सचमुच न्यारी है कुदरत की गति. उज्जैन में महाकाल को भांग की सप्लाइ रुक जाए, माता के बुलावे पर आने वाले वैष्णो देवी के भक्तों को यह बताया जाए कि रुकिए! माता ही आपके घर आ रही है (ऑनलाइन!), सवालियों की मुराद पूरी होने पर रोज 72 क्विंटल मीठा चावल पकाने वाले, अजमेर शरीफ के दो बड़े देग महीने भर के लिए ठंडे पड़ जाएं तो इसे और कहें भी तो कैसे! देवी-देवताओं के मंदिरों, उनकी चौखट पर लाखों की तादाद में श्रद्धालु रोज दस्तक देते आए थे, इस उम्मीद में कि उनका ईष्ट, उनका आराध्य उन्हें हर तरह की सांसारिक बलाओं, भौतिक दुखों से छुटकारा दिलाएगा, उनके जीवन में अच्छे दिन लाएगा. आज वही देव प्रतिमाएं, उदास-सी श्रद्धालुओं का इंतजार करती प्रतीत हो रही हैं. मस्जिदों में अजान होती है लेकिन घर पर ही नमाज पढऩे को कहा जाता है.

मस्जिदों की सामूहिक नमाज में सिर्फ तीन-चार लोग होते हैं. जुमे की सामूहिक नमाज भी बंद है. चर्च में भी यही हाल है, गुड फ्राइडे को भी चर्चों में सन्नाटा रहा. और यह प्रतीक्षा महीने भर से भी लंबी खिंचती दिख रही है.
दुनिया की आधी आबादी को घरों के भीतर समेट देने वाले और 90,000 से ज्यादा जिंदगियां निगल चुके अदृश्य और अदना-से वायरस ने सर्वशक्तिमान को ही जैसे चुटकी काटकर चिढ़ा दिया है. दानपेटियां एक सिक्के तक की खनक सुनने को तरस गई हैं.
भंडारे भी कमोबेश ठप हैं. पूजास्थलों में पसरे सन्नाटे की तस्वीरें वायरल हो रही हैं. उनसे जुड़े छोटे-बड़े उपक्रमों में लगे कई करोड़ लोगों की रोजी-रोटी संकट में पड़ गई है.
देश में दो दर्जन से अधिक तीर्थस्थल ऐसे हैं जहां रोज 15,000 से लेकर एक लाख श्रद्धालु चौखट पर माथा नवाने आते हैं. सप्ताहांत में यह संख्या डेढ़ से दो लाख तक भी जा पहुंचती है. इस लिहाज से अमृतसर का स्वर्ण मंदिर सबसे बड़ा धर्मस्थल है, जहां रोज का औसत एक लाख का है. ब्रिटेन के वर्ल्ड बुक ऑफ रिकाडर्स ने तो ढाई साल पहले इसे दैनिक फुटफॉल के नजरिये से दुनिया के पहले धर्मस्थल का प्रमाणपत्र दिया था. आज उस स्वर्ण मंदिर के गेट भले बंद न हों पर श्रद्धालुओं की तादाद सीधे दो अंकों पर आ गई है, वे भी अमूमन इंतजामिया कमेटी के लोग. वैसे होली तक तो यहां बिल्कुल कोई असर नहीं पड़ा था. लेकिन जनता कर्प्यू और फिर लॉकडाउन के बाद कदम थम गए. और 2 अप्रैल को स्वर्ण मंदिर के एक पूर्व रागी 62 वर्षीय निर्मल सिंह की कोरोना से हुई मौत के बाद धार्मिक हलका सकते में आ गया.

परिसर में ही चलने वाले लंगर में रोज 50,000 से ज्यादा लोग प्रसाद चखते थे, और जिनमे अच्छी-खासी संख्या शहर में रहने वाले प्रवासियों की होती थी, आज सन्नाटे में है. हालांकि बंद नहीं है.
स्वर्ण मंदिर का इंतजाम देखने वाली शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की धर्म प्रचार समिति के सचिव मंजीत सिंह स्पष्ट करते हैं, ''लंगर बंद होने का तो सवाल ही नहीं उठता.'' लेकिन श्रद्धालुओं की ही आवक ठप पड़ जाने से लंगर की आंच मंद पड़ जाना लाजिमी है.
माता का बुलावा! अजी देवी आपके द्वार
उत्तर भारत के ही एक और बड़े तीर्थ वैष्णो देवी में दर्शन 18 मार्च से ही बंद है. प्रबंधन ने श्रद्धालुओं तक इसकी खबर पहुंचाने का दिलचस्प तरीका अपनाया है. उसकी वेबसाइट पर अपलोड एक वीडियो संदेश में श्रीमाता वैष्णो देवी बोर्ड के सदस्य, आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर श्रद्धालुओं को दिलासा देते हुए कहते हैं, ''इस साल कोरोना वायरस के चलते माता का दरबार पब्लिक के लिए बंद रहेगा...माता इस बार खुद चलकर आपके घर आ रही है...आप माता की आरती टीवी पर देख पाएंगे.'' 17 मार्च यानी दर्शन के आखिरी दिन यहां 14,816 यात्री आए थे. पिछले साल के औसत के हिसाब से देखें तो मध्य अप्रैल तक यात्रा रुकी रही, जिससे बोर्ड को 4.5 से 5 लाख दर्शनार्थियों का नुक्सान उठाना पड़ेगा.

वहीं क्यों? शक्ति उपासना की दृष्टि से अहम माने जाने वाले दूसरे शक्तिपीठों का हाल ऐसा ही है. देवभूमि हिमाचल में भी देवियां रूठ गई लगती हैं. कांगड़ा जिले का प्रसिद्ध शक्तिपीठ वज्रेश्वरी मंदिर हो या ज्वाला जी अथवा चामुंडा देवी.
सब जगह 1-2 पुजारियों से काम चल रहा है. कांगड़ा के रहने वाले मुनीश शर्मा बताते हैं, ''पिछले चैत्र नवरात्र में ज्वाला जी में 70 लाख रु. का चढ़ावा चढ़ा था. तीन लाख तक श्रद्धालु आते थे. पांच दफा आरती होती थी.
अब तो यूट्यूब पर आरती के दर्शन करवाए जा रहे हैं.'' मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) के विंध्यवासिनी धाम सरीखे दूसरे शक्तिपीठ भी नवरात्रों में सूने ही रहे. पूजा में पुजारी समेत बस सात लोग शिरकत कर रहे हैं. पास में ही मां अष्टभुजा और महाकाली मंदिर भी 20 मार्च से पूरी तरह बंद हैं.
बुलेटप्रूफ सुरक्षा में भगवान
मध्य भारत में दूरदराज में स्थित मशहूर साईंबाबा के दरबार में भी कोरोना का काफी खौफ है. दर्जनों दूसरे धर्मस्थलों की तरह यहां से भी ऑनलाइन दर्शन कराए जा रहे हैं, पृष्ठभूमि में अनुराधा पौडवाल और सुरेश वाडकर जैसे गायकों के गाये भजन और आरती के साथ. मैनेजमेंट के तहत आइटी सेल के एक प्रतिनिधि फोन पर बताते हैं, ''इधर कड़क लॉकडाउन है. किसी को इच्च जाने नईं दे रए अंदर.
दर्शन, कैंटीन, रूम बुकिंग सब बंद है 17 (मार्च) से ही.'' धर्मक्षेत्र में इस पूजास्थल का खासा दबदबा है. देश और दुनिया से श्रद्धालुओं की आवक के दबाव, उनमें बड़े भक्तों के रसूख और इस पूरे उपक्रम में जुड़े अर्थशास्त्र को देखते हुए ही ढाई साल पहले यहां हवाईअड्डा शुरू करना पड़ा. अंतरराष्ट्रीय महत्व वाले बौद्धों के आस्था केंद्र बोधगया को छोड़ दें तो किसी धर्मस्थल की वजह से हवाईअड्डा स्थापित करवाने वाला शिरडी पहला शहर होगा. यहां रोज औसतन 50,000 श्रद्धालु आते हैं. रोजाना चढ़ावा 2 करोड़ रु. या 700 करोड़ रु. सालाना है.
उधर, अजमेर में सूफी संत क्चवाजा मोइनुउद्दीन चिश्ती की दरगाह में एक दिन में 72 क्विंटल मीठा चावल पकाने वाले दो देग महीने भर से ठंडे पड़े हैं. इस चौखट पर कोई सवाली कब मन्नत पूरी होने की खुशी में चावल पकाने का 'ऑर्डर' देगा, दरगाह के किसी खादिम को भी नहीं पता. उन्हीं खादिमों में से एक सैयद हमीद चिश्ती बताते हैं कि सारे ऑर्डर फिलहाल कैंसिल करवाए गए हैं. ''रोज 4-5 तो हिंदू भाइयों के ही फोन आ जाते हैं कि मन्नत मांग रखी थी, कहीं ख्वाजा की नाराजगी न हो जाए! उनको समझाना पड़ता है कि इस वक्त जान की सलामती के लिए घर में रहने से बेहतर कुछ नहीं.'' रोज यही कोई 10,000-15,000 सवाली देश और दुनिया के कोने-कोने से अजमेर शरीफ आते हैं.
जुमे और शनिवार-रविवार को यह तादाद 30,000 से 50,000 तक जा पहुंचती है. अजमेर में आज छोटे-बड़े 2,000 होटलों को इन श्रद्धालुओं से कारोबार है. फिलहाल सब ठप है. खादिमों की बिरादरी में भी उदासी है. हमीद अपना पक्ष जोडऩे की कोशिश करते हैं. ''प्रार्थनाएं और दुआएं करने की इजाजत सारी इबादतगाहों को होनी चाहिए थी, भले उनकी तादाद बहुत कम रखी जाती. दुआ की चौखट खुली रहती है तो इनसान में नाउम्मीदी नहीं पैदा होती.''
ज्योतिर्लिंग: सैनिटाइजर का सुरक्षा घेरा
कोरोना के खौफ ने महाकाल की हदों में भी घुसपैठ की है. उज्जैन तो शहर ही सील कर दिया गया है. मंदिर में तो प्रवेश 21 मार्च से ही बंद है. जानकार बताते हैं कि 1992 में देशव्यापी दंगों के दौरान शहर में 4-5 दिन कर्फ्यू लगे होने के बावजूद मंदिर बंद करने के आदेश पहले कभी नहीं दिए गए थे. महाकाल की संध्या आरती में श्रंगार के वक्त भांग चढ़ाई जाती है और यहां के पुजारियों के पैनल में शामिल 27 वर्षीय राघव शर्मा बताते हैं, ''26 मार्च से भांग मिल ही नहीं पा रही थी. 7 अप्रैल को जाकर उसका इंतजाम हो पाया, तब वह महाकाल को चढ़ाई जा सकी. ऐसा पहली बार हुआ है.'' यहां भीतर भले भस्म चढ़ती हो, मंदिर के गेट पर तो सैनिटाइजर ही रक्षक है. लॉकडाउन से कुछ दिन पहले सख्ती के दौरान 3-4 दिन फूल मालाओं के लिए जूझना पड़ा था. पर जल्दी ही मंदिर प्रशासन ने रास्ता निकाल लिया. मंदिर की अपनी गौशाला है तो दूध-दही, पंचामृत की दिक्कत हुई नहीं.

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक अन्य बाबा वैद्यनाथ धाम (देवघर, झारखंड) में भी तड़के सरदारी पूजा और फिर कांचा पूजा के बाद सुबह ही सात बजे पट बंद कर दिए जाते हैं. पूजा में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ कुछेक स्थानीय श्रद्धालुओं को ही आने की इजाजत होती है.
देवघर और आसपास के सैकड़ों होटल, धर्मशालाएं और यहां परिवहन कमोबेश मंदिर की गतिविधि से ही जुड़े हैं. पास के ही मल्हारा गांव के सभी लोग बाबा पर चढ़ाने के लिए फूल-बेलपत्र उगाते थे. उनकी रोजी मारी गई. अब तक देवघर में खपते आए आसपास की सैकड़ों डेयरियों का दूध अब औने-पौने बिक रहा है. स्थानीय पत्रकार अनलकांत मिश्र अंदेशा जताते हैं कि लॉकडाउन का असर यहां सावन के मेले पर भी पड़ सकता है.

बनारस में काशी-विश्वनाथ मंदिर न्यास के सीईओ विशाल सिंह बताते हैं ''लॉकडाउन में पूजा तो हो ही रही है. सुबह की मंगला आरती में 5-6 और शाम की सप्तऋषि आरती में सात पुजारी होते हैं.'' न्यास ने कोरोना से निबटने में लगे डॉक्टरों के क्वारंटीन के लिए गेस्टहाउस स्थानीय प्रशासन को सौंप दिया है.
संकट मोचन हनुमान भी लॉकडाउन झेल रहे हैं. यहां रोज तो 20,000-30,000 भक्त आते थे और मंगलवार को यह संख्या एक से डेढ़ लाख तक पहुंच जाती थी. हां, इस मंदिर की ड्यौढ़ी पर हर साल होने वाला प्रतिष्ठित संकट मोचन संगीत समारोह 12 से 17 अप्रैल तक जरूर होगा: ऑनलाइन.
लॉकडाउन के चलते ओडिशा के जगन्नाथ पुरी में 23 जून से निकलने वाली महाप्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा को लेकर भी कयास लगने लगे हैं. इसमें भागीदारी के लिए हर साल देश-विदेश से 8-10 लोग पुरी आते हैं और यह हिंदुओं के सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक आयोजनों में से एक है. रथ निर्माण के लिए लकड़ी आने के साथ ही उसका पूजन भी हो चुका है. पुरी के मंदिर में रोजाना औसतन 50,000 दर्शनार्थी आते हैं.
श्री जगन्नाथ मंदिर के प्रशासक (रीति-नीति) जितेंद्र कुमार साहू ऊहापोह को स्वर देते हैं, ''रथयात्रा के बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा.'' जानकर बताते हैं कि इससे पहले रथयात्रा भले बिना भक्तों की भीड़ के निकाली गई हो पर कभी रोकी नहीं गई. जहां कभी लाखों रुपए रोज हुंडी में आते थे, आज हालत यह है की 400-500 से लेकर 1,500 रुपए तक आ रहे हैं.
—साथ में, महेश शर्मा, आशीष मिश्र, डी.डी. गुप्ता, मनीष दीक्षित, मंजीत ठाकुर, संध्या द्विवेदी और महेश पांडे
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