बाबा रामदेव बौखलाए हुए हैं. 2014 में भाजपा के सबसे मुखर प्रचारकों में से एक बाबा रामदेव ने हाल ही में घोषणा की कि वे 2019 के आम चुनावों में किसी भी दल का प्रचार नहीं करेंगे.
योग गुरु की इस विरक्ति को समझा जा सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सभी योग कार्यक्रमों से रामदेव को हमेशा दूर रखा. प्रधानमंत्री के आश्वासन के बावजूद केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उनके वैदिक शिक्षा बोर्ड (माना जाता है, आरएसएस इसके सख्त खिलाफ है) के प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं दी.
और सुनने में आया है कि रामदेव के एफएमसीजी, पतंजलि आयुर्वेद को भाजपा शासित राज्यों का पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा है. असम में पतंजलि के खिलाफ एक हाथी की मौत को लेकर एफआइआर दर्ज हुई है, महाराष्ट्र में भूमि अधिग्रहण प्रयास विवादों में उलझ गया है, और बाबा ने हाल ही में धमकाया कि अगर उत्तर प्रदेश की नौकरशाही इसी तरह अड़चनें खड़ी करती रही तो वे राज्य में अपने प्रस्तावित फूड पार्क का काम रोक देंगे. अध्यात्म और व्यापार, दोनों को एक साथ साधे रखना, कोई हंसी-ठट्ठा नहीं है बाबा...
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