केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) की ओर से पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआइए) मसौदा अधिसूचना 2020, 23 मार्च को जारी होते ही पर्यावरणवादियों, ऐक्टिविस्टों और कानूनी पेशेवरों के निशाने पर आ गया था. इन सभी का आरोप है कि केंद्र सरकार इसके जरिए पर्यावरण मंजूरी के नियमों को हल्का कर रही है. पर्यावरण संरक्षण कानून
1986 की धारा 3 के तहत जारी ईआइए अधिसूचना तय करती है कि पर्यावरण पर असर डालने वाली गतिविधियों को नियमों के दायरे में लाने के तौर-तरीके क्या हों. भारत ने ईआइए के मानदंड सबसे पहले 1994 में तय किए थे, जिन्हें 2006 में बदला गया. 14 साल बाद इस प्रक्रिया को ‘‘ज्यादा पारदर्शी और मौजूं’’ बनाने के लिए केंद्र सरकार मानदंडों में संशोधन चाहती है.
मगर आलोचकों का दावा है कि 2020 की यह मसौदा अधिसूचना अगर लागू कर दी जाती है तो यह न केवल नाजुकमिजाज पर्यावरण की कीमत पर उद्योगों की तरफदारी करेगी, बल्कि पर्यावरण से जुड़े फैसले लेने में जन भागीदारी को सीमित कर देगी. इतना ही नहीं,
उल्लंघन करने वालों को यह इनाम बख्शेगी. उनमें से ज्यादातर का यह भी आरोप है कि नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार ईज ऑफ डूइंग बिजनेस यानी कामकाज को आसान बनाने पर जिस तरह से जोर दे रही है, उसका खामियाजा पर्यावरण को भुगतना पड़ रहा है.
भारत ने विश्व बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में पिछले छह साल में लगातार ऊंची छलांग लगाई है और 2014 में 142वें पायदान से बढ़कर 2019 में 63वें पायदान पर आ गया है. इसके ठीक उलट, येल सेंटर फॉर एनवायरनमेंट लॉ ऐंड पॉलिसी के पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में भारत (180 देशों की फेहरिस्त में) 2014 में 155वें पायदान से लुढ़ककर इस साल 168वें पायदान पर आ गया.
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के चीफ एनवायरनमेंट इकोनॉमिस्ट पुष्पम कुमार कहते हैं, ‘‘पर्यावरण और विकास को एक की खातिर दूसरे के साथ समझौते के तौर पर देखा जाता है, जबकि ऐसा है नहीं. सरकार को लंबा-चौड़ा लागत-लाभ विश्लेषण करना ही चाहिए, जिसमें प्रकृति और प्राकृतिक पूंजी पर विकास का प्रभाव भी शामिल हो.’’
कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप के चलते अब बहस ने राजनैतिक मोड़ ले लिया है. ईआइए पर बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हाल ही में सरकार से कहा कि वह ‘‘भारत के पर्यावरण से जुड़े नियम-कायदों को मटियामेट करना बंद करे.’’ उनके बेटे और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, ''मसौदा शर्मनाक ही नहीं, खतरनाक भी है.
इसमें न केवल हमारे पर्यावरण की रक्षा के लिए लड़ी गई सालों लंबी लड़ाई में बमुश्किल तमाम हासिल कई फायदों पर पानी फेर देने की क्षमता है, बल्कि यह भारत भर में पर्यावरण की चौतरफा तबाही और अफरा-तफरी भी ला सकता है.’’ पार्टी में उनके सहयोगी, पूर्व पर्यावरण मंत्री तथा विज्ञान, प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन पर राज्यसभा की स्थायी संसदीय समिति के अध्यक्ष जयराम रमेश मौजूदा पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर के साथ चिट्ठियों की जंग’ में उतर पड़े हैं.
उन्होंने ईआइए मसौदे को ''लोकतंत्र विरोधी, जन स्वास्थ्य विरोधी और सहकारी संघवाद विरोधी’’ करार दिया है. कांग्रेस की नई सहयोगी पार्टी शिवसेना भी इस मंडली में शरीक हो गई, जब उसके नेता और महाराष्ट्र के पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे ने दावा किया कि नया मसौदा 2016 के पेरिस जलवायु समझौते के अनुरूप नहीं है और इसके अलावा यह सतत विकास के लक्ष्य के लिए खतरा है.
जावडेकर ने ‘‘जल्दबाजी और उतावलेपन’’ के लिए आलोचकों की कड़ी निंदा की. उन्होंने कहा कि यह अभी केवल मसौदा अधिसूचना है और इसे अंतिम रूप देने से पहले लोगों की चिंताओं का ख्याल रखा जाएगा. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ‘‘2006 की ईआइए अधिसूचना में 55 संशोधन हुए और 230 ऑफिस मेमोरैंडम जारी किए गए हैं. ईआइए 2020 इन बदलावों का संकलन भर है.’’
कुछ विशेषज्ञ भी मानते हैं कि नया मसौदा कई तदर्थ प्रक्रियाओं को औपचारिक, कारगर और आसान बनाता दिखता है. इंस्टीट्यूट ऑफ ग्रीन इकोनॉमी के डायरेक्टर प्रमोद कांत कहते हैं, ‘‘प्रारूप अधिसूचना से जाहिर मंसूबा मोटे तौर पर तो समझदार नजर आता है.’’
अधिसूचना को अंतिम रूप देने से पहले ईआइए पर उसे मिले 18 लाख सार्वजनिक सुझावों की, पर्यावरण मंत्रालय जांच-पड़ताल कर रहा है.
इस बीच कर्नाटक हाइकोर्ट ने 5 अगस्त को एक आदेश जारी करके केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को 7 सितंबर तक अंतिम अधिसूचना प्रकाशित करने से रोक दिया. खंडपीठ ने कहा, ''पहली नजर में हमें लगता है कि आपत्तियां दाखिल करने का नागरिकों का अधिकार छीन लिया गया है.’’
विवाद के मसले
अधिसूचना में सबसे ज्यादा विवाद इसकी धारा 22 में किए गए बदलाव को लेकर है. यह धारा पर्यावरण मंजूरी लिए बगैर चल रही परियोजनाओं को नए सिरे से मंजूरी लेने और इस उल्लंघन के लिए भारी जुर्माना अदा करके बच निकलने की इजाजत देती है. आलोचक इसे ‘पूर्व प्रभाव से’ दी जा रही मंजूरी और पर्यावरण मंत्रालय को दिए गए अधिकार के घोर उल्लंघन के तौर पर देखते हैं.
सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च से जुड़ी पर्यावरणवादी कांची कोहली कहती हैं, ‘‘यह ईआइए की प्रक्रिया को पूर्व मंजूरी की प्रक्रिया से बदलकर काम के बाद मंजूरी की प्रक्रिया बना देगा.’’
यह प्रावधान अलबत्ता नया नहीं है. एनडीए की पहली सरकार के वक्त मई 2002 में पर्यावरण मंत्रालय ने एक सर्कुलर जारी करके पर्यावरण की मंजूरी लिए बगैर कामकाज शुरू कर चुके उद्योगों को 2003 तक मंजूरी लेने की इजाजत दी थी.
इसे रास्ते से भटकने वाली परियोजनाओं के लिए ''आखिरी और निर्णायक मौका’’ माना गया था. मगर फिर कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार ने 2010, 2012 और 2013 में तीन ऑफिस मेमोरंडम जारी करके कई परियोजनाओं को पूर्व प्रभाव से मंजूरी दी थी.
जनवरी 2016 में राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) ने मई 2002 के सर्कुलर को कानून के खिलाफ ठहराया था. एनजीटी ने मंजूरियों को रद्द करने और उद्योगों को बंद करने के निर्देश दिए थे. केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने मार्च 2017 में एक और अधिसूचना पारित की और कहा कि पूर्व मंजूरी के बगैर चल रही परियोजनाएं पर्यावरण मंजूरी के लिए अर्जी दे सकती हैं.
इस बीच पर्यावरण मंत्रालय की समिति ने 30 से ज्यादा बैठकें करके पर्यावरण मंजूरी के नियमों का उल्लंघन करने वाली ऐसी सैकड़ों परियोजनाओं को मंजूरी दे दी. यह सुप्रीम कोर्ट के अगस्त 2017 के उस फैसले के बावजूद किया गया जिसमें कहा गया था कि ''पूर्व प्रभाव से पर्यावरण मंजूरियां पर्यावरण के लिए नुक्सानदेह होंगी और इनसे पर्यावरण की अपूरणीय क्षति हो सकती है.’’
शीर्ष अदालत ने वैध पर्यावरण मंजूरियों के बगैर चल रही गुजरात की तीन औद्योगिक इकाइयों से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए इस साल अप्रैल में अपना यह पुरजोर रुख दोहराया. उसने 2016 के एनजीटी के आदेश को सही ठहराया. शीर्ष अदालत ने मनमाने उद्योगों की आलोचना तो की पर उन्हें बंद करने का आदेश नहीं दिया.
उसका कहना था, ‘‘पर्यावरण मंजूरियों को रद्द करने और इकाइयों को बंद करने के एनजीटी के निर्देश अनुरूपता के सिद्धांत से मेल नहीं खाते.’’ 2011 में भी लाफार्ज उमियम माइनिंग बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुरूपता का सिद्धांत लागू किया था और फैसला दिया था कि अनुपालन नहीं करने की वजह से प्रतिष्ठान को बंद नहीं किया जा सकता.
उद्योग के जानकारों ने इस कदम का स्वागत किया. पीडब्ल्यूसी इंडिया के सस्टेनेबिलिटी ऐंड रिस्पॉन्सिबल बिजनेस एडवाइजरी के पार्टनर यासिर अहमद कहते हैं, ''यह उल्लंघन करने वालों के लिए अनुपालक बनने का मौका है; यह उनके लिए मुख्यधारा में आने की खिड़की है, खासकर तब जब इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वे जिस मूल्यांकन प्रक्रिया के लिए राजी हो रहे हैं, उसका नतीजा उनके पक्ष में होगा.’’
जावडेकर जोर देकर कहते हैं कि उल्लंघन करने वालों को उनकी परियोजना की वजह से हुए पर्यावरण के नुक्सान की भरपाई के लिए सुधार की योजना लानी होगी और उल्लंघन के कारण पारिस्थितिकी तंत्र को हुए नुक्सान और आर्थिक फायदे के आकलन के हिसाब से उसका 1.5 गुना चुकाना होगा. यही नहीं, अगर प्रदूषक तत्वों में इजाफा हुआ, तो उल्लंघन करने वाले को उसका शुल्क चुकाना होगा, जो उल्लंघन के जुर्माने से अलग होगा.
टीईआरआरई पॉलिसी सेंटर की संस्थापक निदेशक विनीता एच. आप्टे कहती हैं, ''ज्यादा पेनाल्टी का प्रावधान स्वागतयोग्य कदम है. जुर्मानों के जरिए इकट्ठा फंड पर्यावरण की हिफाजत के काम में लाया जा सकता है.’’
मगर दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में अनुपालन के खराब रिकॉर्ड को देखते हुए ‘‘उल्लंघनों को वैध बनाने’’ के लिए ऐसे प्रोत्साहनों का नतीजा मई में विशाखापत्तनम की एलजी पॉलीमर्स गैस लीक और जून में असम के बागजान तेल क्षेत्र में आग सरीखे और ज्यादा हादसों में हो सकता है. एलजी 2017 से ही बिना पर्यावरण मंजूरी के काम कर रही थी.
ऐसी एक परियोजना के लिए अगर पर्यावरण मंजूरी खारिज हो जाती है, तब भी पर्यावरण को हुए नुक्सान की भरपाई कभी नहीं हो पाएगी. वैश्विक रिसर्च संगठन वल्र्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट की मुख्य अर्थशास्त्री मधु वर्मा कहती हैं, ''ईआइए में पारिस्थितिकीय नुक्सान और आर्थिक फायदे के आकलन पर सतही चर्चा ही है. पर्यावरण को होने वाली क्षति और आर्थिक फायदों को लगने वाले चूने का न तो कोई आकलन किया गया है और न ही उनकी कोई सूची बनाई गई है. ऐसे में कोई भी उसका अपने हिसाब से अर्थ निकाल सकता है.’’
नया बंटवारा
मसौदा अधिसूचना परियोजनाओं की तीन श्रेणियां तय करती है—ए, बी1 और बी2. ये पर्यावरण और भूगोल पर हुए असर पर आधारित हैं. ईआइए में दो किस्म की मंजूरियों का प्रावधान है—विशेषज्ञ समिति की स्वीकृति से पूर्व पर्यावरण मंजूरी (ईसी) और समिति की मंजूरी के बगैर पर्यावरण अनुमति/प्रावधान (ईपी). बी2 श्रेणी की कुछ परियोजनाओं को ईसी या ईपी की जरूरत नहीं है. आलोचकों का आरोप है कि आसान मंजूरी पक्की करने की गरज से यह मसौदा कई किस्म की परियोजनाओं को बी2 श्रेणी में ले जाने की कोशिश करता है.
ईआइए मसौदे की धारा 26 के तहत मिट्टी और रेत की खुदाई या कुओं की खुदाई या इमारतों की नींव, सौर ताप ऊर्जा संयंत्र और साझा अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र सरीखे 40 किस्म के उद्योगों/काम-धंधों को ईसी या ईपी से छूट दी गई है.
यही छूट तमाम अंतर्देशीय जलमार्ग परियोजनाओं और राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार या उन्हें चौड़ा करने को दी गई है. आलोचकों का कहना है कि इन छूटों का नतीजा भूल-चूकों की शक्ल में सामने आएगा; भारत में सौ औद्योगिक क्लस्टरों को 2016 में तीव्र/बेहद गंभीर रूप से प्रदूषित की श्रेणी में रखा गया था.
नया मसौदा सरकार की तरफ से 'रणनीतिक’ ठहराई गई किसी भी परियोजना को ईआइए के दायरे से छूट देता है. जावडेकर कहते हैं कि सुरक्षा एजेंसियां तय करेंगी कि क्या रणनीतिक है और क्या नहीं. मगर विशेषज्ञों के मन से संदेह नहीं जाता.
कंजर्वेशन ऐक्शन ट्रस्ट के एग्जीक्यूटिव ट्रस्टी देबी गोयनका कहते हैं, ''रक्षा परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी देने पर मुझे कोई ऐतराज नहीं है. राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता. लेकिन व्यापक मंजूरी देते हुए सरकार को परिचालन ढांचे और गैर-परिचालन ढांचे में फर्क करना ही चाहिए.’’
कई श्रेणियों की परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक विचार-विमर्श की जरूरत को तिलांजलि दे दी गई है. इनमें सिंचाई परियोजनाओं को आधुनिक बनाने, अधिसूचित औद्योगिक एस्टेट के भीतर स्थित परियोजनाएं, राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा से जुड़ी तमाम परियोजनाएं, सरहदी इलाकों में सड़क और पाइपलाइन सरीखी सीधी लंबाई में फैली परियोजनाएं और 12 समुद्री मील के दायरे से बाहर स्थित अपतटीय परियोजनाओं सरीखी श्रेणियां शामिल हैं. विशेषज्ञों की राय में यह ऐसी परियोजनाओं से प्रभावित होने वाले लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार छीनता है और ईआइए प्रक्रिया की पारदर्शिता को कमजोर करता है.
जावडेकर दावा करते हैं कि केवल साफ-सुथरी टेक्नोलॉजी वाले एमएसएमई और उद्योगों को जन सुनवाई के दायरे से बाहर निकाला गया है. वे कहते हैं, ''2006 की अधिसूचना ने नौ श्रेणियों के लिए जन सुनवाई से छूट दी थी. हम इसे घटाकर सात पर ले आए हैं. यूपीए की सरकार के दौरान 19 क्षेत्रों में जन सुनवाई की जरूरत नहीं थी. हमने सीमेंट, ताप बिजली, स्टील, कागज सरीखे 17 बेहद प्रदूषक उद्योगों को इस सूची से हटा दिया.’’
आलोचकों ने सरहदी इलाकों की परिभाषा पर भी सवाल उठाए हैं. यह सरहदी इलाकों को भारत की सरहद पर बसे देशों से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा से 100 किमी हवाई दूरी के भीतर आने वाले भूभाग के तौर पर परिभाषित करती है. उनका कहना है कि इससे उत्तरपूर्व का ज्यादातर हिस्सा इसकी जद में आ जाएगा, जो देश की सबसे समृद्ध जैवविविधता का भंडार है. यह आलोचना पर्यावरण मंत्री को पीछे हटने को मजबूर करने में नाकाम रही.
मंत्री महोदय जन सुनवाई के लिए नोटिस की मियाद को 30 से घटाकर 20 दिन कर देने की बात को भी मामूली मुद्दा कहकर झटक देते हैं. वे कहते हैं, ‘‘आजकल संचार के साधन इतने तेज रफ्तार हैं कि इस प्रक्रिया के लिए 20 दिन काफी हैं.’’ मसौदे की धारा 22 की उपधारा (1) कहती है कि उल्लंघनों की इत्तला सरकार और खुद परियोजना के प्रस्तावक ही दे सकते हैं, नागरिक नहीं. इस बारे में मंत्री का कहना है, ''कोई भी ऐसे उल्लंघन सरकार की जानकारी में ला सकता है. जरूरत होने पर कार्रवाई की जाएगी.’’
2006 की अधिसूचना में परियोजना अनुपालन रिपोर्ट हर छह महीने में दाखिल करना जरूरी था. इसे बढ़ाकर साल में एक बार कर दिया गया है. कई जानकार इसका भी विरोध कर रहे हैं. लेकिन सबसे ज्यादा वे ईआइए की प्रक्रिया में ज्यादा पारदर्शिता और जवाबदेह तंत्र की मांग कर रहे हैं. पारिस्थितिकी विज्ञान केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान की प्रोफेसर रेनी एम. बोर्गेस कहती हैं, ''ईआइए चुनौतीपूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसे महत्वहीन नहीं बनाया जा सकता. यह जरूरी विशेषज्ञता से लैस सक्षम व्यक्तियों/एजेंसियों से ही करवाया जाना चाहिए. ईआइए करने वाले व्यक्तियों/एजेंसियों और परियोजना के प्रस्तावकों के बीच हितों के टकराव की कठोर जांच भी होनी ही चाहिए.’’
राज्यों की औकात क्या!
ईआइए 2020 को राज्यों को विवेकाधिकार से 'वंचित करने’ के लिए भी लगातार खासी आलोचना झेलनी पड़ रही है. मसलन, परिपाटी को उलटते हुए मसौदा उद्योगों का ए, बी1 और बी2 श्रेणियों में बंटवारा करता है. पहले ऐसी श्रेणियां तय करने का विवेकाधिकार राज्यों को दिया गया था. जावडेकर कहते हैं, ''अगर एक राज्य ने एक उद्योग को ए श्रेणी में रखा और दूसरे राज्य ने उसी उद्योग को श्रेणी बी में रख दिया तो? इससे उलझन पैदा हुई, लिहाजा हमने बंटवारे को आसान और कारगर बना दिया.’’
लेकिन रमेश के मन में उस वक्त कोई उलझन नहीं थी, जब उन्होंने राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरणों (एसईआइएए) की नियुक्ति के पर्यावरण मंत्रालय के फैसले को ''सहकारी संघवाद के ताबूत में एक और कील’’ करार दिया. जावडेकर इसके लिए कुछ राज्यों की फैसले न लेने की फितरत को दोषी ठहराते हैं. वे कहते हैं, ''एसईआइएए के सदस्यों को नामजद करना केंद्र का अधिकार है. दिल्ली और झारखंड सरीखे कई राज्यों ने बार-बार याद दिलाने के बावजूद बीते तीन साल से अपने एसईआइएए के लिए लोगों का नामांकन नहीं किया. लिहाजा हमें दखल देना पड़ा.’’
जावडेकर के जवाबी हमलों के बावजूद संरक्षणवादियों का तबका हरित मंत्रालय में फाइलों को तेज रफ्तार से मंजूरी देने के मोदी सरकार के घोषित उद्देश्य को लेकर उत्साहित नहीं हैं. असल में, इस बात को लेकर हो-हल्ला खासा बढ़ा है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण सुरक्षा को एक की खातिर दूसरे के साथ समझौते के तौर पर न देखा जाए. दुनिया का 60 फीसद से ज्यादा जीडीपी प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है.
इसी वजह से वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने हाल में कहा कि जलवायु परिवर्तन और जैवविविधता का नुक्सान कारोबार और उद्योग के लिए दो सबसे बड़े खतरे हैं. 1992 और 2014 के बीच भारत की प्राकृतिक पूंजी में आई गिरावट पर अफसोस जाहिर करते हुए पुष्पम कहते हैं कि सत्ताधारियों को इस रुझान को पलटने पर संजीदगी से ध्यान देना चाहिए. वे कहते हैं, ''दमदार ईआइए यह पक्का कर सकता है, फिर इससे उद्योग और कारोबारों को मदद मिलेगी.’’
जावडेकर भी मानते हैं कि पर्यावरण की हिफाजत करना और टिकाऊ विकास पक्का करना बेहद जरूरी है. वे दावा करते हैं, ''हम इने-गिने देशों में हैं जिनकी पेरिस समझौते पर कथनी और करनी एक है. हमने 2030 तक उत्सर्जन की तीव्रता में 35 फीसद कमी लाने का वादा किया है, जिसमें 21 फीसद हमने पहले ही हासिल कर लिया है.
हमने अपना वनावरण 15,000 वर्ग किमी बढ़ाया है, 2.6 करोड़ हेक्टेयर परती भूमि सुधारने का लक्ष्य भी हाथ में लिया है." अगर सच हैं तो ये सराहनीय उपलब्धियां हैं. लेकिन उस देश में, जिसे पर्यावरण लक्ष्य हासिल करने के मामले में दुनिया के 15 बदतरीन देशों में गिना जाता है, सरकार के लिए आत्मसंतोष की कोई जगह नहीं.
—साथ में, राहुल नरोन्हा
''ईआइए में पारिस्थितिकीय नुक्सान और आर्थिक फायदे के आकलन पर सतही चर्चा ही है. पर्यावरण को होने वाली क्षति और आर्थिक फायदों को लगने वाले चूने का न तो कोई आकलन किया गया है और न ही उनकी कोई सूची बनाई गई है. ऐसे में कोई भी इसका अपने हिसाब से अर्थ निकाल सकता है’’
मधु वर्मा
मुख्य अर्थशास्त्री,
वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट
''पर्यावरण और विकास को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखा जाता है पर ऐसा है नहीं. सरकार को लागत-लाभ का एक व्यापक विश्लेषण करना चाहिए, जिसमें विकास का प्रकृति और प्राकृतिक पूंजी पर पडऩे वाला असर भी शामिल हो. प्रस्तावित ईआइए ने वह काम नहीं किया है"
पुष्पम कुमार
मुख्य पर्यावरणीय अर्थशास्त्री,
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण
कार्यक्रम (यूएनईपी)
‘‘जावडेकर का काम पर्यावरण की रक्षा करना है. सड़कें या बंदरगाह बनवाना उनका काम कब से हो गया? यह काम तो नितिन गडकरी का है. जावडेकर को यह बात पक्की करनी चाहिए कि गडकरी की परियोजनाएं हमारे पर्यावरण को तहस-नहस न करने पाएं. यही उनका काम है’’
देबी गोयन्का
एग्जीक्यूटिव ट्रस्टी,
कंजर्वेशन ऐक्शन ट्रस्ट
‘‘सरकार का कहना है कि ईआइए में जो बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं वे पिछले एक दशक में आए अदालत के फैसलों की रोशनी में किए गए हैं. इसके पीछे प्रतिबद्धता इसी बात की है कि परियोजनाओं के क्रियान्वयन में होने वाली देरी को कम किया जा सके. ईआइए के मसौदे में चीजों को जिस तरह से तैयार किया गया है, वे मोटे तौर पर तो ठीक ही नजर आ रही हैं’’
प्रमोद कांत
डायरेक्टर,
इंस्टीट्यूट ऑफ ग्रीन इकोनॉमी
''ईआइए में नया कुछ भी नहीं है. यह 2006 के बाद से संशोधनों और सरकारी आदेशों के जरिए अस्तित्व में आई तमाम प्रक्रियाओं का नियमन भर है. इन नई अधिसूचना का श्रेय भी उन सभी सरकारों को लेना होगा, साथ ही किसी भी तरह के आरोपों का ठीकरा भी सबके सर पर फूटेगा’’
विनीता एच. आप्टे
संस्थापक अध्यक्ष,
टीईआरआरई पॉलिसी सेंटर
‘‘देखिए, ईआइए एक बेहद चुनौतीपूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया है और इसे किसी भी तरह के दांव-पेच में नहीं उलझाया जाना चाहिए. इसमें सक्षम लोग और एजेंसियां ही शामिल हों तो अच्छा है. ईआइए और प्रोजेक्ट की तैयारी/क्रियान्वयन से जुड़े व्यक्तियों और एजेंसियों के बीच भी हितों का किसी तरह का टकराव नहीं होना चाहिए’’
प्रोफेसर रेनी एम. बोर्गेस
सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज,
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस

