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ढाक के तीन पात

सात अगस्त को सोनिया गांधी को लिखा गया खत कांग्रेस के लिए इलाज को मजबूर करने वाली चोट जैसा हो सकता था, पर हमेशा की तरह गांधी परिवार के भक्तों ने एकजुट हो खत लिखने वालों की ही लानत-मलामत कर डाली.

छाया राज? कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी बेटे राहुल गांधी के साथ
छाया राज? कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी बेटे राहुल गांधी के साथ
अपडेटेड 4 सितंबर , 2020

अगस्त की 24 तारीख को कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक एक चिट्ठी पर विचार-विमर्श के लिए बुलाई गई थी. यह पत्र नेताओं के एक समूह ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखा था. पार्टी की सर्वोच्च निर्णायक संस्था दो संकल्पों के साथ खत्म हुई और ये दोनों ही अनुमान के अनुरूप थे.

एक, उसने सोनिया से तब तक अध्यक्ष बने रहने को कहा, ‘‘जब तक परिस्थितियां अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआइसीसी) का अधिवेशन बुलाने की इजाजत न दें’’; दूसरा, उन्हें संगठन में अपनी समझ से कोई भी उपयुक्तों बदलाव करने को अधिकृत कर दिया गया.

चिट्ठी पर 7 अगस्त की तारीख थी और इस पर कम से कम 23 नेताओं ने दस्तखत किए थे. इसमें कई दूसरी बातों के अलावा पूर्णकालिक, सक्रिय और सर्वसुलभ नेतृत्व के साथ-साथ सामूहिक नेतृत्व के एक सांस्थानिक तंत्र की मांग की गई थी, जिसका 'गांधी परिवार अभिन्न अंग होगा.’ इससे दो साफ और दोटूक बातें निकलीं.

एक, सोनिया के कांग्रेस अध्यक्ष बने रहने को लेकर तारी अनिश्चितता खत्म होनी चाहिए; दूसरे, गांधी परिवार को सारी सत्ता और अधिकार अपनी मुट्ठी में रखने के बजाए एक सामूहिक व्यवस्था में उनका इस्तेमाल किया जाना चाहिए. कइयों ने इसे गैर-गांधी पार्टी अध्यक्ष की मांग के तौर पर देखा, दूसरों ने इसे पार्टी के असली मुखिया राहुल गांधी के लिए मिल-जुलकर फैसले लेने की कार्यप्रणाली अपनाने के इशारे की तरह देखा.

लिहाजा कार्यसमिति के फैसलों से यह धारणा बनी कि उन तमाम मुद्दों को सिरे से खारिज कर दिया गया है जो पत्र पर दस्तखत करने वालों ने उठाए थे. इन पत्र लेखकों में राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद, कार्यसमिति के सदस्य आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक और जितिन प्रसाद, पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी, शशि थरूर, कपिल सिब्बल और मिलिंद देवड़ा, पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और पृथ्वीराज चव्हाण और बिहार चुनाव अभियान के मौजूदा प्रमुख अखिलेश प्रसाद सिंह शामिल थे.

कांग्रेस महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल ने यह तो कहा कि अगला अध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया यथासंभव जल्द से जल्द शुरू होगी, लेकिन सामूहिक नेतृत्व या संगठन चुनावों की दिशा में उठाए जा रहे कदमों का कोई जिक्रन किया. कार्यसमिति के संकल्प ने निकट भविष्य में गैर-गांधी कांग्रेस अध्यक्ष की संभावना को भी खारिज कर दिया. संकल्प कहता है, ''अत्यधिक प्रबल विचार और कांग्रेस कार्यकर्ताओं की इच्छा को देखते हुए कार्यसमिति ने एकमत से हर संभव तरीके से सोनिया गांधी और राहुल गांधी के हाथ मजबूत करने का संकल्प लिया.’’

बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सामूहिक नेतृत्व का विचार साफ और दोटूक खारिज कर दिया, ''सामूहिक नेतृत्व पर उनके जोर देने से कोई मकसद नहीं सधेगा. हमें नेतृत्व देने के लिए सोनिया जी और राहुल जी पर भरोसा करना पड़ेगा.’’ पूर्व लोकसभा सांसद सुष्मिता देव कहती हैं, ''मैं पार्टी में कमेटियों से थक चुकी हूं. हर फैसले के लिए विचार-विमर्श के बहुत सारे दौर चलते हैं. क्या यह सामूहिक नेतृत्व नहीं है?’’

अलबत्ता पत्र लेखक इसे 'मुंहतोड़ हार’ (जैसा कि उनके विरोधी इसे पेश कर रहे हैं) के तौर पर स्वीकार करने को तैयार नहीं. वे दावा करते हैं कि उन्होंने जिन सुधारों की मांग की है, कांग्रेस का अधिवेशन उनकी शुरुआत की दिशा में पहला कदम होगा. दस्तखत करने वाले एक प्रमुख नेता ने इंडिया टुडे से कहा, ''पत्र में सोनिया या राहुल के नेतृत्व पर सवाल नहीं उठाए गए थे.

यह पार्टी में सांस्थानिक सुधारों और अगले आम चुनाव में 272 की उड़ान का रास्ता खोजने के बारे में था.’’ एक और पत्र लेखक ने कहा कि वे ''रातोरात बदलाव होने की उम्मीद नहीं कर रहे थे. सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया गया है कि महामारी से उबरते ही अध्यक्ष पद का चुनाव होगा. कांग्रेस का अधिवेशन बुलाया जाएगा, जिसका मतलब है कि कार्यसमिति के कुछ चुनिंदा सदस्य अपनी इच्छाएं पूरी पार्टी पर नहीं थोप सकेंगे. यह अच्छी शुरुआत है.’’

यह अच्छी शुरुआत हो या न हो, संगठन में सुधार लाने की इस धड़े की कोशिश ने शुरुआत में ही खटास पैदा कर दी जब चिट्ठी की मुख्य बातें कार्यसमिति की बैठक से एक दिन पहले एक मीडिया संस्थान को बता दी गईं. इन नेताओं को अपनी चिंताएं जाहिर करने का पूरा अधिकार था, लेकिन लीक होने की वजह से, उठाए जा रहे मुद्दों से ध्यान भटक गया. इसकी बजाए बैठक में उन्हें चिट्ठी की मंशा और समय को लेकर सवालों का सामना करना पड़ा.

कुछ ने तो भाजपा के साथ सांठगांठ से साजिश की तरफ इशारा किया. यहां तक कि नपा-तुला बोलने वाले नेता भी 'पत्र लेखकों’ पर जमकर बरसे. मनमोहन सिंह ने कहा, ''सोनिया गांधी को अध्यक्ष बने रहना चाहिए और निहित स्वार्थों की ओर से उठाई जा रही गैरमौजूं बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए...ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि उन्होंने यह सब मीडिया के जरिए उठाया.’’

अप्रिय बाता-बाती के अलावा इस प्रसंग से पार्टी के भीतर की वह फूट भी उजागर हो गई है जो पिछले दो-एक साल में उभरी है. इसके केंद्र हैं राहुल गांधी. असल में, माना जा रहा है कि यह चिट्ठी बम कांग्रेस की नई कार्यकारी टीम की प्रतिक्रिया में फोड़ा गया है जिसकी योजना पिछले दो महीने से भी ज्यादा समय से बनाई जा रही थी.

इसमें मुख्यत: ऐसे लोग शामिल होंगे जो 'कांग्रेस को लेकर राहुल के विजन से मेल खाते’ हैं. पार्टी के अंदरूनी लोगों का दावा है कि राहुल कांग्रेस के शीर्ष पद पर तब तक लौटने को राजी नहीं जब तक उनकी पसंद की टीम काबिज न हो और पार्टी 'निजी हितों को तरजीह देने वाले’ नेताओं से निजात न पा ले.

पिछले साल लोकसभा चुनाव में पार्टी की बुरी हार की जिम्मेदारी लेकर कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देते वक्त राहुल ने तकलीफ जाहिर की थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा-आरएसएस की मशीनरी के खिलाफ अपनी लड़ाई में उन्हें अक्सर अकेला छोड़ दिया गया. 23 जून को कार्यसमिति की बैठक में भी उन्होंने यही शिकायत की और ज्यादातर नेताओं पर मोदी की सीधी आलोचना से बचने का आरोप लगाया.

उनकी बहन और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी उनका साथ दिया, जबकि राहुल के साथ अपनी नजदीकी के लिए जाने जाने वाले राज्यसभा सदस्य राजीव सातव ने वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं में जुझारूपन न होने का आरोप लगाया. इसका जवाब 7 अगस्त की चिट्ठी पर दस्तखत करने वालों में शामिल आनंद शर्मा ने दिया. उन्होंने कहा कि कई बड़े नेताओं ने मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ आगे रहकर मोर्चा संभाला है, संसद के रिकॉर्ड इसके गवाह हैं.

इनमें से कुछ 'पत्र लेखकों’ और राहुल के वफादारों के बीच तनाव 30 जुलाई को कांग्रेस के राज्यसभा सांसदों के साथ सोनिया गांधी की बैठक में भी सामने आए. जब एक और पत्र लेखक और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने पार्टी की ढलान के लिए अपने भीतर झांकने और ईमानदार चर्चा की मांग की, सातव ने पलटवार करते हुए कहा कि अपने भीतर झांकने की शुरुआत यूपीए-दो के वक्त से होनी चाहिए.

अगले दिन तिवारी, थरूर और शर्मा सरीखे यूपीए की सरकार में मंत्री रह चुके नेताओं ने सातव का नाम लिए बगैर सोशल मीडिया पर इसका जवाब दिया और कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को यूपीए और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए. एक हफ्ते बाद सोनिया गांधी के नाम वह पांच पेज की चिट्ठी सामने आई.

कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, पत्र लेखक 'अपनी मां सोनिया गांधी की ओर से पार्टी चला रहे’ राहुल और पार्टी के सत्ता ढांचे में आगे बढ़ते उनके विश्वासपात्रों के साथ लगातार ज्यादा से ज्यादा असहज महसूस कर रहे थे. मसलन, उनके पसंदीदा वेणुगोपाल को न केवल महासचिव (संगठन) बनाया गया बल्कि राजस्थान से राज्यसभा में भेजा गया.

सातव को गुजरात से संसद के ऊपरी सदन में लाया गया. उनके एक और पुराने वफादार अजय माकन को हाल में राजस्थान का प्रभारी महासचिव बनाया गया और कार्यसमिति में शामिल किया गया. सुष्मिता देव अब पार्टी की महिला शाखा की प्रमुख हैं. असम से लोकसभा सांसद 37 वर्षीय गौरव गोगोई पश्चिम बंगाल के प्रभारी हैं, जहां से लोकसभा की 42 सीटें आती हैं.

इससे पहले 18 अप्रैल को जब सोनिया गांधी ने 'मौजूदा चिंता के विषयों पर विचार-विमर्श’ के लिए 11 सदस्यीय सलाहकार समूह का गठन किया था, इसमें सात ऐसे नेताओं को शामिल किया गया था जो पार्टी में अपनी हैसियत के लिए राहुल के ऋणी हैं. इससे कई लोगों में नाराजगी पैदा हुई. गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा सरीखे दिग्गज नेताओं को न लिया जाना उभरते भावी नेतृत्व का संकेत था.

पत्र लेखकों ने इस हक्रते चिट्ठी में राहुल की तो तारीफ की, लेकिन उनके हाथों शुरू की गई युवक कांग्रेस और एनएसयूआइ की चुनाव प्रक्रिया की आलोचना से साफ हो गया कि उनके नेतृत्व के कुछ निश्चित पहलू इस समूह के नेताओं को रास नहीं आए. चिट्ठी में दावा किया गया कि इस चुनाव प्रक्रिया की वजह से धनबल और राजनैतिक संरक्षण वाले लोगों ने इन संगठनों की राज्य इकाइयों पर कब्जा कर लिया है.

ये 'विद्रोही’ राहुल के उस अफसाने का हिस्सा भी नहीं थे, और खुद अपनी इच्छा से नहीं थे, जो वे कोविड-19 महामारी से लेकर लद्दाख में चीनी आक्रामकता तक कई सारे मुद्दों पर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ बुनने की कोशिश करते आ रहे हैं. इनमें से कई तो मोदी पर राहुल के निजी हमलों से असहज थे, क्योंकि ये उलटे कांग्रेस को ही नुक्सान पहुंचाते मालूम देते थे.

कई दूसरे नेता (जो पत्र लेखकों में शामिल नहीं हैं) शिकायत करते हैं कि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर पार्टी का रुख तय करने के लिए कांग्रेस के मंचों पर कोई नियमित चर्चा नहीं होती. असल में, कुछ हल्कों का कहना है कि सामूहिक नेतृत्व का विचार राहुल की एकतरफा कार्रवाइयों का मुकाबला करने के लिए रखा गया. पत्र में कहा गया कि कार्यसमिति की बैठकें इन दिनों किसी विशेष विषय पर केंद्रित होती हैं. संसदीय बोर्ड को फिर से जिलाने की मांग की गई, जिसे 1993 में तब के कांग्रेस अध्यक्ष और प्रधानंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने भंग कर दिया था.

धीरे-धीरे इस तरह दरकिनार कर दिए जाने से न केवल कुछ नेताओं में बेचैनी पैदा हुई, बल्कि इसने पार्टी के भविष्य को लेकर कार्यकर्ताओं को भी चिंतित कर दिया. राहुल कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर न लौटने को अड़े हैं, वहीं इस पद पर बने रहने की सोनिया की अनिच्छा और उनकी सेहत ने अनिश्चितता बढ़ा दी है.

थरूर, तिवारी और देवड़ा सरीखे नेताओं ने पहले भी गैर-गांधी अध्यक्ष चुनने की हिमायत की थी, लेकिन ज्यादातर लोग इस विचार से उत्साहित नहीं दिखे. इन हालात में आम भावना यह है कि एक के बाद एक दो लोकसभा चुनावों में अपमानजनक हार और राज्यों में सिलेसिलेवार पराजयों के बाद कामकाज के मौजूदा रवैए और रफ्तार से पार्टी नहीं चल सकती.

यही वजह है कि 7 अगस्त की चिट्ठी की गूंज अलग-अलग उम्र, भूगोल, पद और वफादारी वाले भिन्न-भिन्न नेताओं के समूह में सुनाई दी और उन्हें एक साथ ले आई. आनंद शर्मा ने ट्वीट किया, ''भाजपा से मुकाबला करने के लिए भारत को मजबूत विपक्ष की जरूरत है. पार्टी को नई ऊर्जा देने के सुझाव ईमानदारी से दिए गए हैं और मतभेद नहीं हैं. उम्मीद है सभी साथियों ने इसे पढ़ा होगा.’’

चिट्ठी में उठाए गए मुद्दों पर कार्यसमिति की बैठक में कोई चर्चा नहीं हुई और बड़ी तादाद में पार्टी नेताओं ने इन मुद्दों से सहमत होने के बावजूद पत्र लेखकों को अपना गिरता राजनैतिक करियर बचाने की कोशिश कर रहे दुस्साहसी नेताओं के समूह के तौर पर खारिज कर दिया.

कार्यसमिति के एक सदस्य ने इंडिया टुडे से कहा, ''पत्र लेखकों में तीन किस्म के नेता हैं. पहली किस्म के नेताओं के खिलाफ विभिन्न मामले चल रहे हैं; दूसरे असंतुष्ट नेता हैं क्योंकि उन्हें कुछ खास पद नहीं मिले या उन्हें खोने का डर है; तीसरे वे नेता हैं जो खुद को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर देखते हैं.’’

इस किस्म की अपमानजनक बातों के बावजूद पत्र लेखक दावा करते हैं कि उन्होंने देश भर से 303 कांग्रेस सदस्यों के दस्तखत जुटा लिए थे. कइयों ने नैतिक समर्थन दिया, हालांकि वे खुलकर सामने आने को तैयार न थे. नैतिक समर्थन मिले या न मिले, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने पार्टी के ढांचे से जुड़े बेहद अहम मुद्दे उठा दिए हैं.

एक पूर्व कांग्रेस मुख्यमंत्री कहते हैं, ‘‘फिलहाल तनाव भले शांत हो गया हो, पर अगर ठोस कदम नहीं उठाए जाते हैं और बदलाव दिखाई नहीं देता है तो असंतुष्टों की तादाद बढ़ेगी. इससे ज्यादा अहम यह कि पार्टी मटियामेट भी हो सकती है.’’ परिवार के वफादार भरोसा दिलाते हैं कि 'जल्द कदम उठाए जाएंगे’. यह तो पहले भी सब सुन चुके हैं. 

चिट्ठी का मजमून लीक हो जाने की वजह से उसमें उठाए गए मुद्दों से ध्यान ही हट गया. कुछ नेताओं ने तो इसमें भाजपा के साथ मिलकर की जा रही एक साजिश भी सूंघ ली

विरोध एक स्वर से
 

गुलाम नबी आजाद
राज्यसभा में विपक्ष के नेता, कार्यसमिति सदस्य

आनंद शर्मा
राज्यसभा सदस्य, कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य

भूपिंदर सिंह हुड्डा
पूर्व मुख्यमंत्री, हरियाणा

कपिल सिब्बल
राज्यसभा सदस्य और पूर्व केंद्रीय मंत्री

शशि थरूर
लोकसभा सदस्य और पूर्व केंद्रीय मंत्री

मनीष तिवारी
लोकसभा सदस्य और पूर्व केंद्रीय मंत्री

वीरप्पा मोइली
कर्नाटक के पूर्व मुक्चयमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री

जितिन प्रसाद
पूर्व केंद्रीय मंत्री

मिलिंद देवड़ा
पूर्व केंद्रीय मंत्री

पृथ्वीराज चौहान
महाराष्ट्र के पूर्व सीएम और पूर्व केंद्रीय मंत्री
 

कहां रखी उंगली
चिट्ठी में उन 'बीमारियों’ की पहचान की गई थी जिनसे कांग्रेस ग्रस्त रही है

युवाओं ने नरेंद्र मोदी के पक्ष में निर्णायक ढंग से वोट डाला है जबकि उनके बीच अपना आधार तेजी से खो रही है. यह गंभीर चिंता का विषय है.

पार्टी का इतनी तेजी से पतन उस समय हो रहा है जब देश आजादी के बाद सबसे गंभीर राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है. यहां तक कि लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार को साल भर से ज्यादा बीत जाने के बाद भी पार्टी ने अपने निरंतर अवसान के कारणों को जानने के लिए ईमानदारी से कोई आत्मनिरीक्षण शुरू नहीं किया है

नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता और पार्टी में अंदरूनी स्थिति डावांडोल होने से कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है

कांग्रेस कार्यसमिति (सीडद्ब्रल्यूसी) भाजपा सरकार के खिलाफ जनमत बनाने में ‘प्रभावी भूमिका’ नहीं निभा पा रही. कार्यसमिति की बैठकें 'कभीकभार’ होती हैं और वे भी राजनैतिक घटनाक्रमों की प्रतिक्रिया में बुलाई जाती हैं. कांग्रेस संसदीय दल (सीपीपी) की बैठक तो सीपीपी अध्यक्ष सोनिया गांधी रस्मी भाषणों और शोक सभाओं तक ही महदूद होकर रह गई है

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों और दूसरे पदाधिकारियों जैसी अहम नियुक्तियों के मामले बिलावजह लटकाकर रखे जाते हैं, किसी राज्य में सक्वमानप्राप्त और व्यापक स्वीकार्यता वाले नेताओं की समय पर नियुक्ति ही नहीं होती. राज्य कांग्रेस अध्यक्षों को संगठन के बारे में निर्णय लेने की आजादी ही नहीं होती

युवक कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआइ) में चुनावों की जो परंपरा शुरू की गई है, उसने खासे टकराव और विभाजन वाली स्थितियां बना दी हैं. इससे हुआ यह है कि इन संगठनों पर उन लोगों ने ‘कब्जा’ करना शुरू कर दिया जिनके पास या तो अकूत पैसा था या जिन्हें किसी राजनैतिक संरक्षण हासिल था

बताया इलाज भी
चिट्ठी में वे उपाय भी सुझाए गए हैं जिनके जरिए कांग्रेस फिर से उठ खड़ी हो सकती है

पूर्णकालिक अध्यक्ष हो जो हमेशा सक्रिय और पार्टीजनों को उपलब्ध रहे

सामूहिक नेतृत्व का कोई संस्थागत तरीका ईजाद किया जाए, गांधी परिवार के सदस्य जिसका अपरिहार्य अंग हों

कांग्रेस कार्यसमिति का चुनाव पार्टी संविधान के तहत हो; कार्यसमिति राष्ट्रीय एजेंडा तय करने और नीतिगत पहलों के लिए एक विचार-बहस की इकाई, उसका मंच बने

कांग्रेस संसदीय बोर्ड की अवधारणा को फिर से ङ्क्षजदा किया जाए, जिसमें पार्टी अध्यक्ष और नौ दूसरे सदस्य शामिल रहें

ब्लॉक, राज्य और अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के स्तर पर संगठनात्मक चुनाव हों

एक स्वतंत्र चुनाव इकाई बनाई जाए जो जो साफ-सुथरे, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक ढंग से सगंठनात्मक चुनाव कराने का पुख्तर इंतजाम करे

समान सोच वाली पार्टियों का एक राष्ट्रीय गठजोड़ बने और कांग्रेस छोड़कर गए नेताओं को फिर से साथ लाने के उपाय किए जाएं

पर कार्यसमिति ने किया क्या?
चिट्ठी में उठाए गए मुद्दों पर कहीं कोई बात ही नहीं हुई. इसके बजाए चिट्ठी लिखे जाने के पीछे के मंतव्य और समय को लेकर सवाल उठाए गए. बैठक के अंत में कार्यसमिति ने किया यह:

''अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का अधिवेशन बुलाने लायक समय और परिस्थिति न बन पाने तक’’ सोनिया गांधी से अध्यक्ष पद पर बने रहने की विनती

सोनिया और राहुल गांधी के हाथ हर संभव ढंग से मजबूत करने का संकल्प लिया

सोनिया को इस बात के लिए अधिकृत किया कि वे संगठन में जिस तरह का बदलाव जरूरी समझें, उसे अंजाम दें 

 

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