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इंडिया टुडे वार्षिकांक 2016: 30 बरस में ऊंट के मुंह में जीरा है दलितों को मिले अधिकार

उत्पीडऩ विरोधी कानून और आरक्षण से दलितों की हालत अपेक्षाकृत सुधरी लेकिन पिछले तीन दशकों में दलित चेतना के विकास और विस्तार से नई चुनौतियां उभरीं.

दलितों की हालत सुधरी पर अब भी कई चुनौतियां
दलितों की हालत सुधरी पर अब भी कई चुनौतियां
अपडेटेड 29 नवंबर , 2016

अस्पृश्यता की समस्या को गहराई से समझने और समझाने वाले डॉ. भीमराव आंबेडकर पहले नेता थे. उन्होंने 1920 से 1956 के बीच अपने बौद्धिक, सामाजिक और राजनैतिक प्रयासों से अस्पृश्यता की समस्या को पहली बार राष्ट्रीय मुद्दा बनाया. फिर, 1950 में संविधान में दलितों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान किए गए. कुछ संवैधानिक प्रावधानों को नीतियों में बदला गया. आखिरकार 1950 में अस्पृश्यता पर रोक लगा दी गई. 1955 में अस्पृश्यता-विरोधी कानून और 1989 में उत्पीडऩ विरोधी कानून बनाकर ऐसे सामाजिक भेदभाव के खिलाफ कानूनी सुरक्षा मुहैया कराई गई. इसी तरह रोजगार और शिक्षा में भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा देने के लिए आरक्षण की नीति बनाई गई ताकि उनका आर्थिक और शैक्षिक स्तर ऊपर उठ सके और विधानमंडलों में ये नीतियां साठ साल से भी ज्यादा समय से चल रही हैं. इसलिए हमारे लिए ये सवाल पूछना लाजिमी हो जाता है किरू क्या जाति-आधारित ऊंच-नीच और छुआछूत अब इतिहास की बातें बन गई हैं? क्या दलितों ने ठोस आर्थिक और शैक्षिक विकास हासिल कर लिया है? क्या उन्हें दूसरों के बराबर नागरिक अधिकार मिल गए हैं? आखिर, सिविल सोसायटी और दलितों के राजनैतिक प्रयासों से अब तक क्या हासिल हुआ है? अगर 1950 से पहले की स्थिति पर गौर करें तो हम कह सकते हैं कि उनकी आर्थिक और शैक्षिक स्थिति में फर्क आया है. भेदभाव और अस्पृश्यता के मोर्चे पर भी प्रगति हुई है. लेकिन प्रगति की रफ्तार उम्मीद से बहुत धीमी रही है. दलित आज भी ऊंची जातियों से बहुत पीछे हैं और गरीबी और जातिगत भेदभाव की समस्या बदस्तूर जारी है.

हालांकि सरकारी आंकड़े और अध्ययन बताते हैं कि दलितों के नागरिक अधिकार हासिल करने के मामले में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन छुआछूत आज भी बड़े पैमाने पर जारी है. 1995-2014 के बीच जातिगत भेदभाव और अत्याचार के 2.43 लाख मामले दर्ज हुए हैं. इस हिसाब से साल में औसतन 13,000 मामले बैठते हैं. यह तो सिर्फ एक बानगी भर है, क्योंकि इस तरह के सिर्फ गंभीर मामले ही दर्ज होते हैं.

इंडिया टुडे में फुलन देवी पर कवर स्टोरीआर्थिक क्षेत्र में देखें तो कभी अस्पृश्य समझे जाने वाले दलितों को विभिन्न बाजारों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिनमें श्रम बाजार भी शामिल है. ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पृश्य समझे जाने वाले दलितों को कुछ तरह के कामों के लिए रोजगार नहीं दिया जाता है जैसे कि रेस्तरां में और बच्चों के लिए मिड-डे भोजन तैयार करने के लिए रसोइए का काम. यहां तक कि उन्हें वेटर का काम भी देने से परहेज किया जाता है. उन्हें बड़ी जाति के श्रमिकों के मुकाबले कम दिन के लिए और कम पारिश्रमिक पर रोजगार दिया जाता है, जबकि कुछ दूसरे कार्यों के लिए उनसे जबरन काम कराया जाता है. शहरों में निजी कंपनियों में अगड़ी जातियों के मुकाबले दलितों को इंटरव्यू के लिए कम संक्चया में बुलाया जाता है, भले ही दोनों की योग्यताएं समान हों. दलितों को खेती की जमीन खरीदने में भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है, इसी तरह शहरों में घरों के किराये के मामले में भी दलितों को भेदभाव झेलना पड़ता है.

गैर-कृषि रोजगार और व्यापार के क्षेत्र में दलितों के साथ भेदभाव बरता जाता है. देश में 6 राज्यों के 13 जिलों में 90 दलित उद्यमियों के अनुभवों के आधार पर असीम प्रकाश ने पाया कि विभिन्न बाजारों में अनुसूचित जाति के उद्यमियों और कारोबारियों को जातिगत बाधाओं का सामना करना पड़ा था. संपत्ति की मिल्कियत के मामले में 2012 में कुल ग्रामीण अनुसूचित परिवारों में से 20 फीसदी किसान थे और अन्य 14 फीसदी छोटे उद्यमी या कारोबारी थे, जबकि शहरी इलाकों में यह अनुपात करीब 27 फीसदी था. 2005 के इकोनॉमिक सर्वे ऑफ प्राइवेट एंटरप्राइसेज से पता चलता है कि देश के कारोबारी बाजार में अनुसूचित जाति का हिस्सा मात्र 10 फीसदी था, जो उनकी कुल आबादी से काफी कम है. दलित शिक्षा और नागरिक सुविधाओं में हिस्सेदारी के मामले में भी पीछे हैं. 2014 में उच्च शिक्षा के लिए नामांकन के मामले में अनुसूचित जाति का हिस्सा 22 फीसदी था, जबकि ऊंची जातियों का हिस्सा 42 फीसदी था. इस प्रकार जाति-आधारित भेदभाव और गरीबी दिखाती है कि कुछ हद तक सुधार के बावजूद दलित आज भी बड़े स्तर पर भेदभाव का सामना कर रहे हैं. मानव विकास के मामले में उनके और बाकी के बीच अंतर है. अब भी उन्हें पूर्ण नागरिक का दर्जा हासिल नहीं है—आंबेडकर के शब्दों में वे ''हिंदू समाज का हिस्सा हैं, लेकिन बिल्कुल अलग हिस्सा.''

इंडिया टुडे में दलितों पर आवरण कथादलितों को आज बहुत-सी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों तक उनकी प्रगति का बड़ा स्रोत सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण हुआ करता था. लेकिन निजीकरण की तेजी से बढ़ती दर के कारण वे दोनों स्रोत खत्म होते जा रहे हैं. इस तरह निजीकरण का मतलब आरक्षण खत्म होना है. सरकारी नौकरियों में बहुत तेजी से कमी आई है, जो अब सिर्फ 20 फीसदी है, जबकि 80 फीसदी नौकरियां निजी क्षेत्र में हैं, और निजी क्षेत्र में किसी तरह का आरक्षण नहीं है. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पढऩे वाले छात्रों की संक्चया कुल छात्रों की संख्या का करीब एक-तिहाई है और यहां भी कोई आरक्षण नहीं है. इसलिए 80 फीसदी निजी नौकरियों और 30 फीसदी शिक्षा क्षेत्र में दलितों की हिस्सेदारी बहुत ही कम है. इस प्रकार निजी क्षेत्र में उनके लिए चुनौतियां बनी हुई हैं.

दूसरी चुनौती राजनैतिक मोर्चे पर है. राजनैतिक आरक्षण ने प्रशासनिक और निर्णय लेने के क्षेत्र में दलितों को स्थान दिया है. विधायिका में दलितों को हिस्सेदारी मिलने से वे अपने पक्ष में नीतियां बनाने में योगदान देते हैं. लेकिन उनकी प्रभावी भूमिका की कुछ सीमाएं हैं. यह सीमा चुनावी तरीकों के कारण है. डॉ. आंबेडकर का कहना था कि राजनैतिक आरक्षण के चुनावी सिस्टम के तहत दलितों का चुनाव उच्च जाति के बहुमत वोट पर निर्भर करता है. इससे दलित विधायिका का प्रभाव सीमित हो जाता है. इसीलिए डॉ. आंबेडकर ने उनके लिए एक अलग निर्वाचक मंडल की मांग की थी, जिसमें सिर्फ दलित ही अपने उम्मीदवारों का चुनाव कर सकें. अब चुनावी तरीके में सुधार करने का समय आ गया है, जिससे एक स्वतंत्र दलित विधानमंडल बन सकेगा, जो उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका देगा.

इंडिया टुडे में दलित उत्पीड़न पर आवरण कथाआंबेडकर ने संसदीय लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों के लिए कुछ सुरक्षा का सुझाव दिया था. उनका कहना था कि बहुमत वाली पार्टी जरूरी नहीं कि धर्मनिरपेक्ष होगी. इसलिए उनका सुझाव था कि बहुमत वाली पार्टी के प्रधानमंत्री और मंत्री का चुनाव पूरे सदन की ओर से किया जाना चाहिए, जिसमें बहुमत और अल्पसंख्यक दोनों राजनैतिक पार्टियों का विधानमंडल शामिल हो. आंबेडकर एक अन्य चुनौती को लेकर भी चिंतित थे और वह है उच्च जातियों के प्रभुत्व वाले प्रशासनिक क्षेत्र का भेदभाव. उनका मानना था कि इस भेदभाव के कारण दलितों से संबंधित योजनाओं को लागू करने में समस्या आएगी. सभी सरकारी दफ्तरों में दलित कर्मचारियों का एक संघ होता है, जो लगातार आरक्षण नीति और अन्य योजनाओं को लागू करने के लिए लड़ाई लड़ता है. आंबेडकर ने नीति-निर्माण और अमल करने वाली संस्थाओं में दलित अधिकारियों की भर्ती के लिए कुछ उपाय सुझाए थे.

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के प्रयोग को छोड़ दें तो एक राजनैतिक पार्टी के स्तर पर ज्यादातर राज्यों में उनके बीच राजनैतिक एकता का अभाव है और थोड़ी-बहुत है भी तो वह बहुत कमजोर है, यहां तक कि महाराष्ट्र में भी उनके बीच कोई राजनैतिक गोलबंदी नहीं है.

दलित सिविल सोसाइटी गैर-राजनैतिक संगठन के जरिए अपने दम पर विभिन्न स्तरों पर काम करती है, खासकर सरकारी कर्मचारियों के बीच एक सीमित एजेंडा के साथ. अखिल भारतीय स्तर पर ऐसा कोई संगठन नहीं है जो पूरे देश के स्तर पर किसी तरह का प्रभाव डाल सके. रोहित वेमुला की आत्महत्या, उना और महाराष्ट्र की घटनाओं के मामले में हाल में जिस तरह की जागरूकता और एकता देखी गई, वह इस बात का संकेत है कि ग्रामीण क्षेत्र के मध्य, निम्न मध्य, निम्न वर्ग और युवाओं में भारी चेतना आई है. लेकिन अपनी समस्याओं के समाधान की खातिर एक छतरी के नीचे उन्हें संगठित करने के लिए एक नीतिगत एजेंडे का अभाव है. दलितों की समस्याएं जटिल हो चुकी हैं, इसलिए सामान्य तरीके से उन्हें संगठित करना आसान नहीं है. लेकिन हाल में दिखी चेतना एक बेहतर कल के लिए उक्वमीद जगाती है.

सुखदेव थोराट(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से जुड़े हैं और आइसीएसएसआर के चेयरमैन हैं)

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