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एक आर्टिस्ट की असहज मौत

एमएस यूनिवर्सिटी-बड़ौदा में कभी सबकी चहेती मुंबई में एक दिन नृशंसतापूर्वक काटकर सीवर में पटक दी गई. आर्टिस्ट हेमा उपाध्याय की यात्रा सबसे त्रासद प्रेमकथाओं में से एक बनकर रह गई.

अपडेटेड 21 दिसंबर , 2015

बारह दिसंबर को शनिवार के दिन शाम 6 बजे मुंबई के पेडर रोड पर स्थित जिंदल मैनशन की लॉबी में जानेमाने कलाकार सुधीर पटवर्धन और गीव पटेल के अलावा समकालीन कलाकार शिल्पा गुप्ता “दिस सिटी रिमाइंड्स मी ऑफ एनदर” विषय पर आयोजित आर्ट इंडिया परिचर्चा के लिए तीन पैनलिस्टों की कुर्सियों पर आसीन थे. इसका आयोजन अभय सरदेसाई ने किया था. चौथी कुर्सी, जो हेमा उपाध्याय के लिए आरक्षित थी, खाली पड़ी थी.

यह बात सभी के लिए समझ से परे थी. सांस्कृतिक थियोरिस्ट शिल्पा फड़के ने उपाध्याय के काम पर एक पेपर अपने हाथ में पकड़ रखा था. वे समझ नहीं पा रही थीं कि क्या किया जाए. गुप्ता ने सुझाव दिया कि वे हेमा का काम दिखा दें और पेपर पढ़ दें. वहां उपस्थित कलाकार थोड़े अप्रसन्न थेः कला जगत ऐसी जगह नहीं है जिसमें कलाकार समय देकर न पहुंचें. हेमा का फोन बंद आ रहा था. और चूंकि वे अकेले रहती थीं, इसलिए किसी को नहीं पता था कि उनकी जान-पहचान वाले किस व्यक्ति को फोन किया जाए.

उसी समय मुंबई के उत्तरी उप नगर कांदीवली पश्चिम में मोरेकरवाड़ी-धानुकरवाड़ी श्मशान के पास झुग्गियों में कूड़ा बटोरने वाले एक आदमी ने प्लास्टिक की सफेद चादरों में लिपटे दो कार्डबोर्ड देखे. इनमें से एक में से एक पैर बाहर निकला दिखाई दे रहा था. शाम 7.30 बजे कांदीवली पश्चिम की पुलिस के पास दो शव मिलने की खबर आई. फायर ब्रिगेड ने इन बक्सों को निकाला और दो अफसरों ने इनमें से लाशों को बरामद किया. महिला ने काली पैंट और काली शर्ट पहन रखी थी और शर्ट पर लाल रंग के फूल बने हुए थे जबकि दूसरी लाश एक पुरुष की थी जिसने भूरे रंग की पैंट और नीले रंग की शर्ट पहन रखी थी. उसके हाथ रस्सियों से बंधे थे, आंखों पर पट्टी बंधी थी और डक्ट टेप से गला घोंटा हुआ था.

उस समय तक मुंबई में कला की छोटी-सी दुनिया में घबराहट फैल रही थी. शुक्रवार (11 दिसंबर) की रात हेमा, जो वडोदरा में पली-बढ़ी एक सिंधी-गुजराती महिला थीं और अपनी मां बीना हीरानी के बेहद करीब थीं. हेमा ने अपनी मां को बताया था कि वे रात के भोजन के लिए बाहर जाने वाली हैं. इस पर, उनकी मां ने चुटकी लेते हुए उनसे कहा था कि तुम मांसाहारी खाना पा जाओ तो जमकर खाती हो. लेकिन हेमा ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि वे एक गुजराती घर में खाना खाने जा रही थीं. फोन पर कई बार संपर्क करने की कोशिश के बाद शनिवार की सुबह हेमा के घरेलू नौकर ने उनकी मां, दिल्ली में रहने वाले उनके पूर्व पति चिंतन उपाध्याय, गैलरिस्ट और करीबी दोस्त शिरीन गांधी और मुंबई में कलाकार दंपती रीना और जितीश कल्लाट को बता दिया था कि कुछ गड़बड़ लग रहा है. उसने शनिवार की सुबह ही कांदीवली पुलिस स्टेशन में उनके लापता होने की शिकायत दर्ज करा दी थी.

उससे पहले की रात वकील हरीश भंभानी की बेटी अनीता भंभानी ने भी माटुंगा पुलिस स्टेशन में पिता के लापता होने की शिकायत दर्ज करवाई थी. वे भी कई बार अपने पिता के फोन पर संपर्क करने की कोशिश कर चुकी थीं लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिल रहा था.
कलाकार शिल्पा गुप्ता की रिश्तेदार रीना कल्लाट का भी संदेह तब और बढ़ गया जब उनके पति जितीश ने उनके पिता को फोन किया और पता चला कि हेमा उस दिन गुप्ता की पैनल चर्चा में भी नहीं पहुंची थीं. 13 दिसंबर को रविवार के दिन सुबह 4.30 बजे रीना ने अपने मित्रों और रिश्तेदारों को संदेश भेज यह जानने की कोशिश की कि क्या उनमें से किसी को हेमा के बारे में कोई जानकारी है. रविवार की सुबह जब उन लोगों ने डिब्बे में बंद दो शवों के बरामद होने की छोटी-सी खबर अखबार में पढ़ी तो गुप्ता के मुताबिक उन सभी को यही लगा कि ऐसी घटनाएं तो दूसरों के साथ होती हैं. लेकिन तब उन्हें यह पता नहीं था कि अगले चौबीस घंटे उन्हें गलत साबित कर देंगे.

शवों की पहचान
सुबह 9 बजे जांच अधिकारी सब-इंस्पेक्टर राठौर ने लाशों की पहचान करने के लिए उन पर से टेप हटाए थे. वे लापता व्यक्तियों की तस्वीरों से लाशों का मिलान कर चुके थे. माटुंगा पुलिस ने किंग्स सर्कि ल के सिल्वरनेस्ट में भंभानी की बेटी को और जुहू में हेमा के घरेलू नौकर को इस बारे में सूचित कर दिया था. नौकर ने बाद में हेमा के सभी मित्रों को सूचित कर दिया. दिन के 11 बजे शिरीन गांधी और उनके पति कुरुश जंगवाला, अर्चना हांडे और कल्लाट दंपती पुलिस स्टेशन पहुंच चुके थे. चिंतन उपाध्याय विमान में थे और दिल्ली से कहीं बाहर जा रहे थे.

घरेलू नौकर ने फूले हुए और विकृत हो चुके शव को, जो उस समय तक पहचानने लायक नहीं रह गया था, को उसके कपड़ों के कारण पहचान लिया. वह हेमा का ही शव था. शव पर वही कपड़े थे जो 11 दिसंबर को दिन के 11 बजे अंधेरी स्टुडियो के लिए निकलते समय हेमा ने पहन रखे थे. दिन के 11.30 बजे तक गांधी ने अपने मित्रों को बता दिया था कि कलीना फोरेंसिक लेबोरेटरी में पोस्टमार्टम की मेज पर जो लाश पर पड़ी है, वह किसी और की नहीं बल्कि उन सबकी चहेती कलाकार हेमा की है.

रविवार की दोपहर चिंतन उपाध्याय को पूछताछ के लिए बुलाया गया और प्रेस के पास संदिग्ध के तौर पर ले जाने के वक्त तक उन्हें हिरासत में रखा गया. 14 दिसंबर को सोमवार की शाम फैब्रिकेशन कामगार शिवकुमार (उर्फ साधु राजभर) को भंभानी और उपाध्याय के क्रेडिट कार्डों और डेबिट कार्डों के साथ वाराणसी से पकड़ा गया. उसने कैमरों के सामने हत्या के अपराध को स्वीकार कर लिया, हालांकि इस तरह का सार्वजनिक “कबूलनामा” अदालत में मान्य नहीं होता है.

हत्या में कथित रूप से उसके सहयोगियों आजाद राजभर, प्रदीप राजभर और विजय राजभर को बाद में मुंबई से गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. विद्यासागर राजभर कांदीवली में उस गोदाम का मालिक है जहां हत्या किए जाने का संदेह है. उसकी तलाश जारी है. साधु राजभर के मुताबिक, विद्यासागर ही असली गुनाहगार है. फैब्रिकेटरों की यह पूरी टीम पिछले छह साल से हेमा के साथ काम कर रही थी. यह फैक्टरी विद्यासागर के पिता दो साल पहले मौत से पहले तक चला रहे थे. शुरुआती छानबीन से पता चला है कि विद्यासागर और हेमा के बीच 5 लाख रु. को लेकर कोई विवाद चल रहा था. विद्यासागर ने इलाज के खर्च के लिए चिंतन से 6 लाख रु. उधार लिए थे और उनके खर्चे पर जयपुर में फैब्रिकेशन की ट्रेनिंग लेने के लिए जा चुका था.

संदेह के घेरे
चिंतन उपाध्याय पर शक जाहिर किया जाने लगा तो इस जोड़े को पिछले बीस से जानने वाली कलाकारों की बिरादरी यह मानने को कतई तैयार नहीं थी कि इस हत्या के पीछे उनकी मिलीभगत हो सकती है. इस शक की वजह माटुंगा की अस्तित्वहीन संपत्ति (परिवार, मित्रों, चिंतन के वकीलों और मुंबई पुलिस की ओर से अस्तित्वहीन होने की पुष्टि) के अलावा जुहू की एक संपत्ति थी. चिंतन के पिता विद्यासागर उपाध्याय, जो अमूर्त चित्रकार के तौर पर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं, सांताक्रूज के श्मशान में हेमा के अंतिम संस्कार के समय जयपुर से पहुंचे थे. उन्होंने भी हत्या के पीछे बेटे का हाथ होने से साफ इनकार किया है.

अंतिम संस्कार के समय चिंतन के साथ सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी भी मौजूद थे. पुलिस (अपराध) के संयुक्त आयुक्त देवेन भारती कहते हैं, “चूंकि दोनों पक्ष जीवित नहीं हैं इसलिए बयानों की पुष्टि करना कठिन हो गया है. हम गवाहों की तलाश कर रहे हैं.” यह सुनिश्चित नहीं किया जा सका है कि क्यों हेमा अपने वकील 62 वर्षीय हरीश भंभानी के साथ 11 दिसंबर को रात 8.30 बजे अनजान लोगों से गोदाम में मिलने चल पड़ी थीं. पुलिस भी असमंजस में है कि पूछताछ में जो वजहें बताई गई हैं-कि विद्यासागर ने 5 लाख रु. के लिए हेमा की हत्या की और संपत्ति को लेकर विवाद था या वैवाहिक झगड़ा था&वे वास्तव में सही हैं.

सबकी नजर का नूर
एमएस यूनिवर्सिटी, बड़ौदा (एमएसयू) में बेचलर ऑफ फाइन आर्ट्स के ग्रुप फोटोग्राफ में हेमा बिखरे बालों और खिली मुस्कान के साथ नजर आती हैं. वे आमतौर पर नीली जींस और सफेद रंग की शर्ट पहनती थीं और तस्वीर में सबसे अलग चमकती हुई नजर आती थीं. इरोज फिल्म्स में क्रिएटिव डायरेक्टर और एमएसयू में उनके जूनियर रहे वैभव विशाल बताते हैं कि न्न्लास में वे सबकी पसंदीदा हुआ करती थीं और सभी को ताज्जुब होता था कि आखिर उन्होंने चिंतन में ऐसा क्या देखा कि उनके साथ शादी कर ली, क्योंकि चिंतन तो हेमा के विपरीत दबंग और ढीठ स्वभाव वाले थे.

चेमोल्ड गैलरी में 2014 में साथी कलाकारों अनुज डोडिया, ध्रुवी आचार्य, अर्चना हांडे और अन्य साथियों के साथ ग्रुप फोटो में हेमा, जो उस समय उपाध्याय थीं और जिनका तलाक का मामला चल ही रहा था, किसी एक कोने में खोई हुई और कैमरे की नजर से आंख चुराती हुई दिखाई दे रही थीं. हमेशा से ऐसा नहीं था. उनके दोस्त 1990 के दशक में चिंतन और हेमा के शुरुआती साझा शो के बारे में याद करते हैं. 1998 में कॉलेज से निकलने और शादी के कुछ ही दिन बाद मुंबई को अपना निवास बनाने के बाद दोनों ने एक-दूसरे का चुंबन लेते हुए अपनी एक बड़ी-सी तस्वीर ब्रोशर के आवरण पर लगाई थी. जहांगीर आर्ट गैलरी में वह तस्वीर एकदम अलग दिखाई पड़ती थी. यह तस्वीर उस समय भी रुढ़िवादी कला बिरादरी के लिए हैरानी की बात थी. अगर वे दोनों ज्यादा मशहूर हस्ती होते तो निश्चित ही शिवसेना ने हंगामा करके उसे वहां से हटवा दिया होता.

चिंतन और हेमा की जोड़ी ने नई दिल्ली में 10वीं अंतरराष्ट्रीय कला त्रैवार्षिकी में प्रतिष्ठित त्रैवार्षिकी पुरस्कार जीता था. यह 2001 का साल था, जब हेमा ने अपना पहला एकल शो “द निंफ ऐंड द एडल्ट” आयोजित किया. इस दंपती ने 2003 में एक बार फिर “मेड इन चाइना” नाम से साझा शो किया. लेकिन उनके काम एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे. हाल ही में विवादित उड़ती गाय वाली प्रदर्शनी में चिंतन, जिनकी कलाकृति में कोई भूमिका नहीं थी, ने अपना नाम भी इसमें जुड़वा दिया और प्रचार का फायदा उठाने के लिए कलाकार सिद्धार्थ करवाल के साथ खड़े रहे. 2002 में वडोदरा में आयोजित एक प्रदर्शनी में उन्होंने बफ में तस्वीर खिंचाई.

कला संग्रहकर्ता-अभिनेता-निर्देशक आशीष बलराम नागपाल की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने साथ मिलकर कला को भव्यता में बदलने का काम किया. चिंतन ऐसे पहले कलाकार थे जिन्होंने बॉक्वबे टाइम्स के मुखपृष्ठ पर अपने शो “कमेमोरेटिव स्टांप्स” के लिए एक विज्ञापन निकाला और पेज-3 पर दिखने की आदत बना ली. वे कला को बड़े स्तर पर उतारने में विश्वास करते थे. इसीलिए उन्होंने राजस्थानी लघु चित्रों को निर्वस्त्र बच्चों के अपने “गंदा बच्चा” सीरीज में पेंट करने के लिए कलाकारों की सेवाएं लीं और उन्हें अपनी कंपनी “चिंतन अनलिमिटेड” का नाम दिया.

हेमा, जिनके बारे में उनके एक मित्र का कहना है कि वे “उनके प्लस वन्य में बदल गई थीं, ने इस सब की अनदेखी कर दी और कैमरों के सामने मुस्कराती हुई खामोशी से उनके पीछे चलती रहीं. उन्होंने लंदन में ग्रासवेनर वाडेहरा, सिंगापुर में बोधि आर्ट, रोम में मार्को, वेरोना में स्टुडियो ला सिट्टा जैसी नामी-गिरामी गैलरियों में शो किए. वे संवेदनशील, नारीवादी और स्वतंत्र कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध हो चुकी थीं. उनकी कृतियों में उनका वैचारिक संघर्ष साफ नजर आता था.

उनकी हत्या से विचलित किरण नाडर, जिनके किरण नाडर म्युजियम ऑफ आर्ट्स में हेमा की 12 गुणा 12 आकार की कृति लगी है, याद करते हुए बताती हैं कि हेमा का काम बहुत शानदार था. बोस्टन फाइन आर्ट्स म्युजियम में होने वाले उनके आगामी शो का शीर्षक “बिल्ड मी ए नेस्ट सो आइ कैन रेस्ट” था. 2010 में जब चिंतन ने अपनी वकील मृणालिनी देशमुख के जरिए तलाक के लिए अदालत में मामला दाखिल किया था तो उस समय तक दोनों अपनी-अपनी दुनिया में पूरी तरह रम चुके थे.

एक घोंसले की तलाश
अश्लीलता के झूठे आरोपों के बावजूद, जिसे लेकर पति-पत्नी के बीच झगड़ा था, हेमा ने 2010 में महिलाओं का अश्लील प्रतिनिधित्व (निषेध) विधेयक के तहत शिकायत दर्ज कराई थी और चिंतन को मनोरोगी और शराबी बताया था. देशमुख कहते हैं, “हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में बॉम्बे हाइकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी, लेकिन दोनों एक-दूसरे के प्रति सम्मान के साथ पेश आते थे.

हेमा अदालत में चिंतन और उनके वकीलों को पूरा सम्मान देती थीं, जबकि वे निर्वाह के लिए अदालती लड़ाई लड़ रही थीं. अदालत ने उनकी मांग खारिज कर दी थी, क्योंकि वे अपेक्षाकृत ज्यादा संपन्न थीं. अदालत ने 2014 में दोनों को तलाक की अनुमति दे दी थी, लेकिन एक शर्त के साथ, जो इस बात की गारंटी देता था कि दोनों के बीच पैसों का विवाद खत्म होने से पहले चिंतन दूसरी शादी नहीं कर सकते थे.

हेमा के वकील भंभानी अपील कर रहे थे कि तलाक गलत तरह से दिया गया था. चिंतन के वकील नितिन प्रधान कहते हैं, “मैंने हाइकोर्ट में उनका केस देखने से मना कर दिया था. मैंने उनसे कहा था कि मैं ऐसे केस नहीं लेता हूं जिनमें मुवक्किल वकीलों से किराए का टट्टू होने की उम्मीद करता हो.” प्रधान कहते हैं कि चिंतन और हेमा अदालत में एक-दूसरे के साथ मुस्करा कर अभिवादन किया करते थे. वे आपस में मजाक करते थे और फिर साथ-साथ खाना भी खाया करते थे और उम्मीद करते थे कि उनके वकील ही आपस में भिड़ते रहें.

2014 में जब चिंतन ने दिल्ली की अदालत में मामला डाला तो उसके बाद भी वे मुंबई जाने पर जुहू में अपने घर में एक साथ रहा करते थे और हेमा उनके लिए खाना पकाया करती थीं. अदालत में तलाक के मामले पर लड़ाई करते हुए और चिंतन की ओर से निर्वाह का पैसा देने से इनकार करने के बाद भी दोनों के बीच इस तरह का सहज संबंध बना हुआ था.

प्रधान कहते हैं, “हत्या के मामले में चिंतन का नाम दर्ज करना पुलिस की एक औपचारिकता भर है.” उन्हें पूरा विश्वास है कि चिंतन का नाम बेदाग साबित होगा. अदालत की ओर से 40,000 रु. प्रतिमाह देने या आवेदन के दिन से अब तक 4 लाख रु. देने के आदेश के बाद चिंतन ने प्रधान के जरिए 10 दिसंबर को हेमा के लापता होने से एक दिन पहले इसकी आधी रकम और 2 लाख रु. का चेक हेमा को भेजा था. अंतिम संस्कार के समय हेमा के शव को देखकर जब चिंतन रो पड़े थे तो यह दोनों की प्रेम कहानी का यह सचमुच एक दुखद अंत था. एक ऐसी प्रेम कहानी जिसमें दोनों कलाकार अपनी कलात्मक कृतियों के कारण अपनी अलग पहचान रखते थे.

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