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स्वामित्व योजनाः तय होगा हर घर का मालिक

ड्रोन सर्वे के लिए राज्य पहले सर्वे ऑफ इंडिया से बाकायदा एमओयू करेंगे. जमीन पर प्रॉपर्टी का सीमांकन गांव के लोग, ग्राम पंचायत और राज्य का राजस्व विभाग करेगा. खुला मैदान, सरकारी भूमि, ग्रामसभा की जमीन, लोगों की संपत्ति इन सब संपत्तियों के निर्धारण में राजस्व विभाग और राज्य का पंचायती राज विभाग सर्वे ऑफ इंडिया की मदद करेगा.

स्वामित्व योजना
स्वामित्व योजना
अपडेटेड 7 मई , 2020

कानपुर देहात में मैथा तहसील के अरिमल न्यायी टीपू गांव के शिशुपाल सिंह उर्फ राजा सिंह बताते हैं, ''अभी तक गांव के घरों पर हमारा मालिकाना हक नहीं है. हक हो जाए और बैंक में हमारे मकान की मान्यता हो जाए तो इससे गांववालों को फायदा होगा. उसे इमरजेंसी में कोई जरूरत है तो उसे लोन मिल जाएगा. अभी तो गांव में मकान की कोई वैल्यू नहीं है.'' ये बातें उन्होंने केंद्र सरकार की तरफ से शुरू की गई स्वामित्व योजना से जुड़े सवाल के जवाब में कहीं. शिशुपाल सिंह की पत्नी उमा देवी गांव की प्रधान हैं और वे बताते हैं कि अभी तक गांवों के घरों का जिक्र पंचायत के पास परिवार रजिस्टर में होता है. लेकिन केंद्र सरकार की नई पहल से अब इसकी व्यवस्था बदलने वाली है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंचायती राज दिवस पर 24 अप्रैल को स्वामित्व योजना शुरू की है. केंद्र सरकार की योजना के तहत देशभर के 6.62 लाख से ज्यादा गांवों की रिहाइशी संपत्ति का ड्रोन से सर्वे कर भवन स्वामियों को मकान नंबर के साथ प्रॉपर्टी कार्ड दिया जाएगा. स्वामित्व योजना को चार साल में पूरा किया जाना है. यह इस साल पायलट फेज में है और इसके तहत 1 लाख गांवों में काम होना है.

सरकार के मुताबिक, स्वामित्व योजना का मकसद ग्रामीण रिहाइशी संपत्ति के फायदों को सामने लाना है. सबसे पहले गांव की आबादी के रास्ते के आसपास चूने की लाइन बनाई जाएगी. इसके बाद ड्रोन के जरिए गांवों की आबादी या रिहाइशी इलाकों की हाइ रिजोल्यूशन 2डी तस्वीर खिंचेगी. तस्वीर में मकान की पैमाइश भी आ जाएगी और इसके आधार पर राजस्व विभाग मकानों का नंबर देगा और मकान मालिक को प्रॉपर्टी कार्ड जारी किया जाएगा.

सरकार कहती है कि प्रॉपर्टी कार्ड बन जाने से ग्रामीण रिहाइशी संपत्ति का मौद्रीकरण हो सकेगा, यानी इन्हें गिरवी रखकर बैंकों या वित्तीय संस्थाओं से कर्ज लिया जा सकेगा. संपत्ति को सटीक तरीके से चिन्हित करने से ग्राम पंचायतें बेहतर नागरिक सुविधाएं दे सकेंगी और भविष्य में प्रॉपर्टी टैक्स भी ले सकेंगी. सरकार के लिए विकास की योजनाएं बनाने में आसानी होगी और कोई भी विभाग इन नक्शों का अपने काम में इस्तेमाल कर सकेगा. इससे संपत्ति विवाद और मुकदमे कम होंगे.

हाइ रिजोल्यूशन तस्वीरों पर आधारित नक्शे बनाने का काम सर्वे ऑफ इंडिया करेगा, जिसमें राज्य सरकार का राजस्व विभाग, पंचायती राज विभाग आदि सहयोग करेंगे. सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) गिरीश कुमार कहते हैं, ''इन अत्याधुनिक एचडी तस्वीरों में गांव के हर घर का एक-एक मेजरमेंट रहेगा. टोटल एरिया, कवर्ड एरिया, सब कुछ आ जाएगा. यह मैप से बिल्कुल अलग होगा. नक्शे की भाषा में कहें तो यह 500 के स्केल पर होगा. इस पैमाने पर देश में किसी शहर का मैप अभी तक नहीं बना है. इसके बाद बड़े मैप बनाने की जरूरत नहीं होगी, इन्हीं से बड़े नक्शे बनाए जा सकेंगे. मकानों के नक्शों के आधार पर सरकार मालिकाना हक के कागजात बनाएगी.''

गिरीश कुमार कहते हैं, ''सरकार गांव में नाली का प्लान करना चाहे या पाइपलाइन डालना चाहे तो जमीन की ऊंचाई-निचाई भी इसमें दिखाई जाएगी. गलियों तक का ब्योरा इस डिजिटल मैप में होगा. पांच सेंटीमीटर का रिजोल्यूशन है जिससे 10 सेंटीमीटर की एक्युरेसी हो जाएगी यानी इतनी छोटी चीज भी दिखेगी. आबाद इलाके के मैप आज तक बने नहीं हैं. सरकार ने इन गांवों के लिए टाइटल डीड का इंतजाम कर बहुत बड़ा काम किया है. टाइटल डीड शहरों में भी नहीं होती है.''

ड्रोन सर्वे के लिए राज्य पहले सर्वे ऑफ इंडिया से बाकायदा एमओयू करेंगे. जमीन पर प्रॉपर्टी का सीमांकन गांव के लोग, ग्राम पंचायत और राज्य का राजस्व विभाग करेगा. खुला मैदान, सरकारी भूमि, ग्रामसभा की जमीन, लोगों की संपत्ति इन सब संपत्तियों के निर्धारण में राजस्व विभाग और राज्य का पंचायती राज विभाग सर्वे ऑफ इंडिया की मदद करेगा. ड्रोन सर्वे के दौरान ड्रोन उड़ाने वाली टीम के साथ राजस्व विभाग और ग्राम पंचायत का एक कर्मचारी रहेगा और जरूरत पडऩे पर पुलिसकर्मी भी रहेगा.

सर्वे हो जाने के बाद राज्य का राजस्व विभाग और पंचायती राज विभाग मालिकाना हक की वैधानिकता जांचने के लिए अधिसूचना जारी करेगा. जो भी आपत्तियां आएंगी उनका निस्तारण राजस्व विभाग का जांच अधिकारी करेगा.

संपत्तियों के सत्यापन के बाद नाम बदलने, संयुक्त मालिकाना हक आदि जैसे संशोधन किए जाएंगे. जो मामले फिर भी नहीं सुलझेंगे उन्हें जिला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर के पास भेज दिया जाएगा.

गांवों के ये डिजिटल मैप रक्षा मंत्रालय की मंजूरी के बाद सर्वे ऑफ इंडिया, केंद्र सरकार, राज्य के राजस्व विभाग, पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभाग को सौंपेगा. प्रॉपर्टी कार्ड राज्य के प्राधिकरण और राजस्व विभाग जारी करेंगे. नक्शों को भविष्य में अपडेट कराना राज्य सरकार और ग्राम पंचायतों का दायित्व होगा.

लेकिन जानकार कहते हैं कि यह काम इतना आसान नहीं है. मध्य प्रदेश जैसे ज्यादा जमीन वाले राज्य में राजस्व विभाग के जानकार बताते हैं कि गांवों के लोगों के पास रिहाइशी संपत्ति का कोई दस्तावेज नहीं होता. इस योजना में समस्या यह आएगी कि अगर किसी घर में तीन भाई हैं तो वे कहेंगे कि हमें अलग-अलग प्रॉपर्टी कार्ड मिले और छोटे घरों में ऐसा कर सकना प्रशासन के लिए कठिन काम होगा.

इसके अलावा गांवों की संरचना जटिल है. पुलिया बनी है, उसके बाद किसी का आंगन आया, फिर किसी का घर आ गया. अभी तो कोई किसी को आने-जाने से नहीं रोकता. लेकिन जब संपत्ति की मैपिंग होगी और मालिकाना हक की बात आएगी तो आंगन के लिए भी विवाद होगा.

मध्य प्रदेश सरपंच संगठन के अध्यक्ष सोमेश गुप्ता अंदेशा जताते हुए कहते हैं, ''गांव में बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जिन्होंने गांवों में कई जगह कब्जे करा लिए हैं. लोगों ने तो यहां कब्जे करके शहर के लोगों को भी मकान बेच दिए हैं. इस योजना से तो उनको भी कब्जे मिल जाएंगे. यहां अवैध कब्जे वालों ने कब्जे के बाद आधार कार्ड में पता बदलवाकर वोटर आइडी में नाम भी दर्ज करा लिया है.

पांच-पांच जगह तक लोग कब्जा किए बैठे हैं.'' इससे प्रशासन कैसे निबटेगा, यह देखने लायक रहेगा. गुप्ता का दावा है कि प्रदेश में दमोह तहसील की टिडोनी और कुंवरपुर खेजरा समेत अनेक गांवों में ऐसे कई मकान देखने को मिल जाते हैं. सही मालिक का पता लगाना मध्य प्रदेश के गांवों में बहुत मुश्किल होगा. मध्य प्रदेश में परिवार रजिस्टर जैसा कोई प्रावधान नहीं है.

उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद तहसील अधिवक्ता संघ के पूर्व अध्यक्ष रामानंद गोयल कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश में कुटुंब रजिस्टर में पूरे घर भर के लोगों के नाम होते हैं. ऐसे में गृहस्वामी के न होने पर किसके नाम प्रॉपर्टी कार्ड बनेगा इस बात पर झगड़ा बढ़ेगा.'' सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए गोयल कहते हैं, ''सरकार भविष्य में कमाई का एक जरिया बनाने के लिए यह योजना लाई है. प्रॉपर्टी कार्ड देने का मतलब है आपने एक कस्टमर बना दिया. आज कार्ड दिया, कल को चार्ज लगाकर भेज देंगे.''

खैर, ये तो तब होगा जब ड्रोन मैपिंग हो जाएगी. फिलहाल तो भारत में ग्रामीण संपत्ति का कोई दस्तावेज ही नहीं है.

दरअसल, भारत में लैंड सर्वे हुए दशकों बीत चुके हैं. सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया के मुताबिक, हरियाणा में ही 50 साल पहले सर्वे हुआ था और बाकी राज्यों में भी कमोबेश यही स्थिति रही है. यह प्रोजेक्ट सिर्फ ग्रामीण आबादी क्षेत्र के लिए है. खेती की जमीन का रिकॉर्ड भी उतना दुरुस्त नहीं है. शिशुपाल सिंह कहते हैं, ''परिवारों की संख्या बढ़ गई. एक ही मकान के चार टुकड़े हो गए. वोटर लिस्ट में अ, ब, स लिखकर सभी मालिकों का पता-नाम लिखा जाता है. लिखत-पढ़त में गांवों की संपत्ति कहीं नहीं है. आबादी का नक्शा लेखपाल के पास है. फिलहाल जो मकान बिकते हैं, उसको कहीं दर्ज नहीं किया जाता.''

नीति आयोग की लैंड पॉलिसी सेल के पूर्व प्रमुख और मॉडल लैंड लीजिंग ऐक्ट तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कृषि अर्थशास्त्री तजाम उल हक कहते हैं, ''यह बेहतरीन योजना है जिसकी काफी वक्त से जरूरत थी. गांवों में संपत्ति के विवाद तो हैं और लंबे समय से चले आ रहे हैं. स्वामित्व योजना से उन विवादों को समाप्त करने और कम करने में भी मदद मिलेगी. गांवों में रिहाइशी संपत्ति को पहचान मिलेगी. योजना से मिले डेटा को आगे चलकर देशभर में गांवों की जमीन के डिजिटाइज्ड डेटा से एकीकृत किया जाएगा. गांवों की रिहाइशी संपत्ति को रिकॉर्ड में एक न एक दिन तो लाना ही था और यह काम शुरू हो गया है.''

सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय भी इससे जुड़ी मुश्किलों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, ''यह बिल्कुल नया कदम है. गांवों की बनावट काफी जटिल है और मालिकाना हक का मुद्दा उससे भी ज्यादा जटिल. अभी जो गांवों के मकान बिकते हैं, वे उन लोगों के होते हैं जो गांव छोड़कर जाना चाहते हैं और वे जमीन बेचते हैं. इस जमीन के सौदे में ही मकान का दाम लग जाता है.''

वे कहते हैं कि चकबंदी में खेतों की जमीन का अपडेट तो होता गया लेकिन गांव के घरों के आगे कितना चौड़ा दरवाजा है, कितना बड़ा मैदान है—इसका ब्योरा कहीं दर्ज नहीं है. हालांकि, यह योजना संपत्ति विवादों को कम करने में मददगार रहेगी. गांवों में भैंस बांधने को लेकर भी मुकदमे चलते रहते हैं, इसलिए इस प्रक्रिया में गांवों में लंबित संपत्ति विवाद बाधा बनेंगे. उपाध्याय आशंका जताते हैं कि उत्तर प्रदेश के बेहद घने बसे गांवों में रिहाइशी संपत्ति का निर्धारण करना बहुत मुश्किल होगा.

लेकिन वकील गोयल एक और जटिल मुद्दे को इस योजना से जोड़ते हैं और वह है गांव की राजनीति. वे कहते हैं, ''योजना में जमकर राजनीति होगी. प्रधान अपने गुट को आगे बढ़ाएगा और दूसरे की टांग खींचेगा. गांवों में ज्यादातर पुश्तैनी मकानों की कोई रजिस्ट्री नहीं है और बाद के उत्तराधिकारियों का भी कोई हिसाब नहीं है. पंचायत की राजनीति ने समाज में जबरदस्त बंटवारा कर दिया है. हो सकता है गांवों में कुछ मकानों की रजिस्ट्री हो गई हो. रजिस्ट्री किसी भी संपत्ति की हो सकती है पर वह मालिकाना हक का सुबूत नहीं है. मकान का टाइटल किसके नाम है यह ज्यादा महत्वपूर्ण होगा.''

आशंका जताई जा रही है कि कोई शख्स सालों से गांव के घर नहीं गया तो क्या होगा? इस पर राजस्व विभाग के जानकार कहते हैं, अगर कोई घर 20 साल से खाली है तो उसकी दशा भी खराब हो गई होगी. उसके मालिक लोग आते रहते हैं तो घर की दशा अलग होगी. घर के मालिक का नाम तो सरपंच या कोटवार बता देंगे और उस मकान को इस प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाएगा.

संपत्तियों की पैमाइश से जुड़ी हर प्रदेश की अपनी समस्याएं हैं. मध्य प्रदेश में अवैध कब्जों की समस्या है तो उत्तर प्रदेश में सरकार अवैध कब्जों पर काफी सख्त है. मध्य प्रदेश के उन आदिवासियों के साथ भी समस्या आएगी जो गांवों में रहते हैं. उनके पास पहचान साबित करने का कोई सुबूत ही नहीं होता. इसके विपरीत गांव के दबंग लोगों के पास अनेक संपत्तियां होती हैं. सरकार को इससे ग्रामीण इलाकों में बेहिसाब अचल संपत्ति रखने वालों की भी जानकारी मिलेगी. जाहिर है, सरकार हर संपत्ति को अपनी गिनती में लेना चाहती है.

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