बढ़ते शहरीकरण के बीच चीन के पश्चिम में यांग्तसी नदी की विपरीत दिशा में यात्रा करते वक्त अचानक चमचमाती बहुमंजिला इमारतों और विशाल पुलों का भव्य नजारा दिखता है. चीन के दक्षिण-पश्चिम के प्रांतों की पहाडिय़ों को काटकर बनाया गया यह नगर है चोंगचिंग, जो 3.2 करोड़ लोगों की रिहाइश है. यहां के स्थानीय अधिकारी और निवासी इसे दुनिया का सबसे बड़ा शहर बताते हैं. दुनिया के महान शहरों का इतिहास अक्सर भीतरी इलाकों से पलायन करके या फिर समुद्र पार से आए लोगों के चलते अनियोजित और बिखरा हुआ रहा है. इन्हीं प्रवासी लोगों ने न्यूयॉर्क और मुंबई जैसे शहरों को अपने सपनों और आकांक्षाओं के साथ परत दर परत गढऩे का काम किया है. चोंगचिंग एक ऐसे प्रयोग का नाम है जिसने इतिहास की इस दलील को सिर के बल खड़ा कर दिया है. यह शायद दुनिया का पहला महानगर है जो यहां लोगों के आगमन से पहले ही बनना शुरू हो चुका था.
चोंगचिंग की नगरपालिका को पश्चिम के सिचुआन प्रांत के पहाड़ों और घाटियों से काटकर 1997 में विकसित किया गया था. यह पश्चिम में चीन की पहली नगरपालिका बनी, जहां का प्रशासन बीजिंग और शंघाई के स्तर का तैयार किया गया. इसे नीतिगत मामलों में स्वायत्तता और केंद्र्रीय अनुदान तक सीधी पहुंच दी गई. आज 20 साल बाद यह नगर तीन करोड़ से ज्यादा लोगों की रिहाइश बन चुका है—जिनमें 70 लाख लोग खास शहर के भीतर रहते हैं जबकि बाकी शहर की विशाल चैहद्दी और बाहरी इलाकों में फैले हुए हैं जो इसे नगरपालिका की शक्ल देते हैं. इसे यांग्तसी नदी पर बसा शिकागो कहा जा सकता है जो पश्चिमी चीन का आर्थिक और प्रौद्योगिकीय केंद्र्र है (जहां संयोग से दुनिया के एक-तिहाई लैपटॉप बनाए जाते हैं). चीन के योजनाकारों के लिए यह शहर बाकी दूसरे शहरों को विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना में एक नजीर की तरह है.

20-20 योजना
एक ऐसे भारत की कल्पना करें जिसमें 20 मुंबई हों—या कम से कम 20 सुनियोजित मुंबई शहर हों जहां प्रत्येक में दो करोड़ से ज्यादा लोग रहते हों और हर शहर प्रवासियों, आर्थिक तरक्की और नवाचार का केंद्र हो. झाओ जियान अपने बीजिंग स्थित दक्रतर की दीवार पर लगा मानचित्र दिखाते हैं. उस पर समूचे चीन में फैले 20 शहरों को चिन्हित किया गया है—पश्चिम के चोंगचिंग से चीन के मध्य में स्थित वुहान, उत्तर में बीजिंग व दक्षिण में शंघाई, शेंझेन और ग्वांगजू. सरकार के नीति सलाहकार और बीजिंग जियातोंग यूनिवर्सिटी में शिक्षक, शहरीकरण विशेषज्ञ झाओ कहते हैं, ''प्रत्येक दो करोड़ के 20 शहर, ऐसी 20 समेकित अर्थव्यवस्थाएं जो चीनी अर्थव्यवस्था का केंद्र होंगी."
कई साल तक झाओ की शहर केंद्रित योजनाएं उपेक्षित रही हैं. इसकी एक वजह नेतृत्व में संकोच कही जा सकती है जो आर्थिक वृद्धि के केंद्र के बतौर ग्रामीण चीन पर से ध्यान हटाने को लेकर काफी सतर्क रहा. हू जिंताओ-वेन जियाबाओ की पिछली सरकार में अर्थनीति के केंद्र में ''एक नए समाजवादी ग्रामीण क्षेत्र" का निर्माण था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण अधिरचना में पैसा लगाना था. ऐसा इसलिए सोचा गया था ताकि लोगों को गांवों-कस्बों में ही रुकने को प्रेरित किया जा सके. झाओ कहते हैं, ''सरकार बड़े शहरों में आबादी को नियंत्रित करना चाहती थी, लेकिन बाजार लोगों को उलटी दिशा में धकेल रहा था. जाहिर है, लोग वही जाएंगे जहां अवसर होंगे." शी जिनपिंग और ली केकियांग के नेतृत्व में 2012 में जब नया नेतृत्व आया, तो उसने तुरंत नीति परिवर्तन के संकेत दे दिए.
सत्ता संभालने के बमुश्किल पांच दिन बाद ली ने पीपल्स डेली में एक लेख में लिखा कि ''शहरीकरण सिर्फ शहरवासियों की संख्या बढ़ाने या शहरों का क्षेत्रफल बढ़ाने तक सीमित नहीं है. यह औद्योगिक संरचना, रोजगार, जीवन स्थितियों और सामाजिक सुरक्षा के मामलों में ग्रामीण से शहर की ओर संपूर्ण परिवर्तन का मसला है." ली केकियांग ने प्रतिष्ठित पेकिंग यूनिवर्सिटी से शहरीकरण में शोध किया था. उनके सलाहकार मशहूर अर्थशास्त्री ली यिनिंग थे, जो चीन के सर्वाधिक अग्रणी बाजार समर्थक अर्थशास्त्री माने जाते हैं (जिन्हें कुछ लोग ''मिस्टर स्टॉक मार्केट" भी कहते हैं). झाओ मानते हैं कि कई साल तक जनसंख्या के प्रवाह को नियंत्रित करने की कोशिशों के बाद मौजूदा नेतृत्व अब घूम-फिरकर इस अवधारणा तक पहुंचा है कि लोगों को वहां जाने का बाध्य नहीं किया जा सकता जहां बाजार न हो.
इस बदलाव में आर्थिकी भी अपना योगदान दे रही है. चीन का लक्ष्य एक उपभोग चालित और नवाचार चालित अर्थव्यवस्था का निर्माण करना है. उसका नेतृत्व अच्छे से समझता है कि यह बदलाव चीन के शहरों से ही आएगा. झाओ कहते हैं, ''मेरा बुनियादी तर्क यह है कि महानगरों को एक विचार की तरह अपनाया जाना चाहिए क्योंकि वहां कई अर्थव्यवस्थाएं होती हैं और उत्पादन की क्षमता ज्यादा होती है. हर देश में यह बात समान है और चीन या भारत के आकार वाले देशों में तो आपको कम से कम ऐसे 20 महानगर चाहिए होंगे, अगर आप एक सशक्त शहरी अर्थव्यवस्था और लोगों के लिए अच्छे जीवन स्तर की ख्वाहिश रखते हैं."

बड़ी चुनौतियां
कागज पर तो चीन की योजना अच्छी दिखती है लेकिन हकीकत में यह कितनी कारगर होगी? इस दिशा में आने वाली चुनौतियों की एक झलक यांजियाओ में देखने को मिलती है. यह हेबेई प्रांत का एक बाहरी कस्बा है जिसे अगले एक दशक में एक विस्तारित महानगर का हिस्सा बनाए जाने का प्रस्ताव है. यह चीन की सबसे बड़ी मेगासिटी होगी जिसका नाम होगा जिंग-जिन-जी. इसे मौजूदा बीजिंग के साथ पड़ोस के तियांजिन और हेबेई प्रांत (जिसका प्राचीन नाम है जी) के कई कस्बों को मिलाकर तैयार किया जाएगा. पेकिंग यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर झांग चुनशियाओ कहते हैं, ''जिंग-जिन-जी के पीछे बुनियादी विचार यह है कि मानव संसाधन और पूंजी जैसे बीजिंग को मिले लाभों का इस्तेमाल करके उसके आसपास के इलाकों को समेकित रूप से विकसित किया जा सके."
यांजियाओ में बसने वाले शुरुआती लोगों में एक हैं बाइ फैंग, जो तीन साल पहले दक्षिणी प्रांत हुनान से बीजिंग की एक आइटी कंपनी में नौकरी करने आई थीं. बीजिंग में किराया बहुत ज्यादा था, इसलिए बाइ और उनके पति को यांजियाओ में एक छोटा अपार्टमेंट लेना पड़ा जिसका दाम एक-तिहाई था. यहां आने की एक और वजह यह थी कि चीन में मकान का पंजीकरण कराने की परमिट हुकोउ के तहत कोई प्रवासी बीजिंग या शंघाई के निवासी का दर्जा हासिल नहीं कर सकता है. मगर हुकोउ के बगैर मुफ्त स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा भी नहीं मिल सकती.
शहरीकरण की योजना के तहत प्रवासियों को आकर्षित करने के लिए यांजियाओ ने उन्हें शहरी परमिट तो दे दिया, लेकिन बाइ का कहना है कि यहां के स्कूल बीजिंग जितने अच्छे नहीं हैं. वे कहती हैं कि उनके छोटे-से गांव से हर कोई अब अपनी जमीन बेचकर शहर चला गया है. उनकी जिंदगी बमुश्किल एक शहरी सपना बनकर रह गई है. उन्हें रोजाना नौकरी करने के लिए यांजियाओ से बीजिंग के झांगुआंकुन तक एक तरफ दो घंटे का सफर करना होता है. शहर के सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क को विस्तारित करने की योजना के तहत बीजिंग का सबवे यांजियाओ तक पहुंचने में बरसों लग जाएंगे.
यांजियाओ के एक और बाशिंदे हैं यू होंग झोउ. उनके पिता यहीं यांजियाओ में पीढिय़ों से मक्के की खेती करते आए थे. अपने परिवार में वे पहले शख्स हैं जो नौकरी कर रहे हैं. उन्हें यांजियाओ के नवनिर्मित टीवी स्टेशन में नौकरी मिली है. वे कहते हैं, ''अकेले हमारा गांव बचा रह गया है." उनके माता-पिता उन कुछेक लोगों में हैं जो अब भी खेती कर रहे हैं. सरकार ने गांवों की खेती की जमीन खरीद ली और अच्छे-खासे मुआवजे के साथ भूधारकों को यांजियाओ में मुफ्त अपार्टमेंट दे दिए. अचानक बदली इस जिंदगी से ताल्लुक बैठा पाना मुश्किल हो रहा है. किसानों के पास घर भी है और पैसे भी, लेकिन वे खाली बैठे हुए हैं क्योंकि नई शहरी अर्थव्यवस्था में उनके पास काम नहीं है.
निर्णायक मोड़
चीन की अर्थव्यवस्था 2012 में एक निर्णायक मोड़ पर पहुंची जब पहली बार उसकी 70 करोड़ की शहरी आबादी ने ग्रामीण चीन की आबादी को पीछे छोड़ दिया. अगले एक दशक में यह संख्या एक अरब को छू जाएगी. चीन के योजनाकार इस बदलाव को अब स्वीकार कर चुके हैं और वृद्धि को टिकाए रखने तथा एक चुनौतीपूर्ण आर्थिक कायाकल्प के लिए इसे कुंजी के रूप में देख रहे हैं. मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की हालिया रिपोर्ट के अनुसार चीन में शहरीकरण की रफ्तार ने भारत को इस मामले में काफी पीछे छोड़ दिया है (जबकि 1950 में भारत का शहरीकरण चीन से ज्यादा था जब चीन के 13 फीसदी के मुकाबले यहां की 17 फीसदी आबादी शहरों में थी). रिपोर्ट का कहना है कि बाद के 55 वर्षों में चीन में शहरीकरण काफी तेज गति से हुआ जहां शहरीकरण की दर भारत के 29 फीसदी के मुकाबले आज 41 फीसदी पर है.
यह अंतर बढ़ता ही जाएगा और 2025 तक चीन की शहरी आबादी 64 फीसदी होगी जबकि भारत में यह 38 फीसदी रहेगी. रिपोर्ट के मुताबिक, ''सबसे तीखा विरोधाभास यह था कि चीन ने शहरीकरण को गले लगाया है और उसे शक्ल दी है" जबकि भारत ''अब भी शहरी हकीकत की ओर आंख खोलने की मुद्रा में ही है" और यह बात समझने की प्रक्रिया में है कि आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन में शहर किस तरह के अवसर मुहैया कराते हैं. मैकिंजी की रिपोर्ट कहती है कि ''भारत ने अपने शहरी कायाकल्प की ओर बमुश्किल ही ध्यान दिया है जबकि चीन ने शहरीकरण के कामकाजी मॉडल के तकरीबन हर पहलू को लेकर आंतरिक रूप से व्यवहार्य आचार संहिताओं को विकसित किया है." इसमें फंडिंग, राजकाज और योजना सब कुछ शामिल है. रिपोर्ट कहती है कि भारत में शहरों में निवेश बेहद कम होता है. शहरी अधिरचना में पूंजीगत निवेश पर प्रति व्यक्ति सालाना व्यय भारत में महज 17 डॉलर है जबकि चीन में यह 116 डॉलर है.
चोंगचिंग शहर चीन के किसी भी शहर से होड़ लेता है. यहां के एक अधिकारी तांग वेन दो सबक देते हैं. पहला है अधिरचना का टिकाऊ और स्थिर निर्माण, खासकर कम आय वाली आवासीय परियोजनाओं में, जिसमें इस शहर ने विशाल व खुले परिसर बनवाए और उन्हें आबादी की आमद से पहले ही रहने को तैयार कर दिया. दूसरे, प्रवासियों का प्रबंधन करने के नए-नए तरीके तलाशना-जैसे हुकोउ कानून में सुधार तथा किसानों को जमीन बेचने व शहरी आवास खरीदने की अनुमति देना. उन्हें उम्मीद है कि दुनिया का यह सबसे बड़ा शहर हमेशा ऐसे ही अनजान नहीं रहेगा.
चोंगचिंग की नगरपालिका को पश्चिम के सिचुआन प्रांत के पहाड़ों और घाटियों से काटकर 1997 में विकसित किया गया था. यह पश्चिम में चीन की पहली नगरपालिका बनी, जहां का प्रशासन बीजिंग और शंघाई के स्तर का तैयार किया गया. इसे नीतिगत मामलों में स्वायत्तता और केंद्र्रीय अनुदान तक सीधी पहुंच दी गई. आज 20 साल बाद यह नगर तीन करोड़ से ज्यादा लोगों की रिहाइश बन चुका है—जिनमें 70 लाख लोग खास शहर के भीतर रहते हैं जबकि बाकी शहर की विशाल चैहद्दी और बाहरी इलाकों में फैले हुए हैं जो इसे नगरपालिका की शक्ल देते हैं. इसे यांग्तसी नदी पर बसा शिकागो कहा जा सकता है जो पश्चिमी चीन का आर्थिक और प्रौद्योगिकीय केंद्र्र है (जहां संयोग से दुनिया के एक-तिहाई लैपटॉप बनाए जाते हैं). चीन के योजनाकारों के लिए यह शहर बाकी दूसरे शहरों को विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना में एक नजीर की तरह है.

20-20 योजना
एक ऐसे भारत की कल्पना करें जिसमें 20 मुंबई हों—या कम से कम 20 सुनियोजित मुंबई शहर हों जहां प्रत्येक में दो करोड़ से ज्यादा लोग रहते हों और हर शहर प्रवासियों, आर्थिक तरक्की और नवाचार का केंद्र हो. झाओ जियान अपने बीजिंग स्थित दक्रतर की दीवार पर लगा मानचित्र दिखाते हैं. उस पर समूचे चीन में फैले 20 शहरों को चिन्हित किया गया है—पश्चिम के चोंगचिंग से चीन के मध्य में स्थित वुहान, उत्तर में बीजिंग व दक्षिण में शंघाई, शेंझेन और ग्वांगजू. सरकार के नीति सलाहकार और बीजिंग जियातोंग यूनिवर्सिटी में शिक्षक, शहरीकरण विशेषज्ञ झाओ कहते हैं, ''प्रत्येक दो करोड़ के 20 शहर, ऐसी 20 समेकित अर्थव्यवस्थाएं जो चीनी अर्थव्यवस्था का केंद्र होंगी."
कई साल तक झाओ की शहर केंद्रित योजनाएं उपेक्षित रही हैं. इसकी एक वजह नेतृत्व में संकोच कही जा सकती है जो आर्थिक वृद्धि के केंद्र के बतौर ग्रामीण चीन पर से ध्यान हटाने को लेकर काफी सतर्क रहा. हू जिंताओ-वेन जियाबाओ की पिछली सरकार में अर्थनीति के केंद्र में ''एक नए समाजवादी ग्रामीण क्षेत्र" का निर्माण था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण अधिरचना में पैसा लगाना था. ऐसा इसलिए सोचा गया था ताकि लोगों को गांवों-कस्बों में ही रुकने को प्रेरित किया जा सके. झाओ कहते हैं, ''सरकार बड़े शहरों में आबादी को नियंत्रित करना चाहती थी, लेकिन बाजार लोगों को उलटी दिशा में धकेल रहा था. जाहिर है, लोग वही जाएंगे जहां अवसर होंगे." शी जिनपिंग और ली केकियांग के नेतृत्व में 2012 में जब नया नेतृत्व आया, तो उसने तुरंत नीति परिवर्तन के संकेत दे दिए.
सत्ता संभालने के बमुश्किल पांच दिन बाद ली ने पीपल्स डेली में एक लेख में लिखा कि ''शहरीकरण सिर्फ शहरवासियों की संख्या बढ़ाने या शहरों का क्षेत्रफल बढ़ाने तक सीमित नहीं है. यह औद्योगिक संरचना, रोजगार, जीवन स्थितियों और सामाजिक सुरक्षा के मामलों में ग्रामीण से शहर की ओर संपूर्ण परिवर्तन का मसला है." ली केकियांग ने प्रतिष्ठित पेकिंग यूनिवर्सिटी से शहरीकरण में शोध किया था. उनके सलाहकार मशहूर अर्थशास्त्री ली यिनिंग थे, जो चीन के सर्वाधिक अग्रणी बाजार समर्थक अर्थशास्त्री माने जाते हैं (जिन्हें कुछ लोग ''मिस्टर स्टॉक मार्केट" भी कहते हैं). झाओ मानते हैं कि कई साल तक जनसंख्या के प्रवाह को नियंत्रित करने की कोशिशों के बाद मौजूदा नेतृत्व अब घूम-फिरकर इस अवधारणा तक पहुंचा है कि लोगों को वहां जाने का बाध्य नहीं किया जा सकता जहां बाजार न हो.
इस बदलाव में आर्थिकी भी अपना योगदान दे रही है. चीन का लक्ष्य एक उपभोग चालित और नवाचार चालित अर्थव्यवस्था का निर्माण करना है. उसका नेतृत्व अच्छे से समझता है कि यह बदलाव चीन के शहरों से ही आएगा. झाओ कहते हैं, ''मेरा बुनियादी तर्क यह है कि महानगरों को एक विचार की तरह अपनाया जाना चाहिए क्योंकि वहां कई अर्थव्यवस्थाएं होती हैं और उत्पादन की क्षमता ज्यादा होती है. हर देश में यह बात समान है और चीन या भारत के आकार वाले देशों में तो आपको कम से कम ऐसे 20 महानगर चाहिए होंगे, अगर आप एक सशक्त शहरी अर्थव्यवस्था और लोगों के लिए अच्छे जीवन स्तर की ख्वाहिश रखते हैं."

बड़ी चुनौतियां
कागज पर तो चीन की योजना अच्छी दिखती है लेकिन हकीकत में यह कितनी कारगर होगी? इस दिशा में आने वाली चुनौतियों की एक झलक यांजियाओ में देखने को मिलती है. यह हेबेई प्रांत का एक बाहरी कस्बा है जिसे अगले एक दशक में एक विस्तारित महानगर का हिस्सा बनाए जाने का प्रस्ताव है. यह चीन की सबसे बड़ी मेगासिटी होगी जिसका नाम होगा जिंग-जिन-जी. इसे मौजूदा बीजिंग के साथ पड़ोस के तियांजिन और हेबेई प्रांत (जिसका प्राचीन नाम है जी) के कई कस्बों को मिलाकर तैयार किया जाएगा. पेकिंग यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर झांग चुनशियाओ कहते हैं, ''जिंग-जिन-जी के पीछे बुनियादी विचार यह है कि मानव संसाधन और पूंजी जैसे बीजिंग को मिले लाभों का इस्तेमाल करके उसके आसपास के इलाकों को समेकित रूप से विकसित किया जा सके."
यांजियाओ में बसने वाले शुरुआती लोगों में एक हैं बाइ फैंग, जो तीन साल पहले दक्षिणी प्रांत हुनान से बीजिंग की एक आइटी कंपनी में नौकरी करने आई थीं. बीजिंग में किराया बहुत ज्यादा था, इसलिए बाइ और उनके पति को यांजियाओ में एक छोटा अपार्टमेंट लेना पड़ा जिसका दाम एक-तिहाई था. यहां आने की एक और वजह यह थी कि चीन में मकान का पंजीकरण कराने की परमिट हुकोउ के तहत कोई प्रवासी बीजिंग या शंघाई के निवासी का दर्जा हासिल नहीं कर सकता है. मगर हुकोउ के बगैर मुफ्त स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा भी नहीं मिल सकती.
शहरीकरण की योजना के तहत प्रवासियों को आकर्षित करने के लिए यांजियाओ ने उन्हें शहरी परमिट तो दे दिया, लेकिन बाइ का कहना है कि यहां के स्कूल बीजिंग जितने अच्छे नहीं हैं. वे कहती हैं कि उनके छोटे-से गांव से हर कोई अब अपनी जमीन बेचकर शहर चला गया है. उनकी जिंदगी बमुश्किल एक शहरी सपना बनकर रह गई है. उन्हें रोजाना नौकरी करने के लिए यांजियाओ से बीजिंग के झांगुआंकुन तक एक तरफ दो घंटे का सफर करना होता है. शहर के सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क को विस्तारित करने की योजना के तहत बीजिंग का सबवे यांजियाओ तक पहुंचने में बरसों लग जाएंगे.
यांजियाओ के एक और बाशिंदे हैं यू होंग झोउ. उनके पिता यहीं यांजियाओ में पीढिय़ों से मक्के की खेती करते आए थे. अपने परिवार में वे पहले शख्स हैं जो नौकरी कर रहे हैं. उन्हें यांजियाओ के नवनिर्मित टीवी स्टेशन में नौकरी मिली है. वे कहते हैं, ''अकेले हमारा गांव बचा रह गया है." उनके माता-पिता उन कुछेक लोगों में हैं जो अब भी खेती कर रहे हैं. सरकार ने गांवों की खेती की जमीन खरीद ली और अच्छे-खासे मुआवजे के साथ भूधारकों को यांजियाओ में मुफ्त अपार्टमेंट दे दिए. अचानक बदली इस जिंदगी से ताल्लुक बैठा पाना मुश्किल हो रहा है. किसानों के पास घर भी है और पैसे भी, लेकिन वे खाली बैठे हुए हैं क्योंकि नई शहरी अर्थव्यवस्था में उनके पास काम नहीं है.
निर्णायक मोड़
चीन की अर्थव्यवस्था 2012 में एक निर्णायक मोड़ पर पहुंची जब पहली बार उसकी 70 करोड़ की शहरी आबादी ने ग्रामीण चीन की आबादी को पीछे छोड़ दिया. अगले एक दशक में यह संख्या एक अरब को छू जाएगी. चीन के योजनाकार इस बदलाव को अब स्वीकार कर चुके हैं और वृद्धि को टिकाए रखने तथा एक चुनौतीपूर्ण आर्थिक कायाकल्प के लिए इसे कुंजी के रूप में देख रहे हैं. मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की हालिया रिपोर्ट के अनुसार चीन में शहरीकरण की रफ्तार ने भारत को इस मामले में काफी पीछे छोड़ दिया है (जबकि 1950 में भारत का शहरीकरण चीन से ज्यादा था जब चीन के 13 फीसदी के मुकाबले यहां की 17 फीसदी आबादी शहरों में थी). रिपोर्ट का कहना है कि बाद के 55 वर्षों में चीन में शहरीकरण काफी तेज गति से हुआ जहां शहरीकरण की दर भारत के 29 फीसदी के मुकाबले आज 41 फीसदी पर है.
यह अंतर बढ़ता ही जाएगा और 2025 तक चीन की शहरी आबादी 64 फीसदी होगी जबकि भारत में यह 38 फीसदी रहेगी. रिपोर्ट के मुताबिक, ''सबसे तीखा विरोधाभास यह था कि चीन ने शहरीकरण को गले लगाया है और उसे शक्ल दी है" जबकि भारत ''अब भी शहरी हकीकत की ओर आंख खोलने की मुद्रा में ही है" और यह बात समझने की प्रक्रिया में है कि आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन में शहर किस तरह के अवसर मुहैया कराते हैं. मैकिंजी की रिपोर्ट कहती है कि ''भारत ने अपने शहरी कायाकल्प की ओर बमुश्किल ही ध्यान दिया है जबकि चीन ने शहरीकरण के कामकाजी मॉडल के तकरीबन हर पहलू को लेकर आंतरिक रूप से व्यवहार्य आचार संहिताओं को विकसित किया है." इसमें फंडिंग, राजकाज और योजना सब कुछ शामिल है. रिपोर्ट कहती है कि भारत में शहरों में निवेश बेहद कम होता है. शहरी अधिरचना में पूंजीगत निवेश पर प्रति व्यक्ति सालाना व्यय भारत में महज 17 डॉलर है जबकि चीन में यह 116 डॉलर है.
चोंगचिंग शहर चीन के किसी भी शहर से होड़ लेता है. यहां के एक अधिकारी तांग वेन दो सबक देते हैं. पहला है अधिरचना का टिकाऊ और स्थिर निर्माण, खासकर कम आय वाली आवासीय परियोजनाओं में, जिसमें इस शहर ने विशाल व खुले परिसर बनवाए और उन्हें आबादी की आमद से पहले ही रहने को तैयार कर दिया. दूसरे, प्रवासियों का प्रबंधन करने के नए-नए तरीके तलाशना-जैसे हुकोउ कानून में सुधार तथा किसानों को जमीन बेचने व शहरी आवास खरीदने की अनुमति देना. उन्हें उम्मीद है कि दुनिया का यह सबसे बड़ा शहर हमेशा ऐसे ही अनजान नहीं रहेगा.

