालिकों से नए सिरे से मोलभाव करेंगे. भर्ती रणनीतियों की पड़ताल की जाएगी. मसलन, ज्यादा ठेका कामगारों को लिया जाएगा.
नौकरियों पर संकट
राज्य कोविड की पाबंदियों को कड़ा करते हैं तो इसकी सबसे ज्यादा चपेट में नौकरियां आएंगी. राजागोपालन अनुमान जताते हैं, ‘‘अगर एक स्टोर हफ्ते में दो दिन भी बंद रखा जाता है तो कर्मचारियों का छठा हिस्सा बेकार और अनुपयोगी हो सकता है.’’ वे कहते हैं कि बाजारों और मॉल के कुल कारोबार का करीब 45 फीसद हक्रते के आखिरी दो दिनों में आता है और इसलिए सप्ताहांत की बिक्री पर कड़ाई बरतना विनाशकारी होगा.
मॉल में दाखिल होने से पहले खरीदारों का तुरत-फुरत ऐंटीजन टेस्ट करवाने का महाराष्ट्र सरकार का फैसला हतोत्साहित करने वाला हो सकता है. यह न केवल खरीदारों को मॉल में आने से हतोत्साहित करेगा, बल्कि प्रति टेस्ट 250 रुपए की कीमत भी, जो खरीदार या मॉल को चुकानी होगी, उन्हें आने से रोकेगी.
जिस एक और बात ने कारोबारों को भौचक्का कर दिया है, वह है कोविड के देशव्यापी टीकाकरण अभियान की धीमी रफ्तार. सरकार ने 16 जनवरी को जब टीके लगाने का कार्यक्रम शुरू किया, कोविड के मामले आहिस्ता-आहिस्ता कम हो रहे थे और देश में रोज 15,000 से कम नए मामले आ रहे थे. मार्च आते-आते मामले तेजी से बढऩे लगे. 28 मार्च को भारत में कोविड के 62,714 मामले आए, जो करीब पांच महीनों में एक दिन की सबसे तेज वृद्धि थी.
28 मार्च तक करीब 6 करोड़ लोगों को टीके लगाए जा चुके थे और सरकार ने 1 अप्रैल से 45 साल की उम्र से ऊपर के सभी लोगों को टीके लगाने की पात्रता दे दी. मगर फोर्ब्स मार्शल के को-चेयरमैन और सीआइआइ (भारतीय उद्योग परिसंघ) के पूर्व प्रेसिडेंट नौशाद फोर्ब्स इससे प्रभावित नहीं हैं. वे शिकायत करते हैं, ‘‘हमें 80 करोड़ वयस्कों को टीके लगाने हैं. वैक्सीन के सबसे बड़े मैन्युफैक्चर्स हमारे यहां हैं. यह समझने की कोई कोशिश ही नहीं है कि संक्रमण कहां फैल रहा है.’’
पुणे में हर दिन 6,000 से ज्यादा नए लोग संक्रमित हो रहे हैं और यहां रोज 25,000 लोगों को टीके लऌग रहे हैं. फोर्ब्स कहते हैं, ''इसे 1,00,000 तक बढ़ाने की जरूरत है.’’ वैक्सीन उनको प्राथमिकता के आधार पर लगाई जानी चाहिए जिन्हें वे ‘‘अगली कतार का आर्थिक कार्यबल’’ कहते हैं, यानी दुकानों, रेस्तरां वगैरह में काम करने वाले लोग. उद्योग के अन्य कप्तानों ने भी वैक्सीन अभियान की प्राथमिकताएं नए सिरे से तय करने की मांग की है.
महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा को लगता है कि युवाओं को प्राथमिकता से टीका लगाना चाहिए. महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक, केरल, छत्तीसगढ़ और गुजरात में कोविड के बढ़ते मामलों का जिक्र करते हुए 24 मार्च को उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘मैं इन राज्यों में वैक्सीन की पात्रता पूरी तरह खोल देने की फिर गुजारिश करता हूं. युवा भी सुपर स्प्रेडर हैं. वितरण चैनलों को फैलाओ. कृपया कंपनियों को खासकर फैक्ट्रियों में अपने लोगों को टीके लगाने की जिक्वमेदारी उठाने दें.’’
उद्योग ने कुछ बेहद कठोर सबक सीखे हैं, पर कोविड के बढ़ते मामलों के बाद राज्यों में लग रहीं ताजा पाबंदियां उनका फिर इम्तिहान लेंगी. बहुत कुछ इस पर निर्भर है कि सुरक्षा नियमों के पालन और टीके लगाने के आक्रामक अभियान के साथ कोविड की इस नई उछाल से कैसे निपटा जाता है, ताकि अर्थव्यवस्था जो अभी बहाली के नाजुक रास्ते पर ही है, फिर पटरी से न उतर जाए.
खुद को बचाए रखने की जुगत
राज्यों में कोविड पाबंदियों से निबटने के लिए कारोबार विभिन्न उपायों को अपना रहे हैं
सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन करना—कार्यस्थल पर सुरक्षित दूरी रखना, दुकानों/दफ्तरों को सैनिटाइज करना, मास्क पहनना
लागत पर बेहतर नियंत्रण, चाहे कच्चे माल की खरीद हो, सप्लाइ चेन को संभालना या रोजमर्रा के काम हों
माल का अंबार लगाने से बचना और माल के बिल्कुल समय पर मौजूद होने का इंतजाम करना और मैन्युफैक्चरिंग तरीकों को चुस्त-दुरुस्त रखना
मौजूदा विक्रेताओं के नाकाम होने की स्थिति में वैकल्पिक विक्रेताओं को तैयार रखना
ऑर्डर लेने और सीधे घरों तक माल पहुंचाने के लिए मजबूत ऑनलाइन रणनीति विकसित करना
मकान मालिकों से मोलभाव करके किराए कम करवाने की कोशिश करना
ज्यादा ठेका/अस्थायी कर्मचारियों का चयन करना ताकि कटौती करना आसान हो.

