आज से ठीक एक शती पहले फरवरी, 1916 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की नींव रखने वाले पंडित मदन मोहन मालवीय ने एक संदेश के जरिए अपने इस सपने की महत्ता को स्पष्ट किया था. इस संदेश की आखिरी लाइनें हैं, “यह केंद्र जो अस्तित्व में आ रहा है वह ऐसे छात्र प्रदान करेगा जो अपने बौद्धिक रूप से संसार के दूसरे श्रेष्ठ छात्रों के बराबर होंगे, बल्कि एक श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करेंगे, अपने देश से प्यार करेंगे और परमपिता के प्रति ईमानदार रहेंगे.” लेकिन स्थापना के सौवें साल में बीएचयू में उलटी गंगा बहती दिखाई दे रही है. यहां जिन शिक्षकों पर श्रेष्ठ और ईमानदार छात्र तैयार करने का जिम्मा है, उनकी ही ईमानदारी और नैतिकता संदिग्ध है. एक ओर जहां विश्वविद्यालय में हाल में नियुक्त शिक्षकों पर सवाल उठ रहे हैं तो दूसरी ओर डॉ. संदीप पांडेय को लेकर हुआ बवाल भी बीएचयू की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचा रहा है.
बीएचयू के सामाजिक विज्ञान संकाय के इतिहास विभाग में पिछले साल सितंबर में डॉ. अशोक कुमार सोनकर असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर तैनात हुए हैं. इंडिया टुडे के पास मौजूद दस्तावेज स्पष्ट करते हैं कि डॉ. सोनकर का 256 पन्नों का पीएचडी प्रबंध (थीसिस) का करीब 70 फीसदी हिस्सा डॉ. प्रशांत कश्यप की किताब गहड़वालों का इतिहास 1089-1196 से हू-ब-हू नकल किया हुआ है. बाकी हिस्सा बीएचयू लाइब्रेरी में उपलब्ध ओमप्रकाश सिंह के अप्रकाशित शोध प्रबंध गहड़वालों का इतिहासः कुछ राजनैतिक और सांस्कृतिक पक्षों का अध्ययन से उतारा हुआ है.
डॉ. सोनकर के साथ ही इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर चयनित डॉ. सत्यपाल यादव का एक रिसर्च जर्नल में काशी के गंगा घाट शीर्षक से प्रकाशित लेख का काफी बड़ा हिस्सा डॉ. हरिशंकर की किताब काशी के घाटः कलात्मक एवं सांस्कृतिक अध्ययन से नकल किया हुआ है. डॉ. यादव का यह लेख हिंदी में है पर इसमें मौजूद वाराणसी में गंगा के घाटों को बताने वाला एकमात्र चार्ट अंग्रेजी में है.
हैरत की बात तो यह है कि अंग्रेजी में इस चार्ट का शीर्षक टेबल 10: द घाट्स अलांग द रिवर गंगा है. इसकी भी नकल का संदेह इस बात से बढ़ता है कि जब लेख में केवल एक ही चार्ट है तो इसे 10 नंबर का क्यों बताया गया है. नकल किए हुए शोध प्रबंध और लेख के जरिए अपना “एकेडमिक परफॉर्मेंस इंडेक्स” सुधारने वाले ये शिक्षक कैसे छात्र तैयार करेंगे, इसका अनुमान लगाया जा सकता है. बीएचयू के कुलपति प्रो. जी.सी. त्रिपाठी बताते हैं, “इन शिक्षकों की सेलेक्शन कमेटी को इनके नकल किए हुए शोध प्रबंध लेख की जानकारी नहीं थी. अब इसका पता चला है, जिसकी जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी.”
धोखाधड़ी के सबूत मौजूद होने के बावजूद जांच के बाद शिक्षकों पर कार्रवाई करने की बात कहने वाले कुलपति ने अपनी अध्यक्षता में 21 दिसंबर को हुई इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आइआइटी), बीएचयू की बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक में डॉ. संदीप पांडेय का विजिटिंग फैकल्टी के रूप में कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने में जरा भी देर नहीं की. कई विभागों में नियुक्ति संबंधी विवादों से घिरे बीएचयू परिसर से डॉ. पांडेय के निष्कासन ने स्थापना का सौवां वर्ष मना रहे इस प्रतिष्ठित विश्वविख्यात की प्रशासनिक कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है.
बीएचयू और स्टुडेंट आमने-सामने
डॉ. संदीप पांडेय की आइआइटी, बीएचयू से संबद्धता समाप्त किए जाने से आहत छात्र-छात्राएं इस फैसले के खिलाफ धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं. इन्हें बीएचयू के आसपास रहने वाले गरीब लोगों का भी काफी समर्थन मिल रहा है. शिक्षण के क्षेत्र में डॉ. पांडेय के नवोन्मेषों ने उन्हें आइआइटी ही नहीं, बीएचयू के आसपास के इलाकों में भी लोकप्रिय बनाया है. रमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता डॉ. पांडेय अगस्त, 2013 में आइआइटी, बीएचयू के मैकेनिकल और केमिकल इंजीनियरिंग विभाग में “विजिटिंग फैकल्टी” के तौर पर जुड़े थे. वे मुख्यतः बीटेक तृतीय वर्ष के छात्र-छात्राओं को “कंट्रोल सिस्टम”, “प्रॉसेस इंस्ट्रूमेंटेशन” और एक खुद का तैयार किया हुआ पाठ्यक्रम डेवलपमेंट स्टडीज पढ़ा रहे थे.
डेवलपमेंट स्टडीज में समसामयिक राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक विषयों को शामिल किया जाता था. इन मुद्दों से जुड़ी डॉक्युमेंट्री फिल्में दिखाई जाती थीं. खास बात यह थी कि इसमें छात्रों को एक प्रोजेक्ट करना होता था. इसमें छात्रों को कम से कम एक ऐसा काम करना होता था जिससे समाज के सर्वाधिक गरीब और पिछड़े लोग सीधे तौर पर लाभान्वित हों. इसके जरिए आइआइटी, बीएचयू के छात्रों ने आसपास के गांव सुसवाही, छ्यापुर में रहने वाली मुसहर जाति की समस्याओं का निस्तारण किया.
गरीबों के राशन कार्ड बनवाए गए, गंभीर बीमारी से पीड़ित गरीबों को मुख्यमंत्री राहत कोष से मदद दिलवाई गई. जल्द ही आइआइटी बीएचयू का यह प्रोजेक्ट बीएचयू के बाहर लंका और आसपास के इलाकों में लोकप्रिय हो गया. छात्रों ने भी पढ़ाई के इस ढंग को बेहद पसंद किया और एक साल के भीतर कुल 100 से ज्यादा प्रोजेक्ट शुरू हो गए. डॉ. पांडेय के हटने से इन सभी प्रोजेक्ट पर संकट आ गया है.
संघ की सक्रियता से उठे सवाल
केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से बीएचयू परिसर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की गतिविधियों में और इजाफा हो गया है. आंध्र प्रदेश निवासी 24 वर्षीय वेंकट राव संघ से तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त हैं. बीएचयू से तेलुगु विषय में एमए करने वाले वेंकट पिछले छह महीने से विश्वविद्यालय के ब्रोचा मैदान में संघ की शाखा का संचालन कर रहे हैं. वेंकट बताते हैं, “पिछले डेढ़ साल के दौरान बीएचयू परिसर में लगने वाली संघ की शाखाओं में शामिल होने वाले युवाओं की संख्या दोगुनी से ज्यादा हो गई है.”
आरएसएस की यह धमक उस वक्त भी दिखी, जब 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन पर बीएचयू परिसर में निकली शोभायात्रा में संघ के कार्यकर्ता सिर और हाथों पर भगवा कपड़ा बांधे “जय बजरंगी, जय श्रीराम” जैसे नारे लगा रहे थे. आरएसएस की सक्रियता के खिलाफ आवाज उठाने की वजह से ही डॉ. पांडेय भगवा टोली के निशाने पर आ गए थे.
आइआइटी, बीएचयू के डायरेक्टर प्रो. राजीव संगल से 21 दिसंबर को हुई बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक की मिली जानकारी का हवाला देते हुए डॉ. पांडेय आरएसएस को ही अपनी बरखास्तगी का जिम्मेदार ठहराते हैं. वे बताते हैं, “बोर्ड के कुल नौ सदस्यों में से छह ही उस बैठक में मौजूद थे. इनमें बीएचयू के कुलपति प्रो. जी.सी. त्रिपाठी समेत आरएसएस के तीन लोग मौजूद थे. बैठक में जब मुझ पर नक्सलवाद फैलाने का आरोप लगाया गया तो दो न्यूट्रल सदस्य उठकर चले गए और संघ के लोगों ने वाटिंग के जरिए मेरे विरुद्ध फैसला कर दिया.” हालांकि डॉ. पांडेय के इन आरोपों को कुलपति प्रो. जी.सी. त्रिपाठी सिरे से खारिज करते हैं.
विवाद भी कम नहीं
डॉ. पांडेय उस वक्त विवादों में घिर गए थे जब पिछले साल मार्च में उन पर आइआइटी बीएचयू में निर्भया पर बनी बीबीसी की प्रतिबंधित फिल्म दिखाने का आरोप लगा था. हालांकि डॉ. पांडेय कहते हैं, “मैं वह फिल्म छात्रों को दिखाना चाहता था पर तभी पुलिस आ गई. उन्होंने रोका तो मैंने क्लास में दूसरी फिल्म दिखाई.”
2002 में डॉ. पांडेय पटना में सीपीआइ (एमएल) के कार्यक्रम में मेहमान के रूप में मंच पर उपस्थित थे, जिसमें सैन्य अभियान में मारे गए नक्सलियों के परिवारों का सम्मान किया गया था. इसको लेकर भी विवाद हुआ और इसके बाद से डॉ. पांडेय पर नक्सलवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है. 2002 में संसद पर हमले के आरोपी प्रो. सैयद अब्दुर्रहमान गिलानी के बचाव में बनी “सिटिजंस डिफेंस कमेटी” में शामिल होने के बाद से डॉ. पांडेय पर देशद्रोह जैसे आरोप भी लगाए गए थे.
ऐसे आरोपों का संज्ञान लेते हुए आइआइटी बीएचयू ने भले ही प्रो. पांडेय की छुट्टी कर दी हो पर विश्वविद्यालय में नियुक्ति संबंधी विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं. चार महीने पहले बीएचयू के सामाजिक विज्ञान संकाय के इतिहास विभाग में प्रो. अरुणा सिन्हा को तीसरी बार विभागाध्यक्ष बनाए जाने के मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है.
काशी नागरिक समिति के संयोजक सुरेंद्रनाथ ने बीएचयू कुलपति को पत्र लिखकर प्रो. सिन्हा की नियुक्ति में “रोटेशन” के निर्धारित नियमों का पालन न करने का आरोप लगाया है. इसी पत्र के जरिए विश्वविद्यालय प्रशासन को जानकारी दी गई है कि प्रो. सिन्हा पर विभागीय धन के दुरुपयोग का आरोप सिद्ध होने के बाद जांच समिति की संस्तुति पर उनके वेतन से इस धन का भुगतान भी किया जा चुका है.
इसी तरह पत्रकारिता एवं जनसंपर्क विभाग में भी एक शिक्षक को यूजीसी के नियमों को ताक पर रखकर तैनाती देने की शिकायत पर भी विश्वविद्यालय प्रशासन ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है. वहीं बीएचयू की छात्र परिषद के पूर्व महासचिव विकास सिंह एक और तस्वीर पेश करते हैं. विकास कहते हैं, “बीएचयू में छात्र परेशान हैं कि अपनी शिकायत कहां करें? कुलपति के पास भी छात्रों से मिलने का समय नहीं है.”
बीएचयू मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे डॉ. अभिषेक चंद्रा ने संस्थान की गड़बडिय़ों के खिलाफ आवाज उठाते हुए डेढ़ साल पहले इस्तीफा दे दिया था. इस्तीफे के साथ डॉ. चंद्रा ने स्वरचित कविता के जरिए अपना दर्द जाहिर किया था “बंद हो राक्षसों का अट्टहास, टूटे दुष्टों का दुस्साहस, गूंजे मृदु चहुं ओर आपकी स्वरलहरी, महामना बनूं मैं आपका दुर्गप्रहरी.” लगता है, बीएचयू को अब ऐसे ही दुर्गप्रहरियों का इंतजार है.
बीएचयूः ज्ञान का केंद्र या सियासी अखाड़ा?
विजिटिंग प्रोफेसर संदीप पांडेय को हटाए जाने और हाल ही में नियुक्त शिक्षकों को लेकर शिकायतों से सवालों के घेरे में काशी हिंदू विश्वविद्यालय.

अपडेटेड 21 जनवरी , 2016
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