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खास रपटः रक्षा सौदों में अटकी सांस

सरहद पर चीन के साथ जारी संकट के बीच रक्षा मंत्रालय चार बेहद अहम हथियार प्रणालियों की खरीद को आगे बढ़ाने के लिए हरकत में आया. मगर कई सारी वजहों से जल्दी हासिल कर पाना मुश्किल.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह 4 सितंबर को मॉस्को में अपने समकक्षी रूस के रक्षा मंत्री सर्जेई शोगू से मुलाकात करते हुए
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह 4 सितंबर को मॉस्को में अपने समकक्षी रूस के रक्षा मंत्री सर्जेई शोगू से मुलाकात करते हुए
अपडेटेड 13 नवंबर , 2020

भारतीय सेना के लिए कारबाइन, मोबाइल एयर डिफेंस गन-मिसाइल प्रणालियों, हल्के हेलिकॉप्टर और कंधे से दागी जा सकने वाली मिसाइलों की 5 अरब डॉलर (36,000 करोड़ रुपए) जितनी रकम की की भारी-भरकम खरीद कई महीनों से अटकी हुई है.

अगर चीन के साथ सैन्य गतिरोध नहीं चल रहा होता तो तत्काल जरूरी साजो-सामान हासिल करने में हो रही यह देरी संकट का सबब नहीं बनती. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत में प्रक्रियाओं पर बहुत ज्यादा जोर देने वाली रक्षा खरीद कछुए की चाल से चलती हैं और सौदे को अंजाम पर पहुंचाने में औसतन 7-8 साल लग जाते हैं.


रक्षा राज्यमंत्री श्रीपाद नाइक ने 15 सितंबर को लोकसभा को बताया कि ये चारों मामले रक्षा मंत्रालय (एमओडी) की इस साल की खरीद का एक हिस्सा भर हैं. मौजूदा वित्तीय साल में सेनाओं के लिए नए साजो-सामान की खरीद पर 90,048 करोड़ रुपए खर्च करने की योजना है.

दो उपकरण खास तौर पर बेहद जरूरी हैं क्योंकि वे सेना के बेहद पुराने हो चुके और अब भी काम में लिए जा रहे उपकरणों की जगह लेंगे. सियाचिन और लद्दाख के ऊंचे पहाड़ों पर सैन्य टुकडिय़ों को जरूरी चीजें पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा चीता हेलिकॉप्टर 1970 के दशक का मॉडल है. वहीं, खासकर अग्रिम मोर्चों पर सस्ते हवाई रक्षा समाधान मुहैया करने को इस्तेमाल कंधे पर रखकर दागी जा सकने वाली मिसाइलों का भंडार घटता जा रहा है. दोनों अपना जीवनकाल पूरा करने के नजदीक पहुंच रहे हैं.

दूसरे विश्व युद्ध के जमाने की एल-70 गन को बदलने के लिए सेना को नई हवाई रक्षा गन-मिसाइल प्रणालियां चाहिए. इन आयातित चीजों में से कम से कम दो—हल्के हेलिकॉप्टर और कारबाइन—के लिए हमारे पास स्वदेशी विकल्प मौजूद हैं और इसलिए ये सरकार की 'आत्मनिर्भर पहल’ के लिए बिल्कुल माकूल होते. तो भी प्रक्रिया में बदलाव, बजट की लाचारी और हाल में स्वदेशीकरण पर नए सिरे से जोर दिए जाने सरीखी तमाम वजहों से रुके हुए ये सौदे बेहद पेचीदा गुत्थी में बदल गए हैं जिन्हें सुलझाने में मंत्रालय अक्षम दिखाई देता है.

भारत के सबसे बड़े हथियार आपूर्तिकर्ता और रणनीतिक भागीदार रूस की मंडराती छाया ने मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. रूस की सरकारी कंपनियां इन महंगे साजो-सामान में से तीन के लिए दौड़ में हैं और माना जा रहा है कि मॉस्को ने ये सौदे रुकवाने के लिए राजनैतिक स्तर पर समर्थन जुटाया है. कारबाइन के लिए दौड़ में शामिल एक कंपनी संयुक्त अरब अमीरात सरकार की है और इस देश का भी नई दिल्ली में अच्छा-खासा कूटनीतिक वजन है. रक्षा मंत्रालय ने खरीद में हो रही देरी का असाध्य मसला सुलझाने के लिए हाल में सिलसिलेवार कई बैठकें कीं पर ज्यादा कामयाबी हाथ नहीं लगी. 

रक्षा सौदों में अटकी सांस
रक्षा सौदों में अटकी सांस

हर वक्त वही फंदा
रक्षा मंत्रालय ने इनमें से तीन खरीदों को 'जाम से निकालने’ की सबसे जोरदार कोशिश 15 सितंबर को की. मंत्रालय के 'हितधारकों’, रक्षा प्रमुख जनरल बिपिन रावत (जो सैन्य मामलों के विभाग के सचिव भी हैं), सेना उप-प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एस.के. सैनी और एमओडी के शीर्ष अधिकारियों की एक बैठक में कुछ तुरत-फुरत फैसले लिए गए. इसमें अमीरात की काराकल इंटरनेशनल एलएलसी (चुनी गई फर्मों में से एक) से 93,000 से ज्यादा कारबाइन के साथ-साथ स्वचालित एयर डिफेंस गन मिसाइल प्रणालियों (एसपीएडीजीएमएस) का आयात रद्द करने का फैसला लिया गया,

जिसके लिए दक्षिण कोरिया की हन्व्हा डिफेंस ने सबसे कम बोली लगाई थी. कारबाइन सौदा रद्द कर दिया गया क्योंकि यह इकलौती योग्य कंपनी पाई गई और सिंगल वेंडर की अनपेक्षित स्थिति बनी; एयर डिफेंस सिस्टम में रूसी प्रतिस्पर्धी के ट्रायल के दौरान ठीक काम न करने के आरोपों के कारण ऐसा किया गया. 

मगर एक महीने के बाद भी इन्हें रद्द नहीं किया गया और ऊहापोह की स्थिति जारी रही. अमीरात सरकार की मिल्कियत वाले ईडीजीई समूह की सहायक कंपनी काराकल ने अब स्थानीय स्तर पर इनके निर्माण की पेशकश की है (पहले सारे हथियार फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया के तहत अमीरात से ही आयात होने थे).

रक्षा मंत्रालय के एक प्रमुख अधिकारी ने करीब 25,000 तैयार कारबाइन खरीदने की सिफारिश की है. सेना को सलाह दी गई है कि वह देश में ही हथियार 'खरीदने और बनाने’ के मकसद से 3,50,000 कारबाइन के ऑर्डर के लिए दी गई 'आवश्यकता की स्वीकृति’ की मियाद बढ़ा ले. एमओडी का आयुध निर्माण बोर्ड और निजी कंपनियों में अडानी डिफेंस तथा एसएसएस डिफेंस सरीखी निजी कंपनियां दौड़ में हैं.

गन-मिसाइल प्रणाली के मामले में देरी लंबी ‌खिंच सकती है. सेना ने 2013 में स्वचालित वायु रक्षा गन मिसाइल प्रणाली की पांच रेजिमेंट की जरूरत बताई थी. इनकी 104 इकाइयों के लिए करीब 2.5 अरब डॉलर का बजट बनाया गया था. हरेक इकाई में 30 मिमी की दो जुड़वा तोपें और पहियों पर लगी चैसिस पर चार कम दूरी की मिसाइलें होनी थीं. इन स्वचालित गन-मिसाइल प्रणालियों का मकसद नीचे उड़ते विमानों, हेलिकॉप्टरों और ड्रोन सरीखे खतरों से सेना की मोबाइल स्ट्राइक कोर की रक्षा करना है.

दक्षिण कोरियाई के30 की निर्माता हन्व्हा डिफेंस दो रूसी दावेदारों को पछाड़कर सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी बनकर उभरी थी. कीमत को लेकर मोलभाव इस साल शुरू होने थे लेकिन आगे नहीं बढ़ पाए क्योंकि रूसियों ने सौदे से उन्हें बाहर निकाल दिए जाने को लेकर ऐतराज उठा दिए. रक्षा मंत्रालय ने सिफारिश की कि सौदे को इस आधार पर रद्द कर दिया जाए कि ठेके के लिए सेना की जरूरतों के ब्योरे 2011 में तय किए गए थे और तकरीबन एक दशक पुराने थे. ऐसी कोई स्वदेशी प्रणाली फिलहाल तो नहीं है.

रक्षा मंत्रालय 200 केए-226टी हेलिकॉप्टर बनाने के लिए एक ठप पड़े भारत-रूस साझा सौदे को भी जिलाने की कोशिश कर रहा है. यह सौदा उस अंतर-सरकारी समझौते (आइजीए) का हिस्सा था जिस पर 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस यात्रा और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के साथ शिखर वार्ता के दौरान दस्तखत हुए थे.

हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), रशियन हेलिकॉप्टर्स और रूस सरकार की हथियार निर्यातक कंपनी रोसोबोरोनेक्सपोर्ट ने 2017 में क्रमश: 50.5 फीसद, 42 फीसद और 7.5 फीसद अंशपूंजी के साथ एक साझा उद्यम इंडो-रशियन हेलिकॉप्टर्स लिमिटेड (आइआरएचएल) बनाया था. यह सौदा आगे नहीं बढ़ा क्योंकि एमओडी ने प्रक्रिया में एक गंभीर खामी बता दी. सौदे पर तब तक अमल नहीं किया जा सकता था जब तक प्रस्ताव के अनुरोध (आरएफपी) की एक बुनियादी जरूरत पूरी नहीं की जाती और वह यह थी कि स्वदेशी कलपुर्जे 70 फीसद होने ही चाहिए. फिलहाल इनमें 70 फीसद कलपुर्जे रूसी और 26 फीसद (इंजन) फ्रांसीसी हैं. आइआरएचएल ने कहा है कि 70 फीसद स्वदेशी कलपुर्जे हेलिकॉप्टरों की चौथी और अंतिम खेप में ही हासिल किए जा सकेंगे.

सौदे में हो रही देरी ने हाल में भारत-रूस रक्षा संबंधों में भी किरकिरी पैदा कर दी. एमओडी ने सुझाव दिया कि मामले को फास्ट-ट्रैक ढंग से सुलझाया जाए. अफसरों का कहना है कि सेना, एचएएल, आइआरएचएल और एमओडी इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि रूस को हेलिकॉप्टरों में स्वदेशी सामग्री बढ़ाने के साथ अहम टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने की जरूरत है.

एमओडी दो रास्तों की पड़ताल कर रहा है. आरएफपी की शर्तों में बदलाव या सौदे को पूरी तरह रद्द करना. पहले के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा खरीद समिति (डीएसी) से नए सिरे से मंजूरी लेनी होगी. सौदा रद्द करना इसलिए मुश्किल हो सकता है क्योंकि यह 2015 के मोदी-पुतिन आइजीए का हिस्सा था. मगर यह पहला मौका नहीं होगा जब भारत साझा उद्यम से बाहर निकलेगा. जुलाई 2018 में तब रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऐलान किया था कि सरकार इंडो-रशियन फिफ्थ जनरल फाइटर एयरक्राफ्ट (एफजीएफए) प्रोजेक्ट से पीछे हट रही है. वजहें लागत में बढ़ोतरी और साझा की जा रही टेक्नोलॉजी के स्तर से आइएएफ और एचएएल की नाखुशी से जुड़ी थीं.

अगर रक्षा मंत्रालय केए-226टी हेलिकॉप्टरों के मामले में भी यही रास्ता चुनता है तो उसे देश में बने लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (एलयूएच) के भरोसे रहना होगा. एलयूएच का डिजाइन और निर्माण एचएएल ने पांच साल के छोटे-से वक्त में किया है और इस साल सितंबर में इसने अत्यधिक ऊंचाइयों पर संचालन क्षमता का प्रदर्शन किया. 10 दिन चले परीक्षणों के दौरान हेलिकॉप्टर लेह से उड़ा और दौलतबेग ओल्डी के 16,000 फुट की ऊंचाई पर बने, दुनिया के सबसे ऊंचे, उन्नत लैंडिंग ग्राउंड पर इसने 'निश्चित ऊंचाई और तापमान’ पर मंडराने का प्रदर्शन किया. एचएएल के अधिकारियों का कहना है कि हेलिकॉप्टर ने सियाचिन हिमनद में वजन ढोने की क्षमता का भी प्रदर्शन किया है. एचएएल के सीएमडी आर. माधवन कहते हैं कि एलयूएच का सेना का संस्करण शुरुआती परिचालन स्वीकृति (आइओसी) के लिए तैयार है.

रूसी मिसाइल
साब डायनामिक्स एबी के प्रेसिडेंट जॉर्जेन जोहानसन ने इस साल फरवरी में राजनाथ सिंह को एक चिट्ठी लिखी. स्वीडन की इस सबसे बड़ी रक्षा फर्म के प्रमुख ने रूस की रोसोबोरोनेक्सपोर्ट पर गंभीर आरोप लगाए. यह रूसी कंपनी भारतीय सेना की कंधे से दागी जा सकने वाली नई वायु रक्षा मिसाइलों की दशक पुरानी खोज में सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी के तौर पर उभरी थी.

जोहानसन ने कहा कि रूसी फर्म को 'रक्षा खरीद प्रक्रिया के दायरे से बाहर जाकर बार-बार अनुचित फायदे दिए जाते रहे हैं’ और इसलिए इसे अयोग्य घोषित कर देना चाहिए. जोहानसन ने कहा कि रूस इग्ला-एस को एक नई मिसाइल वेब्रा से बदल रहा था. उन्होंने यह भी कहा कि भारत को अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी का फायदा भी नहीं मिलेगा. स्वीडन की फर्म ने दो सालों में यह दूसरी चिट्ठी लिखी थी और इसने उस चीज की खरीद में फच्चर फंसा दिया जिसे सेना तत्काल परिचालनगत जरूरत कहती है.

मानव-वहनीय 5,175 वीएसएचओआरएडी (बहुत छोटी हवाई दूरी) वायु रक्षा प्रणालियां खरीदने के लिए सेना की खोज एओएन (आवश्यकता की स्वीकृति) के साथ 2009 में शुरू हुई थी. इन मिसाइलों को 'खरीदो और बनाओ’ श्रेणी में रखा गया था, जिसमें सबसे कम बोली लगाने वाले विदेशी विक्रेता को मिसाइलों और उपकरणों की शुरुआती खेप की आपूर्ति करनी होगी और बाकी बची मिसाइलें स्थानीय तौर पर बनाने के लिए टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम को करना होगा.

तीन मिसाइल प्रणालियों—फ्रांसीसी, स्वीडिश और रूसी—के पांच साल लंबे चले परीक्षण 2017 में खत्म हुए और तभी से यह सौदा विवादों में फंसा है. परीक्षणों में रूसी कंपनी की तरफदारी करने वाले बदलावों का आरोप लगाते हुए पहला पत्र साब ने 2018 में भेजा था. उस साल एमओडी की तरफ से नियुक्त एक समिति ने प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं पाया और सौदे को आगे बढ़ाने की मंजूरी दे दी. फिर भी स्वीडिश फर्म की चिट्ठी ने सौदे को ठप कर दिया है क्योंकि मंत्रालय इससे उबरने के रास्ते खोज रहा है.

एक विकल्प यह है कि फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया के तहत सीमित संख्या में बनी-बनाई मिसाइलें खरीद ली जाएं और स्वदेशी विकल्पों की छानबीन की जाए, जैसा कि हल्के हेलिकॉप्टरों की खरीद के सौदे में हुआ था. एचएएल निर्मित हल्के हेलिकॉप्टरों के विपरीत, जो पांच साल के भीतर सेवा में लाए जा सकते हैं, कोई तुरत-फुरत स्वदेशी समाधान मौजूद नहीं है. रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने मानव-वहनीय मिसाइल तीन साल में देने के वादे किए हैं लेकिन उसे सेना को भरोसा दिलाने की जरूरत है कि वह इस समयसीमा के भीतर वाकई ऐसा कर सकता है.

नए सिरे से समग्र आकलन की जरूरत
इनमें से कई सौदों पर करीब एक दशक से काम चल रहा है. उस वक्त से जब यह मान लिया गया था कि सशस्त्र बलों की बढ़ती जरूरतों के हिसाब से रक्षा बजट में बढ़ोतरी होती रहेगी. इस बीच लेह के गतिरोध ने सेना का ध्यान तमाम नए साजो-सामान की जरूरतों पर केंद्रित कर दिया. इनमें अत्यधिक ऊंचाइयों पर उडऩे में समर्थ ड्रोन से लेकर दुश्मन ड्रोन को मार गिराने वाले हथियार और मौसमी हालात में एलएसी के उस पार गहराई तक देख सकने वाले सेंसर शामिल हैं. यह देखना अभी बाकी है कि सेना का पहले से सीमित बजट उसे इन नई खरीद की और विरासत में मिली पुरानी प्रणालियों में से हरेक को समकक्ष दूसरी नई प्रणालियों से बदलने की इजाजत देता है या नहीं.

सेना के पूर्व डीजी मैकेनाइज्ड फोर्सेज लेफ्टिनेट जनरल ए.बी. शिवाने कहते हैं, ''अप्रासंगिक खरीदों, दोहराव या बहुत सारे सामान को हटाने के लिए हमें नए सिरे से सेनाओं की साझा क्षमता समीक्षा की जरूरत है.’’ ऐसी समीक्षा, मसलन बहुत-से सूचीपत्रों की छानबीन करेगी और पता लगाएगी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि एमओडी ने दोनों केए-226टी और स्वदेशी एलयूएच खरीदने की दिशा में कदम बढ़ा दिए और समान जरूरत पूरी करने वाली अनिवार्य तौर पर एक ही मशीन के लिए दो अलग-अलग उत्पादन सुविधाएं खड़ी कर ली हों.रक्षा खरीद में व्यापक सुधार के अलावा कोई समाधान है नहीं. 

रक्षा के वास्ते
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह 4 सितंबर को मॉस्को में अपने समकक्षी रूस के रक्षा मंत्री सर्जेई शोगू से मुलाकात करते हुए; एचएएल के डिजाइन किए लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (एलयूएच) का अगस्त के अंत में हिमालय के खासे ऊंचे और विरल वायु वाले इलाकों में सफल परीक्षण किया गया

तीन मिसाइल प्रणालियों का पांच वर्षीय फील्ड ट्रायल 2017 में पूरा हुआ था. हवाई रक्षा प्रणाली सौदा उसके बाद से ही किसी न किसी विवाद में अटकता-भटकता आ रहा है

अटके असलहे
रक्षा मंत्रालय भारतीय सेना के लिए 5 अरब डॉलर (36,000 करोड़ रु.) के अटके पड़े चार सौदों का रास्ता साफ करने के लिए प्रयास कर रहा है
स्वचालित एयर डिफेंस गन मिसाइल
104 मिसाइलें
लागत: 2.5 अरब डॉलर
स्थिति: प्रस्ताव के लिए अनुरोध 2013 में जारी. 2019 में एक दक्षिण अफ्रीकी फर्म ट्रायल में दो रूसी दावेदारों को पछाड़कर सबसे कम बोली देने वाली बनी
देरी की वजह: रक्षा मंत्रालय ने सितंबर 2020 में रद्द करने की सिफारिश की, अभी रद्द होना बाकी

क्लोज क्वार्टर कारबाइन
93,815 काइबाइन
लागत: 700 करोड़ रु.
स्थिति: ठेके के लिए यूएई की फर्म अंतिम सूची में
देरी की वजह: रक्षा मंत्रालय ने सितंबर 2020 में रद्द करने की सिफारिश की, अभी रद्द होना बाकी. मंत्रालय कुछ मात्रा में हथियार लेने की संभावना पर विचार कर रहा है

कामोव 226 लाइट ट्रांसपोर्ट (केए-226 टी) हेलिकॉप्टर
200 इकाई (साझा उद्यम में 60 फ्लाइअवे 40 भारत में ही बननी हैं)
लागत: एक अरब डॉलर
स्थिति: रूस के साथ सहमति पत्र पर 2015 में दस्तखत, 2017 में इंडो-रशियन हेलिकॉप्टर्स नाम से साझा उपक्रम बना. संसदीय रक्षा समिति से मंजूरी मिलनी बाकी
देरी की वजह: शुरुआती अनुरोध पत्र की शर्तें पूरी न होना

कंधे पर रखकर दागी जाने वाली मिसाइलें
5,175 मिसाइलें
लागत: 1.5 अरब डॉलर
सौदा: 2010 से
स्थिति: इग्ला-एस का 2017 में चुनाव किया गया. कीमत को लेकर सौदेबाजी पूरी. सौदे पर दस्तखत होना बाकी
देरी की वजह: प्रतिद्वंद्वियों की शिकायतें कि चयन की प्रक्रिया का ठीक से पालन नहीं किया गया.

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