लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन से ऐतिहासिक हजरतगंज चौराहे की ओर जाने का रास्ता साफ मुजाहिरा करता है कि सूबे की राजनीति किस कदर जातियों में जकड़ी हुई है. करीब तीन किलोमीटर लंबी इस सड़क पर पड़ने वाले चौराहों पर लगी प्रतिमाएं महापुरुषों के नाम से नहीं, बल्कि उनकी जाति से अपनी प्रासंगिकता साबित करती हैं. यूपी की सत्ता में बीजेपी का 14 वर्ष का वनवास खत्म करने के संकल्प के साथ 11 अप्रैल को पहली बार लखनऊ पहुंचे नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती जातियों के इस चक्रव्यूह में अभिमन्यु जैसा प्रदर्शन करने की है.
लखनऊ पहुंचकर मौर्य ने सबसे पहले केकेसी कॉलेज के निकट पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर पार्टी की विचारधारा के प्रति सम्मान जाहिर किया. इसके बाद हुसैनगंज चैराहे पर महाराणा प्रताप, कैपिटल तिराहे पर वीरांगना अवंतीबाई की मूर्ति, हजरतगंज चौराहे पर महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर और सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर मौर्य ने अपने “मिशन” की शुरुआत की.
फूलपुर के सांसद और पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाले मौर्य राम मंदिर की बजाए नरेंद्र मोदी की तरह विकास के एजेंडे पर आगे बढ़ने की बात कर रहे हैं. इस बारे में उनका कहना है कि राम मंदिर आस्था का विषय है, चुनाव का नहीं. इस मुद्दे पर इनकार की बजाए उनका विस्तृत जवाब देना पार्टी की बदली हुई अंदरूनी रणनीति की ओर इशारा कर रहा है. हालांकि मौर्य इस बात से साफ इनकार करते हैं कि उन्हें पिछड़ी जाति का होने के नाते अध्यक्ष बनाया गया है.
8 अप्रैल को जैसे ही बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यालय ने यूपी, कर्नाटक समेत पांच राज्यों में नए प्रदेश अध्यक्ष का ऐलान किया, लखनऊ के प्रदेश दफ्तर में मौजूद पार्टी के एक बड़े ब्राह्मण नेता कागज-कलम लेकर गणित लगाने लगे. वे बोले, “देखिए, तीन राज्यों में बीजेपी ने ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्षों को हटा दिया. पार्टी में किसी भी बड़े पद पर अब कोई ब्राह्मण नेता आसीन नहीं है.”
यह टिप्पणी भले ही तात्कालिक हो, लेकिन बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन परिस्थितियों को दोबारा जन्म देने से बचने की भी है, जब सूबे के ब्राह्मण मतदाताओं ने 2007 के विधानसभा चुनाव में भगवा दल का साथ छोड़ बीएसपी का दामन थाम लिया था. चुनौती दलितों को लेकर भी है.
बीजेपी बीएसपी अध्यक्ष मायावती का समर्थन करने वाली जाटव बिरादरी से इतर गैर जाटव जातियों पर फोकस कर रही है, लेकिन प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा फांस बन रहा है. अगर बीजेपी दलितों को साधने के लिए प्रमोशन में आरक्षण का समर्थन करती है तो अगड़ी जातियां नाराज हो जाती हैं.
यूपी में विधानसभा चुनाव तक इस मुद्दे से बचते हुए बीजेपी फिलहाल चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष के साथ विधानसभा और विधान परिषद में नेता का नए सिरे से चयन कर जातीय समीकरणों को साधने में जुटी है. उक्त तीन पदों पर ब्राह्मण, ठाकुर और दलित जाति के नेताओं को बिठाने पर विचार हो रहा है.
पिछले लोकसभा चुनाव के बाद एक दर्जन सीटों पर हुए विधानसभा चुनावों के दौरान बीजेपी ने गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ को प्रचार अभियान कमेटी में शामिल कर हिंदुत्व के एजेंडे की परख की थी. यह प्रयोग मुंह के बल गिरा. इसके बाद पार्टी ने हिंदुत्व से कुछ किनारा किया, लेकिन पिछले साल बिहार चुनाव में मिली बुरी हार के बाद पार्टी को यह समझ में आ गया कि केवल नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनावी जंग नहीं जीती जा सकती. बीएचयू के राजनीतिशास्त्र विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. राजेश्वर सिंह कहते हैं, “अगले विधानसभा चुनाव में वोट देने वाले ज्यादातर युवा वे होंगे, जो राम मंदिर आंदोलन के दौर के बाद पैदा हुए होंगे. इन पर हिंदुत्व जैसे मुद्दे असरदार नहीं.”
बीजेपी अब शैक्षणिक संस्थाओं में चल रही “असामान्य” गतिविधियों का विरोध कर राष्ट्रवाद का नारा बुलंद कर रही है. 14 मार्च को लोकसभा सत्र के दौरान केशव प्रसाद मौर्य ने सदन में इलाहाबाद के पास नैनी के एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का आरोप लगाकर संस्थान पर कार्रवाई की मांग की है. इसी प्रकार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की गतिविधियों को भी बीजेपी ने निशाना बनाया था. 

बीजेपी भले ही हिंदुत्व पर नरम रुख अख्तियार कर रही हो, लेकिन विश्व हिंदू परिषद गुपचुप इस मुद्दे को धार देने की तैयारी में है. अब विहिप कार्यकर्ता गांव-गांव में बैठकें कर लोगों से धर्मांतरण, गोवध जैसे भावनात्मक मुद्दों पर राय जानेंगे.
शहरों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी को समझ में आ गया है कि यूपी की सत्ता तब तक दूर है, जब तक गांवों में जनाधार नहीं बढ़ता. अब गांवों में मोदी का काम गिनाकर बीजेपी ने कमल खिलाने की योजना बनाई है. बीजेपी किसान मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय पाल सिंह तोमर कहते हैं, “गांवों तक केंद्र सरकार की योजनाएं पहुंचाने में सबसे बड़ी बाधा राज्य की सपा सरकार है. आपदा पीड़ित किसानों तक अभी भी मदद नहीं पहुंची है.” बीजेपी ने 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती से यूपी में ग्राम स्वराज अभियान की शुरुआत की है. 10 दिनों तक चलने वाले इस अभियान में पार्टी कार्यकर्ता सूबे के 52,000 गांवों में जाएंगे. अंतिम दिन 24 अप्रैल को हर गांव में पंचायत दिवस मनाया जाएगा. इस दिन पूर्वान्ह 11 से 12 बजे के बीच हर गांव की चौपाल में मोदी के भाषण का सीधा प्रसारण दिखाने का प्रबंध बीजेपी कार्यकर्ता करेंगे.
नए कलेवर के साथ 2017 के विधानसभा चुनाव में उतरने जा रही बीजेपी के नए अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के लखनऊ पहुंचने पर उत्साही कार्यकर्ता नारे लगा रहे थे-“केशव मौर्य संत है, सपा-बसपा का अंत है.” बीजेपी के इस “संत” के कमाल की परीक्षा आगामी विधानसभा चुनावों में हो जाएगी.
बीजेपीः केशव का सहारा
आखिरकार बीजेपी ने यूपी की कमान नए हाथों में सौंप दी. विरोधियों और समर्थकों का अपना आकलन है, लेकिन चुनावी नतीजे ही केशव प्रसाद मौर्य की असली परीक्षा.

अपडेटेड 19 अप्रैल , 2016
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