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जी-शॉट: चुटकियों में चरम सुख

महिलाओं के चरम सुख की पहेली को सुलझाने के लिए आ गया है जी-शॉट इंजेक्शन. यौन सुख के क्षेत्र में महिलाओं के लिए नई क्रांति और चरम सुख के लिए नया हथियार.

जी-शॉट
जी-शॉट
अपडेटेड 7 फ़रवरी , 2017

टन्न. क्लीनिक के शांत माहौल में धातु के धातु से टकराने की आवाज और भी तेज लगती है. आप पीठ के बल लेटी हुई हैं, दोनों पैर फैले हुए हैं, टखने एक खांचे में फंसे हुए हैं. सर्जन आपके ऊपर झुकती है. उसके एक हाथ में बोतल की ओपनर की शक्ल का एक छोटा-सा स्पेकुलम (एक मेडिकल उपकरण) है. दूसरे हाथ में बड़ी-सी सुई. वह आपके गुप्तांग के एक अहम हिस्से में सुई लगाती है और झांकती है, आप इस बीच घबराई हुईं अनिश्चय की स्थिति में पड़ी होती हैं. झेंप और दर्द का एहसास करते हुए आप एक रोमांचक भविष्य के बारे में सोच रही होती हैः कामशक्ति की नई ऊर्जा से भरपूर भविष्य. अंत में सर्जन अपने दस्ताने उतारते हुए शरारतपूर्ण मुस्कान के साथ कहती हैं, ''मुबारक हो. अब आप बिस्तर पर हंगामा बरपाने और भरपूर मजे के लिए तैयार हैं."

आठ सेकंड. इतने कम समय में आप क्या कर सकते हैं? विज्ञान के मुताबिक कुछ ये कामः आपके मुंह से आपके पेट तक खाने का कौर पहुंचने में आठ सेकंड लगते हैं. हमारा दिमाग किसी जानकारी को दीर्घकालिक स्मृति में रखने के लिए इतना ही समय लेता है. पहली नजर का प्यार इतनी ही देर में होता है और अब एक नया विज्ञान, दुनिया भर के कॉस्मेटिक स्त्रीरोग विशेषज्ञों की क्लीनिकों में महिलाओं को यौन सुख की कुंजी पाने में इतना ही समय लगता है. आठ सेकंड में स्त्री के जी-स्पॉट में एक इंजेक्शन लगाने के बाद महिला को पुरुष के साथ सहवास में चरमोत्कर्ष की प्राप्ति होने का दावा किया जा रहा है. यह इलाज अब भारत में शुरू हो चुका है—एक इंजेक्शन पर करीब 50,000 रु. का खर्च आता है, जो चार महीने तक असरदार रहता है. और रिपोर्टों को देखें तो इसकी मांग तेजी से बढ़ती जा रही है.

आखिर यह होता कहां है?
जी-स्पॉट होता कहां है?
मतलब कि तुम्हें मालूम नहीं?
मैंने खुद को इतने गौर से नहीं देखा है.
यह गौर से देखने नहीं, महसूस करने की बात है
क्या तुम्हारे पति ने....?
ओह, उसे तो तुम जानती हो...
तुम्हारी यही दिक्कत है. तुम कुछ कहती ही नहीं. मैंने तो खुद ही पता लगा लिया.
सच में? कैसे?
चोप्प्प्...किसी को बताना मत.
क्या नहीं बताना?
मैंने इंजेक्शन लिया है.
किस चीज के लिए इंजेक्शन?

पिछले 15 वर्षों से डॉ. दीपा गणेश चेन्नै में—किलपौक, वडापलानी, एमआरसी नगर, आलवारपेट—एक निजी अस्पताल से दूसरे निजी अस्पताल का चक्कर लगाते हुए महिलाओं की गर्भाशय संबंधी समस्याओं में सर्जरी को अंजाम देती रही हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से करीब 30 वर्षीया इस महिला रोग विशेषज्ञ के पास ऐसी ढेरों महिलाएं अपनी नई समस्याएं लेकर आती रही हैं, जिनकी वे कोई मदद नहीं कर सकती थीं. वे कहती हैं, ''महिलाएं संभोग संबंधी तरह-तरह की समस्याएं लेकर आती हैं, जैसे योनि का ज्यादा फैल जाना (शायद बच्चे के जन्म की वजह से), रतिक्रिया के समय ज्यादा दर्द महसूस होना, और शारीरिक तथा मानसिक वजहों से सहवास में आनंद से वंचित रहना इत्यादि." वे बताती हैं कि पहले महिलाएं इस तरह की समस्याओं पर चुप्पी साधे रखती थीं और उसे सिर्फ अपने तक ही सीमित रखती थीं. ''पर अब वे ज्यादा सचेत हो चुकी हैं. उनमें इतनी हिम्मत आ गई है कि वे इस बारे में न सिर्फ बात करती हैं, उसका इलाज कराने के लिए खुलकर आगे आ रही हैं."

महिलाएं जब इस तरह की समस्याएं लेकर आने लगीं तो डॉ. दीपा ने चिकित्सा के इस नए क्षेत्र यानी कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी में जानकारी जुटानी शुरू की. नामी-गिरामी हस्तियों, टेलीविजन शो, सोशल मीडिया, इंटरनेट और मोबाइल के माध्यमों से बेहिसाब जागरूकता आने से नई सदी में नई किस्म की मांग देखने को मिल रही हैं और उसी के साथ सौंदर्य के क्षेत्र में अरबों रु. का कारोबार विकसित हो गया है, जिसमें अमेरिका में मां बनने के बाद फिर से छरहरी लड़की बन जाने से लेकर भारत में अंग को लंबा करना, दक्षिण कोरिया में चेहरे की सर्जरी, ब्राजील में स्तन, पेट और नितंबों को आकर्षक बनाना, ईरान में नाक को तराशना और पूरे पश्चिमी जगत में डिजाइनर योनि तक शामिल है. दीपा कहती हैं, ''अमेरिका में आज जननांगों के आसपास के बालों को हटाना उतनी ही सामान्य बात हो चुकी है, जितना कि कांख के बालों को साफ करना और उसी के साथ टैटू, पियर्सिंग और सौंदर्य संबंधी सर्जरी भी शुरू हो गई है."

वे योनि का कायाकल्प करने या उसे नया जीवन देने का काम सीखने के लिए अमेरिका गईं और हॉलीवुड में बेवर्ली हिल्स स्थित डॉ. डेविड मैटलॉक (योनि संबंधी समस्याओं पर अपने नए प्रयोगों के कारण जाने-माने सर्जन हैं और किम कर्दाशियां का ब्राजीलियन बट लिफ्ट कर चुके हैं) की देखरेख में प्रशिक्षण लिया. 2002 में डॉ. मैटलॉक ने जी-स्पॉट के संवर्धन के लिए एक नई विधि विकसित की जिससे जी-स्पॉट के क्षेत्र का व्यास 8.1 मिमी से 15-20 मिमी और ऊंचाई में 0.4 मिमी से 5-10 मिमी हो गया, जैसा 2002 के अपने पेटेंट में उन्होंने दर्ज किया था. इससे कामेच्छा और संवेदनशीलता में वृद्धि हो गई.

उस साल उन्होंने 15 महिलाओं को जी-शॉट या जी-इंजेक्शन दिया था और बताया कि इलाज से पहले जहां 50.7 प्रतिशत महिलाएं सहवास के समय चरम सुख हासिल कर पाती थीं, वहीं इलाज के बाद 82.7 महिलाओं को चरम सुख की प्राप्ति हुई. डॉ. दीपा ने पिछले साल नवंबर में पांच महीने की अपनी ट्रेनिंग पूरी की और जी-इंजेक्शन देना शुरू किया—जो भारत में महिलाओं को चरम सुख दिलाने के लिए पहली बार अपनी किस्म का एक नया इलाज था.

हां. नहीं. हां?
योनि की बाहरी दीवार में उत्तेजित करने वाली अलग जगह है.
नहीं. योनि के आसपास का क्षेत्र उत्तेजना महसूस नहीं करता.
हां. किसी खास स्पॉट को दबाने पर चरमसुख मिल सकता है. चलिए इसे जी-स्पॉट कहते हैं.
नहीं. योनि की दीवारों में ऐसा कुछ नहीं होता जो आपको सीधा चरमसुख दे सके.
हां. अल्ट्रासाउंड दिखाता है कि कुछ औरतों के जी-स्पॉट होता है. कुछ के नहीं.
नहीं. जी-स्पॉट महिलाओं की कल्पना की देन है.
हां. जी-स्पॉट मटर के दाने के आकार की संरचना है जो योनि की पहली परत में होती है.
जी-स्पॉट संवेदनशील क्षेत्र है जो सुख देने वाले बड़े क्षेत्र का हिस्सा है.

क्या जी-स्पॉट जैसी कोई चीज होती है? चेन्नै के अपोलो अस्पताल में सेक्सुअल मेडिसिन के विशेषज्ञ और अमेरिका कॉलेज ऑफ सेक्सोलॉजिस्ट्स डॉ. नारायण रेड्डी कहते हैं, ''यह बिल्कुल वैसा ही सवाल है कि क्या ईश्वर का अस्तित्व होता है." माना जाता है कि जी-स्पॉट एक स्पंज जैसा मटर के आकार का क्षेत्र है, जो योनि की दीवार में दो या तीन इंच अंदर होता है और जिसे छूकर पहचाना जा सकता है. इसे सबसे ज्यादा कामोत्तेजक क्षेत्र माना जाता है, जो बार-बार उत्तेजित करने पर कामेच्छा को जागृत कर देता है और ऐसा करने से कुछ स्त्रियां चरमसुख पाती हैं तो कुछ स्खलित हो जाती हैं. लेकिन कुछ लोगों के लिए यह अब भी पहेली बना हुआ है. ''

आधुनिक विज्ञान के विभिन्न चमत्कारों के बावजूद आज भी एक सीधा सवाल बना हुआ है—क्या जी-स्पॉट सचमुच होता है, और अब तक इसका कोई उत्तर नहीं मिला है." इसे लेकर कई सवाल बने हुए हैं—अगर यह होता है तो कहां होता है, और यह क्या करता है? इस सवाल पर इसके समर्थकों और विरोधियों में कशमकश जारी है. 1905 में मनोविज्ञानी सिग्मंड फ्रायड ने बताया था कि सहवास में चरम सुख की दो तरह की अवस्था होती है, जिसमें योनि का चरम सुख ''वास्तविक चरम सुख" है. इस सिद्धांत को तब जीववैज्ञानिक आधार मिल गया जब 1950 में जर्मनी के स्त्रीरोग विशेषज्ञ और इन्ट्रायूटरीन डिवाइस (आइयूडी) के आविष्कारक डॉ. अर्नेस्ट ग्रैफनबर्ग ने योनि के सामने वाली दीवार पर ''विशेष कामोद्दीपक हिस्सा" होने की जानकारी दी. उनकी उपेक्षा की गई और यहां तक कि उनका मजाक उड़ाया गया.

दरअसल, 1953 में जीववैज्ञानिक और प्रसिद्ध पुस्तक किंसे रिपोट्र्स के लेखक अल्फ्रेड किंसे ने अपना शोध लेख फीमेल प्रकाशित किया और योनि की दीवारों को ''ऐंद्रिक अनुभूति के प्रति असंवेदनशील" बताया. दशकों तक इस मान्यता को भुला दिया गया लेकिन 1982 में इसे उस वक्त ख्याति मिली, जब द जी-स्पॉट ऐंड अदर डिस्कवरीज एबाउट ह्यूमन सेक्सुआलिटी नामक पुस्तक में इसे वैधता मिल गई. यह पुस्तक अंतरराष्ट्रीय रूप से बेहद प्रसिद्ध हो गई और सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों में शामिल हो गई. रिसर्चर जॉन पेरी, बेवरली व्हिपल और एलिस कान ने 400 से ज्यादा महिलाओं में घर्षण के बाद उभार की रिपोर्ट दी. फिर भी शोधकर्ताओं ने इस पर संदेह जताया और इसे ''स्त्रीसंबंधी आधुनिक मिथ्य" करार दिया.

2008 में जी-स्पॉट उस समय फिर चर्चा का विषय बन गया, जब इटली की लाक्विला यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल करके इसके स्थान का पता लगाया. उन्होंने कहा, लेकिन उसमें एक बात है, कुछ औरतों में लगता है जी-स्पॉट है, वहीं कुछ औरतों में नहीं है. इस विषय में यह दुविधा 2014 तक जारी रही, जब तक कि एक नए शोध में यह नहीं पाया गया कि जी-स्पॉट दरअसल औरतों में सेक्स के आनंद के एक बड़े क्षेत्र का महज एक हिस्सा है. अंतिम विश्लेषण में सभी महिलाओं में इस जगह की सही-सही पहचान अब भी अधूरी है.

मानें या न मानें
जी-शॉट के बाद मैं योग करते समय भी उत्तेजित हो जाती हूं
मुझे कई घंटे तक चलने वाले चरमसुख का एहसास हुआ
पहली बार, सब चीजें इतनी तेजी और गहनता के साथ हुईं कि मैं थोड़ा डर गई थी.
मेरे चेहरे पर मुस्कान थी, लोगों को लगा मैं अपना वर्कआउट का मजा ले रही हूं, लेकिन मैं यौन उत्तेजना का एहसास पा रही थी.

ऊपर दिए गए बयान 2,000 से ज्यादा महिलाओं के हैं, जो डॉ. मैटलॉक से जी-शॉट ले चुकी हैं. इनमें से 65 प्रतिशत का कहना है कि उन्हें इसका फायदा मिला है. डॉ. दीपा कहती हैं कि जब वे अमेरिका में थीं तो वे ऐसी महिलाओं से मिलीं, जिनमें कई 16 साल की कमसिन लड़कियां थीं और वे अपनी मां के साथ परामर्श के लिए आई थीं. भारत में वैवाहिक जीवन में झांकना आसान नहीं रहा है. ढेरों पूछताछ के बावजूद दीपा ने अब तक सिर्फ 15 महिलाओं को जी-शॉट दिया है, जिनमें सबसे कम उम्र की महिला 30 साल की थी और सबसे ज्यादा उम्र की महिला 46 साल की. वे कहती हैं, ''वे अकेली ही आती हैं और उनमें से कई तो पतियों को कुछ नहीं बताती हैं."

पिछले साल डॉ. भारती मागू, जो अमेरिकन एकेडमी ऑफ कॉस्मेटिक सर्जरी की सदस्य हैं, ने भी मुंबई के सायन में अपने क्लीनिक में ऐसी ही तकनीक शुरू की. गोल्डन टच नाम की इस तकनीक में वे स्त्रीरोग विशेषज्ञ के साथ यह काम करती हैं. वे कहती हैं, ''मेरी ज्यादातर मरीज 40 और 50 साल से ऊपर की हैं." उनकी ज्यादातर मरीज लंबे समय से उनकी ग्राहक रही हैं और इस वजह से उनसे अपनी यौन समस्याओं के बारे में बात कर पाती हैं. उनके शब्दों में, ''ज्यादातर के लिए उनकी सेक्स लाइफ कामेच्छा की कमी या सेक्स में संतोष न मिलने से नीरस हो चुकी थी, जिसकी वजह से उनमें अपने संबंधों को लेकर असुरक्षा की भावना पैदा हो गई थी...

कुछ महिलाओं में गर्भपात या पहले की सर्जरी की वजह से जी-स्पॉट संवेदनाहीन हो चुका था." कुछ अन्य महिलाओं में प्रसव के कारण योनि की मांसपेशियां ढीली पड़ चुकी थीं. वे कहती हैं, लेकिन अब जी-स्पॉट का पता चलने से ज्यादातर के लिए सहवास का पूरा आनंद उठाना संभव हो गया है. वे अकेली नहीं हैं. लगता है कि देश भर में कॉस्मेटिक स्त्री रोग विशेषज्ञ और प्लास्टिक सर्जन इस नई मांग की तरफ ध्यान देने लगे हैं. उनके मुताबिक, इसमें सबसे ऊपर हैं नई भारतीय महिलाएं. दिल्ली के प्राइमस अस्पताल मंह प्लास्टिक और कॉस्मेटिक सर्जन डॉ. डी.जे.एस. टुल्ला के मुताबिक, ''महिलाएं अब हिम्मत दिखा रही हैं.

वे अब कहीं ज्यादा साहसी हो गई हैं. वे सहवास का पूरा आनंद उठाना चाहती हैं. सेक्स के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण इस तकनीक की मांग बढऩे की पूरी उम्मीद है." इसी के साथ डॉक्टर भी नए नरम-ऊतक संवर्धन ''फिलर्स" के साथ नए प्रयोग करने में व्यस्त हैं, जो पिछले कुछ वर्षों में उभरकर सामने आए हैं. चंडीगढ़ के पास मोहाली में कॉस्मेटिक और प्लास्टिक सर्जन डॉ. राहुल गोयल कहते हैं कि त्वचा की वसा ग्राफ्ट का इस्तेमाल करके बेहतरीन नतीजा प्राप्त किया जा सकता है. वे कहते हैं, ''यह खर्चीला तो है लेकिन एक बार इलाज के बाद स्थायी रूप से इसका लाभ उठाया जा सकता है, लेकिन इसमें छह हफ्ते के लिए आपको सेक्स से दूर रहना होता है."

बंद कमरों की बातें
 मेरे सिर में दर्द है...
रोज तुम्हारे सिर में दर्द कैसे हो सकता है?
आए्यम सॉरी...
क्या मतलब?
समझ जाओ यार...मैं तुम्हारा दिल नहीं तोडऩा चाहती थी...
क्या?

हां, हम जानते हैं कि पुरुष मंगल ग्रह से हैं और स्त्रियां शुक्रग्रह से, खासकर जब मामला अधिकतम आनंद के क्षण का हो. इसका कारण यह है कि पुरुष और स्त्री का सेक्सुअल सिस्टम एक-दूसरे से अलग होता है. लेकिन आंकड़ों के हिसाब से देखें तो यह संख्या काफी डरावनी है. अमेरिका के गैर-मुनाफे वाले प्लांड पैरेंटहुड फेडरेशन, जो दुनिया भर में प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराता है, के मुताबिक, करीब 10 प्रतिशत महिलाओं में चरम सुख पाने की क्षमता नहीं होती, जिसकी वजह शारीरिक स्थितियां, दवाएं या बीमारी होती है. तीन में से एक महिला सेक्स के दौरान चरम सुख का अनुभव नहीं करती, और इसका कारण मनोवैज्ञानिक अवरोध होते हैं, और 80 प्रतिशत महिलाओं को कई वजहों से चरम सुख पाने में कठिनाई होती है.

यह आंकड़ा मुंबई के जसलोक अस्पताल में असिस्टेड रिप्रोडक्शन ऐंड जेनेटिक्स विभाग की निदेशक डॉ. फिरुज़ा पारीख के लिए बिल्कुल भी चौंकाने वाली बात नहीं है. वे शहरी दंपतियों के मुंह से अक्सर ही एक कहानी सुनती रहती हैं, जिसमें पति और पत्नी, दोनों ही नौकरी करते हैं और जब घर लौटते हैं तो थककर चूर हो चुके होते हैं, फिर वे बाहर से फास्ट-फूड मंगाते हैं और खाने के बाद गहरी नींद में सो जाते हैं. उनके शब्दों में, ''मैं देखती हूं कि बहुत-से दंपतियों का वैवाहिक जीवन सेक्स-विहीन होता है, उनमें सेक्स के दौरान चरम सुख का अभाव होता है और सेक्स में कोई दिलचस्पी नहीं होती है." वे कहती है, ''सेक्स तभी आनंददायी होता है, जब हम उसके लिए समय निकालें, अपने कंप्यूटर बंद कर दें और अपने मोबाइल फोन भी बंद कर दें, क्योंकि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के लिए चरम सुख की अवस्था में पहुंचना ज्यादा जटिल और मुश्किल होता है."

फीमेल सेक्सुअल डिसफंक्शन (एफएसडी) यानी महिलाओं में सेक्स की दुष्क्रियता एक अलग मामला है. विश्व स्वास्थ्य संगठन एफएसडी को ऐसी अवस्था बताता है, जिसमें महिला सहवास के समय अपनी इच्छा के अनुसार हिस्सा नहीं ले पाती. दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के स्त्रीरोग विभाग के डॉक्टरों ने एफएसडी का आकलन करने के लिए एक व्यवस्थित तरीके की मांग की है, ताकि उसका इलाज किया जा सके. एम्स में डॉ. जे.बी. शर्मा के मुताबिक, ''एफएसडी ऐसी समस्या है, जिसका सामना हमें रोज ही करना पड़ता है. इसमें महिलाओं में सेक्स के प्रति धीरे-धीरे रुचि कम होने से लेकर चरम सुख की स्थिति में पहुंचने में कठिनाई या अयोग्यता, या पीड़ादायी संभोग तक शामिल है." अध्ययन बताते हैं कि 43-76 प्रतिशत भारतीय महिलाएं सेक्स से संबंधित कोई न कोई समस्या बताती हैं.

संस्कृति भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है. कोलकाता के मनोचिकित्सक डॉ. अनिरुद्ध देव कहते हैं, ''बहुत-सी महिलाओं में अच्छी लड़की और गलत लड़की की भावना बैठी होती है." बहुत-सी स्त्रियों के लिए चरम सुख पाना शर्म की बात होती है, भले ही वे अपने साथ सहवास करने वाले को अच्छी तरह जानती हों और उस पर भरोसा करती हों. कुछ के लिए यह कह पाना बहुत मुश्किल होता है कि वे सेक्स में क्या चाहती हैं. वे कहते हैं, ''ज्यादातर महिलाएं इसी भावना के साथ बड़ी होती हैं...बहुत-सी स्त्रियां सेक्स से बचती हैं, या चरम सुख की अवस्था में पहुंचने का झूठा दिखावा करती हैं ताकि पुरुष के अहं को चोट न पहुंचने पाए." यहां एक और सवाल हैः ''पूरा सुख पाने को किस तरह परिभाषित किया जाए?" वे कहते हैं, भावनात्मक और शारीरिक नजदीकी, गर्माहट भरा संबंध और पूरा ध्यान रखने का मतलब ''बेहतरीन समय" हो सकता है, भले ही स्त्री और पुरुष दोनों को सेक्स में पूरा आनंद न आया हो. उनका कहना है, ''सवाल है किसी के सेक्स जीवन में अनसुलझे मुद्दों का. और इसमें सही परामर्श काफी मददगार साबित हो सकता है."

सवाल ही सवाल
क्या जी-शॉट हर औरत के चरम सुख में इजाफा करेगा?
कोई कितने समय तक शॉट्स ले सकता है?
ये कितने सुरक्षित हैं?
क्या इनके कुछ अनदेखे दुष्प्रभाव हो सकते हैं?
किसी बाहरी दवा को योनि में डालने के दीर्घकालिक दुष्प्रभाव हो  सकते हैं?

एक सुई भर लगा देने से सेक्स में आनंद की बात पर कुछ लोग संदेह जताते हैं. दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में अपोलो कॉस्मेटिक क्लीनिक के प्रमुख डॉ. शाहीन नूरेयेज़दान कहते हैं, ''मैं इसे सिर्फ दिखावा ही कहूंगा." उन्हें बिल्कुल भी यकीन नहीं है कि जी-स्पॉट नाम की कोई चीज होती है. वे कहते हैं, ''माइक्रोस्कोप से देखने पर योनि की कोशिकाओं ने कभी भी तंत्रिकाओं के किसी बड़े नेटवर्क को नहीं दिखाया है." और अगर यह होता भी है तो उन्हें नहीं लगता है कि उन महिलाओं को जी-शॉट से कोई फायदा हो सकता है जो सेक्स में आनंद न पाने की समस्या से ग्रस्त हैं. चिंता की बात यह है कि इस तरह के इलाज या इसकी वजह से होने वाली समस्याओं, जैसे योनि की कोशिकाओं पर निशान, पीड़ादायी संभोग, इन्फेक्शन, अनुभूति पर असर, चिकनाई में कमी और काम की इच्छा में कमी आदि के बारे में कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

दरअसल, अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्सटेट्रिशियंस और स्त्रीरोग विशेषज्ञ 2007 से ही योनि पुनर्जीवन और जी-स्पॉट संवर्धन जैसे तरीकों पर सवाल उठाते रहे हैं, क्योंकि इस बारे में इलाज के बाद होने वाली समस्याओं की दर के बारे में कोई आंकड़ा नहीं दिया गया है और न ही इस इलाज को लेकर उसकी सुरक्षा और प्रभाव के बारे में कोई पक्की जानकारी उपलब्ध है (ऑब्सटेट्रिक्स ऐंड गायनीकोलॉजी, सितंबर 2007). इस तरह का इलाज अब भी सिर्फ मरीज की ओर से दी गई जानकारी पर आधारित है, जबकि यूएस फूड ऐंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) की ओर से मंजूरी मिलना अब भी बाकी है. योनि में एक बाहरी पदार्थ को सुई के जरिए डालना चिंता की एक और बात है. चिकित्सा की दुनिया में मान्यताप्राप्त दवाओं का अलग उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल न ही कोई असामान्य बात है, न ही गैरकानूनी है.

और कई बार तो ये जरूरी हो जाते हैं, खासकर जब कैंसर का मामला हो—लेकिन इसमें खतरा तो बना ही रहता है. डॉ. नूरेयज़दान कहते हैं, ''जी-शॉट में जो दवाएं लगाई जाती हैं, उनमें बहुत-सी दूसरे उद्देश्यों के लिए बनी होती हैं." दवाओं की सुरक्षा के लिए एफडीए की मंजूरी की प्रक्रिया को दुनिया भर में सबसे उत्तम स्टैंडर्ड माना जाता है, और इसने जी-स्पॉट बढ़ाने के लिए किसी भी फिलर को मंजूरी नहीं दी है और न ही योनि की दीवारों में इंजेक्शन की मंजूरी दी है. कोलाजन, हाइलुरोनिक एसिड, रैडिसे और पीआरपी, इन सभी को पुराने घावों को भरने के लिए मंजूरी दी गई है, न कि त्वचा के फिलर के तौर पर. लेकिन एफडीए मेडिकल प्रैक्टिस का नियमन नहीं करता है, न ही जी-शॉट के बारे में अब तक इसे कोई शिकायत मिली है. भारत में इस इलाज को लाने वाले डॉक्टरों के मुताबिक, ज्यादातर लोग इसे बेहद कम खतरे वाला इलाज मानते हैं, जिसमें किसी अध्ययन या चिकित्सकीय परीक्षण की जरूरत नहीं है.

मागू के ज्यादातर मरीज निशान पड़ जाने, अनुभूति में कमी और कैंसर के खतरे को लेकर चिंता जाहिर करते हैं. वे कहती हैं, ''इनमें से ज्यादातर चिंताएं निराधार हैं." इस काम में इतने साल लगाने के बाद वे जमीनी रिपोर्टों यानी मरीज के बयानों पर भरोसा करती हैं. वे कहती हैं, ''मुझे अब तक एक भी ऐसी महिला नहीं मिली, जो इस इलाज से खुश न हो." टुल्ला का कहना है कि यह तो महिलाओं के आनंद की ''अभी शुरुआत है." उनका अनुमान है, अभी यह सब कुछ अजीब सा लगता हो, लेकिन जल्दी ही जी-शॉट एक सामान्य बात हो जाएगी.

अगर सेक्स अपने समय की एक क्रिया है तो देश की महिलाओं के सेक्स जीवन के बारे में यह क्या कहता है? इसके मूल में जाएं तो यह कुछ बेहद कमजोर तरीके से परिभाषित कोशिकाओं के बारे में है, जो महिलाओं के लिए खुशियां ला भी सकता है और नहीं भी ला सकता है. अथवा यह महिलाओं की ताकत के बारे में है. चमचमाते घरों के साथ ऊंचे करियर, बड़ी जिम्मेदारियों के साथ पैसों के पीछे भागते हुए क्या वे उस एक क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा पुरुष जैसा बनने की कोशिश कर रही हैं, जहां जीवविज्ञान एक नियति है. क्या अब स्त्री भी पुरुष की तरह ही अपनी कामवासना को जागृत करने और उसे रोक देने में सक्षम हो सकती है और सुई लगवाकर जी-स्पॉट को क्या उसी तरह बढ़ा सकती है जिस तरह पुरुष वियाग्रा के बल पर अपनी ताकत दिखाता है? तमाम बहसों के बावजूद डॉक्टर एक बात पर सहमत हैः जी-शॉट के लिए एक आदर्श मरीज कौन है? वह जो पहले ही बिस्तर पर ज्यादा मजा उठा रही है.

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