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माओवादः लाल लड़ाकों को गढ़ में मात

महाराष्ट्र पुलिस ने गढ़चिरौली में माओवादियों के कथित इलाके में घुसकर उन पर भारी हमला किया, लेकिन असली कामयाबी इस पूरे इलाके में विकास कार्यों के जरिए मिलेगी

सटीक निशानाः गढ़चिरौली के जंगलों में महाराष्ट्र के सी-60 पुलिस कमांडो कामयाब रहे
सटीक निशानाः गढ़चिरौली के जंगलों में महाराष्ट्र के सी-60 पुलिस कमांडो कामयाब रहे

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में छोटी नदियों के बीच एक निर्जन टापू पर 23 अप्रैल की रात जंगी पोशाक में करीब 50 पुलिसवालों की दो टुकड़ियों ने घेरा डाल दिया. खुफिया सूचना पक्की थी.

एक बैठक के लिए बड़ी संख्या में माओवादी जुटे थे.

चारों ओर से घिरे माओवादियों पर जिले के माओवादी विरोधी बल सी-60 ने एके-47 राइफलों से गोलियां दागनी शुरू कीं. गोलियों की बरसात जब रुकी तो टापू पर 22 माओवादी मरे पाए गए.इसके अलावा 10 माओवादियों के शव इंद्रावती नदी से निकाले गए.

एक दिन बाद सी-60 की एक दूसरी टुकड़ी ने राजाराम खांडला के जंगलों में आठ माओवादियों को मार गिराया. अमूमन माओवादी पुलिस के लिए जैसे जाल बिछाते हैं, सी-60 की टुकड़ियों ने वैसा ही किया और शिकारियों को ही शिकार बना लिया. इस टुकड़ी में ज्यादातर स्थानीय आदिवासी समुदायों के लोग हैं जो इलाके के चप्पे-चप्पे से परिचित हैं और गुरिल्ला हमला बोलने में पारंगत हैं.

यह सी-60 के 1990 में गठन के बाद से ऐसा पहला ऑपरेशन था, जिसमें उसके पाले में कोई जान नहीं गई. मरने वालों में श्रीनिवास और साईंनाथ शामिल थे. दोनों ही सीपीआइ (माओवादी)के दक्षिण गढ़चिरौली संभाग के प्रमुख नेता बताए जाते हैं. माओवादियों ने जिले को ऐसे ही क्षेत्रीय संभागों में बांटा है.

हालांकि माकपा पोलितब्यूरो की सदस्य वृंदा करात मुठभेड़ की पुलिसिया कहानी पर सवाल उठाती हैं. उन्होंने कहा कि सभी मारे गए माओवादियों के पास हथियार नहीं थे और आशंका जाहिर कीकि मरने वालों में कम से कम आठ तो गांववाले हैं.

3 मई के एक लेख में उन्होंने पूछा, ''सरकारी बयान से कई सवाल उभरते हैं. अगर मुठभेड़ तगड़ी थी तो एक ही ओर के लोग कैसे मारे गए?'' जिले के एसपी अभिनव देशमुख ने इन आरोपोंको खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, ''हमने हर मृतक का विसरा सुरक्षित रखा है. उससे मौत की वजह की पुष्टि हो जाएगी. डीएनए परीक्षण से साबित होगा कि क्या लापता लोग हमारे ऑपरेशनमें मारे गए.''

पुलिस का कहना है कि ये मुठभेड़ें सरकार के माओवादियों के खिलाफ रणनीति तैयार करने के दोटूक रवैए का नतीजा हैं. (देखें ग्राफिकः कारगर रणनीति). गढ़चिरौली जिला आकार में सिक्किमराज्य से दोगुना है.

उसे बम, गोलियों और माओवादियों के लिए ही जाना जाता है. वहां सरकारी अधिकारी और पुलिसवाले भी जाने से घबराते हैं. अब ऐसा लगता है कि उग्रवादियों का सफाया किया जा रहा है औरप्रशासन की पहुंच के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है.

पिछले एक दशक में गढ़चिरौली में करीब 700 माओवादी मारे गए हैं और 2015 के बाद करीब 180 ने समर्पण किया है. पुलिस के मुताबिक, ताजा मुठभेड़ में भामरगढ़ तालुका के माओवादियोंके दो दलम (10-15 हथियारबंद माओवादियों का गुट) का सफाया हो गया है. 2015 में भी पुलिस ने इसी तरह सिरोंचा तालुके के दो दलम का सफाया कर दिया था.

गढ़चिरौली शायद पिछले कुछ साल के एक रुझान को ही दर्शा रहा है कि माओवादी अब हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं और उनके इलाके तेजी से सिकुड़ते जा रहे हैं. 15 अप्रैल को केंद्रीय गृहमंत्रालय ने अति वाम उग्रवाद से भीषण रूप से ग्रस्त 126 जिलों की फेहरिस्त में से 44 जिलों को अलग कर दिया.

यह माओवादियों की ताकत में बड़ी गिरावट दर्शाता है. 2004 में पहली दफा छत्तीसगढ़ में सीपीआइ (माओवादी) नमूदार हुए थे. गढ़चिरौली में करीब 200 सक्रिय माओवादी बताए जाते हैं. उसकेअलावा भंडारा और चंद्रपुर अभी भी अति वामपंथ से ग्रस्त जिलों की फेहरिस्त में हैं. गढ़चिरौली में समस्या सबसे गंभीर है क्योंकि यह सबसे अविकसित जिलों में एक है.

माओवादी विचारधारा प्रशासन के लापता रहने और सुशासन के अभाव पर ही फलती-फूलती है, लेकिन सरकार हालात बदलने की कोशिश कर रही है. मुठभेड़ के हफ्ते भर पहले 14 अप्रैल कोमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने गढ़चिरौली में महिलाओं और बच्चों के लिए 100 बिस्तरों वाले अस्पताल का उद्घाटन किया.

राज्य सरकार ने दूसरी पहलें भी की हैं. मसलन, नागभिड-गढ़चिरौली सड़क, अहेरी में उप जिला अस्पताल, मोबाइल फोन के टावरों के बैंडविड्थ बढ़ाना और गांवों में बिजली पहुंचाना.घने जंगलों और कम आबादी वाला यह जिला पड़ोस के राज्यों तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के जिलों को मिलाकर 'लाल गलियारे' का हिस्सा है. खुली सीमा की वजह से माओवादी आसानी से तीनों

राज्यों की पहाड़ियों और घने जंगलों में आवाजाही करते रहे हैं, लेकिन लगता है, अब यह उतना आसान नहीं रहेगा.इन दो मुठभेड़ों ने सी-60 बल और उसके भेदियों के नेटवर्क की प्रतिष्ठा कायम कर दी है. राज्य के पुलिस महानिदेशक सतीश माथुर कहते हैं, ''वह टीमवर्क था. हमने पिछली गलतियों से सीखली.''

उनका दावा है कि अति वाम उग्रवाद से ग्रस्त गांववालों तक पहुंच बनाने का पुलिस का कार्यक्रम नतीजा दे रहा है. ''हमने माओवादियों से अपील की है कि वे समर्पण करके मुख्यधारा मेंशामिल हो जाएं.''तेलंगाना में मांगी दलम के डिप्टी कमांडर ज्योति पुद्यामी ने पुलिस अपील के बाद गढ़चिरौली में समर्पण कर दिया. उसके सिर पर 4 लाख रु. का इनाम था. एक मृतक माओवादी के परिजन

ने डीएसपी देशमुख को यह मांग कर चौंका दिया कि उसे मुआवजे में घर के बाहर बस एक बोरवेल चाहिए. सी-60 के मुखिया राजेश खोडवे कहते हैं, ''उन्हें सरकार से जो चाहिए, चाहे बोरवेल होया स्कूल या दवाइयां, गांववाले पहले पुलिस के पास आते हैं. हम खुशी-खुशी उनकी मांग पूरी कर देते हैं.''

लोगों तक पहुंच बनाने के लिए पुलिस ने स्कूल, सड़क, दवाखाने बनाने का काम हाथ में ले रखा है और ग्राम पंचायत का चुनाव भी कराते हैं. इससे गांववालों का भरोसा बढ़ा है. पिछले तीनसाल में 57 पुलिस चौकियां बनी हैं और हरेक में 100 पुलिसवाले हैं. मतलब, औसतन हर 15 किमी पर एक पुलिस चौकी. इसके अलावा पिछले दो साल में 150 अतिरिक्त पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति हुई है. फड़नवीस ने जिस अस्पताल का उद्घाटन किया,

उसे मिलाकर तीन बड़े अस्पताल बने हैं और दसवीं कक्षा तक के 66 स्कूलों की नींव रखी गई है.ऐसे संकेत हैं कि माओवादियों से लोगों की सहानुभूति भी कम होती जा रही है. यह अपवाद ही है, पर भामरागढ़ के एक ग्रामीण ने देशमुख को माओवादियों को मार गिराने के लिए शुक्रिया कहा.

कल्पना जुमनाले के पति कालिदास को पिछले साल अप्रैल में माओवादियों ने मार दिया था. माहौल बदलने का अंदाजा एक और घटना देती है. इस साल मार्च में काटेहारी गांव के दुर्गा पाटील को माओवादियों ने मार दिया तो गांववालों ने उनकी स्मृति में स्मारक बनाया. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं, ''स्थानीय लोग तभी आते हैं, जब वे देखते हैं कि हमारे बनाए स्कूल,

दवाखाने और बोरवेल वगैरह काम कर रहे हैं और सुरक्षित हैं.''देशमुख को आगे की चुनौतियों का अंदाजा है. वे कहते हैं, ''जहां विकास नहीं होता, उसी इलाके में माओवादी जड़ जमाते हैं. यातायात के साधन और संचार सुविधाएं होने के बाद माओवाद खत्म हो जाएगा.''

महाराष्ट्र पुलिस के मुताबिक, इससे भी बड़ी चुनौती शहरी इलाकों में माओवादी विचारधारा के प्रसार पर रोक लगाना है. सेना की पूर्व अधिकारी और मुंबई स्थित एनजीओ फोरम फॉर इंटीग्रेटेड नेशनल सिक्योरिटी (एफआइएनएस) की अध्येता स्मिता गायकवाड़ कहती हैं कि शहरी माओवादी राज्य की सत्ता को चुनौती देने के लिए जातियों के बीच मतभेदों को अपना औजार बना रहे हैं.

वे कहती हैं, ''कोरेगांव-भीमा दंगे (जनवरी में) अति वाम संगठनों की साजिश का ही नतीजा थे.'' लेकिन भारिपा बहुजन महासंघ के मुखिया, दलित नेता प्रकाश आंबेडकर इससे इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ''आदिवासी और दलित अपने वाजिब हक की खातिर एकजुट हो रहे हैं.''

स्थानीय लोग गढ़चिरौली में विकास और सुरक्षा तंत्र के असंतुलन की बात करते हैं. सुरक्षा बलों पर 1,000 करोड़ रु. खर्च किए गए जबकि जिला विकास समिति (डीपीसी) को 200 करोड़ रु. का ही आवंटन किया गया, जो विकास कार्य करती है.

गढ़चिरौली में तेंदू पत्ते की खरीदार बीड़ी कंपनियां करीब 600 किमी दूर शोलापुर में हैं. यहां अव्वल किस्म के लौह अयस्क का खनन करने वाली कंपनियां स्थानीय कल्याण के कोष में योगदाननहीं करतीं.

सामुदायिक वन अधिकार के लिए सक्रिय कार्यकर्ता मोहन हीराबाई हीरालाल का मानना है कि 2006 के वन अधिकार कानून पर कारगर अमल से ही माओवादी उग्रवाद को मिटाने में मदद मिलेगी.हालांकि इस कानून पर अमल के मामले में गढ़चिरौली का रिकॉर्ड नासिक जैसे दूसरे जिलों से बेहतर है. गढ़चिरौली में जंगल की जमीन पर आदिवासियों के आधे से अधिक दावे निबटाए जाचुके हैं जबकि नासिक में ऐसा 30 प्रतिशत ही हो पाया है.

जिला कलेक्टर शेखर सिंह कहते हैं कि गढ़चिरौली में फंड की कमी नहीं है और सरकार सीधे जिला परिषद को 200 करोड़ रु. भेज रही है जो डीपीसी के आवंटन के बराबर है. उन्होंने समूचेजिले में स्वास्थ्य, स्वच्छता और संचार सेवाओं का एकीकृत केंद्र स्थापित करने की योजना बनाई है.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पुलिस भर्तियों में स्थानीय नौजवानों को तरजीह देने के लिए गोंडी और माडिया जैसी आदिवासी भाषाओं में परीक्षा-पत्र तैयार कर रहे हैं. फिलहाल,माओवादियों के खिलाफ एक परीक्षा तो सी-60 ने भी पास कर ली है.

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