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जारी है धुएं के खिलाफ जंग

बी‌जिंग के अनुभवों से दिल्ली कुछ सबक ले सकती है जहां यह देखा गया है कि सड़क पर वाहनों की पाबंदी का वायु प्रदूषण कम करने पर सीमित असर होता है.

अपडेटेड 21 दिसंबर , 2015

लगातार तीन दिन तक चीन की राजधानी 2010 के पतझड़ में धुएं के एक विशाल पार्किंग लॉट में तब्दील हो गई थी. उस दौरान सड़क के नियमित रखरखाव के एक काम ने दुनिया का सबसे लंबा ट्रैफिक जाम लगा दिया था. यह 100 किलोमीटर लंबा जाम था जो बीजिंग से लेकर हेबेइ के प्रांत तक खिंचता चला गया था जिसमें दो किलोमीटर का सफर तय करने में कारों को पूरे दिन का वक्त लग रहा था. इस जाम को खुलने में कुल 10 दिन लगे. संकट अभी टला नहीं था. जाम लगा हुआ था. ठीक तीन दिन बाद भारी बारिश हुई जिसने धुएं और धूल को तो साफ कर दिया लेकिन बीजिंग के यातायात को दोबारा ठहरा दिया. आधे दिन से ज्यादा वक्त तक 4,321 सड़कों पर जाम लगा रहा.

इन दो घटनाओं ने यातायात और पर्यावरण नियोजकों को शहर की यातायात नीति की समीक्षा करने को बाध्य किया जो 2008 के ओलंपिक खेलों के बाद से बदली नहीं गई थी. ओलंपिक के दौरान बीजिंग ने प्रदूषण कम करने के लिए सम और विषम गाडिय़ों वाली व्यवस्था कुछ समय के लिए लागू की थी जिसके बाद मौजूदा व्यवस्था लागू की गई जिसमें शहर के लोगों को हक्रते में एक दिन कार लेकर बाहर निकलना मना होता है.

बीजिंग की यातायात नीति पर शोध कर चुकीं रेनमिन युनिवर्सिटी की एक प्रोफेसर पिंग क्विन कहती हैं कि शुरुआत में तो ये उपाय काफी आकर्षक जान पड़े थे क्योंकि पहले साल में प्रदूषण का स्तर कम हुआ और जाम में भी राहत मिली थी. शहर में लाइसेंस प्लेट पर निगाह रखने के लिए 2000 कैमरे लगाए गए थे. अधिकतर व्यवस्था स्वचालित थी क्योंकि सरकार को लगता था कि अगर यातायात पुलिस के हाथ में यह काम छोड़ा गया तो भ्रष्टाचार की गुंजाइश रहेगी और यातायात बाधित होगा. उल्लंघन करने वाली गाड़ी पर 100 आरएमबी यानी 1000 रु. का जुर्माना किया जाता और चालक के ऑनलाइन खाते से यह पैसा काट लिया जाता था. भुगतान न होने पर लाइसेंस वापस ले लिया जाता था.

पिंग कहती हैं कि तीन साल के भीतर यातायात का स्तर पहले जैसा हो गया. वे कहती हैं, “बिल्कुल वैसा ही जैसा मेक्सिको सिटी में हुआ था.” वे बताती हैं, “उन्होंने कारों पर जब बंदिश लगानी शुरू की, तो उसके दस साल बाद शहर और ज्यादा प्रदूषित तथा भीड़ भरा हो गया क्योंकि लोग दूसरी गाडिय़ां खरीद रहे थे. बीजिंग में भी ऐसे ही साक्ष्य मिले कि पुरानी गाडिय़ों का बाजार अचानक तेज हो गया था.”
सरकार ने इसके बाद सम-विषम वाली व्यवस्था को और सीमित करने के खिलाफ फैसला लिया. जानकार बताते हैं कि इस कदम के पीछे तीन कारण थे. पहला यह कि योजनाकारों को लगा कि इस कदम के चलते चीन के मध्यवर्ग और संकटग्रस्त मुसाफिरों का आक्रोश भड़क सकता है (बावजूद इसके कि बीजिंग में दुनिया का सबसे लंबा सबवे सिस्टम है जो 600 किलोमीटर लंबा है)- चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के योजनाकारों के लिए यह संभावना ठीक नहीं होती जो वैसे भी असंतोष के प्रति सतर्क रहते हैं.

दूसरे, इससे पुरानी कारों की खरीद और ज्यादा बढ़ जाती. इसलिए सरकार एक और समाधान लेकर आईरू उसने हर महीने गाडिय़ों के पंजीकरण की संख्या को सीमित कर दिया. शंघाई पहला चीनी शहर था जिसने सिंगापुर की तर्ज पर मासिक नीलामी प्रणाली शुरू की. ये उपाय काफी कारगर रहे हैं जिसके चलते जाम कम हुआ है और स्थानीय सरकारों को पैसे की भारी आमद हुई है क्योंकि पंजीकरण की लागत अब एक लाख आरएमबी यानी 10 लाख रु. तक जा पहुंची है. बीजिंग ने इस मामले में ज्यादा लचीला रुख दिखाया&उसने लॉटरी से हर महीने 17,600 पंजीकरण जारी करने का फैसला लिया. पिंग कहती हैं, “जाम कम हुआ है और वाहनों की वृद्धि भी सुस्त हुई है.”

तीसरा कारण प्रदूषण के स्रोतों पर किया गया वह अध्ययन था जो सरकार ने करवाया था, जिसमें पाया गया कि कुल उत्सर्जनों में वाहनों की हिस्सेदारी सिर्फ एक-तिहाई है. अध्ययन से पता चला कि इस वजह से सम-विषम वाली बाध्यता से होने वाले लाभ समूची वाहन चालक आबादी को परेशान करने के लिहाज से बेहद मामूली होंगे. अधिकतर कारों से होने वाला प्रदूषण 31.1 फीसदी था जबकि बाकी उत्सर्जन के लिए कोयला (22.4 फीसदी), अन्य औद्योगिक उत्सर्जन (18.1 फीसदी) और धूल (14.3 फीसदी) जिम्मेदार था.

बीजिंग में दोपहिया वाहनों से प्रदूषण का सवाल ही नही उठता क्योंकि शहर में केवल बैटरी से चलने वाली इलेक्ट्रिक बाइकों की ही अनुमति है. ग्रीनपीस के लिए बीजिंग में जलवायु और ऊर्जा प्रचार अभियान चलाने वाले दोंग लियानसाइ बताते हैं कि इसी कारण से सरकार का सारा ध्यान सड़क यातायात की बजाए कोयले से चलने वाले उद्योगों को सीमित करने और उत्सर्जन के मानकों में सुधार लाने पर ज्यादा है.

उन्होंने बताया, “सरकार ने कई उत्सर्जन मानक जारी किए, एक पर्यावरण और वायु प्रदूषण कानून बनाया (जो उल्लंघन करने वालों के लिए दंड का प्रावधान करता है) और बीजिंग के भीतर चार में से तीन कोयला चालित संयंत्रों को बंद कर दिया.” आखिरी संयंत्र 2016 के आरंभ में बंद किया जाना है. दोंग का शोध बताता है कि इसके चलते साल के पहले नौ महीनों में पीएम 2.5 का स्तर पिछले साल के मुकाबले 12 फीसदी नीचे गिर गया.

यह बात अलग है कि दिसंबर के शुरुआती दो हफ्ते में बीजिंग की तस्वीर कुछ उलट दिखी जब एक बार फिर पूरे शहर पर धुंध के बादल छा गए. सरकार ने 7 दिसंबर को पहली बार धुएं के लिए “रेड अलर्ट” जारी किया. चार श्रेणियों वाली चेतावनी प्रणाली में यह सर्वोच्च था जिसके तहत स्कूल बंद कर दिए जाते हैं, सारा निर्माण कार्य रोक दिया जाता है और अस्थायी रूप से सम-विषम नंबरप्लेट वाली व्यवस्था लागू कर दी जाती है. तीन दिनों के लिए जारी इस रेड अलर्ट के पीछे अगले तीन दिनों का वह पूर्वानुमान था जिसमें पीएम 2.5 के स्तर को 200 के पार बताया गया था.

इस चेतावनी का स्वास्थ्य जानकारों और हरित समूहों ने स्वागत किया. चीन में विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिनिधि बर्नार्ड सवार्टलैंडर ने कहा, “पहला, यह लोगों में प्रदूषण के स्तरों की गंभीरता का संदेश देता है; दूसरे, यह सरकार के तुरंत प्रदूषण स्तर कम करने के लिए कुछ कदमों को प्रोत्साहित करता है- मसलन, निर्माण स्थलों और कारखानों की बंदी और यातयात प्रतिबंध, इत्यादि.”

दोंग बताते हैं कि वायु प्रदूषण में आया यह उछाल ऊर्जा की बढ़ी हुई मांग और कोयला जलाकर पैदा की गई ऊर्जा से आया था जिससे कड़ाके की असामान्य ठंड में बीजिंग के सेंट्रल हीटिंग सिस्टम को चालू रखा जाना था. वे कहते हैं, “इस चेतावनी के बावजूद इसमें कोई शक नहीं कि हवा की गुणवत्ता में लंबी अवधि में काफी सुधर आया है.” धुएं के खिलाफ बीजिंग की जंग अभी खत्म नहीं हुई है, लेकिन इतना तय है कि उसकी जंग सही दिशा में जा रही है.

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