अपना कार्यकाल पूरा होने से नौ महीने पहले ही विधानसभा को भंग करके पहली चाल चलकर लाभ पाने की के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) की उम्मीद शायद ज्योतिष के चक्कर में उनसे छूट जाए. मतदान की तारीख 7 दिसंबर के दिन अमावस्या है और मतगणना के दिन 11 दिसंबर को मंगलवार. दोनों ही दिनों को राव अपशकुनी मानते हैं. तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के मुखिया ने इन चुनावों में सौ सीटें और कम से कम 50 फीसदी मत को हासिल करने का लक्ष्य रखा है. इसके लिए वे अधिकतम लोगों तक अधिकतम तोहफे पहुंचाने की रणनीति पर चल रहे हैं.
वे यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि हर परिवार को उनकी सरकार की 40 प्रमुख विकास और कल्याण योजनाओं में से कम से कम तीन का प्रत्यक्ष फायदा मिल सके. उनकी सरकार ने जून 2014 से इन योजनाओं पर 2,18,377 करोड़ रु. खर्च किए हैं और उसका दावा है कि राज्य की कुल 2.14 करोड़ की ग्रामीण आबादी में से 1.5 करोड़ लोगों को इनका फायदा मिला है. अगर इन सभी योजनाओं से लाभ पाने वाले हरेक व्यक्ति को जोड़ लिया जाए तो उनकी कुल संख्या 6,92,46,598 हो जाती है जो राज्य की 3.52 करोड़ की कुल आबादी का तकरीबन दोगुना है. सत्तारूढ़ पार्टी इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है कि चुनावों में उसे इसका भरपूर फायदा मिलेगा.
पार्टी और अपने पिता के लिए प्रचार कर रहे मुख्यमंत्री के बेटे और उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी और पालिका प्रशासन मंत्री के.टी. रामाराव (केटीआर) का कहना है, ''टीआरएस का नारा है श्फिर एक बार, केसीआर.'' उनके मुताबिक, तेलंगाना नया राज्य है, फिर भी वह सालाना 17.17 फीसदी की रफ्तार से विकास कर रहा है और वह केंद्र सरकार को करों में सबसे ज्यादा योगदान कर रहा है. वह भी तब जब उसे कई 'गेम चेंजर' योजनाओं के लिए फंड से वंचित रखा जा रहा है. मसलन, राज्य में सभी घरों में पाइप से पेयजल पहुंचाने की मिशन भगीरथ योजना के लिए 15,000 करोड़ रु. चाहिए और गांवों में सिंचाई टैंकों को पुनर्जीवित करने के लिए मिशन ककातीय योजना के लिए उसे 5,000 करोड़ रु. चाहिए. नीति आयोग ने इन योजनाओं को बाकी राज्यों में भी लागू करने योग्य बताते हुए इनकी सिफारिश की है.

लेकिन केसीआर के सामने कांग्रेस की तगड़ी चुनौती है. उसने 2018 के इन चुनावों को केसीआर परिवार और तेलंगाना के लोगों के बीच धर्म युद्ध के रूप में पेश करने का अभियान छेड़ रखा है. विरोधी दल बार-बार चार मुख्य मुद्दे उठाते रहे हैं पहला कि टीआरएस का शासन निरंकुश है, राज्य को केसीआर के परिवार की जागीर के रूप में तब्दील कर दिया गया है जिसमें केसीआर के अलावा केटीआर, उनके भतीजे और राज्य के सिंचाई मंत्री के.
हरीश राव और बेटी तथा लोकसभा सदस्य के. कविता शामिल हैं. दूसरा, केसीआर का परिवार और उनकी पार्टी के अन्य प्रमुख नेता भारी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. तीसरा, टीआरएस के शासन में लोगों के सभी लोकतांत्रिक अधिकारों का बर्बरता से दमन किया जा रहा है. और चौथा कि टीआरएस की दिल्ली में भाजपा के साथ और हैदराबाद में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआइएमआइएम) के साथ गुपचुप सांठगांठ है.
विश्लेषकों का मानना है कि केसीआर यह उम्मीद लगाए हुए हैं कि वे यह चुनाव मुसलमानों के समर्थन से जीत जाएं और फिर लोकसभा चुनावों के लिए अपनी निष्ठा भाजपा के पक्ष में जता दें. राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में टीआरएस ने भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में वोट दिया था. नोटबंदी और जीएसटी के मुद्दों पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सबसे पहले समर्थन करने वालों में केसीआर ही थे.
राजनैतिक टिप्पणीकार सी. नरसिम्हा राव का कहना है, ''केसीआर इस भरोसे में हैं कि विभिन्न तोहफे देने से लोगों के पास उनके पक्ष में वोट देने के सिवाय और कोई चारा नहीं रहेगा. पर लोग महज इन तोहफों से प्रभावित नहीं होते. जब लोगों को उनकी ईमानदारी पर संदेह होने लगेगा, और जब उन्हें पार्टी में केसीआर को सुधारने वाला कोई और नेता नजर नहीं आएगा, तो हताशा में लोग उनका साथ छोडऩे लगेंगे. उन्हें राजनैतिक दल नहीं हराएंगे, बल्कि लोग हराएंगे.''
कांग्रेस को विधानसभा जल्दी भंग करने के केसीआर के फैसले से झटका लगा था पर उसने एक महाकुटमी (गठबंधन) जोड़ लेने में सफलता हासिल कर ली है जिसमें उसके साथ तेलुगु देशम पर्टी (टीडीपी), तेलंगाना जन समिति और सीपीआइ शामिल हैं. वे दशहरे के आयोजन खत्म होने के बाद 20 अक्तूबर को या उसके बाद अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम की घोषणा करेंगे. तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष एन. उत्तम कुमार रेड्डी कहते हैं, ''टीआरएस से लोगों का व्यापक रूप से मोहभंग होने और उसे अच्छा सबक सिखाने की इच्छा के अलावा सत्ता-विरोधी माहौल भी तेज हो रहा है. लोगों को केसीआर का खेल समझ में आ रहा है.''
केसीआर अपने भाषणों में अब भी अलग राज्य के लिए संघर्ष में टीआरएस के योगदान की याद करा रहे हैं और कांग्रेस और पड़ोसी आंध्र प्रदेश में सत्ता में बैठी टीडीपी को निशाना बना रहे हैं. उनकी नजर में इन दोनों पार्टियों का गठजोड़ असैद्धांतिक है. भले ही खुद टीआरएस 2009 का चुनाव टीडीपी के साथ मिलकर लड़ी थी. केसीआर इस बात से खीझे हुए हैं कि विपक्षी दल एक हो गए हैं और गठबंधन का गणित भी उनके हक में है.
उनकी परेशानियां पार्टी के भीतर उन लोगों के असंतोष से बढ़ गई हैं जिन्हें पार्टी ने टिकट नहीं दिया है. कांग्रेस और टीडीपी को छोड़कर टीआरएस में शामिल हुए विधायकों समेत ज्यादातर मौजूदा पार्टी विधायकों को भी फिर से टिकट देने के राव के फैसले से उन नेताओं में खासा रोष है जो 2014 के चुनावों में टीआरएस के टिकट पर लड़कर हार गए थे. टीआरएस के कई बागी तो कुल 30 सीटों पर निर्दलीय चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं. फिलहाल वे नवंबर की शुरुआत में सभी प्रत्याशियों के नाम अंतिम रूप से तय हो जाने का इंतजार कर रहे हैं.
केसीआर यह भी उम्मीद कर रहे हैं कि छोटे-मोटे सत्ता-विरोधी गुट और छोटी पार्टियां मिलकर महाकुटमी के खिलाफ एक तीसरा मोर्चा बना लेंगी जिससे टीआरएस-विरोधी वोट बंट जाएंगे. तेलुगु अभिनेता पवन कल्याण की जन सेना पार्टी 24 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और बसपा, भाजपा और आम आदमी पार्टी सभी 119 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने वाली हैं. पर टीआरएस के खिलाफ असंतोष पूरे राज्य में फैला हुआ है, खास तौर पर खम्मम, वारंगल और नलगोंडा जिलों में. चिंतित टीआरएस विधायक ई. रविंदर रेड्डी को महिला स्वयं सहायता समूहों को वोट के बदले 5 लाख रु. देने की पेशकश करते हुए वीडियो में कैद कर लिया गया. वायरल हुए इस वीडियो में महिलाएं ज्यादा बड़ी राशि के लिए उनसे मोलभाव कर रही थीं. वहीं अपनी सीट बदलने के इच्छुक गृह मंत्री एन. नरसिम्हा रेड्डी को कथित तौर पर मुख्यमंत्री ने मुलाकात का वक्त ही नहीं दिया.
क्या केसीआर ने चुनाव समय से पहले कराके और उसकी कोई वाजिब वजह न बताकर एक बड़ी भूल कर दी है? फिर कई चुनावी वादे भी अधूरे पड़े हैं जिनमें मुसलमानों के लिए 12 फीसदी आरक्षण, हर दलित परिवार को तीन एकड़ जमीन का अनुदान और हर गरीब परिवार को दो बेडरूम का मकान और एक नौकरी भी इसमें शामिल है. फिर दशहरे पर बाथुकमा साड़ी के वादे को भी कम ही लोग भूले होंगे. चुनाव आयोग ने करीब 91 लाख साडिय़ों के वितरण पर रोक लगा दी है जिस पर राज्य सरकार ने 280 करोड़ रु. खर्च किए थे.
हैदराबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रामब्रह्मम इवातुरी कहते हैं, ''किसी भी नेता के सभी वादों को तो इतने कम समय में लागू नहीं किया जा सकता, वह भी हमारे जैसे संघीय राजनैतिक ढांचे में. पर जब मुख्यमंत्री राज्य सचिवालय भी नहीं जा रहे हों तब संसाधन जुटाने और उन पर निगरानी रखने की चुनौतियां बड़ी हो जाती हैं. केसीआर के बारे में नकारात्मक राय तेजी से बढ़ रही है और देखना है कि वे इस छवि से कैसे निबट पाते हैं.'' लगता है, केसीआर को इन नकारात्मक अवधारणाओं को झटकने और समयपूर्व चुनाव के अपने फैसले को सही साबित करने के लिए कुछ और जादुई करामात करनी होगी ताकि वे टीआरएस को सहजता के साथ जीत दिला सकें.
केसीआर क्या करें
-उम्मीदवारों की पहली सूची में बदलाव कर उसमें जीत को लेकर आश्वस्त लोगों को शामिल करें
-पुराने दिग्गजों को इस बात के लए राजी करें कि वे इंतजार करके लोकसभा चुनाव लड़ें या फिर बाकी मोटे पदों के मौकों का इंतजार करें
-इस बात को साफ करें कि वे क्यों सचिवालय आने से बचते हैं और क्यों विधानसभा चुनाव नौ महीने पहले कराने को तैयार हो गए
-बागियों और उनके समर्थकों को दंडित करें, जरूरत पड़े तो उन्हें टीआरएस से निकाल दें ताकि यह स्पष्ट हो सके कि पार्टी उनके नियंत्रण में है
-इस बात को भी साफ करें कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व इतना कम क्यों है (कैबिनेट में बिल्कुल भी नहीं है) जबकि 2014 में पिछले चुनावों में पुरुषों के 74 फीसदी वोटों के मुकाबले महिलाओं के 74.18 वोट थे
-मतदान और मतगणना के दिनों के अपशकुनी होने को लेकर अंधविश्वास छोडें
***

