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खास रपटः दूसरी लहर की तेज लपट

देश में कोविड के दोबारा संक्रमण के मामले तेजी से बढ़े, तो, क्या हम अपनी कम मृत्य दर (सीएफआर) को लेकर वाकई राहत महसूस कर सकते हैं?

जरूरी टेस्ट दिल्ली के दरियागंज में कोविड जांच के लिए नमूना लेता एक स्वास्थ्यकर्मी
जरूरी टेस्ट दिल्ली के दरियागंज में कोविड जांच के लिए नमूना लेता एक स्वास्थ्यकर्मी
अपडेटेड 30 सितंबर , 2020

सोनाली आचार्जी

अपूर्वा गुप्ता को कोविड-19 के संक्रमण से उबरकर दिल्ली के सार्वजनिक बैंक की अपनी नौकरी में लौटे अभी महीना भर ही हुआ था. 37 वर्षीय अपूर्वा मधुमेह से ग्रस्त हैं, इसलिए उनके कोविड की चपेट में आने से परिजन और दोस्त सब घबरा गए थे. एक रात उनके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर 86 तक गिर जाने के बाद अगस्त की शुरुआत में वे पांच दिन अस्पताल में भर्ती रहीं. लेकिन ऑक्सीजन के सहारे वे ठीक हो गईं. अपूर्वा कहती हैं, ''टेस्ट नेगेटिव आने के बाद मैं घर लौट आई और मैंने काम से 10 दिन की छुट्टी ले ली ताकि कुछ ताकत जुटा सकूं.'' मगर दफ्तर जाते दो ही दिन हुए थे कि अगस्त के आखिरी हफ्ते में उन्हें फिर बुखार आ गया और सूखी खांसी होने लगी.


उन्होंने गौर किया कि यह बिल्कुल पहले की तरह था. पिछली बार कोविड पॉजिटिव होने के वक्त उन्होंने जो अनुभव किया था, उसके मुकाबले बस इसकी तीव्रता कुछ कम थी. वे कहती हैं, ''मैंने दोबारा कोविड टेस्ट करवाने के बारे में सोचा तक नहीं, लेकिन कुछ दिन बाद डॉक्टर ने टेस्ट करवाने की सलाह दी.'' रिपोर्ट पॉजिटिव आई. वे बताती हैं, ''मुझे फिर अलग-थलग रहना पड़ा और यह बेहद मुश्किल था. मगर इस बार बुखार और खांसी दो दिन में ही ठीक हो गया जिससे तनाव कुछ कम हुआ.'' दो हफ्तों के बाद उनकी टेस्ट रिपोर्ट फिर नेगेटिव आ गई.


दिलचस्प बात यह है कि डॉक्टर इस नतीजे पर पहुंचे कि उनकी बीमारी 'कोविड का पुन:संक्रमण' नहीं बल्कि 'कोविड का पुन: सक्रिय होना' है. कुछ मामलों में ऐसा हो सकता है कि वायरस खून में बचा रह जाए, पर यह इतना कम हो कि आरटी-पीसीआर टेस्ट की पकड़ में न आए. फिर वह इतना बढ़ जाए कि आखिरकार संक्रमण के दूसरे दौर के लक्षण दिखाने लगे. यह पुन: संक्रमण है या संक्रमण का पुन: सक्रिय होना, यह पक्के तौर पर पता लगाने का एकमात्र तरीका रक्तप्रवाह में वायरस की जेनेटिक सिक्वेंसिंग यानी अनुवांशिक टेस्ट करना है.

इसका अध्ययन इंस्टीट्यूट ऑफ जेनोमिक्स ऐंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आइजीआइबी) में किया जा रहा है. यहां वैज्ञानिकों को देश में संक्रमित छह लोगों के खून के वायरल नमूनों में साफ जेनेटिक फर्क दिखाई दिया है. इन छह लोगों में ग्रेटर नोएडा स्थित राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (जीआइएमएस) के दो स्वास्थ्यकर्मी और मुंबई के दो अस्पतालों के चार स्वास्थ्यकर्मी हैं. चिंता की बात यह है कि जिन धागों की सीक्वेंसिंग की गई, उनमें से एक पहले दौर के संक्रमण के दौरान बने ऐंटीबॉडी पाया गया है. आइजीआइबी दिल्ली के डायरेक्टर डॉ. अनुराग अग्रवाल कहते हैं, ''अब तक हमने छह नमूनों का अध्ययन किया है, लेकिन दो दौर के संक्रमणों में हमें फर्क मिले हैं—या तो शरीर में बने ऐंटीबॉडी पर्याप्त लंबे वक्त तक कायम नहीं रहते या फिर यह कोविड की अब ऐसी नस्ल है जो ऐंटीबॉडी की प्रतिरोधक है.''


न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन दावा करता है कि ज्यादातर मामलों (कोविड से उबर चुके 91 फीसद लोगों) में इतने पर्याप्त एंडीबॉडी हैं कि अगले तीन महीनों में होने वाला फौरी पुन: संक्रमण रोक सकें. मगर ऐंटीबॉडी-प्रतिरोधक नस्ल की मौजूदगी इस धारणा को पूरी तरह बदल देगी. दूसरे दौर के संक्रमण की तीव्रता को लेकर भी चिंताएं हैं. अभी तक कोविड के पुन: संक्रमण का केवल एक मामला दर्ज है—अमेरिका के नेवादा में—जिसमें बताए गए लक्षण दूसरी बार ज्यादा तीव्र हैं. कोशिकीय और आण्विक जीवविज्ञान केंद्र (सीसीएमबी) के डायरेक्टर डॉ. राकेश मिश्रा कहते हैं, ''अगर ऐंटीबॉडी-प्रतिरोध विकसित हो रहा है तो वैक्सीन या टीके के लिए इसके नकारात्मक नतीजे हो सकते हैं.''


दूसरी तरफ, कोविड का पुन: सक्रिय होना बनिस्बतन कम चिंता की वजह है. वायरोलॉजिस्ट और वेलकम ट्रस्ट के डायरेक्टर डॉ. शाहिद जमील बताते हैं, ''आरटी-पीसीआर टेस्ट काफी भरोसेमंद है, लेकिन कई सारी भिन्न-भिन्न चीजें नतीजों पर असर डालती हैं. नमूने और वायरस की मात्रा उनमें से दो हैं. अगर नमूना दूषित है या वायरस की मात्रा बहुत कम है, तो नतीजा निगेटिव आ सकता है. इसीलिए यह तय करने के लिए दो टेस्ट करने चाहिए कि शख्स कोविड से मुक्त है या नहीं.'' डॉक्टरों को भी लगता है कि कोविड के गौण मामले का दोबारा उभरना तब तक खतरे की बात नहीं है, जब तक क्वारंटीन के नियम-कायदों का पालन किया जाता है. दिल्ली के राजीव गांधी सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ. बी.एल. शेरवाल कहते हैं, ''लक्षण न हों तब भी कोविड के दूसरे संक्रमण को कोविड के बगैर लक्षणों वाले मामले की तरह देखना चाहिए.

ऐसे मरीज वायरस फैला सकते हैं. अगर वायरस उन्हें कोई न नुक्सान पहुंचाएं, तब भी वह उनके शरीर के द्रवों में मौजूद होगा. बर्तन साझा करने या बगैर मास्क लगाए बातचीत करने से बाज आना चाहिए.'' बगैर लक्षण वाले मामले बहस का विषय बने हुए हैं, लेकिन तमाम अध्ययनों का अनुमान यह है कि दूसरों को जोखिम 10 से 20 फीसद के बीच है. बदकिस्मती से, बगैर लक्षणों वाले या हल्के लक्षणों वाले मामलों की बड़ी तादाद और कम मृत्यु दर (सीएफआर) तथा उबरने की अधिक दर के चलते अब भी कई लोग कोविड की रोकथाम के नियमों को अनदेखा कर देते हैं. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के चेयरमैन डॉ. के.के. अग्रवाल कहते हैं, ''आज आप किसी भी बाजार में जाएं, आप देखेंगे कि आधे लोग सही तरीके से अपना मास्क नहीं पहने हैं. आम राय यह है कि कोविड तुम्हें मारेगा नहीं या यह खतरनाक नहीं है.'' यह आम राय सचाई से कोसों दूर है. ज्यादातर अध्ययनों का कहना है कि मास्क कोविड की आशंका को 80 से 95 फीसद कम कर देता है.

कम मृत्यु दर का मिथक

इसमें कोई शक नहीं कि भारत का सीएफआर महामारी की शुरुआत के बाद से कम हो गया है. मई में 3 फीसद से घटकर 22 सितंबर को यह 1.6 फीसद पर आ गया. अलबत्ता अमेरिका के नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च (एनबीईआर) का हाल का एक अध्ययन कुछ दिलचस्प बातें सामने लाता है. गणितीय मॉडलिंग और अलग-अलग देशों के निश्चित आयु के सीएफआर का इस्तेमाल करके यह अध्ययन इस दावे को खारिज कर देता है कि भारत की मृत्यु दर दुनिया में सबसे कम है. यह कहता है कि भारत में कोविड के 70 फीसद से ज्यादा संक्रमण युवा आबादी (50 से कम उम्र) को हुए हैं जबकि 77 फीसद मौतें 50 से ज्यादा उम्र के लोगों की हुई हैं. युवाओं के कोविड के हमले से बचने की ज्यादा संभावना होती है, जिससे सीएफआर यानी मृत्यु दर थोड़ी भ्रामक हो जाती है, क्योंकि यह आबादी में संक्रमण की कुल संख्या के आधार पर निकाली जाती है. असल में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2 सितंबर को जो नवीनतम डेटा जारी किया है, वह बताता है कि कोविड से मारे गए लोगों में 90 फीसद से ज्यादा 40 साल से ऊपर की उम्र के थे. महाराष्ट्र का राज्य-केंद्रित डेटा भी इन आंकड़ों की तस्दीक करता है. भारत का कुल सीएफआर युवा आबादी और मामलों की बड़ी तादाद की वजह से दुनिया में सबसे कम हो सकता है, लेकिन कोविड के ज्यादा जोखिम से घिरे आयु वर्ग के लोगों की मृत्यु दर या सीएफआर दुनिया के औसत के बराबर ही है (ज्यादातर मौतें 60 से ऊपर के लोगों की हुई हैं).


एनबीईआर ने इसका आगे और विश्लेषण किया. उसने दूसरे देशों के विभिन्न आयु वर्गों के सीएफआर से भारत के अपने आयु वर्गों के आधार पर बंटे आंकड़ों की तुलना की. पता चला कि विभिन्न तारीखों पर भारत का वास्तविक सीएफआर पूर्वानुमानित सीएफआर से कहीं ज्यादा था. डॉ. अग्रवाल कहते हैं, ''मैं कहूंगा कि हम दुनिया में जो हो रहा है, उसके बराबर ही हैं—कम या ज्यादा लोग नहीं मर रहे हैं. मगर जो 60 से ऊपर हैं और जिन्हें दूसरी बीमारियां भी हैं, वे जरूर जोखिम से घिरे हैं. इन कमजोर वर्गों की सीएफआर कोई कम नहीं है.''


कुछ निश्चित तारीखों पर बताई गई मौतों की संख्या को लेकर भी सवाल उठे हैं. मामलों के 'संक्रमित' के तौर पर दर्ज होने और उसके 'मृत्यु' के रूप में दर्ज होने के बीच के समय में फर्क है, इसलिए कहा गया है कि कुछ तारीखों पर कम और दूसरी तारीखों पर ज्यादा मामले दर्ज करके कम सीएफआर का भ्रम पैदा किया जा रहा है. एनबीईआर के अध्ययन में पाया गया कि 10 दिनों और 14 दिनों की भारत की पिछड़ी हुई सीएफआर उन तारीखों पर उसकी वास्तविक सीएफआर से काफी ज्यादा थी. इस अध्ययन से यह भी पता चला कि भारत की सीएफआर चीन, दक्षिण कोरिया और स्पेन सहित कई दूसरे देशों की सीएफआर से कहीं ज्यादा थी.

इटली में बुजुर्ग आबादी का अनुपात ज्यादा है और वहां की सीएफआर भारत की सीएफआर से ज्यादा बनी हुई है. मगर निश्चित आयु के कोविड संक्रमण और कोविड मौतों की तुलना से पता चलता है कि इटली में संक्रमण की कुल संख्या भारत में संक्रमण की कुल संख्या की आधी है बल्कि वहां ज्यादातर बुजुर्ग संक्रमित हैं. डॉ. मिश्रा कहते हैं, ''लगता है हरेक को यह मानने का एक कारण चाहिए कि चीजें बेहतर हो रही हैं... मगर क्या वायरस अब कम गंभीर है और क्या कम लोगों को मार रहा है? हकीकत यह है कि यह अब भी वही वायरस है. यह बेहद संक्रामक है और घातक है.''

राहत और चेतावनी

राहत की असली वजह अलबत्ता भारत में लागों के ठीक होने की दर है. हालांकि इस पर भी पॉजिटिव मामलों की संख्या और आयुवार उनके बंटवारे का असर पड़ता है, लेकिन 22 सितंबर को ठीक होने की दर का हमारा 76 फीसद का आंकड़ा बताता है कि हमारे यहां कोविड का प्रकोप दूसरे देशों से अलहदा नहीं रहा है. 40 वर्ष से कम उम्र के लोगों के ठीक होने की दर तकरीबन 100 फीसद है, जिन्हें कोई दूसरी बीमारी नहीं है. जहां तक पुन: संक्रमण या संक्रमण के पुन: सक्रिय होने की बात है, सतर्क रहना ही कुंजी है. मुंबई के जसलोक अस्पताल के संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. ओम श्रीवास्तव कहते हैं, ''ऐसा नहीं है कि आप कामकाज दोबारा शुरू नहीं कर सकते लेकिन यह जिम्मेदारी से किया जाना चाहिए. हम कोविड के बाद के दौर में नहीं पहुंचे हैं.''


बेफिक्र हो जाने के खिलाफ चेतावनियां कायम हैं और ठीक ही कायम हैं. दिल्ली के अपोलो अस्पताल में पल्मोनोलॉजिस्ट और क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट डॉ. राजेश चावला कहते हैं, ''बदला कुछ नहीं है. कोविड की जांच करना और पॉजिटिव निकले मरीजों को अलग-थलग रखना हमारा सबसे अच्छा दांव है जिससे हमें कमजोर और लाचारों की हिफाजत करनी ही है. यह बीमारी तमाम आयु वर्ग और स्वास्थ्य की अलग-अलग स्थितियों वाले लोगों के लिए खतरनाक और अबूझ बनी हुई है. इसे फैलाने के जोखिम यथासंभव कम करना ही होगा.'' यह खास तौर पर अहम है क्योंकि देश में 10.4 करोड़ (2011 की जनगणना से) बुजुर्ग लोग रहते हैं.

सीएफआर और ठीक होने की दर दोनों ही इस वर्ग को ज्यादा उम्मीद नहीं बंधातीं. विशेषज्ञों का कहना है कि इस वर्ग में आने वाले लोगों के लिए खासकर पुन: संक्रमण जानलेवा होगा. डॉ. शेरवाल कहते हैं, ''पहले दौर में उनके शरीर कमजोर हो चुके होंगे. उन्हें ठीक होने में भी वक्त लगेगा.'' कोविड के बाद जब कई मरीजों के फेफड़े हमेशा के लिए कमजोर हो जाते हैं, ऐसे में बीमारी से उबरने के बाद भी कोई गारंटी नहीं दे सकता कि दूसरा संक्रमण कमजोर और लाचार लोगों की जीवनलीला समाप्त करने वाला नहीं होगा.

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