भारतीय नौसेना के 12 समुद्री प्रतिरोधक जहाजों (एमसीएमवीज) को तत्काल हासिल करने के प्रयासों को इस महीने की शुरुआत में एक और झटका लगा. दरअसल रक्षा मंत्रालय ने दक्षिण कोरिया की कंगनम कॉर्पोरेशन के साथ 2016 के प्रस्ताव को रद्द कर दिया है. एमसीएमवी एक खास तरह का जहाज है, जिसे शत्रुओं के विमानों की बिछाई समुद्री सुरंगों का पता लगाने और नष्ट करने तथा पनडुब्बियों से बंदरगाहों की नाकाबंदी करने के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है.
1970 और 1980 के दशक में पूर्व सोवियत संघ के हासिल किए गए नौसेना के 12 जहाजों के सुरंग-भेदी बेड़े अपनी आखिरी अवस्था में हैं. पुराने जहाजों के रिटायर होने के बाद अब इस बेड़े में सिर्फ चार इकाइयां ही बची हैं. रक्षा मंत्रालय ने इस सौदे को इसलिए रद्द कर दिया, क्योंकि दक्षिण कोरिया के शिपयार्ड ने गोवा शिपयार्ड लिमिटेड को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए एक अरब डालर की मांग की.
एमसीएमवी की खरीद की पूरी प्रक्रिया फिर से शुरू की जाएगी.
इसके वैश्विक विक्रेताओं के लिए रक्षा मंत्रालय जल्द ही नया एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआइ) जारी करने वाली है. यह एक दशक में इन जहाजों को हासिल करने के लिए तीसरा प्रयास होगा. आठ एमसीएमवी खरीदने के लिए 2005 की प्रक्रिया में सबसे कम बोली कंगनम ने लगाई थी.
उसके साथ हुए अधिग्रहण निविदा को 2015 में तब रद्द कर दिया गया, जब पाया गया कि दक्षिण कोरियाई कंपनी ने एजेंटों को नियुक्त किया है, जो रक्षा मंत्रालय के नियमों के मुताबिक निषिद्ध है. फिर इस कोरियाई कॉर्पोरेशन को गोवा शिपयार्ड लिमिटेड में एमसीएवी बनाने के लिए वर्ष 2016 में एकल विक्रेता के रूप में नामित किया गया. अधिकारियों के मुताबिक इसने एकाधिकार की स्थिति को बढ़ाया.
सोलह बहुउद्देश्यीय हेलिकॉप्टर की दूसरी महत्वपूर्ण जरूरत भी इसी तरह से अटकी है. ये हेलिकॉप्टर पनडुब्बियों को नेस्तनाबूत करने के लिए युद्धपोतों को संचालित करने में सक्षम होते हैं. नौसेना के लिए इन 16 बहुउद्देश्यीय हेलिकॉप्टरों की खरीद के 6,000 करोड़ रु. के 2007 के प्रस्ताव को पिछले साल रद्द कर दिया गया था. दरअसल तब पता चला कि हेलिकॉप्टर बनाने वाली अमेरिकी कंपनी की जीत की बोली उससे दोगुनी है, जितना कि रक्षा मंत्रालय भुगतान करना चाहती है.
इस प्रक्रिया को अंततः पिछले वर्ष अगस्त में सरकार की सामरिक भागीदारी नीति के हिस्से के रूप में फिर से शुरू किया गया. इसके तहत एक विदेशी कंपनी एक निजी क्षेत्र की कंपनी के साथ भारत में स्थानीय स्तर पर हेलीकॉप्टरों के निर्माण के लिए गठजोड़ करेगी. फैसले लेने की इस गति से तो युद्धपोत के डेक पर पहले हेलीकॉप्टर के उतरने में एक और दशक लग सकता है.
—संदीप उन्नीथन

