राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार की ओर से 2016 में 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद सियासी विवाद का रूप ले चुकी है. कांग्रेस ने विमान की कीमत पर सवाल उठाते हुए सरकार की नीयत पर संदेह जाहिर किया और उसे कारोबारियों को लाभ पहुंचाने वाला बताया है. फ्रांस के साथ गोपनीयता के करार और राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों का हवाला देकर सरकार ने सौदे की कीमत का खुलासा करने से मना कर दिया है.
इससे जुड़े पूरे तथ्य तब सामने आएंगे जब भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) इस साल संसद के समक्ष अपनी रिपोर्ट पेश करेंगे. तब तक यहां पेश हैं सौदे से जुड़े बड़े सवाल और उनके जवाब, जो गहरी पड़ताल के बाद तैयार किए गए हैं.

एनडीए ने राफेल के लिए ज्यादा पैसे दिए, यूपीए ने किया था सस्ते सौदे का करार
पूरे विवाद का निचोड़ यही है, मोदी सरकार पर आरोप लग रहा है कि वह 36 राफेल विमानों की खरीद के लिए फ्रांस को यूपीए सरकार के दौरान 2012 में 126 विमानों के लिए हुए करार में तय रकम से ज्यादा पैसे दे रही है.
यह तुलना निराधार है क्योंकि इस समझौते पर दस्तखत वास्तव में एनडीए सरकार ने किए हैं, यूपीए ने समझौता किया ही नहीं था.
दोनों ही सरकारों ने अपने कार्यकाल में करार से जुड़े सौदों की सही लागत का ब्यौरा अब तक जाहिर नहीं किया है.
एनडीए ने संकेत दिया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल 2015 में फ्रांस की अपनी राजकीय यात्रा के दौरान फ्रांस को बेहतर कीमत पर राफेल सौदे के लिए राजी कर लिया.
मोदी और तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के हस्ताक्षरित सहमति पत्र में एमएमआरसीए (मध्यम मल्टी-रोल काम्बैट एयरक्राफ्ट) की खरीद के लिए समझौते पर हस्ताक्षर हुए जिसकी शुरुआत 2004 में मनमोहन सिंह सरकार ने की थी.
भारत और फ्रांस ने विमान की खरीद के लिए अंतर-सरकार समझौते (आईजीए) पर दस्तखत किए जिसकी शर्तें "दासो एविएशन की ओर से स्वतंत्र रूप से विमानों की आपूर्ति के लिए प्रस्तावित करार से बेहतर हैं.''
यूपीए ने भी कभी यह नहीं बताया कि 2011 में दासो एविएशन ने विमानों की आपूर्ति के लिए आखिर कितने की बोली लगाई थी जिसके आधार पर सरकार ने जनवरी 2012 में इस फ्रांसीसी लड़ाकू विमान निर्माता कंपनी को एल-1 या सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी घोषित कर दिया था.
उसके बाद इसकी शर्तों को लेकर कुछ पेंच फंस गया गया और सौदे की बात दो साल तक आगे ही नहीं बढ़ पाई. दरअसल रक्षा मंत्रालय और दासो एविएशन यह तय नहीं कर सके कि 108 राफेल विमानों की जिम्मेदारी किसकी होगी जिन्हें भारत में तैयार किया जाएगा—एचएएल या दासो की.

इस खरीद में इतनी बड़ी रकम जुड़ी थी कि सौदे को अंतिम रूप देने से पहले कई चिंताएं उभरना लाजिमी था.
सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) ने 2007 में ही इस सौदे के लिए हामी भर दी थी और रक्षा मंत्रालय ने 126 लड़ाकू विमानों के लिए 10 अरब डॉलर (39,000 करोड़ रु.) के संभावित खर्च को अपने बजट में शामिल कर लिया. लेकिन जैसे-जैसे अनुबंध पर बात आगे बढ़ी, यह रकम साफ तौर पर अवास्तविक लगने लगी.
रक्षा विश्लेषक नीतिन गोखले की किताब सिक्योरिंग इंडिया द मोदी वे में इस बात का उल्लेख है कि 2011 में रक्षा मंत्रालय ने इस खरीद के लिए 1,63,403 करोड़ रु. (करीब 23 अरब यूरो—यह उस साल रक्षा मंत्रालय के कुल रक्षा बजट के करीब था) का बेंचमार्क तय कर दिया था.
इस आंकड़े के अनुसार ही देखें तो 126 राफेल विमानों के लिए प्रति विमान 1,296 करोड़ रु. की लागत बैठेगी.
पर अधिग्रहण की यह कुल लागत, जैसा कि गोखले कहते हैं, "126 एमएमआरसीए के लिए अनुबंधित कुल लागत से अलग थी, जिसके लिए रक्षा मंत्रालय ने 69,456 करोड़ रु. का बेंचमार्क तय किया था.
इसमें ऑफसेट लोडिंग की लागत शामिल नहीं थी जिसकी अनुमानित रकम 2,530 करोड़ रु. से 5,060 करोड़ रु. के बीच रखी गई थी.''
2014 में एनडीए के सत्ता में आने के बाद भी एचएएल-रक्षा मंत्रालय-दासो के बीच गतिरोध कायम रहा.
2015 में, सरकार ने फैसला किया कि वह इस समझौते को रद्द करके दोनों देशों की सरकारों के बीच गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट (जी2जी) सौदा करेगी और बजटीय कारणों से खरीदे जाने वाले विमानों की संख्या भी कम कर दी गई.
2016 में 36 राफेलों के अनुबंध के तुरंत बाद रक्षा मंत्रालय ने एक ऑफ-द-रिकॉर्ड ब्रीफिंग में संकेत दिया गया कि 36 राफेल विमानों के लिए 7.8 अरब यूरो का करार हुआ है.
इसमें 5 अरब यूरो जहाजों के लिए तथा 2.85 अरब यूरो उसमें लगने वाले हथियारों और भारत की जरूरतों के अनुसार कुछ विशिष्ट संवर्धन के एवज में दिए जाएंगे. इन लड़ाकू विमानों को 70 करोड़ यूरो की लागत से हवा से हवा में मार करने वाली मेटेओर मिसाइलें और हवा से सतह पर मार करने वाली स्कैल्प क्रूज मिसाइलों से लैस करने की बात भी जोड़ी गई.
इसका उद्देश्य कम संख्या में मिलने वाले राफेल जहाजों का अधिकतम उपयोग करके अपनी सामरिक जरूरतों की पूर्ति सुनिश्चित करना था. इस साल 12 मार्च को रक्षा राज्यमंत्री सुभाष भामरे ने बताया कि एक राफेल की मोटे तौर पर लागत 670 करोड़ रु. आएगी जिसमें "संबंधित उपकरण, हथियारों, भारतीय जरूरतों के अनुसार कुछ संवर्धनों और रख-रखाव के खर्चे शामिल नहीं हैं.''
गोपनीयता की शर्त विमानों सौदे की लागत को जाहिर करने से रोकती है
रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने मार्च में राज्यसभा को बताया, "राफेल विमान की खरीद पर भारत और फ्रांस के बीच जो समझौता हुआ है उसे अंतर-सरकार समझौते (आईजीए) के अनुच्छेद 10 के अनुसार जाहिर नहीं किया जा सकता क्योंकि सामरिक समझौते को लेकर 2008 का प्रावधान गोपनीय सूचनाएं और सुरक्षा सामग्री से जुड़ी जानकारियों का खुलासा करने से रोकता है.''
20 जुलाई को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सीतारमण ने प्रधानमंत्री के कहने पर संसद में झूठ बोला था और फ्रांस के राष्ट्रपति ने उन्हें बताया था कि फ्रांस के साथ ऐसा कोई गोपनीयता समझौता नहीं हुआ था.
सौदे के दो पहलू हैं, वाणिज्यिक और तकनीकी—जिसमें हथियार तथा जंगी जहाज की क्षमता से जुड़ी जानकारियां और इसे हासिल करने के लिए देश की लागत कितनी आई है इसका विवरण है. ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो सरकार को इस सौदे से जुड़े वाणिज्यिक पहलुओं से संसद को अवगत कराने से रोकता हो.
संसद की लोक लेखा समिति के सदस्यों और रक्षा मामलों की स्थाई संसदीय समिति को सुरक्षा बलों, सरकारी एजेंसियों और रक्षा मंत्रालय द्वारा नियमित रूप से देश की रक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों की जानकारी दी जाती है.
इंडिया टुडे को 7 मार्च 2018 को दिए अपने एक इंटरव्यू में फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस संदर्भ में एक संकेत भी दिया था. उन्होंने कहा था कि यह भारत सरकार को तय करना है कि वे कौन सी जानकारियां विपक्ष और संसद के साथ साझा करना चाहते हैं.
सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एचएएल की बजाए रिलायंस को यह विमान बनाने का मौका मिला
20 जुलाई को लोकसभा में राहुल गांधी ने कहा, "राफेल सौदा एचएएल (हिंदस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड) से ले लिया गया है और एक कारोबारी को दे दिया गया है जिसे 45,000 करोड़ रु. का फायदा मिला है. उस कारोबारी ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी कोई हवाई जहाज नहीं बनाया.''
ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है कि राफेल यहां देश में ही विमान बनाएगा क्योंकि ये विमान बने-बनाए खरीदे जा रहे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष जिस बात का जिक्र कर रहे थे, वह ऑफसेट प्लान है जिसके तहत दासो एविएशन ने अनिल अंबानी की रिलायंस डीफेंस के साथ भागीदारी कायम की है ताकि 36 राफेल विमान सौदों की 50 फीसदी रकम भारतीय उद्योग के पार्टनर के साथ पुनर्निवेश कर सके.
रक्षा ऑफसेट की शुरुआत 2007 में हुई थी और इसमें ओईएम को प्रतिरक्षा ठेके की कीमत का 30 से 50 फीसदी के बीच हिस्सा भारतीय बाजार से लेना होता है. 36 राफेल के मामले में दासो एविएशन को करीब 30,000 करोड़ रु. के पुर्जे और सेवाएं भारतीय उद्योग से खरीदनी हैं.
दासो एविएशन के दस्तावेज के मुताबिक, दासो-रिलायंस संयुक्त उपक्रम उन 72 भागीदारियों में से एक है जो दासो ने भारतीय उद्योगों के साथ जोड़ी हैं
इनमें इंजन के कलपुर्जों के लिए स्नेक्मा-एचएएल एरोस्पेस, मल्टीफंक्शन कॉकपिट डिस्प्ले के लिए सैमटेल, गोदरेज. लार्सन और टूब्रो, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स शामिल हैं. अनिल अंबानी और दासो के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने 27 अक्तूबर 2017 को दासो रिलायंस एरोस्पेस लिमिटेड (डीआरएएल) के तहत, जो दासो और रिलायंस डिफेंस का 51रू49 संयुक्त उद्यम है, फाल्कन बिजनेस जेट के पुर्जे बनाने के लिए एक नए कारखाने की आधारशिला रखी थी. कारखाने ने इस साल अप्रैल में दासो के बिजनेस जेट कॉकपिट का व्यावसायिक उत्पादन शुरू कर दिया.
रक्षा मंत्रालय की खरीद नीति में ऑफसेट पार्टनर चुनने का विकल्प ओईएम पर छोड़ दिया गया है. इसमें कोई असामान्य बात नहीं है, क्योंकि ऑफसेट नीति के तहत विक्रेता या ओईएम को यह इजाजत दी गई है कि वे अपने भारतीय ऑफसेट पार्टनरों (आइओपी) के ब्योरे "या तो ऑफसेट क्रेडिट लेते समय या फिर ऑफसेट जिम्मेदारियों को पूरा करने के एक साल पहले'' दे सकते हैं, जैसा कि बामरे में इस साल मार्च में संसद को बताया था.
प्रक्रियाओं को रखा ताक पर, सीसीएस की मंजूरी नहीं ली
रक्षा मंत्रालय जिन भी बड़ी परिसंपत्तियों की खरीद करता है, वे सब रक्षा खरीद प्रक्रिया से शासित होती हैं. इसमें 3,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के तमाम सौदों के लिए सीसीएस की मंजूरी लेना अनिवार्य है. सीसीएस की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं और उनके अलावा इसमें गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री और विदेश मामलों के मंत्री शामिल हैं. राफेल सौदे का ऐलान प्रधानमंत्री ने अप्रैल 2015 में फ्रांस में किया था और एक सहमति पत्र पर दस्तखत किए गए थे.
सौदे के लिए सीसीएस की मंजूरी 24 अगस्त 2016 को ली गई. वहीं 23 सितंबर 2016 को फ्रांस के रक्षा मंत्री ज्यां-यीव ली ड्रियान और उनके भारतीय समकक्ष मनोहर पर्रिकर ने नई दिल्ली में सौदे पर अंतिम रूप पर दस्तखत किए. एक कांग्रेस सांसद केसवाल का जवाब देते हुए भामरे ने इसी साल 13 मार्च को यह बात संसद में बताई थी.
डीपीपी का पैराग्राफ 71, जो आइजीए पर लागू होता है, ऐसे मौकों का जिक्र करता है जब खरीद मैत्रीपूर्ण बाहरी देशों से की जाएगी. ऐसी खरीद सीएफए (सक्षम वित्तीय प्राधिकार) की मंजूरी के बाद आइजीए पर आधारित होंगी. इस मामले में सीएफए भी सीसीएस ही है.
रक्षा मंत्रालय में पूर्व वित्तीय सलाहकार (अधिग्रहण) अमित कौशिश कहते हैं, "अप्रैल 2015 में जिसका ऐलान किया गया था, वह केवल विमान खरीदने का इरादा था. खरीदने के इरादे के लिए सीसीएस की औपचारिक मंजूरी की जरूरत नहीं है.
यह केवल आइजीए ही है जिसकी मंजूरी लेने की जरूरत है और इस मामले में यह मंजूरी सितंबर 2016 में सौदे पर दस्तखत होने से एक महीने पहले ले ली गई थी.'' सरकार ने इसकी कीमत उजागर नहीं करने की ठान ली है, ऐसे में बात सीएजी पर आकर टिक जाती है कि वह राफेल सौदे की सच्चाई उजागर करे.
दोनों सौदों की कहानी
एमएमआरसीए, यूपीए (2007-2014)
- अगस्त 2007 126 लड़ाकू विमानों के ग्लोबल टेंडर की घोषणा—18 बने-बनाए खरीदे जाएंगे, 108 हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) एसेंबल करेगा. दावेदारों में मिग-29, साब ग्रिपेन, एफ-18, एफ-16, दासो राफेल और ईएडीएस का यूरोफाइटर शामिल थे
- मई 2010 तमाम विमानों के फील्ड परीक्षण पूरे हो गए. भारतीय वायु सेना ने राफेल और यूरोफाइटर को शॉर्टलिस्ट किया
- जनवरी 2012 राफेल एल1 या सबसे कम बोली लगाने वाले के तौर पर उभरा. यूरोफाइटर दौड़ से बाहर हो गया. रक्षा मंत्रालय ने व्यावसायिक मोलभाव शुरू किया. रक्षा मंत्रालय ने खरीद की कुल लागत 1.63 लाख करोड़ रुपए (तकरीबन 30 अरब डॉलर) तय की
- जुलाई 2012 कॉस्ट निगोशिएटिंग कमिटी ने दासो के साथ सौदे पर बातचीत के लिए चार समितियां बनाईं
- मई 2014 एमएमआरसीए सौदा कई मुद्दों की वजह से गतिरोध का शिकार रहा, मुख्य वजह एचएएल में 108 विमानों का लाइसेंस-उत्पादन था, 2014 में सरकार बदलने तक अनुबंध पर दस्तखत नहीं हुए
राफेल, एनडीए (2014-2018)
- 10 अप्रैल 2015 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस की यात्रा पर गए, सीधे फ्रांस की सरकार से 36 राफेल जेट खरीदने के सौदे का ऐलान किया. कीमत बाद में तय की जाएगी
- जुलाई 2015 रक्षा मंत्रालय ने एमएमआरसीए अधिग्रहण रद्दी की टोकरी में डाल दिया. 26 जनवरी 2016 को 36 राफेल के लिए फ्रांस के साथ सहमति पत्र पर दस्तखत हुए. सीसीएस की मंजूरी 24 अगस्त 2016 को मिली
- 23 सितंबर 2016 भारत और फ्रांस ने 36 राफेल की खरीद के लिए इंटर-गवर्नमेंटल समझौते पर दस्तखत किए. कीमत का खुलासा नहीं किया गया, पर ऑफ-द-रिकॉर्ड 7.58 अरब यूरो (58,000 करोड़ रुपए) का जिक्र किया गया. डिलीवरी 2019 में शुरू और 2022 में पूरी हो जाएगी
- 17 नवंबर 2017 रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने मीडिया से कहा कि वे कीमत बात में उजागर करेंगी
- 5 फरवरी 2018 सीतारमण ने फ्रांस के साथ करार में गोपनीयता और राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए कहा कि कीमत नहीं बताई जा सकती
- 20 जुलाई, 2018 संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस. राहुल गांधी ने राफेल सौदे में भ्रष्टाचार और क्रोनी कैपिटलिज्म का आरोप लगाया. प्रधानमंत्री और सीतारमण के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव लाया
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