scorecardresearch

फतवेः जायज-नाजायज की जंग

पंचायत ने इमराना की शादी को भी रद्द करने का फरमान सुना डाला. इस मामले में दारुल उलूम देवबंद ने पंचायत के फरमान पर मुहर लगाई. मगर इमराना फतवे की परवाह किए बगैर अपने पति के साथ रहती रही.

फतवों का गढ़ दारुल उलूम देवबंद के प्रवेश द्वार पर स्थित मस्जिद-ए-रशीदिया
फतवों का गढ़ दारुल उलूम देवबंद के प्रवेश द्वार पर स्थित मस्जिद-ए-रशीदिया
अपडेटेड 30 अक्टूबर , 2017

एक व्यक्ति ने दारुल उलूम से पूछा कि मुस्लिम औरतों का आइब्रो बनवाना और बाल कटवाना क्या इस्लामी नजरिए से जायज है? जवाब में दारुल उलूम ने कहा, ''यह गैर-इस्लामी और शरीयत के मुताबिक, नाजायज काम है." आधुनिक दौर में यह फतवा न सिर्फ  विश्व स्तर पर बल्कि मुसलमानों के बीच भी चर्चा का विषय बना हुआ है. ठीक इसी तरह, महिलाओं और पुरुषों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड करने को नाजायज बताकर भी दारुल उलूम देवबंद एकबार फिर चर्चा में आ गया है.

इस्लामी दुनिया में देवबंद एक विचारधारा है और इसमें एक ''धारा" है फतवों की जो देवबंद से निकलकर पूरी दुनिया में फैलती है. दारुल उलूम में फतवों के लिए अलग विभाग ''दारुल इफ्ता" है जहां से 125 बरस से फतवे जारी हो रहे हैं. इनका मकसद क्या है और ये क्यों जारी किए जाते हैं? तमाम विवादों और चर्चाओं के बीच आखिर फतवों की यह धारा बह क्यों रही है? फतवा क्या है और कौन देता है? क्या इनमें कोई सामाजिक या राजनैतिक निहितार्थ छिपे हैं? कानून से ये कितना टकराते हैं?

दरअसल, दारुल इफ्ता से दुनिया के लगभग हर देश से हर वर्ष लगभग 15,000 फतवे (शंका समाधान) मांगे जाते हैं. इनमें आस्था-विश्वास, प्रार्थना और कर्तव्य, हस्तांतरण व समझौते, सामाजिक मामले और हलाल व हराम जैसे विषयों की विभिन्न श्रेणियों के तहत लोग सवालों के जवाब मांगते हैं. ऐसे असंख्य फतवे हैं जो विवादों में रहे हैं. कुछ फतवों ने तो सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने को बुरी तरह से प्रभावित किया है.

इसे समझने के लिए चलते हैं मेरठ के मुंडाली गांव जहां एक गुडिय़ा रहती थी, जो अब इस दुनिया में नहीं है. 1999 में गुडिय़ा की शादी फौजी आरिफ  से हुई थी. शादी के दस दिन बाद ही करगिल युद्ध छिड़ जाने के बाद आरिफ  को बॉर्डर पर जाना पड़ा और युद्ध के दौरान वह लापता हो गया. सेना ने उसे लापता घोषित कर दिया. 2003 में गुडिय़ा को लेकर दारुल उलूम से फतवा मांगा गया और 26 साल की गुडिय़ा की फतवे के आधार पर आरिफ  की अघोषित मृत्यु मानते हुए एक अन्य व्यक्ति तौफीक से शादी कर दी गई.

इसी बीच पता चला कि आरिफ  को पाकिस्तान ने युद्ध के दौरान बंदी बना लिया था और युद्धबंदियों में उसे रिहा कर दिया गया. आरिफ लौटा तो गुडिय़ा तौफीक के बच्चे की मां बनने वाली थी. अब गुडिय़ा पर आरिफ  के साथ रहने का पारिवारिक दबाव पड़ा तो फतवा मांगा गया, जिसमें उसकी दूसरी शादी को अवैध करार दे दिया गया. यहां तक कहा गया कि यदि वह पहले पति के पास वापस नहीं लौटी तो उसका होने वाला बच्चा नाजायज होगा. आरिफ  ने गुडिय़ा को तो स्वीकार करने की बात कही, लेकिन उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को अस्वीकार कर दिया और मंझदार में फंसी गुडिय़ा की प्रसव के दौरान मौत हो गई.

ऐसा ही चर्चित मामला मुजफ्फरनगर के चरथावल कस्बे का है, 28 साल की इमराना को 2005 में उसके ससुर मोहम्मद अली ने हवस का शिकार बना डाला. कस्बे में पंचायत हुई और इमराना से कहा गया कि वह अब अपने शौहर को अपना बेटा माने. पंचायत ने इमराना की शादी को भी रद्द करने का फरमान सुना डाला. इस मामले में दारुल उलूम देवबंद ने पंचायत के फरमान पर मुहर लगाई. मगर इमराना फतवे की परवाह किए बगैर अपने पति के साथ रहती रही. जुलाई 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर दिए गए फैसले में इमराना केस का उदाहरण देते हुए कहा, ''फतवे किसी व्यक्ति के बुनियादी अधिकारों का ऐसा नुक्सान करते हैं, जिनकी कभी भी भरपाई नहीं की जा सकती.

फतवों के रूप में धार्मिक राय के अच्छे मकसद होते हैं, लेकिन फतवे किसी व्यक्ति के बुनियादी अधिकारों का हनन करते हैं तो इन्हें सही नहीं माना जा सकता." 2005 में दिल्ली के पत्रकार विश्व लोचन मदान की ओर से दायर इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने दारुल उलूम देवबंद को भी स्वतःसंज्ञान लेते हुए पक्षकार बनाया था. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ  किया था, ''अगर कोई व्यक्ति फतवे की मांग करता है तो शरीयत कोर्ट फतवे जारी कर सकती हैं, लेकिन उन्हें मानने के लिए कोई कानूनी बंदिश नहीं है." तब दारुल उलूम देवबंद ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था, ''फतवे बाध्यकारी नहीं, महज एक सलाह होते हैं और न ही ये देश के कानून से टकराते हैं."

दारुल उलूम देवबंद के ऑनलाइन फतवा विभाग के प्रभारी मुक्रती मुहम्मदुल्लाह कासमी कहते हैं, ''व्यक्तिगत रूप से किसी मसले पर शरीयत की रोशनी में किसी व्यक्ति के पूछे जाने पर ही दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं. जवाब मांगने वाला सवाल पूछता ही इसलिए है कि वह व्यक्तिगत रूप से उस पर अमल करे. सवाल पूछा जाएगा तो जवाब भी दिया जाएगा. बिना पूछे फतवा जारी नहीं होता और गैर-जरूरी सवालों के जवाब जरूरी भी नहीं होते."

फतवा क्या है? फतवा अरबी भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है सुझाव और सुझाव मानने की कानूनी बाध्यता नहीं होती. पूछे गए सवाल पर इस्लामी विद्वान (खास तौर पर मुफ्ती) से मिला सुझाव फतवा है. बिना पूछे या बिना मांगे किसी इस्लामी विद्वान की कही बात, सुझाव या अपील फतवा नहीं है. लेकिन आरिफ  या गुडिय़ा और इमराना या उसके पति ने कभी अपने मसलों पर व्यक्तिगत रूप से फतवे नहीं मांगे तो दिए क्यों गए? मुफ्ती मुहम्मदुल्लाह का मानना है कि अधिकांश फतवे व्यक्तिगत रूप से ही मांगे जाते हैं.  

फतवों के राजनैतिक निहितार्थ निकाले जाने को दारुल उलूम सिरे से खारिज करता रहा है. फिर भी कुछ चर्चित फतवों ने इस सवाल को आज भी जिंदा रखा है. 2012 में सलमान रुश्दी की भारत आमद पर रोक लगाने का फतवा जारी करते हुए कहा गया था कि उन्होंने मुसलमानों की आस्थाओं को ठेस पहुंचाई थी, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या फतवे मुसलमानों की आस्थाओं को घायल नहीं कर रहे हैं? मसलन आइब्रो का मामला और ऐसे ही बहुत सारे पर्सनल केयर के वे मामले जो मजहब का हिस्सा तो हैं लेकिन जिंदगी की जरूरत भी हैं.

साफ  कर दें कि जैसा सवाल, वैसा फतवा (जवाब) दिया जाता है, जो एकतरफा होता है. मुफ्ती मुहम्मदुल्लाह स्वीकार करते हैं, ''फतवा एकतरफा इसलिए है कि इसमें एक ही पक्ष है जो सवाल पूछ रहा है और उसी का जवाब दिया जाता है. मुफ्ती इन्वेस्टिगेशन करने तो जाएगा नहीं कि मसला सही है या नहीं?" जाहिर है कि फतवे जायज-नाजायज, इस्लामी-गैर इस्लामी, शरई-गैर शरई और हलाल-हराम के इर्दगिर्द तो घूमते हैं, लेकिन इनसे किसे क्या राजनैतिक नफा और व्यक्तिगत या सामूहिक नुक्सान होगा? फतवे इसकी गारंटी नहीं देते. बहुत से फतवे ऐसे भी हैं जो नजीर बने.

दारुल उलूम ने 2008 में सबसे पहले आतंकवाद को लेकर फतवा जारी किया. इसमें कहा गया, ''किसी बेगुनाह की जान लेना इस्लाम में हराम है." इससे भी प्रभावी फतवा अंग्रेजों के खिलाफ तर्के-ए-मवालात (आर्थिक बहिष्कार) का स्वतंत्रता आंदोलन में दिया गया, जिसने हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सबको प्रभावित किया. ठीक उसी तरह, जैसे फतवा कोई गैर मुस्लिम भी ले सकता है लेकिन यह मुसलमानों पर भी बाध्यकारी नहीं.

Advertisement
Advertisement