अगस्त में ग्वालियर में वन चौकी पर दो व्यापारियों को रोका गया था और उनके पास से सलाई पेड़ का रेजिन बरामद किया गया. यह मध्य प्रदेश के जंगलों में प्रचूर मात्रा में पाया जाता है. जब तक वन अफसरों को यह नहीं बताया गया कि वह रेजिन हिमाचल प्रदेश के कला अम्ब क्षेत्र की एक सौंदर्य प्रसाधन फैक्ट्री के लिए है, तब तक इस बरामदगी में कोई असाधारण बात नहीं थी. मध्य प्रदेश जैवविविधता बोर्ड (एमपीबीबी) के अफसरों ने कंपनी कोणार्क हर्बल के मालिक पर राष्ट्रीय जैवविविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के उल्लंघन के तहत मामला दर्ज कर फैक्ट्री पर छापा मारा.
इस अधिनियम की धारा 7 के तहत राज्य के जैव संसाधनों के व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं के लिए स्थानीय जैवविविधता बोर्ड में पंजीयन कराना और ''एक्सेस बेनिफिट शेयरिंग" के जरिए उपकर का भुगतान करना अनिवार्य है. यह उपकर स्थानीय जैवविविधता के संरक्षण के लिए वसूला जाता है. यह प्रावधान वर्ष 2004 से है, एमपीबीबी का दावा है कि इसे लागू करने वाला वह पहला राज्य बोर्ड है. वैसे उद्योगपतियों और व्यवसायियों में इससे खलबली मच गई है.
उपकर के माध्यम से अतिरिक्त लागत के अलावा कानून का उल्लंघन करने पर नकद जुर्माना और जेल की सजा भी हो सकती है. मध्य प्रदेश जैव विविधता कानून (2004) के तहत व्यापारियों और निर्माताओं के लिए जैव संसाधनों के खरीद मूल्य का एक से पांच प्रतिशत या उनके वार्षिक टर्नओवर का 0.1 से 0.5 प्रतिशत उपकर का भुगतान करना अनिवार्य है.
ज्यादातर फैक्ट्रियों के मालिक इस प्रावधान से वाकिफ नहीं हैं. और न ही वन अफसर, जो इस कानून को लागू करने के लिए जिम्मेदार हैं. एमपीबीबी के सदस्य-सचिव आर. श्रीनिवास मूर्ति बताते हैं कि वन कर्मचारियों को उल्लंघन का पता लगाने और कार्रवाई शुरू करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है. उन्होंने आगे बताया कि पंजीयन प्रक्रिया शुरू करने के लिए एक एक्सेस बेनिफिट सेल जुलाई में स्थापित किया गया है.
एमपीबीबी ने व्यावसायिक उपयोग के 700 जैव संसाधनों की पहचान की है, जिन्हें उपकर के दायरे में लाया जाना चाहिए. इनके व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं में सौंदर्य प्रसाधन, स्वास्थ्य उत्पादों, दवाओं, मादक पेय पदार्थों के निर्माता और अनुसंधान संगठन शामिल हैं. एमपीबीबी का अनुमान है कि उद्योगों में उपयोग होने वाले जैव संसाधनों पर वसूले जाने वाले उपकर से राज्य को 2,000 करोड़ रु. की कमाई होगी.
दिलचस्प बात यह है कि राज्य ने कानून को लागू करना शुरू कर दिया, पर सामुदायिक स्तर पर जैव विविधता संरक्षण के लिए एकत्रित धन के उपयोग की कोई व्यवस्था नहीं की गई है. कानून के जरिए अनिवार्य बनाए गए सभी शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों में जैवविविधता प्रबंधन समिति का गठन नहीं हुआ है. इस बात को लेकर भी भ्रम है कि किस तरह जैव विविधता का गठन होता है और कब. उदाहरण के तौर पर धान जैसी सामान्य व्यापार की वस्तु को उपकर के दायरे से बाहर रखा गया है. लेकिन धान की भूसी से तेल निकालने वाले उद्योगों को उपकर का भुगतान करना होगा. एमपीबीबी ने ऐसी 385 वस्तुओं का सूचीबद्ध किया है.
उद्योगपति चिंतित हैं. राष्ट्रीय जैव विविधता अधिनियम की धारा सात का उल्लंघन करने पर पांच लाख रुपये का जुर्माना या तीन वर्ष जेल की सजा या दोनों हो सकती है. भारतीय उद्योग परिसंघ के मध्य प्रदेश चैप्टर के अध्यक्ष अंशुल मित्तल कहते हैं, ''जैव विविधता उपकर के जरिये वसूले जाने वाले अतिरिक्त कर से समग्र उत्पादकता में बाधा उत्पन्न होगी और अंततः रोजगार सृजन पर रोक लगेगी, खासकर लघु, कुटीर मध्यम उद्योग क्षेत्र में." राज्य के करीब 250 व्यवसायियों ने अब तक एमपीबीबी में पंजीयन कराया है. पर विधानसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले उद्योग मालिकों के बढ़ते विरोध के चलते शिवराज सिंह चौहान सरकार अपने कदम पीछ खींचने को मजबूर हो सकती है.

