एक भारतीय कूटनयिक ने पाकिस्तान के साथ संबंधों को ऐसे हथियारबंद विरोधी के रूप में आंका है, जो किसी आम आदमी को बंदी बनाकर पीछे से गोलीबारी कर रहा है. ऐसे में हथियार का जवाब हथियार से देने पर आम आदमी को खतरा हो सकता है. भारत की पाकिस्तान नीति की यह गुत्थी वर्ष 2007 के बाद से और उलझ गई है, जब से दो बार निर्वाचित नागरिक सरकारों ने वहां पद तो संभाला है लेकिन सत्ता नहीं. वह तो ताकतवर पाकिस्तानी सेना के कब्जे में ही है.
सेना भले ही बैरकों में है, लेकिन विदेश नीति के मामले वही तय करती है. पाकिस्तानी सेना ही दोनों देशों के बीच के सबसे बड़े हौवे, जिसे भारत सरकार “आतंकवाद का ढांचा” कहती है, की कमान भी अपने पास रखती है. यह इस्लामी आतंकी मशीनरी युवाओं की भर्ती करती है और उन्हें भारत की धरती पर हमले बोलने के लिए हथियार देती है, प्रशिक्षित करती है और उनका “ब्रेनवॉश” करती है.
यह आतंकी मशीनरी दो दशकों से भी ज्यादा समय से सक्रिय है, लेकिन इसका मुख्य काम जम्मू-कश्मीर में अस्थिरता पैदा करना रहा है. लेकिन जब-जब वह आगे बढ़ती है, जैसे कि नवंबर 2008 में मुंबई पर आतंकी हमलों के रूप में हुआ तो भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत को पटरी से उतार देती है. दिसंबर, 2001 में भारतीय संसद पर हमले के बाद तो उसने दोनों देशों को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया था. यह सब भी तब है, जब पाकिस्तानी सेना खुद अपने ही पिछवाड़े घुसे बैठे “बिगड़े आतंकवादियों” से जूझ रही है. उस पाकिस्तानी तालिबान ने कई बर्बर हमलों में हजारों बेगुनाहों की जानें ली हैं.
देश का मिजाज सर्वे में शामिल लोगों में से 62 फीसदी मानते हैं कि सीमा-पार का आतंकवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है (चीन इस सूची में दूसरे स्थान पर, लेकिन बहुत पीछे 27 फीसदी पर है). ऐसे में 46 फीसदी लोग यह मानते हैं कि भारत को सीमा-पार से आतंकवाद के पूरी तरह से खत्म होने तक पाकिस्तान के साथ कोई बातचीत नहीं करनी चाहिए. हालांकि लगता नहीं कि सरकार लोगों की राय पर चल रही है क्योंकि वह बार-बार पाकिस्तान को शांति संदेश भेजने में लगी है.
शायद इन असंगतियों की ही वजह से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि पाकिस्तान के प्रति एनडीए की नीति “एक कदम आगे बढ़ो, दो कदम पीछे हटो” वाली है. यह अलग बात है कि पहले विपक्ष में रहते हुए बीजेपी भी मनमोहन सरकार पर ऐसी ही असंगति का आरोप लगाती रहती थी.
प्रधानमंत्री मोदी के विदेश संबंधों और सत्ता में आने के बाद से उनकी विदेश यात्राओं (अब तक 37) में एक पाकिस्तान ही कमजोर कड़ी रहा है. कुल प्रतिभागियों में से 53 फीसदी यह मानते हैं कि मोदी की विदेश यात्राओं से भारत को लाभ मिला है. पठानकोट हमले से कारगर तरीके से नहीं निबट पाने के लिए आलोचना झेल रही मोदी सरकार के लिए राहत की बात यही है कि 39 फीसदी लोग यह मानते हैं कि सरकार ने हमले को कारगर तरीके से झेला. निश्चित रूप से पाकिस्तान मोदी की विदेश नीति का कड़ा इम्तिहान होने वाला है.
देश का मिजाजः जग जीता, पड़ोस में उलझे
नरेंद्र मोदी ने बाकी पूरी दुनिया को तो मोह लिया है, लेकिन जब पाकिस्तान की बारी आती है तो उसकी सेना दोनों मुल्क की सरकारों की हर अच्छी नीयत को नाकाम कर देती है.

अपडेटेड 23 फ़रवरी , 2016
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