इसरोः स्थापनाः 196
कोई अजूबा नहीं
जवाहरलाल नेहरू को 1962 में अंतरिक्षविज्ञानी विक्रम साराभाई ने देसी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास की जरूरत समझाई. उन्होंने तिरुअनंतपुरम के बाहरी इलाके में स्थित थुंबा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन में सॉलिड प्रोपल्शन रॉकेट के प्रक्षेपण का बुनियादी काम किया. इसके लिए प्रौद्योगिकीय मदद उन्होंने अमेरिका, पूर्व सोवियत संघ, जापान और फ्रांस के अपने संपर्कों से ली. उन्होंने मुक्त शोध और नवाचार की एक ऐसी संस्कृति को जन्म दिया जिसने इसरो में स्वस्थ और प्रतिस्पर्धी वातावरण और टीम भावना का संचार किया.
भारत आज एक अंतरिक्षीय शक्ति बन चुका है और उसके पास रॉकेट और उपग्रह निर्माण की विशेषज्ञता है. इसने देश की शोध-अनुसंधान की क्षमताओं में भरोसा जगाया है. इसरो के पूर्व चेयरमैन सतीश धवन का दावा था कि ''अंतरिक्ष कार्यक्रम शांतिपूर्ण है", लेकिन बीते दशक के दौरान इसरो के सबक रक्षा तैयारी और मिसाइल विकास में भी काम आए हैं.
भविष्य
अब चुनौती ज्यादा बड़े और भारी संचार उपग्रह बनाने और प्रक्षेपण प्रति तिमाही एक से बढ़ाकर प्रति माह एक करना है. कुछ ही देश वह काम कर सके हैं जो भारत ने कर दिखाया है—ऐसे रॉकेटों का निर्माण जो उपग्रहों को ध्रुवीय और भू-स्थैतिक कक्षाओं में छोड़ सकें, हर किस्म के उपग्रहों का निर्माण तथा चंद्रयान और मंगलयान अभियान. मंगलयान मिशन इसरो की अंतरिक्ष उद्यमिता का उदाहरण है. संभव है कि देश अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने में भी भविष्य में सक्षम हो जाए.
—अमरनाथ के. मेनन
क्या आप जानते हैं?
पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन 1980 के दशक में इसरो के मुख्य वित्तीय सलाहकार थे

