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खास रपटः दांव पर मायावती की सियासत 

यूपी में राज्यसभा की 10 सीटों के चुनाव ने बसपा और सपा के बीच सियासी कलह की नई शुरुआत कर दी. लेकिन मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी और अपने वोट बैंक को बिखरने से बचाने की.

बढ़ी तल्खी पुरानी दुश्मनी भुलाकर 2019  में साथ आने वालीं मायावती और अखिलेश यादव के बीच तल्खी एक बार फिर बढ़ी
बढ़ी तल्खी पुरानी दुश्मनी भुलाकर 2019  में साथ आने वालीं मायावती और अखिलेश यादव के बीच तल्खी एक बार फिर बढ़ी
अपडेटेड 13 नवंबर , 2020

समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की दो साल पुरानी गठबंधन सरकार से बसपा के समर्थन वापस लेने के बाद सपा कार्यकर्ताओं ने 2 जून, 1995 को लखनऊ के एक सरकारी गेस्ट हाउस में मायावती पर हमला कर दिया था. इस गेस्ट हाउस कांड के बाद से बसपा और सपा के बीच शुरू हुई कड़ी राजनैतिक दुश्मनी के लंबे दौर ने पिछले साल 12 जनवरी को लखनऊ के होटल ताज में विराम लिया. उस दिन होटल ताज में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखि‍लेश यादव पहली बार पुरानी दुश्मनी को भुलाकर आगामी लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन का ऐलान कर रहे थे.

होटल ताज के आसपास का इलाका ''सपा-बसपा आई हैं, नई रोशनी लाई हैं’ जैसे नारे लिखी होर्डिंग से पटा पड़ा था. प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए मायावती जब अखि‍लेश यादव के साथ एक मंच पर आईं तो ढाई दशक पहले हुए गेस्ट हाउस कांड पर अपनी सफाई देने से नहीं चूकीं. पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मायावती ने एक बार नहीं, तीन बार गेस्ट हाउस कांड का जिक्र किया था.

वे बोली थीं, ''1993 में कांशीराम और मुलायम सिंह यादव ने साथ विधानसभा चुनाव लड़ा था. भाजपा जैसी सांप्रदायिक और जातिवादी पार्टी को हराकर सरकार बनाई थी. कुछ गंभीर कारणों से यह गठबंधन लंबे समय तक नहीं चल पाया था. देश हित व जनहित में 2 जून 1995 के लखनऊ गेस्ट हाउस कांड से ऊपर उठकर हमने दूषि‍त राजनैतिक, सांप्रदायिक माहौल को खत्म करने के लिए फि‍र से समझौता किया है.’’ 

दांव पर मायावती की सियासत
दांव पर मायावती की सियासत

सपा और बसपा गठबंधन पर अखि‍लेश यादव का कहना था, ‘‘मैंने कहा था कि गठबंधन के लिए दो कदम पीछे हटने को तैयार हूं लेकिन मायावती ने बराबर का सम्मान देने का काम किया है. मायावती का सम्मान अब मेरा सम्मान है. उनका अपमान होगा तो मेरा अपमान होगा.’’ प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान होटल ताज में मौजूद पत्रकारों ने जब मायावती और अखि‍लेश यादव के सामने सपा-बसपा गठबंधन के भविष्य को लेकर सवाल किए तो मायावती का जवाब था: ‘‘यह सर्व समाज का मेल है.

2019 के लोकसभा चुनाव ही नहीं, उससे आगे विधानसभा चुनाव में भी चलेगा.’’ जाहिर है, मायावती ने सपा और बसपा का गठबंधन 2022 के विधानसभा चुनाव में भी जारी रहने की घोषणा की थी. मायावती और अखि‍लेश यादव की इस जुगलबंदी का ही नतीजा था कि बसपा सुप्रीमो ने गठबंधन की घोषणा के एक महीने के भीतर सुप्रीम कोर्ट में गेस्ट हाउस प्रकरण का मुकदमा औपचारिक रूप से वापस लेने की अर्जी डाल दी थी. इसके बाद अखि‍लेश यादव और मायावती ने पूरी लोकसभा चुनाव के दौरान संयुक्त रूप से कुल 18 रैलियां कीं.

जब साल 2019 के लोकसभा चुनाव का नतीजा सामने आया तो सपा-बसपा गठबंधन से सबसे फायदा मायावती को ही हुआ था. 2014 के लोकसभा चुनाव में खाता तक न खोल पाने वाली बसपा ने 10 सांसद जिता लिए थे. पिछले साल लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद 4 जून को नई दिल्ली में बसपा कार्यालय पर पार्टी पदाधि‍कारियों के साथ बैठक में मायावती ने सपा-बसपा गठबंधन तोडऩे का ऐलान कर दिया. बैठक में मायावती ने सपा प्रमुख अखि‍लेश यादव को नसीहत देने के अंदाज में कहा, ‘‘अगर वह (अखि‍लेश यादव) राजनैतिक कार्यों के साथ अपने कार्यकर्ताओं को बसपा की तर्ज पर मिशनरी मोड पर लाकर एकजुट करेंगे तो भविष्य में हम उनके साथ हो सकते हैं.’’ 

दांव पर मायावती की सियासत
दांव पर मायावती की सियासत

मायावती अखि‍लेश यादव पर एकतरफा हमले कर रही थीं लेकिन सपा प्रमुख अपने पूर्व राजनैतिक सहयोगी पर किसी भी प्रकार की बयानबाजी से दूरी बनाए हुए थे. इसी दौरान पिछले साल 7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट से गेस्ट हाउस मुकदमे की वापसी की प्रक्रिया पूरी हो गई. हालांकि इस दौरान बसपा के कई वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ सपा का दामन थाम रहे थे (देखें बॉक्स).

लगातार बिखरती हुई बसपा को चुनावी मोड में लाकर सक्रिय करने के लिए मायावती ने स्थापना के बाद पहली बार बसपा को पिछले साल 27 सितंबर को हमीरपुर के विधानसभा उपचुनाव में उतार दिया. इसमें बसपा उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई. तब लगा था कि एक सीट का चुनाव है इसलिए बसपा बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई. करीब एक महीने बाद 24 अक्तूबर को जब 11 सीटों पर हुए विधानसभा उपचुनाव के नतीजे आए तो पता चला कि बसपा के कोर वोटों पर भी सेंध लग रही है.

बसपा छह सीटों पर कांग्रेस से भी पीछे छूट गई तो चार सीटों पर मायावती की पार्टी को 10 प्रतिशत वोट भी नहीं मिले. बसपा के लिए सबसे बड़ा झटका जलालपुर विधानसभा उपचुनाव का नतीजा था. यह सीट बसपा विधायक रहे रितेश पांडेय के आंबेडकर नगर से सांसद बनने के बाद खाली हुई थी. उपचुनाव में बसपा ने यह सीट उसी सपा से गंवा दी थी जिस पर चार महीने पहले मायावती ने वोट ट्रांसफर न करा पाने का आरोप लगाया था.

इन उपचुनावों में 2017 के विधानसभा उपचुनावों की तुलना में बसपा के वोट में पांच प्रतिशत की गिरावट हुई थी. इस प्रकार 2022 के विधानसभा चुनाव में नंबर एक बनने का सपना देख रही मायावती के लिए अपनी पार्टी को उत्तर प्रदेश में नंबर दो के पायदान पर भी टिकाना आसान नहीं रह गया था. उपचुनाव में 22.50 प्रतिशत से अधि‍क वोट पाकर सपा नंबर दो पार्टी बन चुकी थी. इसके बाद से मायावती सपा के खि‍लाफ आक्रामक होने का अवसर ढूंढ रही थीं. 

मेरठ कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर मनोज सिवाच कहते हैं, ''मायावती की अभी तक की राजनीति दो तरीकों पर केंद्रित रही है. पहला वे दलितों के बीच खुद को एक ऐसी बेटी के रूप में पेश करती हैं जिसे राजनैतिक रूप से आगे बढऩे से रोका जा रहा है. दलित मतदाताओं के बीच सपा से अपनी दुश्मनी का वास्ता देकर उनका स्वाभि‍मान जगाने की कोशि‍श करती हैं. लोकसभा चुनाव के बाद बने हालात में मायावती एक बार पुन: अपनी पुरानी शैली की राजनीति की तरफ लौटने की कोशि‍श कर रही हैं.’’ 

दांव पर मायावती की सियासत
दांव पर मायावती की सियासत

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के चुनाव ने एक बार फि‍र बसपा और सपा के बीच राजनैतिक कलह की जमीन तैयार कर दी जब 27 अक्तूबर को निर्दलीय उम्मीदवार प्रकाश बजाज ने नामांकन करने के अंतिम क्षण में 10 सपा विधायकों के साथ अपना नामांकन पत्र दाखिल किया. इससे पहले 26 अक्तूबर को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राज्यसभा के लिए नौ की बजाए आठ उम्मीदवारों की घोषणा कर बसपा के 10वें उम्मीदवार रामजी गौतम की राह आसान बनाने की पूरी तैयारी कर दी थी.

सपा समर्थित प्रकाश बजाज के 11वें उम्मीदवार के रूप में सामने आने से 10 सीटों पर होने वाले राज्यसभा चुनाव में एक राजनैतिक मुकाबले की पृष्ठभूमि बन गई थी. सपा सुप्रीमो अखि‍लेश यादव के इस दांव के लिए भाजपा और बसपा, कोई भी तैयार नहीं था. सपा की पैंतरेबाजी ने बसपा के उम्मीदवार रामजी गौतम की संभावनाओं पर संदेह पैदा कर दिया था, जिन्हें पार्टी की ओर से मैदान में उतारा गया था, जबकि इनके पास एकमुश्त जीत दर्ज करने के लिए आवश्यक 37 वोटों से काफी कम वोट थे.

यह संकट बुधवार 28 अक्तूबर की दोपहर को बढ़ गया, जब उत्तर प्रदेश विधानसभा के चार बसपा सदस्यों (विधायकों), जिन्होंने गौतम की उम्मीदवारी का प्रस्ताव किया था, ने रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) को याचिका देकर अपना नाम वापस लेने की मांग की. बाद में, वे तीन और बसपा विधायकों के साथ लखनऊ में सपा पार्टी मुख्यालय में सपा प्रमुख अखिलेश यादव से मिले.

28 अक्तूबर की शाम, राज्यसभा चुनाव के रिटर्निंग अफसर ने गौतम के नामांकन को वैध पाया और बजाज के नामांकन पत्रों को खारिज कर दिया, जिन्होंने 10 सपा विधायकों के समर्थन का पत्र दिया था. इसके बाद से भाजपा के आठ, और सपा-बसपा के एक-एक उम्मीदवार के निर्विरोध निर्वाचित होने की औपचारिकता ही रह गई थी. 29 अक्तूबर की सुबह, मायावती ने बसपा के सात बागी विधायकों को निलंबित कर दिया. लखनऊ में मीडियाकर्मियों से बात करते हुए मायावती ने कहा कि राज्यसभा चुनाव के पहले किए गए सपा के इस षड्यंत्र का जवाब वे विधान परिषद चुनाव में देंगी. सपा को हराने के लिए भाजपा को भी वोट देने से गुरेज नहीं करेंगी.

जो भी सपा के उम्मीदवार को हराएगा, बसपा उसे अपने विधायकों का वोट दिलाएगी. मायावती ने यह भी कहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन और गेस्टहाउस कांड का केस वापस लेना बड़ी भूल थी. लोकसभा चुनाव के बाद मायावती ने जिस तरह कई मुद्दों पर भाजपा सरकार के प्रति नरम रवैया दिखाया था (देखें बाक्स) उससे विरोधी बसपा पर भाजपा से साठगांठ का आरोप लगा रहे थे. लखनऊ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर राजेश्वर कुमार कहते हैं ‘‘2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद हुए यूपी में सभी चुनाव में जिस तरह बसपा का समर्थक दलित वोट बैंक 'राष्ट्रवाद’ की आंधी में लगातार दरक रहा है उसे सहेजे रखने के लिए मायावती भाजपा के सामने बहुत कड़ा रुख अपनाने से बच रही हैं.’’

जिस तरह से पिछले एक साल के दौरान मायावती अलग-अलग मुद्दों पर भाजपा सरकार के पक्ष में बयान दे रही हैं (देखें बाक्स) उससे बसपा के नेता भी परेशान हैं. बसपा से बगावत करने वाले विधायक असलम अली कहते हैं, ''हम लोग तो भाजपा के साथ लड़ते आए हैं लेकिन अब बसपा ही भाजपा के साथ जा रही है. यह मुस्लिम समाज के साथ धोखा है.’’ 

मुस्लि‍म समाज के बीच बसपा के प्रति बन रहे नकारात्मक माहौल को दूर करने के मकसद से मायावती ने 2 नवंबर को एक बयान जारी कर डैमेज कंट्रोल करने की कोशि‍श की. मायावती ने कहा, ''मैं राजनीति से संन्यास ले सकती हूं लेकिन भाजपा के साथ मिलकर कभी चुनाव नहीं लड़ सकती.’’ मायावती ने मुसलमानों को यह भी समझाने की कोशि‍श की कि बसपा ने जब भी भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई है भाजपा का ही नुक्सान हुआ है और जब सपा सत्ता में आई है भाजपा का ही फायदा हुआ है. 

बसपा की राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व प्रोफेसर एस.के. द्विवेदी कहते हैं, ''मायावती के सामने इस समय बसपा को राजनीति में प्रासंगिक बनाए रखने का प्रश्न है. लगातार घटते जनाधार से मायावती दुविधा में हैं. वे भले ही भाजपा के साथ मिलकर कभी भी चुनाव न लडऩे की घोषणा कर रही हों लेकिन आम जनता विशेषकर मु‍स्लिम अभी भी मायावती पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं. मायावती के विरोधाभासी रवैये ने बसपा की सियासत को दांव पर लगा दिया है.’’ 

लोकसभा चुनाव के बाद बसपा में मची भगदड़
घूरा राम: कांशीराम के करीबी घूरा राम पूर्वांचल के प्रमुख दलित नेताओं में शुमार थे. 1993 में सपा-बसपा गठबंधन की सरकार में मंत्री रहे घूरा राम 2002 से 2012 के बीच लगातार बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट से बसपा विधायक रहे. पिछले साल 26 अगस्त को वे सपा में शामिल हो गए 

दयाराम पाल: कभी मायावती के करीबी रहे बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दयाराम पाल ने पिछले साल 20 सितंबर को सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखि‍लेश यादव की मौजूदगी में हाथी की सवारी छोड़ साइकिल पर सवार हुए. उनके साथ कई राज्यों में बसपा के प्रभारी रहे मिठाई लाल भी सपा में शामिल हो गए 

विनोद सिंह: बसपा सरकार में मंत्री रहे विनोद सिंह सुल्तानपुर के रहने वाले हैं. लंभुआ से विधायक रहे विनोद पिछले साल लोकसभा चुनाव के बाद 5 दिसंबर को भाजपा में शामिल हो गए थे, हालांकि लोकसभा चुनाव के दौरान इन्होंने सुल्तानपुर और आसपास की सीटों पर भाजपा के लिए वोट मांगा था 

टी. राम: लोक निर्माण विभाग के सेवानिवृत्त प्रमुख अभियंता टी. राम 2012 में बसपा के टिकट पर वाराणसी की अजगरा विधानसभा सीट से विधायक बने. 2017 में अजगरा से विधानसभा चुनाव और मछलीशहर से लोकसभा चुनाव लड़े लेकिन जीत न सके. 5 दिसंबर, 2019 को भाजपा में शामिल हो गए 

राम प्रसाद चौधरी: मायावती सरकार में मंत्री रहे चौधरी की गिनती पूर्वांचल के प्रभावी कुर्मी नेताओं में होती है. वे बस्ती के कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्र से लगातार पांच बार विधायक रहे और एक बार खलीलाबाद लोकसभा सीट से सांसद भी बने. इसी साल 20 जनवरी को वे सपा में शामिल हो गए 

बलिहारी बाबू: कांशीराम के करीबी और बसपा के पूर्व सांसद बलिहारी बाबू की गि‍नती आजमगढ़ समेत पूर्वांचल के कद्दावर नेताओं में होती है. कांशीराम जयंती के मौके पर 15 मार्च को पूर्व सांसद बलिहारी बाबू ने लखनऊ में सपा प्रदेश मुख्यालय में समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की 

चंद्रदेव राम यादव: बसपा के संस्थापक सदस्यों में से एक और कांशीराम के करीबी चंद्रदेव राम यादव ने पिछले साल दिसंबर में मायावती पर उपेक्षा का आरोप लगाकर पार्टी से इस्तीफा दे दिया. पूर्व कैबिनेट मंत्री चंद्रदेव को इस साल 22 जुलाई को अखि‍लेश यादव ने सपा की सदस्यता दिलाई 

रामवीर उपाध्याय: पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय पश्चिमी यूपी में बसपा के ब्राह्मण चेहरा माने जाते थे. लोकसभा चुनाव में टिकट को लेकर अनबन होने के बाद बसपा ने सादाबाद से विधायक रामवीर को पार्टी से निलंबित कर दिया. उनके बेटे ने भाजपा की सदस्यता ले ली


भाने लगा भगवा पार्टी का अंदाज
अनुच्छेद 370: मायावती ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का समर्थन किया था. 26 अगस्त, 2019 को मायावती ने अपने ट्वीट में कहा था, ''डॉ. आंबेडकर जम्मू-कश्मीर में अलग से अनुच्छेद 370 के प्रावधान के पक्ष में नहीं थे. इसीलिए बसपा सांसदों ने इस अनुच्छेद को हटाए जाने का समर्थन किया है.’’ मायावती ने कांग्रेस नेताओं के कश्मीर जाने पर भी सवाल उठाते हुए उसे बिना सोचे-समझे उठाया गया कदम करार दिया था 

आरक्षण समय सीमा: पिछले साल मायावती ने एक बयान जारी करके लोकसभा और विधानसभाओं में एसी-एसटी आरक्षण को फि‍र से 10 साल और बढ़ाने के नरेंद्र मोदी सरकार के फैसले की तारीफ की थी. साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों की नौकरियों में एससी-एसटी वर्ग के कोटे के आरक्षि‍त खाली पड़े पदों को विशेष भर्ती अभि‍यान चलाकर भरने की मांग की थी 

कोरोना में सहयोग: कोरोना के संक्रमण के बीच मायावती ने 3 अप्रैल को बसपा के सभी विधायकों को अपनी विधायक निधि‍ से एक-एक करोड़ रुपए देने का निर्देश दिया था. इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कोरोना के खि‍लाफ प्रदेश सरकार के अभि‍यान में सहयोग देने के लिए मायावती का आभार जताया था 

कोटा अभि‍यान: लॉकडाउन के दौरान कोटा में पढ़ रहे छात्रों को यूपी लाने की प्रदेश सरकार की कवायद का मायवती ने समर्थन किया था. 18 अप्रैल को मायावती ने अपने बयान में कहा, '' यूपी सरकार ने कोटा में फंसे छात्रों को वापस लाने के लिए बसें भेजी. यह स्वागत‍ योग्य है. बसपा इसकी सराहना करती है. पर, सरकार से अनुरोध है कि वह उन लाखों मजदूर परिवारों की भी चिंता करे जो घरों से दूर नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हैं’’

दलित उत्पीडऩ: आजमगढ़ में दलित उत्पीडऩ से जुड़े प्रकरण पर 13 जून को मायावती ने ट्वीट के जरिए अपनी बात रखी. उन्होंने कहा, ''आजमगढ़ में दलित बेटी के साथ हुए उत्पीडऩ के मामले में मुख्यमंत्री देर आए पर दुरुस्त आए, यह अच्छी बात है. लेकिन बहन-बेटियों के मामले में कार्रवाई आगे भी समय से और तुरंत होनी चाहिए तो यह बेहतर होगा’’

आत्मदाह प्रकरण: लखनऊ में लोकभवन के सामने 17 जुलाई की शाम अमेठी की मां-बेटी के आत्मदाह प्रकरण के अगले दिन मायावती ने ट्वीट कर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा किया. उन्होंने कांग्रेस का नाम लिए बिना कहा कि अगर राजनैतिक स्वार्थ की पुष्टि‍ के लिए मां-बेटी को आत्मदाह के लिए उकसाया गया है तो यह गंभीर आपराधि‍क मामला है. इसकी जांच कराकर दोषि‍यों पर कार्रवाई होनी चाहिए.

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