
पंजाब पुलिस की काउंटरइंटेलिजेंस शाखा की टीम 8 फरवरी को सारी रात लखनऊ की सड़कों पर गाड़ी दौड़ाती रही. वे एक दिन पहले अमृतसर जिले के वेरोवाल गांव से गिरफ्तार गैंगस्टर जगरूप सिंह से मिले सुराग का पीछा कर रहे थे. टीम ने जगरूप से पांच चीनी पिस्तौल बरामद की थीं. इससे भी अहम बात, उन्हें उसके संगी-साथियों के पते-ठिकाने भी मिल गए थे. इनमें जगदेव सिंह जग्गा भी था, जो उत्तर प्रदेश में लखीमपुर से लखनऊ जा रहा था. जासूसों ने उसे पकड़ लिया और पंजाब ले आए.
पंजाब पुलिस की एक दूसरी टीम ने गैंगस्टर गुरपिंदर सिंह को महाराष्ट्र में नांदेड़ से गिरफ्तार किया. पुलिस ने बताया कि उन्होंने खालिस्तान टाइगर फोर्स (केटीएफ) के एक मॉड्यूल का पर्दाफाश किया है जो ब्रिटेन में रह रहे बब्बर खालसा इंटरनेशनल (बीकेआइ) के उग्रवादी परमजीत सिंह पम्मा के निर्देश पर भारत में हत्याओं की साजिश रच रहा था.
ये गिरफ्तारियां अलग-थलग और एकबारगी नहीं थीं. 7 दिसंबर को दिल्ली पुलिस ने दो बदमाशों गुरजीत सिंह और सुखदीप सिंह को पकड़ा था, जिन्हें कथित तौर पर गैंगस्टर सुख भिखारीवाल ने अक्तूबर 2020 में पंजाब के भीखीविंड के खालिस्तान-विरोधी ऐक्टिविस्ट बलविंदर सिंह संधू की हत्या के लिए भाड़े पर रखा था.
संधू को 1990 के दशक में पंजाब के तरनतारन जिले में उग्रवादियों के खिलाफ जोरदार लड़ाई लडऩे के लिए 1993 में भारत के तीसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था. दुबई से प्रत्यर्पण के बाद दिल्ली लाए गए भिखारीवाल ने जांच एजेंसियों को बताया कि हत्या का फरमान इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन (आइएसवाइएफ) के सरगना लखबीर सिंह रोडे ने दिया था.

बीकेआइ और आइएसवाइएफ 1990 के दशक में पंजाब में स्वतंत्र 'खालिस्तान’ के लिए हिंसक अलगाववादी आंदोलन में सबसे अगली कतार में शामिल उग्रवादी समूह थे. बीते छह साल में 20 से ज्यादा घटनाओं को खालिस्तानी अलगाववादियों से जोड़ा जाता है, जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और हिंदुत्ववादी नेताओं की हत्याएं तथा सिख प्रचारकों पर हमले शामिल हैं. अधिकारियों का कहना है कि ऐसे हमले पंजाब में वैमनस्य के बीज बोने को किए जाते हैं. उन्हें अंदेशा है कि बहुत पहले दफनाए जा चुके खालिस्तान के भूत को फिर से, और ज्यादातर विदेशों से, जिंदा करने की कोशिशें की जा रही हैं.
सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि पम्मा और रोडे उन नौ कुख्यात खालिस्तानी सरगनाओं में से हैं जो पाकिस्तान सहित पांच देशों से काम कर रहे हैं. इस फेहरिस्त में बाकी हैं प्रतिबंधित खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स (केजेडएफ) से जुड़े और जर्मनी में रह रहे गुरमीत सिंह बग्गा और भूपिंदर सिंह भिडा; लाहौर में रह रहा केजेडएफ का सरगना रणजीत सिंह नीता, बीकेआइ प्रमुख वाधवा सिंह बब्बर और खालिस्तान कमांडो फोर्स का सरगना परमजीत सिंह पंजवार; हरदीप सिंह निज्जर (वैंकूवर) और सिख्स फॉर जस्टिस (एसएफजे) का न्यूयॉर्क में रह रहा संस्थापक गुरपतवंत सिंह पन्नू. (देखें उग्रपंथियों के सरगना).

अफसरों का कहना है कि ये खालिस्तानी सरगना भारत में निशानेवार हत्याओं को अंजाम देने के लिए स्थानीय अपराधियों, गैंगस्टरों और ड्रग डीलरों के नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं. सुरक्षा एजेंसियां बीते दशक के दौरान खालिस्तान आंदोलन को जिंदा करने की इन कोशिशों के पीछे पाकिस्तान की आइएसआइ (इंटर-सि र्विसेज इंटेलिजेंस) का हाथ देखती हैं. अस्सी के दशक में अलगाववाद को बढ़ावा देने के लिए पाकिस्तान सेना ने खालिस्तान और कश्मीर को मिलाकर ‘के2’ प्लान बनाया था. मसलन, बलविंदर संधू के कथित हत्यारे हिज्बुल मुजाहिदीन के तीन सदस्यों के साथ पकड़े गए थे, जिनमें से एक पाकिस्तान के कई छद्म आतंकवादियों में से एक था.
ओटावा स्थित थिंक-टैंक मैक्डोनाल्ड-लॉरियर इंस्टीट्यूट की तरफ से छपे दिसंबर 2020 के एक परचे खालिस्तान: ए प्रोजेक्ट ऑफ पाकिस्तान में कनाडा के दिग्गज पत्रकार टेरी मिलेव्स्की ने नए सिरे से जिंदा खालिस्तान आंदोलन से भारत और कनाडा को पैदा खतरे के बारे में आगाह किया था. इस रिपोर्ट में कहा गया था, 'कनाडाइयों के लिए पाकिस्तान की कार्रवाइयां राष्ट्रीय सुरक्षा का असल और मौजूदा खतरा पैदा कर रही हैं. चूंकि खालिस्तान के अभियान के प्रति पंजाब में कम ही खिंचाव है, ऐसे में खालिस्तानी उग्रवादियों को पाकिस्तान का समर्थन कनाडा में रह रहे उग्रवादियों को फायदा देगा.’’
भारतीय अधिकारियों का कहना है कि आइएसआइ पंजाब और जम्मू-कश्मीर के सरहदी इलाकों में हथियार और नशीले पदार्थ उतारने के लिए 2019 से ही ड्रोन का प्रयोग कर रहा है. सितंबर 2019 के बाद ड्रोन के जरिए भेजे गए सामानों के कम से कम एक दर्जन मामलों का पता लगाया गया है.
केंद्रीय और पंजाब की सुरक्षा एजेंसियां यह भी मानती हैं कि खालिस्तानी उग्रवादी पंजाब में नौजवानों को कट्टर बनाने के लिए धार्मिक संगठनों और किसानों के मौजूदा आंदोलन का इस्तेमाल कर रहे हैं. लुधियाना से कांग्रेस सांसद रवनीत सिंह बिट्टू आरोप लगाते हैं कि खालिस्तानी तत्वों ने पिछले नवंबर से ही दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर चल रहे किसानों के आंदोलन में घुसपैठ कर ली है. सिंघु बॉर्डर पर 25 जनवरी को खुद पर हुए हमले के लिए बिट्टू खालिस्तान से हमदर्दी रखने वालों पर आरोप लगाते हैं.
पड़ोसी हरियाणा भी बराबर चौकन्ना है. इसके सिरसा, हिसार, अंबाला, फतेहाबाद, यमुनानगर और कुरुक्षेत्र जिले कभी खालिस्तानी अलगाववादियों की पनाह के लिए मुफीद हुआ करते थे. हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इंडिया टुडे से कहा, ''आंदोलन पर हमारी पैनी नजर है. हम न तो कट्टरवाद को पनपने देंगे, न हिंसा को.’’

खालिस्तान 2.0
1990 के दशक के मध्य में जब खालिस्तानी आंदोलन अपने चरम पर था—भारत के इस सबसे हिंसक विद्रोहों में से एक—में डेढ़ दशक के दरमियान 21,532 जानें गई थीं. इनमें 8,090 अलगाववादी, 11,696 नागरिक और 1,746 सुरक्षाकर्मी (1,415 सिर्फ पंजाब पुलिस के) शामिल थे. आंदोलन अप्रैल 1981 में शुरू हुआ था जब अमेरिका में रह रहे खालिस्तानी विचारक गंगा सिंह ढिल्लों ने चंडीगढ़ में एक सेमिनार के दौरान सिखों के स्वतंत्र और अलग देश की मांग की.
संयोग से इसी वक्त बड़ी उग्रवादी शख्सियत जरनैल सिंह भिडरांवाले का उदय हुआ, जिसने 1983 में अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर के भीतर अपने अनुयायियों के साथ मजबूत किलेबंदी कर ली थी. नतीजतन भारतीय सेना को जून 1984 में मंदिर परिसर के भीतर कार्रवाई करनी पड़ी (ऑपरेशन ब्लूस्टार) और फिर उसी साल अक्तूबर में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सिख अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी थी.
सुरक्षा बलों ने पक्के इरादे के साथ लड़ाई लड़ी और 1990 के दशक के मध्य तक पंजाब से विद्रोह का सफाया कर दिया. मगर आतंकी मॉड्यूलों ने भारत से बाहर ठिकाने बना लिए. ऐसे नौ में से चार मॉड्यूल के नेता—रोडे, बब्बर, नीता और पंजवार—और दल खालसा (इंटरनेशनल) का संस्थापक गजिंदर सिंह 'हाइजैकर’ लाहौर से काम करता है. सिखों के बीच कट्टरता फैलाने की मुहिम में पंजवार को अहम माना जाता है, जो पहले कथित तौर पर तस्करी के जरिए भारत में हथियार, नारकोटिक्स और नकली मुद्रा पहुंचाने और यूरोप में खालिस्तानी नेटवर्क बढ़ाने के कामों से भी जुड़ा था.
विदेशी हाथ
खालिस्तान 1.0 को कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन में रहने वाले समृद्ध सिख समुदाय का साथ मिला था. आंदोलन के इस दूसरे अवतार को अब पहले से अधिक प्रभावशाली, समर्थ और मुखर सिख प्रवासियों की ओर से हरसंभव मदद मिल रही है. इसमें पारंपरिक खालिस्तान नेटवर्क के अलावा एसएफजे और कनाडा स्थित पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन (पीजेएफ) जैसे संगठन शामिल हैं.
उनका प्रोपगेंडा, जिसे उनके देशों में गुरुद्वारों के माध्यम से भी आगे बढ़ाया जाता है, 1982 और 1995 के बीच की घटनाओं, विशेष रूप से ऑपरेशन ब्लू स्टार और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों के इर्दगिर्द रचा जाता है.
आप्रवासी कैब ड्राइवर से अटॉर्नी बने गुरपतवंत सिंह पन्नू ने साल 1984 के दंगों के पीडि़तों के लिए न्याय मांगने को 2007 में एसएफजे की शुरुआत की थी. हालांकि 2006 से यह समूह खालिस्तान का कट्टर पक्षधर हो गया था. 2019 में भारत सरकार ने एसएफजे पर प्रतिबंध लगा दिया जब इसने एक साल पहले पंजाब को भारत से अलग करने के विषय पर प्रवासी सिखों के बीच 2020 में जनमत संग्रह कराने की घोषणा की थी (जो महामारी के कारण दो साल के लिए स्थगित है).
भारतीय एजेंसियों को संदेह है कि किसानों का विरोध चरम पर होने के दौरान कैलिफोर्निया में बैठे पन्नू और कुछ अन्य तत्व सिख युवाओं को कट्टरपंथी बनाने की कोशिश कर रहे थे और दिल्ली में गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली के दौरान भीड़ को लाल किले की घेराबंदी करने के लिए उन्होंने ही उकसाया था. उनका मानना है कि लाल किले की हिंसा के आरोपी और पंजाबी अभिनेता से एक्टिविस्ट बने दीप सिद्धू और लाखा सिद्धाना पन्नू के संपर्क में थे.
इन वर्षों में ऑपरेशन ब्लू स्टार और 1984 के दंगों के चित्रों को स्टॉकटॉन, युबा सिटी, फ्रेमोंट, सैक्रामेंटो, न्यूयॉर्क और वाशिंगटन डीसी जैसे अमेरिकी शहरों के गुरुद्वारों की चित्र दीर्घाओं में जगह मिली है. कनाडा में भारतीय राजनयिकों को हाल ही में ओटावा के डिक्सी गुरुद्वारे में प्रवेश करने से रोक दिया गया.
वैंकूवर में गुरुद्वारे के शासी निकाय का मुखिया निज्जर है. शायद ही कोई प्लेटफॉर्म हो जहां भारतीय राजनयिक उनसे बातचीत कर सकें. पंजाब के एक शीर्ष खुफिया अधिकारी कहते हैं, ‘‘इन गुरुद्वारों पर प्रभुत्व रखने वाले आप्रवासी सिखों को निशाना बनाते हैं और युवाओं को कट्टरपंथी बनाने की कोशिश करते हैं.’’
इंग्लैंड और कनाडा दोनों में, खालिस्तान आंदोलन को कुछ मुखर सिख प्रवासी सांसदों का भी समर्थन मिलता रहता है. स्लाउ से लेबर पार्टी के सांसद तनमनजीत सिंह धेसी ने किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित मानवाधिकार उल्लंघन के मुद्दे को उठाते हुए ब्रिटिश सरकार से हस्तक्षेप की मांग की.
पिछले साल अगस्त में लेबर सांसद प्रीत कौर गिल ने खालिस्तान की मांग को जायज ठहराया था. गिल ने एक ट्वीट में तर्क दिया था, ''आत्मनिर्णय का सिद्धांत संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुच्छेद-I में प्रमुखता से सन्निहित है.’’
इसी तरह कनाडाई सांसद और न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी) के नेता जगमीत सिंह धालीवाल ने मांग की है कि जस्टिन ट्रूडो सरकार किसान आंदोलन को लेकर कथित मानवाधिकार हनन के खिलाफ बयान जारी करे. 24 सांसदों वाली एनडीपी का समर्थन ट्रूडो सरकार के अस्तित्व के लिए अहम है. कई कनाडाई मंत्रियों में खालिस्तान को लेकर सहानुभूति देखी जाती है.
अप्रैल 2017 में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने खालिस्तान को लेकर कनाडा के रक्षा मंत्री हरजीत सिंह सज्जन के कथित समर्थन के कारण उनसे मिलने से इनकार कर दिया था. भारतीय एजेंसियों को भारतीय मूल के एक अन्य कनाडाई राजनेता अमरजीत सोही पर भी खालिस्तान को लेकर सहानुभूति रखने का संदेह है. सज्जन और सोही दोनों इससे इनकार करते हैं.
भारत ने खालिस्तान समर्थकों को प्रत्यर्पित करने के लिए विदेशी सरकारों पर बार-बार दबाव डाला है. 3 मार्च को भारतीय अधिकारियों ने ब्रिटेन से केजेडएफ सदस्य कुलदीप सिंह का प्रत्यर्पण मांगा. वह 16 साल से वहां रह रहा है. पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे सुखबीर की हत्या की साजिश के आरोप में वह वांछित है. दिसंबर, 2015 में पुर्तगाल में पम्मा की गिरफ्तारी के बाद भारतीय अधिकारियों ने उसके प्रत्यर्पण के लिए अर्जी दी थी. लेकिन अपील को खारिज कर दिया गया था और पम्मा वापस ब्रिटेन चला गया, जहां उसे साल 2000 में शरण मिली थी.
2018 में ट्रूडो की भारत यात्रा के दौरान अमरिंदर ने विदेशी आतंकी ऑपरेटिव को लेकर एक डोसियर साझा किया था. इस सूची में निज्जर, मलकीत सिंह फौजी, गुरजीत सिंह चीमा, गुरप्रीत सिंह लांडे और गुरजिंदर सिंह पन्नू के नाम थे. ट्रूडो ने अमरिंदर को भरोसा दिलाया कि कनाडा ने कहीं भी अलगाववादी गतिविधियों का समर्थन नहीं किया है.
कई विदेशी सरकारों ने उन आतंकियों के खिलाफ भारत के मामलों में संशय का रुख अपनाया है जबकि वे अन्य आतंकी समूहों पर सख्त होते हैं. रॉ के पूर्व सेक्रेटरी जी.बी.एस. सिंधु का कहना है कि पश्चिमी देश अपने नजरिये में चयनात्मक हैं, ''वे देश अपनी जरूरतों के हिसाब से ऐसे व्यक्तियों पर अपना शिकंजा कसते हैं या उन्हें छोड़ देते हैं.’’
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने 2019 में पंजाब में लक्षित हत्याओं, हथियार तस्करी, हिंसा और अलगाववाद को हवा देने के मामलों में इनमें से कई विदेशी आतंकियों को नामजद किया है. पिछले साल एजेंसी ने पन्नू, निज्जर और पम्मा की संपत्तियां जब्त की और उनके विरुद्ध आतंकी गतिविधियों के लिए आरोप-पत्र दायर किए.
पिछले साल सितंबर में पंजाब से शुरू हुए किसान आंदोलन ने विदेशों में रह रहे सिखों को एकजुट होने का बड़ा मौका दिया. सुरक्षा एजेंसियों को डर है कि विरोध प्रदर्शन ने आइएसआइ और कुछ उत्तर अमेरिकी तत्वों को अलग खालिस्तान की भावना को फिर से भड़काने के लिए नई ऊर्जा दी होगी.
उन्होंने अपने प्रोपगेंडा के लिए सोशल मीडिया और वेब चैनलों का इस्तेमाल किया. पीजेएफ के सह-संस्थापक मो धालीवाल और अनीता लाल एनडीपी प्रमुख जगमीत धालीवाल के करीबी माने जाते हैं. माना जाता है कि किसानों के विरोध प्रदर्शन की टूलकिट उन्होंने ही तैयार की थी.
किसान संगठनों ने खालिस्तान समर्थकों को आंदोलन से बाहर रखने की कोशिश तो की है, पर वे इसमें पूरी तरह सफल नहीं रहे. वैंकूवर में एक रेडियो स्टेशन के प्रस्तोता समीर कौशल कहते हैं, ''सिख धर्म के एक वर्ग के बीच यह भावना प्रबल हुई है कि उनके साथ अन्याय हुआ है. किसानों के आंदोलन ने इसे और हवा दे दी है. बाद में उत्तरी अमेरिका में कट्टरपंथी भावना ने और जोर पकड़ा.’’ भारत के किसानों के साथ एकजुटता जताने के लिए कैलिफॉर्निया और कनाडा में खालिस्तानी झंडे के साथ कार-ट्रैक्टर रैलियां निकालने की खबरें हैं.
भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि लखबीर रोडे और उसके बेटे भगत बरार ने सिंघु बॉर्डर पर किसानों के विरोध प्रदर्शन को भड़काने के लिए खालिस्तानी कार्यकर्ताओं की घुसपैठ कराई है. बरार कनाडा के ब्रैम्पटन में रहता है और वह अपने पिता तथा आइएसआइ एजेंटों से मिलने के लिए अक्सर पाकिस्तान जाता है. ब्रिटेन में भी, किसान आंदोलन के समर्थन में खालिस्तानी रंग साफ दिखा. दिसंबर में लंदन में भारतीय उच्चायोग के बाहर एक प्रदर्शन में बीकेआइ कार्यकर्ताओं को देखा गया और खालिस्तानी नारेबाजी हुई.
सुस्त, लेकिन जिंदा है
पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ में गुरुद्वारों का प्रबंधन करने वाली शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने जून 2017 में स्वर्ण मंदिर परिसर में विवादास्पद ‘शहीद स्मारक’ में भिंडरांवाले का चित्र फिर से स्थापित करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया. इसे भाजपा के दबाव में हटाया गया था.
खालिस्तान की विचारधारा के महिमामंडन के ऐसे प्रयासों को लेकर पंजाब के बुद्धिजीवियों का कहना है कि इस आंदोलन को धरातल पर बहुत कम समर्थन है. पंजाब के समकालीन इतिहास के जानकार जगतार सिंह संधू कहते हैं, ''खालिस्तान एक विचार है, और कोई विचार कभी नहीं मरता. सिखों के बीच एक छोटा वर्ग है जो इस विचार का प्रचार करता है पर इसके लिए पंजाब में कोई खास समर्थन नहीं दिखता.’’
2019 की दो घटनाओं ने सिखों के कुछ तबकों में नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ राय बनी है—अनुच्छेद 370 का उन्मूलन और जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा वापस लेना, तथा नागरिकता (संशोधन) कानून का पारित होना. इन कदमों को कई सिखों ने अल्पसंख्यकों पर आधिपत्य बढ़ाने की भाजपा-आरएसएस की चाल के रूप में देखा. 1973 में अकाली दल के आनंदपुर साहिब प्रस्ताव में पंजाब को भी जम्मू-कश्मीर जैसा विशेष दर्जा देने की मांग की गई थी.
पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक शशिकांत का कहना है कि खालिस्तान आंदोलन पंजाब में सुस्त पड़ा है, मरा नहीं है. वे कहते हैं, ‘‘कुछ प्रवासी जो अब तक अतीत से बाहर नहीं आ पाए हैं, अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इसे उकसा रहे हैं.’’ वे पिछले 18 महीनों में आइएसआइ के आतंकी स्लीपर सेल को सक्रिय किए जाने के कारण पैदा खतरे को लेकर आगाह भी करते हैं.
भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के प्रमुख बलबीर सिंह राजेवाल का कहना है कि किसान आंदोलन का खालिस्तान से कोई नाता नहीं है, ‘‘सरकार किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए खालिस्तान का नाम ले रही है. लोग कृषि कानूनों को लेकर नाराज हैं. अगर कनाडा में रहने वाले खालिस्तान चाहते हैं तो वे वहां ही बना सकते हैं. भारत में ऐसी कोई मांग नहीं है.’’
मोदी सरकार ने सिख संगठनों में अच्छा संदेश देने के लिए बीते दो वर्षों में दो नामों को छोड़ भारतीय मूल के अन्य सभी सिखों के नामों को ‘प्रतिकूल सूची’ से हटा दिया ताकि वे वीजा आवेदन करने और भारत आने में सक्षम हो सकें. अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और जर्मनी में शरण लिए सिख परिवारों को भी वीजा मिल सकता है.
1997 से ही पंजाब में खालिस्तान, विधानसभा चुनाव का मुद्दा और ध्रुवीकरण को हवा देने वाला कारक रहा है. इसलिए किसी भी ठोस कदम के लिए एक साहसिक सियासी निर्णय की जरूरत होगी. लेकिन जैसा कि सैनफ्रांसिस्को स्थित वकील और सिख एक्टिविस्ट सुखी चहल कहते हैं, ''अगर ऑपरेशन ब्लू स्टार मामले की जांच पूरी की जाती है और 1984 के सिख विरोधी दंगों के 3,000 पीडि़तों के लिए न्याय पक्का कर दिया जाता है तो खालिस्तान का विचार अपनी मौत खुद मर जाएगा.
यहां तक कि प्रवासी लोगों के बीच भी वह नहीं रहेगा.’’ उनका तर्क है कि इससे सिख समुदाय को अतीत की कड़वी यादों को भुलाकर आगे बढऩे का हौसला मिलेगा; वरना खालिस्तान का विचार जिंदा रहेगा जिसका कुछ लोग अपने निहित स्वार्थों के लिए पर दोहन करते रहेंगे. ठ्ठ
उग्रवाद के सरगना
अधिकारियों को कहना है कि खालिस्तान आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय चेहरों के एक नेटवर्क जरिए हवा मिल रही है
पुराने धुरंधर
परमजीत सिंह पंजवार
खालिस्तान कमांडो फोर्स (केसीएफ) का मुखिया है. 1994 से लाहौर में रहता है; पत्नी और दो बेटे फ्रैंकफर्ट में रहते हैं. कथित तौर पर भारत में नारकोटिक्स तस्करी का नेटवर्क चलाता है.
वाधवा सिंह बब्बर
बब्बर खालसा इंटरनेशनल (बीकेआइ) का प्रमुख. नोटबंदी के पहले यह आइएसआइ के लिए कथित तौर पर भारत में नकली भारतीय मुद्रा का नेटवर्क संभालता था. लाहौर में रहकर काम करता है.
गजिंदर सिंह 'हाइजैकर’
दल खालसा (इंटरनेशनल) का प्रमुख. लाहौर से सिख प्रचारकों का समर्थन जुटाता है और सिख राजनीति पर दबदबा रखता है.
रणजीत सिंह नीता
प्रतिबंधित आतंकी संगठन खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स का लाहौर-स्थित सरगना के हिज्बुल मुजाहिदीन के साथ संबंध हैं. कथित तौर पर यह नेटवर्क पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए पंजाब में गोला-बारूद भेजता है.
लखबीर सिंह रोडे
जरनैल सिंह भिंडरांवाले का भतीजा. लाहौर में ननकाना साहिब में रहता है. इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन का मुखिया है. कथित तौर पर यूरोप और कनाडा में खालिस्तानी ताकतों को एकजुट करता है.
मेहल सिंह बब्बर
आइएएफ का पूर्व अफसर मेहल बब्बर खालसा इंटरनेशनल (रेशम सिंह धड़ा) का प्रमुख है. यह कथित तौर पर यूरोप और ब्रिटेन में खालिस्तानी धड़ों के बहुत करीब है. आखिरी बार यूरोप में देखा गया था.
मंच पर नए खिलाड़ी
गुरपतवंत सिंह पन्नू
सिख्स फॉर जस्टिस का संस्थापक, 1990 के दशक में अमेरिका जाकर वहां टैक्सी चलाने लगा था. बाद में अमेरिका में राजनैतिक शरण हासिल करने में पंजाब के प्रवासी लोगों की मदद करने के लिए एटॉर्नी बन गया.
परमजीत सिंह पक्वमा
नब्बे के दशक का छोटा-मोटा अपराधी. कथित तौर पर वाधवा सिंह बब्बर और जगतार सिंह तारा सरीखे आतंकियों के साथ काम किया. ब्रिटेन में राजनैतिक शरण ले रखी है.
गुरमीत सिंह बग्गा
जर्मनी में रहता है. पंजाब में सामान उतारने के लिए पाकिस्तान स्थित अपने साथी रणजीत सिंह नीता को कथित तौर पर ड्रोन मुहैया करता है.
मो धालीवाल
वैंकूवर में ठिकाना. कनाडा के राजनेता जगमीत सिंह धालीवाल का करीबी माना जाता है. पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन शुरू किया. माना जाता है कि किसान आंदोलन को लेकर मीडिया टूलकिट के पीछे इसी का दिमाग था
हरदीप सिंह निज्जर
वैंकूवर में रहता है. खालिस्तान टाइगर फोर्स का प्रमुख है. कथित तौर पर संभावित रंगरूटों की पहचान और उनके प्रशिक्षण का इंतजाम करके भारत में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देता है.
भगत सिंह बरार
कनाडा में रहकर कथित तौर पर भारत-विरोध गतिविधियों से जुड़ा है. कथित तौर पर विदेशों में भारत-विरोधी गतिविधियों को संगठित करने के मकसद से समुदाय के कट्टर नेताओं, आइएसआइ अफसरों से मिलने को अक्सर पाकिस्तान जाता है.

