scorecardresearch

पैबंदों से परेशान देश का कपड़ा उद्योग

भारत का वस्त्र क्षेत्र भारी संख्या में रोजगार पैदा करने में सक्षम है, लेकिन पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी की मार से त्रस्त यह उद्योग औंधे मुंह जा गिरा है, और इसे फौरन राहत की जरूरत है.

मदद की दरकारः मुंबई के पास भिवंडी के पॉवरलूम में बुनकर की दशा
मदद की दरकारः मुंबई के पास भिवंडी के पॉवरलूम में बुनकर की दशा
अपडेटेड 9 मई , 2018

मुंबई से 40 किलोमीटर उत्तर भिवंडी के वजा मोहल्ले की संकरी, सीलन भरी गलियों से गुजरते हुए हम 55 वर्षीय आरिफ अंसारी के साथ उनके पॉवरलूम कारखाने पहुंचे. यह शहर का पुराना हिस्सा है, जिसकी फिजाओं को 1970, 1984 और 1992 के दौरान सांप्रदायिक दंगों ने स्याह कर दिया था, लेकिन आज माहौल काफी बदल चुका है और यहां शांति कायम है.

पर कपड़ा निर्माताओं के लिए स्थिति अब भी ठीक नहीं है. कारखाने में घुमाते समय अंसारी हमसे कहते हैं, ''भिवंडी उपेक्षा का सामना कर रहा है. मौजूदा पीढ़ी को पॉवरलूम कारोबार में दिलचस्पी नहीं है, जो भिवंडी का एकमात्र उद्योग रहा है. वे दूसरी नौकरियों में जा रहे हैं.''

कारखाने में पुराने जमाने के 40 शोर करते पॉवरलूम पर कपड़े तैयार हो रहे थे जो मुंबई और भारत में दूसरे बाजारों तक पहुंचते हैं. अंसारी अपने उद्यमी परिवार की तीसरी पीढ़ी से हैं जिनका मानना है कि ''यहां के ज्यादातर पॉवरलूम के मालिकों की हालत खस्ता है.'' वे अपने कारखाने में बने कपड़े दिखाते हैं जिनमें ज्यादातर पर्दे और चादरें हैं और कहते हैं कि ''वह समय दूर नहीं जब 'मैनचेस्टर ऑफ एशिया' इतिहास की किताबों में ही दर्ज रह जाएगा.''

अंसारी की कड़वाहट बेवजह नहीं है. आज भिवंडी में करीब 5 लाख पॉवरलूम हैं. यहां 1934 में पहले पॉवरलूम की स्थापना हुई थी. 1980 के दशक की शुरुआत में बंबई में कपड़ा मिलों की स्थिति खराब होने पर भिवंडी अचानक शीर्ष पर जा पहुंचा था.

हर महीने यहां करीब 10,000 लाख मीटर कपड़ा तैयार होता है जो देश के कुल उत्पादन का 50 फीसदी है. करघा उद्योग से करीब 10 लाख लोगों को रोजगार मिल रहा है और हर साल 24,000 करोड़ रु. के कपड़े तैयार हो रहे हैं. 90 प्रतिशत करघे पुरानी पीढ़ी के हैं, क्योंकि वे सस्ते हैं.

उनकी उत्पादन क्षमता आधुनिक इकाई के मुकाबले बहुत कम है. आधुनिक लूम खरीदने के लिए पैसे की तंगी की वजह से फैक्ट्री-मालिक चीनी लूम का आयात करते हैं जिसमें इस्तेमाल की गई मशीन 25,000 रु. और नई 3 लाख रु. में आती है. आधुनिक करघे की लागत 30-35 लाख रु. है.

कई लोगों को केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय की संशोधित टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन फंड्स स्कीम (एटीयूएफएस) बहुत उपयोगी नहीं लगती, क्योंकि सहायता राशि मिलने की प्रक्रिया बड़ी जटिल है. भिवंडी में कपड़े का कम उत्पादन और बाजार का अभाव भी उत्पादकों पर भारी पड़ रहा है.

फिर, 2016 की नोटबंदी ने तो मानो उन पर पहाड़ ही ढा दिया, क्योंकि मजदूरों के वेतन का भुगतान नहीं किया जा सका. एक पॉवरलूम के मालिक शरदराम सेजपाल कहते हैं, ''हम मुंबई के व्यापारियों की दया पर हैं. जहां मुंबई के व्यापारियों को कपड़े बेचने पर हमें सिर्फ 2-3 प्रतिशत का मुनाफा मिलता है, वहीं वे 20-25 फीसदी लाभ कमाते हैं.''

भिवंडी के बाहरी इलाके में एक आधुनिक इकाई ऑप्टिमम सिल्क मिल्स के मालिक मनोज शाह के मुताबिक, भारतीय कपड़े विश्व बाजार में चीन, बांग्लादेश और विएतनाम के उत्पादों के मुकाबले पिछड़ रहे हैं क्योंकि उन देशों के कपड़े 30-40 फीसदी सस्ते होते हैं.

मंडराता संकट

भारत के कताई और बुनाई क्षेत्र में पॉवरलूम की अपनी भूमिका है, जिसमें कपास को हथकरघे या मशीन के जरिए धागा बनाकर और फिर बुनकर कपड़े तैयार किए जाते हैं. लेकिन यह टुकड़ों में बंटा है, छोटे पैमाने पर काम कर रहा है और मानव श्रम पर निर्भर है. भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के तहत विदेशों में भारतीय ब्रांडों को बढ़ावा देने के लिए बने ट्रस्ट भारतीय ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन (आइबीईएफ) के अनुसार, इस क्षेत्र में लगभग 39 लाख हैंडलूम और 17 लाख पॉवरलूम हैं. आधुनिक शटल-रहित करघा कुल जरूरत का करीब 1 फीसदी है.

भिवंडी के पॉवरलूम मालिकों की हताशा लगातार गिरते भारतीय वस्त्रोद्योग की स्थिति को दर्शाती है जो फिलहाल 8.9 लाख करोड़ रु. का कारोबार है जिसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 6.5 करोड़ कामगारों को रोजगार मिल रहा है. लेकिन यह विश्व बाजार में अपनी जगह नहीं बना पा रहा, क्योंकि पुराने चलन और टेक्नोलॉजी की वजह से यहां के उत्पादक चीन से टक्कर लेने में असमर्थ हैं.

एक रोड़ा यह भी है कि कपड़ा उत्पादन की प्रक्रिया अलग-अलग स्थानों पर स्थित विभिन्न इकाइयों में पूरी की जाती है. मसलन, लूम जहां कपास या सिंथेटिक धागे से कपड़ा तैयार होता है; प्रिंटिंग और रंगाई और परिधान तैयार करना. इस वजह से लागत बढ़ जाती है.

भारत की तुलना में चीन जैसे देश लागत कम करने और आपूर्ति शृंखला में माल की आवाजाही को सुधारने के लिए टेक्स्टाइल क्लस्टर पर काम कर रहे हैं. प्रमुख वस्त्र उत्पादक देशों में आमतौर पर कताई, बुनाई और कपड़े तैयार करने की पूरी प्रक्रिया एक ही मिल के अंदर होती है. लेकिन भारत में यह आउटपुट का सिर्फ 3 फीसदी है.

भारत में कुल 276 कंपोजिट मिलें काम कर रही हैं, ज्यादातर सार्वजनिक क्षेत्र के अधीन हैं और बीमार हैं. सकल घरेलू उत्पाद में 6 फीसदी का योगदान करने वाला वस्त्रोद्योग आज भी कम उत्पादन, पुरानी मशीनरी और जटिल शुल्क प्रणाली से त्रस्त है जिसमें ऊंची कीमत के परिधानों के आयात को तरजीह दी गई है. अगर कपड़े के आयात को प्रोत्साहित किया जाए तो उनसे परिधान बनाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुनाफा कमाने के लिए बाजार तैयार किया जा सकता है.

भारत के लिए वस्त्र कारोबार संभावनाओं से भरा क्षेत्र है. एक अनुमान के मुताबिक, करीब 77,000 छोटी इकाइयों में कपड़े तैयार किए जाते हैं. इस क्षेत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा पड़ोसी देशों से होने वाला सस्ता आयात है.

मुख्यतः रेडीमेड वस्त्र क्षेत्र से जुड़ी 20,000 फर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था क्लोथिंग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएमएआइ) के अध्यक्ष राहुल मेहता इस बात की पुष्टि करते हैं कि हाल के समय में बांग्लादेश से आयात में काफी तेजी आई है. वे कहते हैं, ''बांग्लादेश के साथ हुए समझौते के कारण चीन का सस्ता कपड़ा बांग्लादेश होते हुए तैयार वस्त्र के रूप में भारत आ रहा है.'' दूसरी ओर, भारत के निर्यात की स्थिति बुरी है.

मेहता कहते हैं, ''जब से जीएसटी लागू हुआ है, हमारे उत्पाद की लागत 5-7 फीसदी बढ़ गई है और इस तरह हमारे निर्यातक दुनिया के दूसरे देशों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं. आमतौर पर निर्यातक बहुत कम मुनाफे पर काम करते हैं.

ऐसे में लागत में 5 प्रतिशत अंकों का इजाफा भी बहुत भारी पड़ता है. इसके अलावा, नई कर व्यवस्था में निर्यातकों का हजारों करोड़ रुपये का रीफंड अब भी फंसा हुआ है. मेहता कहते हैं, ''यह सही है कि पैसा डूबा नहीं है क्योंकि अंततः निर्यातकों को अपना पैसा मिल ही जाएगा, लेकिन थोड़े समय के लिए उनकी कार्य पूंजी तो फंस गई, इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा.''

भारत के प्रमुख वस्त्र और सिलाई केंद्र तिरुपुर की कहानी इससे अलग नहीं है. निर्यातक जीएसटी से नाखुश हैं. तिरुपुर निर्यातक संघ के अध्यक्ष ए. शक्तिवेल कहते हैं, ''चूंकि जीएसटी लागू हो गया, निर्यातकों को मिलने वाला ड्यूटी ड्रॉ बैक और राज्य लेवी के पुनर्भुगतान (आरओएसएल) का लाभ 11 फीसदी से घटकर 3 फीसदी हो गया है.''

इसका असर मुनाफे पर पड़ा है और इकाइयों के सामने बंदी की स्थिति आ गई है. शक्तिवेल कहते हैं, ''हमने सरकार से अनुरोध किया है कि वह पेट्रोलियम जैसे उत्पादों के संबंध में अंतर्निहित कर का रीफंड जारी करा दे.''

गिरता निर्यात

हाल के वर्षों में वस्त्र निर्यात में लगातार गिरावट रही है. भारतीय कपड़ा उद्योग संघ के इस साल फरवरी में इकट्ठा किए आंकड़ों के मुताबिक, कपड़ा और वस्त्र निर्यात जनवरी, 2018 में 13 फीसदी की गिरावट के साथ 18,600 करोड़ रु. पर आ गया, जबकि पिछले साल जनवरी में यह 21,500 करोड़ रु. पर था.

अप्रैल, 2017 से जनवरी, 2018 के बीच कपड़ा और वस्त्र निर्यात में पिछले वर्ष की तुलना में 4 फीसदी की कमी आई जबकि इस दौरान धागा, कपड़ा और परिधानों का आयात 15 फीसदी की दर से बढ़ा. विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत के कपड़ा व्यवसाय की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि जब पूरी दुनिया सस्ते और सुलभ मानव निर्मित धागे की ओर बढ़ रही है, भारत ने सूती कपड़े पर ही ध्यान केंद्रित कर रखा है.

क्रिसिल के वरिष्ठ निदेशक अनुज सेठी कहते हैं, ''आज जब दुनिया भर की खपत में सिंथेटिक कपड़ों की हिस्सेदारी 50 फीसदी से भी अधिक है, भारत का निर्यात मुख्यतः सूती कपड़ों पर ही आधारित है.'' कच्चे माल की सुलभता की वजह से सिंथेटिक कपड़ों के निर्यात में चीन का बोलबाला है. सेठी कहते हैं, ''भारत की शुल्क प्रणाली में सिंथेटिक कच्चे माल पर आयात शुल्क निर्यात प्रोत्साहन की अपेक्षा अधिक है जिसके कारण हमारे कपड़ा निर्माता सिंथेटिक कपड़े की तुलना में सूती कपड़े के निर्यात को तरजीह देते हैं.''

इसके अलावा हमारे यहां निर्यात को बढ़ावा देने के उपाय भी नहीं हैं. बांग्लादेश का ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि निर्यात में तेजी लाकर रोजगार को बढ़ाया जाए और इस तरह संभावनाओं से भरे परिधान और वस्त्र क्षेत्र से होने वाली आय में वृद्धि की जाए.

बांग्लादेश और पाकिस्तान के यूरोपीय संघ के साथ समझौते की वजह से भारत की तुलना में उनके उत्पाद 10-15 फीसदी सस्ते पड़ते हैं. इसके अलावा, भारत में जहां मजदूरी बढ़ रही है, वहीं श्रमिकों की उत्पादकता घट रही है. सेठी कहते हैं, ''पिछले दो वर्षों के दौरान तिरुपुर, बेंगलूरू और गुरुग्राम जैसे टेक्सटाइल केंद्रों में न्यूनतम मजदूरी बड़ी तेजी से बढ़ी है.''

कर्नाटक में न्यूनतम मजदूरी 30-35 फीसदी बढ़ गई है. सस्ते श्रम का इस्तेमाल करते हुए बांग्लादेश भारत से कपड़े का आयात करके परिधान बनाकर वापस निर्यात कर देता है. सूत्रों के मुताबिक सरकार ने बांग्लादेश से आयातित तैयार उत्पादों पर शुल्क लगाने का मन भी बनाया, लेकिन यह देखते हुए पैर खींच लिए कि भारतीय कंपनियों ने वहां अपनी यूनिट खोल रखी हैं.

इस क्षेत्र में आधुनिक मशीनें लगाना बहुत जरूरी है. फैक्टरी मालिक व्यावहारिक जटिलताओं के कारण बेहतर तकनीक के लिए धन मुहैया कराने वाली स्कीम (एटीयूएफएस) का पूरा फायदा नहीं उठा पा रहे हैं. मेहता कहते हैं, ''कई तरह की शर्तों और कागजी खानापूर्ति ने उद्योग के लिए मुश्किलें खड़ी कर रखी हैं. यह मामला खास तौर पर गंभीर हो जाता है क्योंकि इस क्षेत्र से जुड़े 80 फीसदी कारोबारी एमएसएमई (लघु, छोटे और मझोले उद्योग) क्षेत्र में आते हैं. क्रिसिल के मुताबिक, यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख आयातकों के साथ बेहतर कारोबारी समझौतों और सरकारी प्रोत्साहनों की बदौलत भारतीय उद्यमी दुनिया की प्रतिस्पर्धा का बेहतर तरीके से सामना कर पाएंगे.

1980 के दशक के मध्य में शुरू हुए विनियमन की वजह से कताई वस्त्र उद्योग के सबसे संगठित और तकनीकी रूप से सक्षम क्षेत्र के तौर पर उभरा है. गौरतलब है कि आज भी यह क्षेत्र औसतन पुरानी तकनीक पर चलने वाले छोटे संयंत्रों पर ही निर्भर है.

आइबीईएफ कहता है कि इस क्षेत्र में लगभग 1,146 छोटी स्वतंत्र फर्में हैं जबकि बड़ी इकाइयों की संख्या 1,599 है. कपड़े की प्रोसेसिंग में मुख्यतः छोटे दर्जे की इकाइयां हैं जिनमें 2,300 प्रोसेसर (2,100 स्वतंत्र इकाइयां और 200 वैसी जो कताई, बुनावट और बुनाई जैसी इकाइयों से जुड़ी हैं) काम कर रहे हैं.

छोटी और मध्यम इकाइयों और मझोले कार्पोरेट इकाइयों के प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए जरूरी है कि उन्हें आकर्षक दर पर ऋण मिले. क्रिसिल का कहना है कि घरेलू टेक्सटाइल क्षेत्र कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, महंगी बिजली और निर्यात प्रोत्साहनों में कमी से जूझ रहा है और इस वजह से अन्य एशियाई देशों के साथ उसकी प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हुई है. फिर भी, लागत प्रबंधन के मामले मंि धागा और वस्त्र क्षेत्र के कारोबारी रंगाई या छपाई से जुड़े कारोबारियों की तुलना में बेहतर हैं.

उम्मीद की किरण

डेनिम और होम टेक्सटाइल जैसे विशेष क्षेत्रों में भारत का प्रदर्शन अच्छा रहा है. वित्तीय वर्ष 2012 से घरेलू टेक्सटाइल बढ़ रहा है. मसलन, सूती चादरों और टेरी टॉवल के अमेरिकी आयात में भारत की हिस्सेदारी 34 फीसदी से बढ़कर 2016-17 में 40 फीसदी हो गई.

भारत के ये उत्पाद चीन और पाकिस्तान से सस्ते हैं. वैश्विक होम टेक्सटाइल बाजार में अमेरिका का हिस्सा एक तिहाई है जो करीब 16 अरब डॉलर का है. पिछले वित्तीय वर्ष में भारत का लगभग 47 फीसदी होम टेक्सटाइल निर्यात (34,450 करोड़ रु.) अमेरिका को किया गया.

लेकिन, अब स्थितियां अलग हैं. ऑनलाइन रिटेलरों से मिल रही चुनौती के मद्देनजर बड़ी संख्या में अमेरिकी रिटेलरों ने आयात घटा दिया है. इस कारण भारत के होम टेक्सटाइल निर्यातक दबाव में आ गए हैं. उनका संचालन मुनाफा घटकर 3 फीसदी पर आ गया है.

ऐसा नहीं कि सरकार स्थिति को सुधारने की कोशिश नहीं कर रही है. उसने 2017 के फरवरी में विशेष पैकेज की घोषणा की ताकि वस्त्र क्षेत्र में 1.1 करोड़ रोजगार अवसर पैदा हों, निर्यात बढ़कर 2.13 लाख करोड़ रु. का हो जाए और 2020 तक इस क्षेत्र में 80,630 करोड़ रु. का निवेश आ सके. रोजगार देने के लिए एटीयूएफएस के अंतर्गत 10 फीसदी का उत्पादन आधारित अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जा रहा है.

केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी का मानना है कि आम बजट में किए गए आरओएसएल में 39 फीसदी की वृद्धि जैसे उपायों से निर्यात बढ़ेगा. 2017-18 के लिए आरओएसएल का बजट आवंटन 1,555 करोड़ से बढ़ाकर 2,163 करोड़ रु. कर दिया गया है.

उत्तर-पूर्व में टेक्सटाइल्स क्षेत्र को बढ़ावा देने की योजना पर स्मृति ईरानी कहती हैं, ''हम स्थानीय आबादी को औपचारिक रोजगार के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं. इस पैकेज का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि पिछले एक वर्ष के दौरान वस्त्र उद्योग में काम करने वाले करीब 1.8 लाख कर्मचारी औपचारिक रूप से ईपीएफओ (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) का हिस्सा बने, यानी यह उद्योग धीरे-धीरे नियमित हो रहा है.''

विनिर्माण क्षेत्र के कायाकल्प में वस्त्रोद्योग की बड़ी भूमिका हो सकती है. लेकिन इसकी समस्याओं की जड़ें गहरी हैं. यह सही है कि सरकार के तमाम उपायों से हालात बेहतर तो हुए हैं, लेकिन यह क्षेत्र भविष्य में रोजगार पैदा करने वाला प्रमुख क्षेत्र बन सके, इसे ध्यान में रखकर जरूरी प्रयास नहीं हुए.

***

Advertisement
Advertisement