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...मगर राजनीति क्यों खुलने देगी नेताजी का रहस्य

दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से उसी राज का खुलासा हुआ जो सरकार अब तक कहने से डर रही थी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत 70 साल पहले एक विमान हादसे में हो गई थी लेकिन उनकी “गुमशुदगी” को लेकर राजनैतिक पैंतरेबाजी खत्म नहीं हो पाई.

अपडेटेड 1 फ़रवरी , 2016

कम से कम सार्जवनिक रूप से तो भारत सरकार यह मानती है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस 18 अगस्त, 1945 को “लापता” हो गए थे. ऐसा इसलिए है क्योंकि देश की आजादी की लड़ाई के उस सेनानायक की नियति देश की सबसे बड़ी अनसुलझी राजनैतिक पहेली बनी हुई है. तीन जांच आयोग इस मुद्दे को किसी निष्कर्ष पर पहुंचाने में नाकाम रहे हैं और पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक देश के हर प्रधानमंत्री ने यह गुत्थी अपने उत्तराधिकारी को विरासत में सौंपी है.

यही उन वजहों में से एक है कि क्यों इस मुद्दे से जुड़ी “गोपनीय फाइलों” को सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन रखा जाता है, जबकि इन फाइलों में से कुछ तो देश की आजादी के समय की हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 जनवरी, 2016 को नई दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार में एक बटन दबाकर नेताजी से जुड़ी 100 गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक कर दिया जिनमें 15,000 से ज्यादा पन्ने हैं.

इन पीले पड़ते पन्नों का मोटे तौर पर निष्कर्ष यही है कि सरकार लगभग सर्वसम्मत रूप से यकीन करती रही है कि नेताजी 18 अगस्त, 1945 को ताईवान के ताइहोकु में हुए विमान हादसे में मारे गए थे. वह इस बात को पुख्ता तौर पर कहने से हिचकती रही, क्योंकि इससे विवाद खड़ा होने का डर था. नेताजी की 119वीं जयंती पर सार्वजनिक की गई ये फाइलें बताती हैं कि राजनैतिक सत्ता के फैसलों का हर कदम पर बचाव करने के लिए सतर्क नौकरशाही यह चेतावनी देती रही कि नेताजी की मृत्यु की सार्वजनिक घोषणा या यह कहने पर लोग भड़क सकते हैं कि टोक्यो के रेंकोजी मंदिर में रखी अस्थियां उन्हीं की है.

इन गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक करने की फौरी वजह 10 अप्रैल, 2015 के अंक में इंडिया टुडे की वह स्टोरी थी जिसमें यह खुलासा किया गया था कि खुफिया ब्यूरो 20 साल तक नेताजी के परिजनों पर निगरानी रखता रहा. प्रधानमंत्री ने नेताजी के परिजनों से पिछले साल अक्तूबर में मुलाकात की थी और ऐलान किया था कि फाइलों को सार्वजनिक करने का काम 23 जनवरी को नेताजी की 119वीं जयंती से शुरू कर दिया जाएगा.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पिछले साल सितंबर में ही राज्य सरकार के अभिलेखागार में रखी नेताजी से जुड़ी 64 फाइलों को सार्वजनिक करके पहल हथिया ली थी. इस बार उन्होंने यह मांग रखी कि नेताजी को उनकी जयंती पर “राष्ट्रनेता” की उपाधि से नवाजा जाए.

नेताजी को लेकर यह नई सरगर्मी महज संयोग भर नहीं है. पश्चिम बंगाल में चुनाव महज कुछेक महीने दूर हैं. जाहिर है, तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ही नेताजी की विरासत पर अपना दावा ठोकने की होड़ में हैं और इस क्रम में उन्हें बंगाल के कद्दावर नेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं जिन्हें कांग्रेस ने कभी उनका वाजिब हक नहीं दिया.

हाल में सार्वजनिक किए दस्तावेजों में ज्यादातर प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह तथा विदेश मंत्रालयों के बीच हुए पत्राचारों से संबद्ध हैं. उनसे नेताजी की मृत्यु के बारे में सरकारी सक्रियता का पता चलता है. सरकार ने दो जांच आयोग&1956 में शाहनवाज आयोग और 1977 में जी.डी. खोसला आयोग गठित किए. दोनों ने ही यह निष्कर्ष निकाला कि यकीनन ताईवान में हुए विमान हादसे में लगी गंभीर चोटों से नेताजी की मौत हो गई थी. तत्कालीन गृह सचिव के. पद्मनाभैया के दस्तखत वाले 6 फरवरी, 1995 के एक कैबिनेट नोट में कहा गया, “इस बात पर संदेह करने की कोई गुंजाइश नहीं है कि ताइहोकु में 18 अगस्त को हुई विमान दुर्घटना में उनकी मौत हो गई थी. भारत सरकार ने पहले ही इस स्थिति को स्वीकार कर लिया है. इसके उलट किसी भी बात के कोई साक्ष्य नहीं हैं.”

लेकिन जस्टिस मुखर्जी जांच आयोग ने 2005 में यह निष्कर्ष निकालकर सनसनी पैदा कर दी कि ताईवान में उस दिन कोई विमान दुर्घटना ही नहीं हुई थी. आयोग ने कहा, यकीनन नेताजी की मौत हो चुकी है लेकिन विमान हादसे में नहीं बल्कि शायद बढ़ती उम्र के कारण.

सरकार इस निष्कर्ष से दंग रह गई. जनवरी 2006 में गृह मंत्रालय के नौ पन्नों के नोट में जस्टिस मुखर्जी के निष्कर्षों का बिंदुवार जवाब दिया गया था. नोट में इस बात को विस्तार से बताया गया था कि क्यों आयोग ने यह निष्कर्ष निकालने के पीछे पर्याप्त कारण नहीं दिए थे कि नेताजी की मौत विमान हादसे में नहीं हुई थी.

गृह मंत्रालय के नोट में लिखा गया कि मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार कर लेने से नेताजी का रहस्य नहीं सुलझ जाएगा. “इसके उलट, इससे रहस्य गहरा हो जाएगा.” लिहाजा, सरकार ने आयोग के निष्कर्षों को खारिज कर दिया. हालांकि सार्वजनिक हलके में रहस्य कायम रहा.

मुखर्जी आयोग के निष्कर्षों ने नेताजी की मृत्यु के रहस्य को और उलझा ही दिया. नेताजी के विशाल परिवार के एक हिस्से को यह यकीन होने लगा कि उन्हें उनकी मौत के बारे में पूरा सच नहीं बताया जा रहा है. विमान हादसे के प्रत्यक्षदर्शियों की गवाहियों में थोड़ी असंगतता, नेताजी की मौत के बारे में किसी दस्तावेज का अभाव और इन सबसे ऊपर उनके शरीर का कोई भी फोटो उपलब्ध कराने में सरकार की नाकामी से परिजनों का अविश्वास लगातार बढ़ता गया.

अब जबकि उनकी मौत ही रहस्य बन गई थी तो फिर सरकार के लिए भारतीय राजनीति के सबसे विवादास्पद लकड़ी की आठ इंच चौड़ी मंजूषा को तो भारत लाने का कोई सवाल ही नहीं था, जिसमें कथित रूप से नेताजी की अस्थियां रखी हैं. लकड़ी के इस चौकोर डिब्बे में फारमोसा (मौजूदा ताईवान) में 23 अगस्त, 1945 को हुए अंतिम संस्कार के बाद कथित तौर पर नेताजी की अस्थियां भर दी गई थीं. इसे आजाद हिंद फौज ने जापान भेज दिया था जहां उसे मंदिर में रख दिया गया. उसके बाद एक के बाद एक हर सरकार उसे देश लाने में हिचकती रही है.

“अनुकूल अवसर”

आइबी के तत्कालीन संयुक्त निदेशक (बाद में उसके मुखिया बने) टी.वी. राजेश्वर के एक अत्यंत गोपनीय नोट में 19 अगस्त, 1976 को कहा था कि अस्थियों को वापस लाने से और जटिलता ही पैदा होगी क्योंकि उनके परिजन और उनकी पार्टी फॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्य मानते हैं कि ये नेताजी की अस्थियां नहीं हैं. ऐसे में पहले से चल रहे इमरजेंसी में लोग यह समझेंगे कि सरकार उन पर कोई झूठी कहानी थोप रही है. “नतीजतन, अस्थियों को जापान में ही रहने दिया जाए जब तक कि उसके लिए कोई ज्यादा अनुकूल अवसर न आ जाए.”

सरकार अस्थियों को वापस लाने के सबसे करीब 2007 में पहुंची थी. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जापानी सरकार से यह कहने के लिए तैयार थे कि रेंकोजी मंदिर में रखी अस्थियां भारत को सौंप दी जाएं. इससे पहले नेताजी की बेटी अनिता बोस फॉफ ने प्रधानमंत्री से भावपूर्ण अपील की थी कि वे अस्थियों को भारत लाकर उसका कुछ हिस्सा गंगा नदी में प्रवाहित करना चाहती हैं. लेकिन तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सरकार को सुझाव दिया कि इसकी बजाए सरकार अस्थियों को मंदिर में ही रहने दे और अन्य विकल्पों पर विचार करे, जैसे कि मंदिर के रखरखाव के लिए दिए जा रहे खर्च को बढ़ा दे.

वर्ष 1967 से 2005 के बीच विदेश मंत्रालय ने अस्थियों को सुरक्षित रखने के लिए मंदिर को 53.66 लाख रु. की राशि दी. सरकार ने अस्थियों को टोक्यो में भारतीय मिशन में स्थानांतरित करने के प्रस्ताव पर थोड़ा विचार किया लेकिन फिर उसे तज दिया. सरकार को बाद में यह एहसास हो गया था कि इसका भी यही निहितार्थ होगा कि ये नेताजी की ही अस्थियां हैं.

लोकसभा में 1995 में इस सवाल पर कि सरकार की नेताजी की अस्थियों के साथ क्या करने की योजना है, एक विस्तृत जवाब दिया गया. इसमें कहा गया, “नेताजी की मौत का मुद्दा भावनाओं से जुड़ा है और उसे लेकर राय अलग-अलग हैं. भारत सरकार का यह मानना है कि आम सहमति के अभाव में अस्थियों को भारत लेकर आना विभाजनकारी और तनाव पैदा करने वाला हो सकता है.”

अगस्त 1997 में मंदिर में भारत की आजादी की स्वर्ण जयंती मनाए जाने के उत्सव के मौके पर भी जब नेताजी के पूर्व जापानी सहयोगियों ने अस्थियों को भारत लौटाने की पेशकश के बाबत पूछा तो भारत सरकार के अधिकारियों ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया. वह नेताजी की सौवीं जयंती का भी साल था. सरकार ने यही राय जाहिर की-वह समय अस्थियों को भारत लाने के लिए अनुकूल नहीं था. इनमें से कुछ चिंताएं नेताजी की बेटी के तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल को 24 फरवरी, 1998 को लिखे गए दो पन्ने के पत्र से जाहिर भी होती हैं. उनकी बेटी ने भारत सरकार से कहा था कि वह अस्थियों को भारत लाने में और दिल्ली में नेताजी का स्मारक बनवाने में मदद दे.

यह यकीन करते हुए कि उनके पिता की विमान हादसे में मौत हो गई थी, अनिता बोस फॉफ स्पष्ट करती हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद सुदूर पूर्व में उथल-पुथल से लेकर विमान हादसे तक, हर चीज की जानकारी उपलब्ध होने में असंगतता रही.
उन्होंने विमान हादसे के बाद नेताजी की नियति को लेकर चल रही कई साजिशी कहानियों को भी स्पष्ट किया. (उनमें एक के मुताबिक नेताजी ने अपनी मौत का भ्रम कायम किया और चुपके से सोवियत संघ चले गए. बाद में वे चीन के रास्ते भारत लौटकर साधु वेश में रहे.)

अनिता बोस ने गुजराल को लिखा, “विमान दुर्घटना की पहली खबरें आने के बाद मेरी मां और अंकल शरतचंद्र बोस समेत कई लोगों ने यह माना कि उनकी पिछली करामातों की ही तरह (कोलकाता में नजरबंदी से निकलकर जर्मनी और फिर पनडुब्बी से सुदूर पूर्व पहुंच जाना) यह भी कोई उनकी निकल जाने की नई तरकीब रही होगी. नेताजी के प्रति उनका प्रेम उन्हें यह उम्मीद दिलाता रहा कि वे बच निकले होंगे और एक न एक दिन भारत जरूर लौटेंगे. लेकिन समय बीतने के साथ इसकी संभावना कम से कम होती गई.”
नेताजी के पड़पोते आशीष राय कहते हैं, “जिन दस्तावेजों को सार्वजनिक किया गया है उनसे कुछ रहस्योद्घाटन नहीं होता.”

आशीष ने दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने से कुछ ही दिन पहले एक वेबसाइट पर विमान हादसे में नेताजी की मौत होने के कई कथित पुख्ता साक्ष्य जारी किए थे. वे कहते हैं, “कई जानकारियां कुछ इतिहासकारों और नेताजी के परिजनों के एक हिस्से को पहले से थी.”

सार्वजनिक की गई फाइलों से जले हुए सोने के जेवरात और “आइएनए के उस खजाने” यानी सौ किलो से ज्यादा सोने के अवशेषों के चित्र भी जाहिर हुए हैं. कहा जाता है कि नेताजी अगस्त 1945 में आखिरी विमान यात्रा में सोने से भरे दो सूटकेसों को साथ लेकर जा रहे थे. विमान के मलबे के साथ नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय की तिजोरी में रखे 11 किलो के जले हुए जेवर ही नेताजी को ले जा रहे विमान के हादसे के एकमात्र साक्ष्य हैं. लेकिन अस्थियों की ही तरह उनको लेकर भी विवाद है.


राजनैतिक लड़ाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 जनवरी को नेताजी के परिवार को यह भरोसा दिलाया है कि सरकार हर महीने नेताजी से जुड़ी 25 फाइलें सार्वजनिक करेगी. वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने नेताजी के परिवार के लोगों को बताया है कि जिन फाइलों को सार्वजनिक किया जाना बाकी है, उनमें भी कोई बड़ा रहस्य नहीं छिपा है.

प्रधानमंत्री के कदम की सूचना के अधिकार के कार्यकर्ताओं ने सराहना की है. पिछले लगभग एक दशक से नेताजी की फाइलें सार्वजनिक करने के लिए संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं के एक समूह-“मिशन नेताजी” में शामिल रहे अनुज धर कहते हैं, “प्रधानमंत्री मोदी ने एक झटके में वो कर दिया जो कांग्रेस दशकों तक नहीं कर पाई. कांग्रेस को गहरे रहस्यों को बनाए रखने में बड़ा मजा आता था. वर्ष 2007 में मुझे पीएमओ से नेताजी की फाइलें के नाम तक जानने में दो साल लग गए थे.”

जेएनयू में ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र की चेयरपर्सन मृदुला मुखर्जी सरकार में गोपनीयता की संस्कृति बनाए रखने के लिए कांग्रेस की हिचक को जिम्मेदार मानती हैं जिसमें कोई भी नौकरशाह किसी भी दस्तावेज को जाहिर करने की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता. वे कहती हैं, “सिर्फ नेताजी की फाइलें ही क्यों, सरकार ने नेहरू के दौर के किसी भी दस्तावेज को सार्वजनिक नहीं किया है, इमरजेंसी के कागजों तक को भी नहीं.”

दस्तावेजों को सार्जनिक करने का स्वागत करने वाली कांग्रेस ने इसके पीछे बीजेपी के खेल को लेकर भी लोगों को आगाह किया है. कांग्रेस नेता सचिन पायलट कहते हैं, “मौजूदा बीजेपी सरकार के भीतर ऐसी ताकतें हैं जो सरदार पटेल, पंडित नेहरू और नेताजी सुभाष बोस जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के बीच काल्पनिक विभाजन खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं. वह भी तब जब आरएसएस में से किसी ने भी आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं किया था.”

राजनैतिक जानकार एनडीए की पारदर्शिता की कवायद को चार महीने बाद होने वाले पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखते हैं. इस दौड़ में केंद्र से बाजी मारते हुए पिछले सितंबर में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य सरकार के पास मौजूद नेताजी की फाइलों को सार्वजनिक कर दिया था.

राजनैतिक विश्लेषक नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, “कांग्रेस को धूल चटाने के लिए नेताजी को औजार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस में आपस में होड़ चल रही है.” वे वोटों पर असर डालने की नेताजी के मुद्दे की क्षमता पर भी सवाल उठाते हैं. बीजेपी सोचती है कि इसका राजनैतिक फायदा उठाया जा सकता है.

इसी क्रम में 25 जनवरी को नेताजी के भाई शरत चंद्र बोस के पोते और बोस परिवार के प्रवक्ता चंद्र कुमार बोस ने कोलकाता में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रैली में बीजेपी की सदस्यता ले ली. उन्हें विधानसभा चुनावों में खड़ा करने की योजना है. जाहिर है, नेताजी की विरासत के लिए अगली लड़ाई का मैदान पश्चिम बंगाल के चुनाव होंगे.

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